अक्टूबर 2018

उड़ी उड़ी जाए जहाज को पंछी

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

उड़ी-उड़ी जाए जहाज को पंछी, पुनी जहाज पर आवे, यह कबीर की वाणी है। लेकिन कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो जहाज पर पंछी बनकर नहीं, वरन चूहा बनकर आते हैं, उसे कुतर-कुतरकर खाते हैं। जब जहाज डूबता है, उसे छोड़कर सबसे पहले भाग जाते हैं। वह कबीर का युग था। युग बदला, जहाज भी बदला, वह राफेल जहाज बन गया है। कुछ पंछी सरकार में आकर गिद्ध बन इस पर मंडरा रहे हैं। भारत में सन 1964 से एचएएल नाम से सरकारी कम्पनी है, जो रक्षा सौदों में विमानों का रख-रखाव व निर्माण करती रही है। इसकी फ्रांसीसी कम्पनी द सॉल्ट से 500 करोड़ रुपए प्रति जहाज में 126 जहाज खरीदने की डील होने की स्थिति में आ गई थी। अचानक दिवालिया होने जा रहे सबसे बड़े देश भक्त अनिल अम्बानी, जिन्हें रक्षा सौदों का ‘र’ भी नहीं मालूम था, 1500 करोड़ रुपए प्रति जहाज में डील हो गई। कारण दिल्ली में देश भक्त सरकार है। कीमत बढ़ने से 126 जहाज की जगह आवश्यकता 30 जहाज में बदल गई। प्रश्न खड़े होने पर सरकार उलटे दोषारोपण करने लग गई। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रलपति कह रहे हैं कि अनिल अम्बानी से डील करने को भारत सरकार ने कहा था। सरकार कटघरे में है। वो कुतर्क कर रही है। बोफोर्स सौदे में तो सिर्फ रेडियो पर सुना गया था कि इसमें दलाली हो सकती है। उसमें आज की सरकार जब वो प्रतिपक्ष में थी, उसने देश गुंजा दिया था। आज जब यह सरकार राफेल जहाज में रंगे हाथ पकड़ा गई है खुद तो जवाब दे नहीं पा रही है, देश के सेनाध्यक्ष से अपने पक्ष में बयान जारी करवा रही है। खुद के बचाव की यह पाकिस्ताननुमा सैन्य राजनीति वो सरकार कर रही है, जो अपने प्रतिपक्षियों के विरोध का मुंह पाकिस्तान की ओर मोड़ देती है। भारत में मीडिया की कई किस्में हैं। कुछ सरकारी, कुछ कॉरपोरेट, कुछ मालिक तो कुछ लोकहित की हैं। पिछले चार वर्षों से पहले तीन शीर्ष पर थे। मोदी सरकार ने साम, दाम, दंड, भेद से इन पर नियंत्रण किया था। इन्हें गोदी मीडिया कहा जाने लगा था। चौथा जो निष्पक्ष खबरें दे रहा था, उसे तरह-तरह से दबाया जा रहा था, लेकिन एक पांचवां मीडिया भी है, वो है सोशयल मीडिया। इसने सरकारी अवरोधों को ताक में रखकर सही खबरें पहुंचाने का काम किया है। गोदी मीडिया के पत्रकार शेखर गुप्ता ने राफेल डील के पक्ष में अपने कुतर्क दिए हैं। ये कॉरपोरेट वाली पत्रकारिता के चेहरे हैं। अपने बुद्धि कौशल के पाखंड से इसे ढंककर रखते आए हैं। जब इन्होंने अपने दो आराध्योंत अंबानी और सरकार को फंसते देखा तो उनके पक्ष में लेखनी चला दी है। इन जैसों की लेखनी की स्याही अब इनका और सरकार का चेहरा उजला नहीं, काला कर रही है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 26 जनवरी को जब वे लाल किले पर भाषण देने जा रहे थे, लिखा था। विदेश घूमते हुए 9 महीने हो गए हैं। हनीमून पीरियड खत्म हो चुका है। मोदी जी भारत लौट आइए, किए गए वादे इंतजार कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने जब दस लाख का सूट पहना, गोदी मीडिया को देश का सम्मान नजर आ रहा था। हमने रविवार में गांधी की सूट से धोती और मोदी की चड्डी से सूट तक की यात्रा पर लिखते हुए आने वाले कल के लिए चिंता जाहिर की थी। पार्टी के राष्ट्रीय प्रमुख अश्वमेध का घोड़ा लेकर कांग्रेस मुक्त भारत करने निकले थे। अश्वमेध के भी कुछ नियम होते थे, लेकिन वो सारी नैतिकताओं को तिलांजलि देकर बस युद्ध जीतना चाहते थे। मंत्री, सांसद, विधायक किसी एक जाति-संप्रदाय को लेकर गलत बयान देते रहे। गाय,लव-जेहाद, वेज-नॉनवेज, गलत-सही इतिहास के नाम पर, तोड़फोड़-मारपीट, हत्याएं होती रहीं, लेकिन प्रधानमंत्री चुप्पी साधे बैठे रहे। प्रश्न करने वालों पर प्रति प्रश्न कर उन्हें देशद्रोही घोषित किया जाता रहा। बड़े अखबारों में खास तौर पर हिन्दी अखबारों में इन सब पर अंधकार बना रहा। 8 नवम्बर 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को खिलजी की राहों पर छोड़ दिया है, ‘जीरो बटा-घटा = सन्नाटा’ कैश पैसा देश का वरदान था, जिसे अभिशाप बताया जा रहा था। बचा हुआ कहर जीएसटी के रूप में बरपाया जा रहा था। हर दिन पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते रहे। नौकरी को बेरोजगार तरसते रहे। किसान आत्महत्या करते रहे। महंगाई में जनता पिसती रही। हमारे मीडिया के दिग्गज चूं-चूं का मुरब्बा बनाते रहे। भाजपा की 282 से 272 लोकसभा सीटें हुए एक वर्ष हो गया है। लेकिन गोदी मीडिया भाजपा की दिल्ली में हुई केन्द्रीय दल की बैठक के निर्णय को नहीं देख पा रहा है। वो है- 2019 के लिए भाजपा का नया नारा- ‘‘अजेय भारत अटल भाजपा।’’ इसमें मोदी-मोदी तो ठीक, मोदी भी कहीं नहीं हैं। यही 2019 की हकीकत है। -- राहुल गांधी शिव स्त्रोत राहुल गांधी ने कैलाश मानसरोवर की पन्द्रह दिवसीय यात्रा पूर्ण कर देश की सारी समस्याएं भगवान शिव के समक्ष रख दी हैं। अभी उन्हें देश के अन्य तीर्थ स्थलों पर भी जाना है, क्योंकि समस्याएं बहुत ज्यादा हैं। सिर्फ एक धर्म स्थल से काम नहीं चलेगा। इसलिए उनकी आंतरिक मंडली धर्मस्थलों की सूची बना रही है। अच्छा होगा राहुल गांधी यह सूची जनता के नाम चुनावी घोषणा पत्र के रूप में जारी कर दें। उनके नजदीकी गुणीजनों ने उन्हें समझा दिया है कि भाजपा इसी तरह से सत्ता में आई थी। वैसे भाजपा भी आजकल घबराहट में है, जनता से किए गए वादों के टूटने से नहीं वरन उसके भगवान रूपी हिन्दू ब्रांड को कांग्रेस पहन रही है, ओढ़ रही है, बिछा रही है। राहुल गांधी से देश एक सबल प्रतिपक्ष की उम्मीद कर रहा है, इसलिए वे कठिन यात्रा करके आये हैं 21वीं सदी का भारत कैसा होगा, उसकी तैयारी करके आये हैं। उन्हें आने वाले कल में भारत की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना है। डॉलर-पौंड से लड़ना है, महंगाई, बेरोजगारी कम करना है। किसानों को फसल का उचित मूल्य दिलाना है। इसलिए जनता को शिव स्त्रोत सिखाना है। वैसे उनकी सरकार जब दस वर्ष थी, तब वे यह सब समस्याएं दूर नहीं कर पाए थे। लेकिन राहुल गांधी और उनकी मंडली का मानना है कि हमने तो देश को खुशहाल कर दिया था। बस एक ही गलती हो गई थी कि हम मंदिर-मंदिर नहीं गए थे। भाजपा वाले चले गए थे। भगवान उनसे प्रसन्न हो गए और उनकी सरकार बन गई। इसलिए अब राहुल को देश भर में जहां-जहां चुनाव हैं, वहां-वहां मंदिर-मंदिर तो जाना ही है, साथ ही अन्य धर्म के भगवानों से भी संतुलन बनाना है। कहीं वे नाराज न हो जाएं। वैसे यह राहुल भक्त अभी तक नदारद थे। धीरे-धीरे मोदी भक्त कम होने लगे हैं। तो राहुल भक्त बढ़ने लगे हैं। मोदी जब-जब इतिहास की बात करते हैं, उनसे गलती हो जाती है। इसलिए राहुल के भक्त भी उन्हें इतिहास से दूर ही रखते हैं। वे नहीं जानते कि मेहमूद गजनवी ने जब सोमनाथ का मंदिर लूटा था, तब पंडित लोग तेज स्वरों में शिव स्रोत का पाठ कर रहे थे। उनकी मान्यता थी कि भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग चमत्कारी है। वह हवा में लटका हुआ है। वह गजनवी और उसकी फौज को नष्ट कर देगा, जबकि हकीकत में वह चारों ओर के चुम्बकीय कोणों से टिका हुआ था। गजनवी ने ठोंके दिए, ज्योतिर्लिंग नीचे गिर गया। इस तरह के अंधविश्वास ने देश को लुटवाया था। इन्हें यह इतिहास भी नहीं मालूम है कि दलित तब भी अदृश्य भारत था। उसे छूना तो दूर उसकी छाया पड़ना भी अपराध था। नाई, धोबी, तेली, तंबोली, अहीर, कहार, चर्मकार तब भी अपने जाति के कटघरे में कैद थे। वणिक व्यापार करते थे और क्षत्रिय युद्ध लड़ते थे। ब्राह्मण पाठ-पूजा और मंत्रोच्चार करते थे। देश करोड़ों का था। जाति के कारण बंटा हुआ था। इसीलिए सोमनाथ लुटाया था। गांधी ने यह दृश्य आजादी की लड़ाई में जेल में देखा। बंद सब आजादी के लिए होते थे, लेकिन बंटे हुए थे। एक-दूसरे के हाथ का खाना तो दूर पानी भी नहीं पी सकते थे। राहुल गांधी ब्राह्मणों से मंत्रोच्चार करवाकर देश को एक बार पुन: मजबूत कर रहे हैं। कैलाश मानसरोवर के बाद राहुल गांधी का भोपाल आगमन हुआ। यहां उन्होंने मध्यप्रदेश के चुनावों का शुभारंभ ग्यारह ब्राह्मणों के शिव स्त्रोत से करा दिया है। इसके बाद अमेठी में शिव स्त्रोत पढ़वा दिए हैं। जगह-जगह हर-हर महादेव के नारे लग रहे हैं। जय-जय सियाराम की यह नई तोड़ उनकी मंडली ने निकाल ली है। यह तोड़ निकालने वाले सलाहकार का नाम वे सरकार बनने पर अपनी सलाहकार मंडली में सबसे पहले रखेंगे। जिस तरह मोदी सरकार उनकी आंतरिक मंडली चला रही है। मंत्री परिषद ठप है, वैसी ही सरकार राहुल गांधी अपनी आंतरिक मंडली के साथ चलाएंगे। शिव स्त्रोत के पाठ पूरे देश में पढ़वाएंगे। धर्मनिरपेक्ष भारत की नई तस्वीर बनाएंगे। लोकतंत्र का अपमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बोहरा धर्मगुरु की बंदगी में इंदौर आगमन बहुत से प्रश्न छोड़ गया है। प्रधानमंत्री का झुककर अभिवादन करना, बोहरा गुरु का सिंहासननुमा ऊंचे तख्तेताउस पर बैठना । उनके पास ही कुछ नीचे प्रधानमंत्री की कुर्सी देश के 135 करोड़ लोगों का अपमान था। धर्मगुरु कोई भी हो, वो अपने अनुयाइयों का, उस धर्म को मानने वालों का आराध्य हो सकता है, लेकिन वो देश का आराध्य नहीं हो सकता है। आजकल हर संत के साथ राष्ट्र संत लगाने की एक फूहड़ परम्परा चल पड़ी है। कोई भी मंत्री-मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री आकर उसकी धर्म की दुकान को चमका जाता है। यदि पूर्व से ही चमकदार है तो उसमें चांद-सितारे जड़ जाते हैं। किसके पास कितने बड़े लोग आते हैं, उससे कैसे मिलते हैं, झुकते हैं या लेटते हैं, यह सब मूल्यांकन का आधार होता है। जिन्हें 135 करोड़ लोग मूल्यांकन कर पास करते हैं, वे लोक का अपमान कर अपना अवमूल्यन इस तरह आये दिन कराते रहते हैं। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने जब बनारस में 1962 में 200 ब्राह्मणों के सार्वजनिक रूप से पैर धोए थे, तब डॉ. लोहिया ने इसे निर्लज्जता का प्रदर्शन बताया था। उसका विवरण रविवार के इसी अंक में ‘जाति और योनि के दो कटघरे’ शीर्षक से दिया गया है। नेहरू ने इन चीजों का विरोध नहीं किया, तो समर्थन भी नहीं किया था। यह तटस्थता कालांतर में भारी पड़ी। इंदिरा गांधी ने राजेन्द्र प्रसाद की परम्परा का अनुसरण किया। उनके समय में देवहरा जैसे बाबा तैयार हुए। जो झाड़ पर झोपड़ी बनाकर रहते थे। उनसे झाड़ के नीचे खड़े होकर नेता सिर पर लात रखवाते थे, जिसे लात खाना कहते थे। भिण्डरावाले, आसाराम से लेकर रामरहीम तक का उदय धर्म के पाखंड की राजनीति की दुष्पपरिणति था। ये दुर्भाग्य है कि हमारे नेता घटनाओं से सुधरते नहीं, बिगड़ते हैं।