दिसम्बर 2016

काला धन : जीरो बटा घाटा = सन्नाटा

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

खिलजी वंश के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने बाजार नियंत्रण नीति बड़ी कठोरता से लागू की थी। कोई कम तौलता था तो उसका उतना ही मांस काट लेते थे। इससे देश की आर्थिक स्थिति नियंत्रण के बाहर हो गई। तब यह कहावत प्रचलित हुई कि दाम तो है, लेकिन ऊँट कहाँ से लाऊँ। 8 नवम्बर की रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1000 और 500 के नोट बंद कर देश को खिलजी की राह पर छोड़ दिया है। देश में आदमी के पास 500-1000 के नोट तो हैं, लेकिन वो कह रहा है कि ब्याह कैसे रचाऊं, इलाज कैसे कराऊं ?

खिलजी वंश के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने बाजार नियंत्रण नीति बड़ी कठोरता से लागू की थी। कोई कम तौलता था तो उसका उतना ही मांस काट लेते थे। इससे देश की आर्थिक स्थिति नियंत्रण के बाहर हो गई। तब यह कहावत प्रचलित हुई कि दाम तो है, लेकिन ऊँट कहाँ से लाऊँ। 8 नवम्बर की रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1000 और 500 के नोट बंद कर देश को खिलजी की राह पर छोड़ दिया है। देश में आदमी के पास 500-1000 के नोट तो हैं, लेकिन वो कह रहा है कि ब्याह कैसे रचाऊं, इलाज कैसे कराऊं ? चुनाव के पूर्व हर खाते में पन्द्रह लाख का काला धन लाने का वादा शिगुफा था और अब कालाधन उजला, सत्ता में बने रहने की शिद्दत है। सत्ता में आने या सत्ता बचाने के लिए शासक इसी तरह के ऊलजलूल कदम उठाते हैं। इतना बड़ा चौकाने वाला निर्णय करने वालों के पास एक दृष्टि, एक चिंतन और भविष्य की एक सश्क्त रूपरेखा होती है। जिससे किसी मुल्क की किस्मत बदलती है। दुर्भाग्य कि इतना बड़ा निर्णय करने वालो के पास इसकी प्रारम्भिक तैयारी भी नही थी। यदि होती तो बीमार के इलाज का, किसान की फसल का, खेत में बीज का, शादी ब्याह का, लाइन में खड़े होकर मरते-पिसते आदमी का कोई व्यवस्थित हल अवश्य होता। जिन्हें यह गुमान भी नहीं होगा कि उद्योग-व्यापार ठप्प हो जावेंगे। खेती किसानी चौपट हो जावेगी। वे यह कैसे सोच सकते है कि ? बेरोजगारों को नौकरी का वादा था और आज मजदूर कामगार बेकार है। वह प्रतिदिन या हर सप्ताह हाट से आटा, किराना आदि खरीद कर अपनी जिंदगी चलाता है। सप्ताह पर सप्ताह गुजर रहे हैं वो वह भूखा है। वह गुनगुना रहा है कि ‘वादा तेरा वादा, वादे पे तेरे मारा गया बंदा ये सीधा-साधा’। सरकार एटीएम दिखा कर देश भक्ति का गाना गा रही है। नरेन्द्र मोदी कह रहे हैं कि प्रतिपक्ष के नेता, अधिकारी और अन्य ताकतवर लोग, जिनके पास नोटों का वीटो पॉवर था, उन्होंने उनसे यह जखीरा छीन लिया है। इसलिए ये सब उनका विरोध कर रहे है। हकीकत यह है कि हमारा देश अति गरीब, गरीब, निम्न मध्यमवर्गीय, मध्यमवर्गीय, उच्च मध्यमवर्गीय, धनवान, अति धनवान, और अतिविशिष्ट धनवानों के खानों में बटा हुआ है। नोट बंदी से अति वाले दोनों ही पक्ष अप्रभावित है। इस अति में सत्तासीन नेता, बड़े अधिकारी और बड़े कारपोरेट घराने आते है। इनका आपस में गठबंधन होता है चोली-दामन का रिश्ताध होता है। बंगाल में भाजपा द्वारा तीन सौ करोड़ रुपए बैंक में जमा करवाए गए है। यह सब कितना काला, कितना उजला है इसकी तस्वीर आगामी उत्तरप्रदेश के चुनाव में दिखेगी। बार-बार यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि कालाधन गंगा में डूबोया जा रहा है, कचरे में फेका जा रहा है, हकीकत यह है कि देश में अडानी, अम्बानी जैसे लोगों के पास1000-500 रुपए के नोट नहीं होते हैं। इनका सब काम एक नम्बर में होता है। जिस तरह दूध से मलाई और मक्खन निकाला जाता है, उसी तरह ये भी अपने एक नम्बर के पैसे में से ऊपर ही ऊपर दो नम्बर का धन निकाल लेते हैं। और विजय माल्या की तरह लंदन में होटल खरीद लेते हैं, या स्विस बैंक में रुपया जमा कर देते हैं। उसके बाद की कहानी यह है कि बाजार में एक लाख या दस लाख के 1000-500 के पुराने नोटों के बदले नए 80 हजार या 8 लाख रुपए आराम से मिल रहे हैं। सोना, जेवरात खरीदे जा रहे हैं। ज्वेलर्स की दुकानें, शोरूम खाली हो गए हैं। जमीन-संपत्ति खरीद ली गई है। मोदी के इस कार्य से बड़े आदमी का कुछ नहीं बिगड़ा है। उसे 20 से 25% का कर सरकार को नहीं, अपने देश के दूसरे बड़े लोगों को ही देना पड़ा है, जिससे उसकी रकम उजली हो गई है। अब जिन्होंने यह उजला काम किया है,उन्हें अपने 20-25% में से 10% तक का कर या कट सरकारी विभागों से करवाना पड़ेगा। टीवी पर अर्थशास्त्री भ्रम फैला रहे है और कह रहे हैं कि एक-एक व्यक्ति के पास 12 हजार करोड़ रुपए के अवैध नोट हैं। उनसे प्रतिप्रश्न किया गया कि मोदी ने 50 दिन का वादा किया है, क्या इससे सब ठीक हो जाएगा? वे उत्तर देते हैं कि मोदी देशभक्ति का महान यज्ञ कर रहे हैं। लेकिन देश के कुछ लोग इतने गिरे हुए हैं कि वे स्वप्रेरणा से देश के लिए अपना कालाधन घोषित नहीं करेंगे। इस किस्म के मोदी भक्त इस वक्त देश को सर्वाधिक नुकसान पहुँचा रहे हैं। ये अर्थशास्त्री पढ़े-लिखे मूर्ख हैं। ये देश की जमीनी हकीकत से दूर रहते हैं। इनकी बहुत बड़ी तादाद देशभर में अलग-अलग शक्लों में ताकतवर जगहों पर मिल जाएगी। ऐसे लोग देशभक्ति के नाम पर सत्ता की चमचागीरी कर उसकी छाँव घनेरी का आनंद लेते रहे हैं। उन्हें मालूम है कि जो सत्ता का विरोध करते हैं, उन्हें सदैव धूप में जलना पड़ता है। देश में ट्रांसपोर्ट पर ग्रहण लग गया है। उद्योग-व्यापार ठप है। कपड़ा, खाना, किराना, लोहा, लकड़ी, दवा, ट्रांसपोर्ट, हार्डवेयर, इलेक्ट्रॉनिक आदि हजारों तरह के छोटे-बड़े उद्योग-व्यापार काले-उजले धन से चलते हैं। इसमें कोई बाकी कारोबार एक हजार, पाँच सौ के नोटों की शक्ल में चलायमान काली मुद्रा में रहता है। अब यह मुद्रा लुप्त हो गई है। यह देश के सराफा बाजार, प्रॉपर्टी बाजार या बैंक में नकद के रूप में प्रविष्ट हो रही है। इसके दो हजार और पाँच सौ के नोट में बदलकर आने में वक्त लगेगा। जो आएगा उसकी मात्रा बहुत कम रहेगी, इससे उद्योग-व्यापार घटेगा, बेरोजगारी बढ़ेगी और अनिश्चितता का वातावरण बनेगा। गाँव की हालत तो सबसे ज्यादा खराब है वहां कमाई नहीं है। और गाँव से शहर गए कामगार के पास रुलाई ही रुलाई है। देश के अर्थशास्त्री बता रहे हैं कि सन 2015 में देश की जीडीपी (सकल राष्ट्रीय उत्पादन) का लगभग 20% कालाधन था। 2015 में भारत का सकल घरेलू उत्पादन 150 लाख करोड़ था। अर्थात 2000 से 2015 तक 2250 करोड़ का 20% 450 लाख करोड़ कालाधन था। रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च 2016 में 500 और 1000 रुपए मूल्य के 12 लाख करोड़ रुपए देश में चलन में थे, जो उपलब्ध एक से 100 तक के नोटों का 86% था। यह 12 लाख, कुल 450 लाख करोड़ का 3% भी नहीं होता है। प्रश्नल उठना स्वाभाविक है कि बाकी का कालाधन कहाँ गया? उत्तर है यह जमीन, मकान, डायमंड, सोना, कार सहित भोग-विलास आदि के सामान में जमा हो गया है। सरकार ने इसके पूर्व 30 सितम्बर 2016 तक 45% कर के रूप में उजला करने की घोषणा की थी। खुद प्रधानमंत्री सहित इनकम टैक्स के अधिकारियों द्वारा बार-बार डराने-धमकाने पर देश के 64,275 व्यक्तियों ने 65,250 करोड़ रुपए कालेधन की घोषणा की थी। मतलब, प्रति व्यक्ति करीब 1 करोड़ रुपए जमा हुए थे। इसके पहले 1997 में भी ऐसी ही योजना घोषित हुई थी। तब 4,66, 031 लोगों ने इसमें शिरकत की थी। तब लोगों की स्वेच्छा ज्यादा और डर कम था। तब काला धन भी कम था। आज ज्यादा है, फिर क्या कारण रहे कि लोग खुलकर नहीं आ सके? इसका एक कारण तो 45% कर ज्यादा लग रहा था। दूसरा कारण, पिछले तीन वर्षों में उद्योग-व्यापार गिरा है और आम आदमी पिसा है। हमें हमारे देश-काल और उसकी परिस्थितियों को भी बदस्तूर समझना होगा। जिस तरह से प्रदूषण में कम या अधिक सब की भागीदारी है, उसी तरह कालेधन में भी सब भागीदार हैं, चाहे वह कम या अधिक हो। हमारी अर्थव्यवस्था और उसकी कर प्रणाली भी जकड़न भरी है। हमारे देश और उसके नागरिकों की आर्थिक स्थिति भी कमजोर है। हमारे यहाँ चिकित्सा एक बोझ है, जिसका खर्च देश का गरीब, मध्यमवर्गीय तो क्या, अमीर भी उठाने में अक्षम है। आए दिन होने वाली नई-नई बीमारियां और उनमें होने वाले खर्च के लाखों के आँकड़े सुनकर ही लोगों के पसीने छूट जाते हैं। भविष्य अनिश्चित दिखता है और बुढ़ापा सुरक्षित नहीं दिखता। हमारे यहाँ लड़की के पैदा होते ही उसकी शादी की चिंता लग जाती है। माँ-बाप पैसे जमा करने लगते हैं। दहेज के बगैर आज भी शादी नहीं होती है। जनम-मरण-परण इन तीन बन्धनों में ही आदमी की रीढ़ की हड्डी टूट जाती है। धन होने पर भी अज्ञात भय उसके दिल में समाया रहता है। आज देश में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। देश निरक्षरता से उबर रहा है। हमारे यहाँ कमाने के अवसर बढ़ना शुरू हुए हैं। लोग टैक्स भरना सीख रहे हैं। ऐसे देश में कालाधन उदार नीति और उसके ईमानदार क्रियान्वयन से निकलवाया जा सकता है। हमारी तुलना विदेशों से और उनकी कर प्रणाली से नहीं हो सकती है। हम विदेशों से अच्छा तो ग्रहण नहीं कर पा रहे हैं और उनकी कर प्रणाली की पूँछ पकड़ कर बैठ गए हैं। यह हमारे देश की अर्थव्यवस्था की वैतरणी को पार नहीं करवाएगी, वरन डुबो कर छोड़ेगी। हमारे देश में सदियों से एक गुप्त खजाना है, खुलजा सिमसिम है, जिसकी मालकिन घर की महिला है। मोदी के इस नोटबंदी कदम से यह खजाना लुट गया है। भारतीय महिला का यह खजाना पति के दुख-सुख में, परिवार के काज-किरावर में, बार-त्योहार पर, बच्चों को देने की उसकी सबसे बड़ी पूँजी था। वह उसका एक संबल था। भारतीय महिला आज पढ़-लिख रही है, नौकरी, उद्यम कर रही है। लेकिन सदियों से वह घर की मालकिन के रूप में सबसे बड़ी नौकरानी रही है। पहले पिता के, फिर पति के और बाद में बेटे के भरोसे उसने जिंदगी गुजारी है। पति भले ही करोड़पति हो, उसके गुजर जाने के बाद बेटा ही संपत्ति का मालिक होता है। महिला को यदि अपनी इच्छा से कहीं 100 रुपए भी देने हों तो वह बेटे पर आश्रित रही है। यह गुप्त खजाना ही उसकी ताकत था। वह आज घर की चौखट पर खाली हाथ खड़ी है। पति अच्छा है, बेटे अच्छे हैं तो ठीक है, लेकिन यदि वे उजाड़ू, शराबी, जुआरी, सटोरिए हैं तो वह क्या करेगी? ऐसे अनेक यक्ष प्रश्न हैं, जिनका उत्तर यही है कि धन तो देश का देश में रह गया और घर की महिला का अपना धन पराया हो गया। भारत के मस्तक पर लिखा है शुभ-लाभ। घर में प्रवेश के पहले चौखट के दोनों ओर लिखा जाता है, शुभ-लाभ । शुभ कार्य की पूजा और प्रार्थना में सर्वप्रथम लिखा-बोला जाता है शुभ-लाभ। शुभ का मतलब सबका लाभ, सबके लाभ में स्वयं का लाभ। यह हमारी संस्कृति है जो कहती है कि यदि आप सकारात्मक हैं, शुभ हैं तो आपकी चिंता और चिंतन सबके लाभ के साथ आपके लाभ की ओर प्रवृत्त होगी। इससे आपका लाभ द्विगुणित नहीं, कई गुना बढ़ेगा। उससे समाज और देश का लाभ बढ़ेगा। आप में ये सब और सब में आप होंगे। इंसान के अंध स्वार्थ ने इस शुभ-लाभ को लाभ-शुभ में बदल दिया है। सिर्फ स्वयं के स्वार्थ को वह शुभ मान बैठा। उस लाभ ने कालाधन पैदा किया, नकली नोट बनाया। जुबान पर शुभ-शुभ और दिल में लाभ-लाभ का गीत बजता रहा। 'अर्थ बिना सब व्यर्थ' देश का फलसफा बन गया। जिस तरह दिल्ली में प्रदूषण में साँस लेना मुश्किल हो रहा है,कमोबेश वही हालात हमारी अर्थव्यवस्था के हो गए। उस अर्थव्यवस्था ने, उस कालेधन ने अपने प्रदूषण में राजनीति को भी समेट लिया। राजनीति से सत्ता मिलने लगी। सत्ता से अर्थ और अर्थ से सत्ता एक सिक्के के दो पहलू बन गए। लोकतंत्र की भट्टी से सोना तप कर कुंदन नहीं बना, कालेधन से तपी सत्ता निकलने लगी। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री और उनकी सरकार भी 1000-500 के नोट से निकले काले धुएँ के प्रदूषण की सरकार है। उन्होंने दुनिया घूम-घूम कर जन्नत का नजारा देख लिया है। अपने देश के जन्नत की हकीकत को भी वे जानते हैं। वे विदेशों से कालाधन लाने का वादा कर देश को जन्नत बनाने के लिए आए थे। जब ढाई वर्षों में वे ना मालूम कितनी जन्नतें दिखा चुके हैं। लेकिन जन्नत बना न सके और साठ साल की कांग्रेस सरकार को दोष देते-देते थक गए तो देशभक्ति का यह नया नजारा दिखा रहे हैं। देख कर लग रहा है कि ‘एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं...’‍