अक्टूबर 2018

भाजपा के माथे पर पसीना

जयशंकर गुप्त

सोलहवीं लोकसभा के कार्यकाल का समापन और उससे पहले पांच राज्य विधानसभाओं के चुनाव का समय ज्यों ज्यों करीब आ रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा में उनके करीबी सलाहकार और रणनीतिकारों से लेकर संघ परिवार के शिखर पुरुषों के माथे पर पसीने की लकीरें चौडी होती जा रही हैं. रॉफेल विमान सौदे में घोटाले की गूंज, बेरोजगारी और बेकाबू महंगाई से लोगों में मचे हाहाकार के बीच सत्तारुढ कुनबे को आने वाले चुनाव में चुनौतियों के पहाड नजर आ रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिपहसालार और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह घोषित तौर पर भले ही अगले 50 वर्षों तक भाजपा के देश पर राज करने के दिवास्वप्न जैसा दंभ भर रहे हों, अगले महीनों में होनेवाले राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम विधानसभा के चुनावों को और इनके साथ हों या इनके बाद, लोकसभा के आमचुनाव जीतना भाजपा और संघ परिवार के रणनीतिकारों के लिए कष्ट साध्य कवायद बनती जा रही है। बैठक पर बैठकें हो रही हैं। लेकिन ऐसी कोई तदबीर समझ में नहीं आ रही है जिससे इन राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के आम चुनाव में भी जीत सुनिश्चित हो सके। शायद यह भी एक बड़ा कारण है कि देश भर में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की पैरोकर मोदी सरकार यह तय नहीं कर पा रही है कि 17वीं लोकसभा और उसके साथ निर्धारित कुछ राज्य विधानसभाओं के चुनाव भी इस साल के अंत में होनेवाले पांच राज्य विधानसभाओं के चुनाव के साथ ही कराने चाहिए या नहीं! अपने और कुछ तटस्थ कहे जानेवाले चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के नतीजे भी भाजपा और संघ परिवार के शीर्ष नेतृत्व को बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं कर पा रहे। और फिर नोट बंदी से लेकर फ्रांस की दसॉल्ट कंपनी के साथ रॉफेल युद्धक विमानों की खरीद के सौदे में घपले, अपने करीबी मगर सरकारी कर्ज में डूबे उद्योगपति अनिल अंबानी की सौदे से चंद रोज पहले ही बनी कंपनी को सौदे में शामिल करवाने को लेकर भारत सरकार और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा करनेवाले आए दिन के खुलासे, इस मामले में फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांदे के ताजा बयान, जम्मू-कश्मीर में तमाम दमनकारी उपायों के बावजूद स्थिति के लगातार बदतर होते जाने, बीते 18 सितंबर को सीमा पर पाकिस्तानी रेंजरों के द्वारा बीएसएफ के जवान नरेंद्र सिंह की बर्बर हत्या और उनका सिर धड़ से अलग करने के साथ ही उनके शव को क्षत विक्षत करने, जम्मू-कश्मीर में पुलिस कर्मियों के अपहरण के बाद आतंकवादियों के द्वारा उनकी हत्या, बेरोजगारी, पेट्रोलियम पदार्थों की बेतहासा बढ़ती कीमतें और उसी रफ्तार से अमेरिकी डालर के मुकाबले भारतीय रुपये की लगातार गिरती कीमत, किसानों को उनकी फसलों की उचित कीमत नहीं मिल पाने के कारण उनकी आत्महत्या दरों में कमी नहीं आने तथा व्यापारियों के बीच जीएसटी और खुदरा बाजार में शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की छूट के कारण बढ़ रही बेचैनी भारत के उस हिंदू मध्य वर्ग को भी नाराज कर रही है, जो कट्टरपंथी सोच का नहीं है लेकिन जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रति नाराजगी और नरेंद्र मोदी के प्रति एक अलग तरह के भरोसे के कारण बड़े पैमाने पर भाजपा का साथ दिया था। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के अन्य बड़े नेताओं के द्वारा कही गई अधिकतर बातें और वादे जुमला साबित होते जाने के कारण अब उनके ही सिर पर प्रेत छाया के रूप में चुभन दे रहे हैं। विपक्ष भला उनकी बातों और चुनावी वादों को वस्तुस्थिति की कसौटी पर रखकर तौलने और उसे जनता जनार्दन के बीच ले जाने से क्यों चूकने वाला। परंपरागत जनाधार भी नाराज अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण, कामन सिविल कोड, कश्मीर से धारा 370 हटाने के मामले में भाजपा की हीला हवाली तथा आरक्षण से लेकर एससी, एसटी एक्ट पर मोदी सरकार के स्टैंड को लेकर भाजपा के परंपरागत समर्थक सवर्ण जनाधार के बीच भी नाराजगी बढ़ी है। 1990 से या कहें कि उससे पहले से भी अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर बनाने की कसमें खाते रहे, धारा 370 को संविधान से हटाने और सबके लिए समान नागरिक संहिता के पक्ष में नारे लगाते रहे लोगों को नरेंद्र मोदी से बड़ी उम्मीदें थीं। इन लोगों को लगता था कि 56 इंच का सीना रखने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण में आनेवाली बाधाओं को दूर कर मंदिर बनवाएंगे, चीन और पाकिस्तान के शासकों के साथ उनकी आंखों में आंखें डालकर बातें करेंगे, कश्मीर से आतंकवाद का नामोनिशान मिट जाएगा और पाकिस्तान हमारे सैनिकों का सिर काट कर ले जाने की जुर्रत दोबारा नहीं करेगा। लेकिन इन तमाम मामलों में आम लोगों की बात तो छोड़ ही दें भाजपा के समर्थकों को भी निराशा ही हाथ लगी। अभी पिछले 8-9 सितंबर को यहां दिल्ली में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में राम जन्मभूमि मंदिर के बारे में कोई जिक्र तक नहीं हुआ। अलबत्ता, अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी ने पार्टी के भीतर किसी अंदरूनी चुनौती की आशंका पर विराम लगाने की गरज से एक प्रस्ताव पारित करवा लिया कि अगला लोकसभा चुनाव अमित शाह की अध्यक्षता और मोदी के ही नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा जबकि अमित शाह का अध्यक्षीय कार्यकाल अगले जनवरी में ही समाप्त हानेवाला है। यानी आगामी विधानसभा चुनावों के अपेक्षानुकूल नहीं रहने पर भी उन्हें चुनौती नहीं दी जा सकती। पार्टी के प्रवक्ता, मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा भी, ''आज मोदी जी और अमित शाह जी की बदौलत ही तो भाजपा के पास 350 से अधिक सांसद और तकरीबन 1500 विधायक हैं।'' लेकिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी में राम जन्मभूति मंदिर के निर्माण एवं भाजपा के अन्य विवादित मुद्दों का जिक्र नहीं होना भी एक बड़ा कारण है कि इसके समर्थकों के बीच बढ़ रही निराशा अब उनकी नाराजगी के रूप में राजस्थान और मध्यप्रदेश के साथ ही उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे हिंदी पट्टी के राज्यों में भी साफ दिखने लगी है। भाजपा के परंपरागत समर्थक सवर्ण मतदाता भी खुलकर भाजपा नेतृत्व के बारे में जली कटी बातें बातें करने के साथ ही उनके सामने विरोध प्रदर्शन करने लगे हैं। दूसरी तरफ, भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि चुनाव आने तक विकल्पहीनता के कारण उसके सवर्ण समर्थक भाजपा का ही साथ देने के लिए विवश होंगे क्योंकि जिस तरह बड़े पैमाने पर मुसलमान भाजपा का साथ नहीं देनेवाले, उसी तरह सवर्ण भाजपा को छोड़कर कहीं और नहीं जानेवाले! भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार एक तरफ उन्हें गाली देकर भी सवर्ण साथ नहीं छोड़नेवाले, दूसरी तरफ दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ी जातियों के बीच यह संदेश जा रहा है कि भाजपा उनकी हितैषी है तभी न उसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी धता बता कर एससी एसटी कानून में संशोधन किया है। इसीलिए तो सवर्ण लोग इसे गाली दे रहे हैं। हिंदू मध्यवर्ग की नाराजगी को लेकर चिंता भाजपा और संघ परिवार की असल चिंता उस हिंदू मध्य वर्ग की नाराजगी को लेकर है जो कांग्रेस से नाराज होकर और मोदी की छवि तथा उनके कथित गुजरात विकास माडल से और उनके चुनावी वादों से प्रभावित होकर भाजपा के साथ जुड़ा था। मोदी के अधिकतर चुनावी वादे और घोषणएं न सिर्फ हवाई जुमले साबित हुए, पिछले सवा चार वर्षों के भाजपा के राज में भाजपा और संघ परिवार से जुड़े लोगों के जरिए हिंदुत्व का जो कट्टरपंथी चेहरा विद्रूपता के साथ सामने आने लगा, उससे यह तबका भी भीतर ही भीतर देश के भविष्य, संसदीय लोकतंत्र, विधायिका, न्यायपालिका, मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान की संप्रभुता को लेकर आशंकित होने लगा है। जिस तरह से राह चलते लोगों को या उनके घरों में घुसकर कथित गोरक्षकों के झुंड गो हत्या और गोमांस खाने या साथ रखने का आरोप लगाकर मारने लगे, कहीं लव जिहाद तो कहीं दलितों के अच्छे कपड़े पहनने, शादी विवाह के मौके पर दलित समुदाय के दूल्हे के घुड़ चढ़ी से क्रुद्ध होकर उन्हें मारा पीटा जाने लगा। गुजरात के ऊना में जिस तरह से मरे पशुओं की खाल उतारनेवाले दलितों की खाल उतारकर हत्या कर दी गई, दलित, अल्पसंख्यक एवं अन्य पिछड़ी जातियों की बच्चियों के साथ बलात्कार और उनकी नृशंस हत्या की घटनाओं से न सिर्फ इन तबकों के बीच बल्कि उदारमन हिंदुओं के दिल दिमाग में भी खौफ पैदा होने लगा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारत में दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं। शायद यह भी एक कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी से लेकर आरएसएस के सर संघचालक मोहन भागवत भी 'सबका साथ, सबका विकास' के नारे के तहत भाजपा और संघ की छवि सुधार के अभियान में जुट गए। कभी आमतौर पर मुसलमानों के द्वारा पहनी जानेवाली गोल टोपी धारण करने से साफ मना कर देनेवाले मोदी पिछले दिनों इंदौर में मोहर्रम के उपलक्ष्य में दाऊदी बोहरा मुसलमानों के विवादित धर्म गुरु सैयदना के कार्यक्रम में एक भक्त के रूप में हाजिर हुए। सैयदना के विरुद्ध दाऊदी बोहरा समाज में सुधारवादी आंदोलन चलानेवाले दिवंगत मानवाधिकारवादी असगर अली इंजीनियर के पुत्र और समर्थकों ने उन्हें पत्र लिख कर सैयदना के कार्यक्रम में हिस्सा लेने से मना भी किया था लेकिन मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के साथ ही कुछ अन्य राज्यों में सीमित संख्या मगर प्रभावी भूमिका में नजर आनेवाले व्यवसाई बोहरा और शिया मुसलमानों का समर्थन हासिल करने और इस बहाने में मुस्लिम समाज को अलग तरह का संदेश देने की कोशिश की। यही नहीं उन्होंने वहां सस्वर नोहा भी पढ़ा। उनकी इस कवायद से गुजरात एवं देश के अन्य हिस्सों पर भी खुद को कथित हिंदुत्व फोर्सेज के निशाने पर महसूस कर रहे पीड़ित और प्रताड़ित मुसलमानों के घाव भर पाएंगे! कहना कठिन है। लेकिन मुस्लिम समाज में कुछ लोगों का मानना है कि मोदी की कोशिश एक तरफ तो अपनी उदारमन छवि पेश करने की हो सकती है, दूसरे वह मुस्लिम समाज को शिया और सुन्नी का विभाजन कर एक हिस्से को अपने साथ जोड़ना चाहते हैं। वैसे, भाजपा विरोधी दलों ने भी मुसलमानों के सामने भाजपा का हव्वा खड़ा करने के अलावा उनकी बेहतरी के लिए क्या किया। और फिर अब कांग्रेस और इसके अध्यक्ष राहुल गांधी भी तो नरम हिंदुत्व की राह पकड़ने के क्रम में मुसलमानों से दूरी बनाने में लगे हैं। इन लोगों का मानना है कि हिंदी पट्टी के अन्य राज्यों के इतर मध्यप्रदेश, और फिर गुजरात और महाराष्ट्र में भी मुसलमानों का एक तबका मानता है कि गुजरात दंगों में जो हुआ से हुआ, उसके बाद तो कोई दिक्कत उनके सामने नहीं पेश आ रही। तीन तलाक पर सरकार के ताजा अध्यादेश के जरिए भी वह मुस्लिम महिलाओं के एक वर्ग का समर्थन पाने की उम्मीद कर रहे हैं। इस कवायद के तहत ही संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने भी लगातार चार दिनों तक दिल्ली में डेरा डालकर संघ की महिला, अल्पसंख्यक-मुस्लिम एवं ईसाई-दलित विरोधी छवि के बारे में सफाई देकर संघ की छवि सुधारने की कोशिश की। तीन दिनों तक नई दिल्ली में सरकारी विज्ञान भवन में 'भविष्य का भारत' विषय पर उन्होंने अपनी राय रखी। विपक्ष के बिखराव पर टिकी है आस लेकिन क्या इसका सकारात्मक असर मुसलमानों, दलितों, महिलाओं और अन्य पिछड़ी जातियों पर भी पड़ेगा। भाजपा के रणनीतिकारों के मुताबिक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पिछले चुनाव में अपनाई गई जाटव रहित दलित तथा यादव रहित अन्य पिछड़ी जातियों को साधने की रणनीति इस बार राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा बड़े पैमाने पर लोकसभा के चुनाव में भी अपनाई जा सकती है। इस बार कोशिश यथासंभव जाटवों और यादवों को भी साथ जोड़ने की हो सकती है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार इस रणनीति को कांग्रेस के डीएनए में ही ब्राह्मण होने के कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के बयान से भी सहायता मिल सकती है। भाजपा की कोशिश उत्तर प्रदेश सहित कुछ अन्य राज्यों में या कहें राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्ष के महागठबंधन में चुनाव से पहले ही सेंध लगाने या उसमें बिखराव पैदा करने की भी हो सकती है। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में विपक्षी जमावड़े में बड़े दम खम और जोशो खरोश के साथ शामिल होनेवाली बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष एवं यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बजाय कांग्रेस से अलग हुए पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी के साथ सीटों का तालमेल करने को इसी रणनीति के हिस्सा के रूप में देखा जा रहा है। जोगी वहां भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए कांग्रेस की राह में सबसे बड़े अवरोधक साबित हो रहे हैं। मायावती ने राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस के साथ किसी तरह के चुनावी गठबंधन के सकारात्मक संकेत नहीं दिए हैं। विपक्षी महागठबंधन में शामिल होने के लिए वह 'सम्मानजनक सीटें' मिलने की शर्त रखने लगी हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार उनमें भावी प्रधानमंत्री की उम्मीदें हिलोर मारने लगी हैं। आश्चर्य नहीं कि उनकी उम्मीदों को भाजपा और संघ परिवार हवा दे रहा हो। इसके पीछे सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के इस्तेमाल की बातें भी हवा में हैं। इसी तरह से उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के कुनबे में चाचा शिवपाल यादव की बगावत और उनके समाजवादी सेक्युलर मोर्चे के गठन के पीछे भी बजरिए अमर सिंह, भाजपा की ही रणनीति नजर आ रही है। वह लोकसभा की सभी 80 सीटों पर लड़ने की बात कर रहे हैं। सभी सीटों पर सपा के असंतुष्ट यादव और मुस्लिम नेताओं को टिकट और पैसा देकर भतीजे का खेल बिगाड़ने और भाजपा को मजबूत करने में वह कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। हालांकि उनके साथ होने के दावे को झुठलाते हुए 23 सितंबर को उनके सहोदर भाई मुलायम सिंह यादव ने नई दिल्ली के जंतर मंतर पर समाजवादी पार्टी की साइकिल यात्रा के समापन कार्यक्रम में अखिलेश यादव के साथ मंच साझा कर उनके इरादे पंचर कर दिए। दलितों के युवा नेतृत्व से मिल रही है कडी चुनौती राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि दलितों, पिछड़ी जातियों और मुसलमानों के भी एक हिस्से को साधने का सच अगले विधानसभा चुनावों में ही सामने आ सकेगा। एक दलित युवा नेता की सुनें तो पिछले लोकसभा चुनाव में शून्य पर सिमट गईं मायावती अब दलितों की एकमात्र नेता नहीं रह गई हैं। देश का दलित युवा अब नए ढंग से सोचने लगा है। उनकी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व अब गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी, अल्पेश ठाकोर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सहारनपुर के शब्बीरपुर कांड से उभरे भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद, रोहित वेमुला के समर्थक आदि कर रहे हैं। वह समझाते हैं कि कैराना संसदीय उपचुनाव में मायावती के खुलकर समर्थन नहीं करने के बाद चंद्रशेखर की मां और उनके समर्थक दलित बस्तियों में घूम घूम कर जाट, मुस्लिम और दलित के समीकरण को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अंततः मायावती को भी विपक्ष के साझा उम्मीदवार का साथ देना पड़ा था। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में भी ये लोग भूमिगत रह कर भाजपा विरोध की अलख जगा रहे हैं। इनके कार्यक्रमों में लोग बड़े पैमाने पर जमा हो रहे हैं जिनमें दलित, पिछड़ी जातियों और मुसलमानों पर बढ़ रही जुल्म ज्यादती की घटनाओं को सामने रखकर ये लोग भाजपा और उसके समर्थकों को किसी कीमत पर भी वोट नहीं करने की कसमें भी खिला रहे हैं। इस दलित युवा नेता के अनुसार जमीनी हकीकत बताती है कि पांच में से कम से कम तीन राज्य पक्के तौर पर भाजपा की झोली में नहीं आ रहे। लेकिन भाजपा में एक बड़ा तबका और खासतौर से मोदी और अमित शाह के समर्थकों का मानना है कि अभी भी भाजपा का परंपरागत समर्थक जनाधार पूरी तरह से निराश और नाराज नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी और उनके नेतृत्व को लेकर उसे अब भी उम्मीदें हैं। दूसरी तरफ, विपक्ष के पास कोई सर्वमान्य चेहरा भी तो नहीं है। भाजपा इस चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री स्व। अटल बिहारी वाजेपयी की छवि को भुनाने के प्रयास भी खूब करेगी। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रधानमंत्री मोदी ने 'अजेय भारत अटल भाजपा' का नारा भी दिया। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी अब तक 300 से अधिक लोकसभा क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं। लोकसभा चुनाव से पहले वह बाकी 200 क्षेत्रों का दौरा भी पूरा कर लेंगे। उनके अनुसार पार्टी के दस करोड़ कार्यकर्ताओं के जरिए मोदी सरकार की उज्वला गैस योजना, जनधन खाते, आयुष्मान भारत, स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ, बेटी पढाओ, सभी गांवों में सड़क और बिजली पहंचाने जैसी योजनाओं और उनके लाभ को जन जन तक पहुंचाएगी। लेकिन पार्टी के नेता दबी जुबान कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी से लेकर सर संघचालक मोहन भागवत दिखावे के लिए कुछ भी कहें मुस्लिम विद्वेष का जो पाठ पार्टी के कार्यकर्ता और स्वयंसेवक दशकों से पढते आए हैं, उसे आसानी से नहीं छोड़नेवाले। भाजपा विदेशी और खासतौर से रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को बाहर निकालने और नेशनल सिटिजन रजिस्टर को मुद्दा बनाएगी। लेकिन सवाल एक ही है कि यह सब करके भी वह राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना की विधानसभाओं के चुनाव जीत पाएगी। अगर लोकसभा के चुनाव साथ नहीं हुए तो ये विधानसभा चुनाव अगले लोकसभा चुनाव का सेमी फाइनल साबित होंगे और इनमें हारी हुई टीम का मनोबल कम करेंगे। यह तो भाजपा के बड़े नेता भी मानते हैं कि अगर विपक्ष का महागठबंधन बन गया, खासतौर से हिंदी पट्टी के राज्यों में कांग्रेस का सपा, बसपा और राजद से के बीच व्यावहारिक और प्रभावी चुनावी तालमेल हो गया तो इन राज्यों के साथ ही महाराष्ट्र, गुजरात जैसे राज्यों में भी इसकी लोकसभा सीटों में भारी कमी आ सकती है। उसकी भरपाई दक्षिण भारत, पश्चिम बंगाल और ओडिसा के साथ ही उत्तर पूर्व के राज्यों से होने की सूरत साफ नजर नहीं आती। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)