अक्टूबर 2018

रॉफेल सौदे में बेपर्दा हुआ सरकार का झूठ

प्रवीण मल्होत्रा

फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि अरबों डॉलर के रॉफेल विमान सौदे में दसॉल्ट एविएशन का साझेदार बनाने के लिए भारत सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेन्स के अलावा दूसरा कोई विकल्प हमें नहीं दिया था। इस खुलासे के बाद साफ हो गया है कि रॉफेल सौदे में अनिल अंबानी की कंपनी को जो 21 हजार करोड़ रुपये दिलाए गए हैं वह सीधे-सीधे कमीशन की राशि है।

फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने एक प्रसिद्ध वेबसाइट पत्रिका 'मीडिया पार्ट' को दिए गए इंटरव्यू में स्पष्ट रूप से यह कहा है कि राफेल डील के समय अनिल अंबानी का नाम भारत सरकार ने ही दिया था और हमारे पास उसे स्वीकार करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं था, जबकि उन्होंने इससे पूर्व अनिल अंबानी का नाम तक नहीं सुना था। इस स्वीकारोक्ति के बाद राफेल विवाद में सन्देह की सुई निर्णायक रूप से प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की ओर मुड़ गयी है। क्योंकि अप्रेल 2015 में उनके फ्रांस के आधिकारिक दौरे में अनिल अंबानी उनके साथ ही फ्रांस में मौजूद थे। तब तक फ्रांसिसी कंपनी की राफेल खरीदी के सम्बंध में सारी बातचीत सार्वजनिक क्षेत्र की अनुभवी कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लि. (HAL) के साथ चल रही थी कि अचानक HAL को अलग कर 'रिलायंस डिफेन्स' नाम की कुछ दिन पहले ही कागजों पर अस्तित्व में आई एक अनुभवहीन कंपनी को राफेल डील में साझीदार बना दिया गया, जिसकी जानकारी भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को भी नहीं थी। प्रसिद्ध अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक इंटरव्यू में बताया है कि 58,000 करोड़ रुपये के इस सौदे में रिलायंस डिफेंस लि. को 21,000 करोड़ रुपये मिलेंगे जो कि कमीशन के अलावा कुछ नहीं है। अब मोदी सरकार के प्रवक्ताओं और वित्त मंत्री अरुण जेटली, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण तथा कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के पास बचाव के लिये कोई तर्क नहीं बचा है। इसीलिये रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता घिसी पिटी बात कह रहे हैं कि ओलांद के बयान की जांच की जा रही है। क्या ओलांद कोई साधारण व्यक्ति हैं कि आप उनके बयान की, जो उन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ फ्रांस की एक प्रतिष्ठित पत्रिका 'मीडिया पार्ट' को अपने इंटरव्यू के दौरान दिया है, और उस पर वे पूरी तरह कायम भी हैं, की जांच कर रहे हैं? बिकाऊ मीडिया के माध्यम से इस पूरे विवाद को दूसरी दिशा में मोड़ने के प्रयास भी किये जा रहे हैं। बिकाऊ मीडिया कमीशन की बात से ध्यान हटाने के लिये राफेल की उत्कृष्टता पर चर्चा कर रहा है। जबकि यह तो विवाद का कोई कारण ही नहीं है। बोफोर्स तोपों की खरीदी के समय भी उस समय के प्रतिबद्ध मीडिया ने इसी तरह विमर्श को दूसरी दिशा में मोड़ने का प्रयास किया था। लेकिन उस समय तक मीडिया (इलेक्ट्रॉनिक तो था नहीं, सिर्फ प्रिंट मीडिया ही था) इतना नीचे नहीं गिरा था और इतना बिकाऊ भी नहीं हुआ था। इसलिये बोफोर्स विवाद ने राजीव गांधी की तीन चौथाई बहुमत से चुनी गयी सरकार को भी दोबारा बहुमत में आने से वंचित कर दिया था। लेकिन राफेल विवाद में कमीशनखोरी के आरोपों को, जिसमें बहुत हद तक सच्चाई है, बिकाऊ मीडिया द्वारा दूसरी ही दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। बहरहाल फ्रांस्वा ओलांद के इस इंटरव्यू के बाद अब कोई मूर्ख या नासमझ ही इस बात पर विश्वास करेगा कि "न खाऊंगा और न किसी को खाने दूंगा." का उदघोष करने वाले प्रधानमंत्री का दामन पाक और साफ है! यह उल्लेखनीय है कि अंबानी की रिलायंस पर 45 हजार करोड़ का कर्ज है, वह एक डिफाल्टर कंपनी है, उसे लड़ाकू विमान क्षेत्र में नर्सरी का अनुभव भी नहीं है फिर भी भारत सरकार ने उसे फ्रांस पर दबाव डाल कर राफेल सौदे में भागीदार बनवा दिया। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद के इस बयान पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि 'अनिल अंबानी की रिलायंस कंपनी को राफेल सौदे में शामिल करने के लिये उसका नाम भारत सरकार ने दिया था। हमारे सामने इसे स्वीकार करने के सिवाय कोई अन्य विकल्प नहीं था।' इसलिये अब वित्त मंत्री चाहे जितने ब्लॉग लिखें या रक्षा मंत्री चाहे जितने बयान दें यह साफ हो गया है कि राफेल सौदे में अनिल अंबानी की कंपनी को 21 हजार करोड़ दिलाये गये हैं जो कि सीधे-सीधे कमीशन की राशि है। बोफोर्स तोप सौदे में 64 करोड़ के कमीशन का ही लेनदेन हुआ था, जिसमें राजीव गांधी की सरकार चली गयी थी। उसकी तुलना में राफेल सौदे में 328 गुना अधिक राशि के कमीशन का लेनदेन हुआ है। बोफोर्स सौदे के बाद कांग्रेस को कभी भी लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला। 1991 में नरसिंहराव की अल्पमत सरकार बनी। फिर 2004 से 2014 तक मनमोहनसिंह की अल्पमत सरकार रही। इस दृष्टि से यदि तुलना की जाए तो राफेल डील में 21 हजार करोड़ के कमीशन खाने के बाद भाजपा को अगले 100 साल तक बहुमत में आने तथा सत्ता सुख प्राप्त करने का कोई हक नहीं रह जाता है। अब यह इस देश की जनता को सोचना और समझना है कि देश की सम्पदा को लूटने वाली, विजय माल्या से लेकर नीरव मोदी और मेहुल चौकसे जैसे कई बैंक डिफाल्टर्स को भारत से भागने में सहयोग करने वाली, उनके इमिग्रेशन क्लियर करवाने में सहयोग से लेकर सीबीआई के लुक आउट नोटिस विड्रा करवाने वाली भाजपा सरकार ही उन्हें चाहिये जो उन्हें धर्म और गो माता की घुट्टी पिलाती रहती है या संविधान की रक्षक कोई अन्य पार्टी या गठबन्धन की सरकार चाहिये। अपनी नियति तो देश की जनता को ही तय करना है कि क्या वह धार्मिक ध्रुवीकरण और उसके पुनरुत्थान के नाम पर 18 वीं सदी की मानसिकता में ही जीना चाहती है या देश में एक प्रगतिशील, पारदर्शी, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष सरकार चाहती है! यहां यह भी उल्लेखनीय है कि राफेल डील पर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद के सनसनीखेज खुलासे के बाद कांग्रेस की ओर से ऐसी कोई तीव्र प्रतिक्रिया नहीं आई है कि वह एक राजनीतिक तूफान खड़ा कर सकने लायक जनान्दोलन का बायस बने। इसका कारण यह है कि कांग्रेस ने अभी तक विपक्ष बनने की तमीज नहीं सीखी है। कांग्रेस जब भी सत्ता में रहती है तो वह भी बीजेपी की तरह कुछ लोगों के हित में ही सारे काम करती है। लेकिन बीजेपी और कांग्रेस में एक बुनियादी फर्क है। बीजेपी को सरकार चलाने के साथ-साथ विपक्ष की तमीज भी है। आज यदि बीजेपी विपक्ष में होती तो उसके कार्यकर्ता सड़कों पर निकल चुके होते, प्रदर्शन और धरने दिए जा रहे होते तथा जगह-जगह प्रधानमन्त्री के पुतलों का दहन हो रहा होता। अगले महीने संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने वाला है। (नवम्बर-दिसम्बर में तीन राज्यों के चुनाव होना हैं। इसका बहाना बना कर सत्ता पक्ष शीतकालीन सत्र को स्थगित कर बजट सत्र में मर्ज भी कर सकता है) यदि कांग्रेस ने विपक्ष का दायित्व निर्वाह करने की तमीज सीख ली है तो मानसून सत्र या बजट सत्र में संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के गठन की घोषणा अवश्य हो जाना चाहिये। अन्यथा, भले ही संसद ठप्प हो जाये, बजट के अलावा कोई अन्य विधेयक पारित नहीं होना चाहिये। क्योंकि राफेल सौदे में की गई हजारों करोड़ रुपये की कमीशनखोरी हमारी बहादुर सेना के शहीद जवानों का सरासर अपमान है जिन्होंने देश की सुरक्षा करते हुए अपनी जान की बलि दी है और दूसरी ओर कमीशनखोर नेता और पूंजीपति मिलकर देश को लूट रहे हैं। मीडिया के माध्यम से इस पूरे विवाद को दूसरी दिशा में मोड़ने के प्रयास भी किये जा रहे हैं। गोदी मीडिया कमीशन की बात से ध्यान हटाने के लिये राफेल की उत्कृष्टता पर चर्चा कर रहा है। जबकि यह तो विवाद का कोई कारण ही नहीं है। बोफोर्स तोपों की खरीदी के समय भी उस समय के प्रतिबद्ध मीडिया ने इसी तरह विमर्श को दूसरी दिशा में मोड़ने का प्रयास किया था। लेकिन उस समय तक मीडिया (इलेक्ट्रॉनिक तो था नहीं, सिर्फ प्रिंट मीडिया ही था) इतना नीचे नहीं गिरा था और इतना बिकाऊ भी नहीं हुआ था। इसलिये बोफोर्स विवाद ने राजीव गांधी की तीन चौथाई बहुमत से चुनी गयी सरकार को भी दोबारा बहुमत में आने से वंचित कर दिया था। लेकिन राफेल विवाद में कमीशनखोरी के आरोपों को, जिसमें बहुत हद तक सच्चाई है, बिकाऊ मीडिया द्वारा दूसरी ही दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।