सितम्बर 2018

चुनरी चदरिया

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

कबीर कहते हैं ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया। अर्थात् यह मानव जनम बड़ी मुश्किल से मिला है। यह जीवन एक चदरिया है। साफ-स्वच्छ धुली हुई। जिन्दगी ऐसे गुजरे कि इसमें कोई गलती न हो, पाप न हो। चादर में कोई दाग नहीं लगे। रजनीश ने कबीर की चंदरिया को बहुत ही सुन्दर तरीके से अभिव्यक्त किया है। गीतकार साहिर लुधियानवी ने कबीर को गीत में इस तरह लय बद्ध किया है - ‘‘लागा चुनरी में दाग, चुनरी में दाग छुपाऊं कैसे, घर जाऊं कैसे, कोरी चुनरिया आत्मा मेरी मोह है माया जाल, ऊपर मोरे घर है पिया का नीचे है ससुराल, जाके बाबुल से नजरें मिलाऊं कैसे, घर जाऊं कैसे....।’’ अर्थात यह दुनिया मायाजाल है। ऊपर पीहर है, बाबुल का घर है। वहां से ससुराल रूपी संसार में आए हैं। गलतियां हो गई हैं, चुनरी में दाग लग गए हैं, अब बाबुल से ऊपर जाकर नजरें मिलाएंगे कैसे। पूरे मुल्क ने इस गाने को गुनगुनाया, गाया,लेकिन चुनरी के दाग के अर्थ का अनर्थ कर दिया। चुनरी के दाग को लेकर अपने चेतन-अचेतन में चस्पा नारी की अस्मिता को लेकर बनी एक निम्नतम सोच ने उसे उसकी देह से जोड़ दिया। यही हमारी बदनसीबी रही है। अपनी नाकामियों, बदनामियों को बेशर्मी से नारी की ओर मोड़ देना। कबीर को गए 600 साल हो गए हैं। हम हर महापुरुष को घोल कर पी जाते हैं, कबीर को भी पी गए। टीवी पर आप की अदालत में रजत शर्मा अभिनेता धर्मेन्द्र से पूछ रहे हैं। ‘‘आपने मीनाकुमारी के साथ काम किया है। आपको शराबनोशी उन्होंने सिखाई। आपके इश्क के कितने ही किस्से हैं। आपने शर्मिला टैगोर, सायरा बानो, रेखा, जीनत अमान के साथ काम किया है।’’ रजत शर्मा के चेहरे पर शरारत है। धर्मेन्द्र शरमा रहे हैं। उनके चेहरे पर शर्म है। रजत शर्मा फिर मीनाकुमारी दोहराते हैं। साथ में हेमामालिनी का नाम भी लाते हैं। रजत शर्मा घुमा कर प्रश्न कर रहे हैं। उनके संवाद व्यंग्य के साथ द्विअर्थी हैं। धर्मेन्द्र कहते हैं मैं निजता का सम्मान करता हूं। अपनी खूबसूरत शेर-ओ-शायरी से रजत शर्मा को दोस्ती और इश्क का मतलब समझाते हैं। उनकी बातों में भोलपान है साफगाई है। लेकिन रजत शर्मा को अपनी टीआरपी बढ़ाना है, उनके लिए इसके और भी अर्थ हैं। वे निजता को वो भी नारी की निजता को तारतार करते हैं। धर्मेन्द्र कहते हैं मैंने 70 से अधिक हीरोइनों के साथ काम किया। रजत शर्मा कहते हैं 70, बैठे हुए लड़के-लड़कियां ठहाके लगाते हैं। धर्मेन्द्र ने उत्तर दिया क्यों हमारे कपड़े उतार रहे हैं। नारी को सरेआम बेइज्जत करने का यह नजारा पूरा देश देखता है। रेखा, शर्मिला टैगोर से लेकर 70 अभिनेत्रियां जिन्होंने धर्मेन्द्र के साथ काम किया है, वे काम के द्विअर्थी संवाद के दंश को अपने शौहर, बच्चों के साथ झेल रही होंगी। सायरा बानो दिलीपकुमार के साथ उनकी उम्र के आखिरी पड़ाव में अपनी अस्मिता पर उठ रहे सवालों के दर्द की पीड़ा भोग रही होंगी। मीना कुमारी की रूह तो पुरुषोचित पाखंड के नश्तर से जख्मी होकर जीते जी तो तड़पी हो सही, मरने के बाद भी तड़प रहीं होगी। जिस मुल्क के रजत शर्मा जैसे पद्मविभूषण नारी के प्रति इतनी दुराग्रह की दृष्टी रखते हैं, उस मुल्क में उन्हें पद्मविभूषण देने वाले रहनुमाओं की पसंद और सोच के स्तर को समझा जा सकता है। यह पद्मविभूषण के प्रदूषणों के गंदे सोच के कूड़े से निकले कीटाणुओं का ही असर है कि रोज-रोज और न जाने कहां-कहां बच्चियों से, विकलांगों से, निराश्रितों से और नारियों से बलात्कार की खबरों की बाढ़ आई हुई है। जब तक यह सोच और सोच वाले नहीं बदलेंगे, तब तक यही सिलसिला चलता रहेगा। कारण कि नारी की अस्मिता का दर्द ये समझते ही नहीं हैं। इसलिए इनके द्वारा किए गए प्रयत्न सिर्फ जनता को बहलाने के लिए होते हैं। असर कुछ भी नहीं होता है। आप पढ़े-लिखों से लेकर अनपढ़ तक में उनकी बातचीत में इस गिरावट के दर्शन कर सकते हैं। नारी के मामले में सबकी दृष्टि समाजवादी हैं। यह आप अखबार, टीवी, सोशल मीडिया पर ही नहीं अपने आसपास कभी भी देख और महसूस कर सकते हैं। नारी सदियों से घर में बंद और घूंघट-पर्दे में कैद इन्हीं वजहों से रही है। आज उसे कुछ आजादी मिल रही है, लेकिन देह की देहरी पर वो कल भी खड़ी थी और आज भी खड़ी है। देह से परे वो कुछ है, यह पुरुष को जब दिखेगा, तभी इंसानियत का सिलसिला शुरू होगा। -- कुलदीप नैयर कुलदीप नैयर ज्यों की त्यों घर दीनी ये चदरिया को सार्थक करते हुए ससुराल रूपी इस दुनिया को अलविदा कह उपर पीहर बाबुल के घर चले गए। ठीक 14 दिन पहले 9 अगस्त को कुलदीप नैयर ने उनके घर पर द्रोहकाल डॉट कॉम का उद्घाटन किया था। तब उनसे मुलाकात एवं चर्चा हुई थी। 95 वर्ष की उम्र में अस्वस्थ्यता के बाद भी वे देश के हालात को लेकर चिंतित थे। उन पर अपने ख्यालात रख रहे थे। वे कह रहे थे कि बचपन में उनका एक दोस्त सफदर था। न जाने क्या हुआ, मुस्लिम लीग बनी, हिन्दू महासभा बनी। मैं तो स्यालकोट में पैदा हुआ। लाहौर में पला-बढ़ा। अचानक भारत-पाक बंटवारा हो गया। वो जख्म आज तक नहीं भरे हैं। आजकल फिर न जाने ये क्या हो रहा है। साथ में अन्य विद्वजन लेखक, पत्रकारगण भी थे। सभी देश के मौजूदा हालात पर अपने-अपने विचार रख रहे थे। चर्चा का लब्बोलुआब यह था कि आज देश में गली-मोहल्ले, चौराहों पर सरे आम वहशी बनकर मॉबलंचिंग के नाम पर निरपराधों को मारा जा रहा है। इतिहास के आदिम काल में भी ऐसे उदाहरण देखने को नहीं मिलेंगे। सरकार कुछ करना तो ठीक उलटे पैरवी करते दिखती है। इससे उत्साहित हो अपराधी इस सबको धर्मोचित बताकर मीडिया में, टीवी पर अपने कृत्य की पैरवी करते हैं। सरकार द्वारा कुछ नहीं करने पर सर्वोच्च न्यायालय इन्हें रोकने और दोषियों पर कार्यवाही के लिए निर्णय देता है। नतीजा ढाक के तीन पात आता है। कभी-कभी गिरफ्तारी कर छोड़ने की कार्यवाही कर ली जाती है। छूटने वाले का क्रांतिकारी की तरह स्वागत होता है। मैंने कहा भाईसाहब हम जो यहां सब बैठे हैं। उसमें ब्राह्मण भी हैं, बनिया, पिछड़ा, पंजाबी और मुसलमान भी हैं। इसमें हिन्दू कौन है? ब्राह्मण से, बनिया से जात का अहसास होता है। बनिये में भी अग्रवाल, खंडेलवाल, माहेश्वरी आदि सबका अलग-अलग एहसास होता है। जैन भी दिगम्बर और श्वेताम्बर अलग-अलग, इनमें भी कई पंथ हैं। इन सबके आपस में हजारों साल में बेटे-बेटी के रिश्ते नहीं हुए हैं। रिश्ता होना तो ठीक ऐसा सोचना भी पाप था। ऑनरकिलिंग उसी पाप की परिणिती है। अभी पिछले 10-20 सालों में रिश्तों के सिलसिले शुरू हुए हैं। आप चिंतित मत होइये जो आदमी सुबह मुसलमान को गाली देता है, वो दोपहर में जैन को, शाम को सिंधी, पंजाबी और रात होने तक ठाकुर को और उसी के साथ आरक्षण के नाम पर पिछड़े-दलित को गाली देते हुए सो जाता है। यह जाति का कचरा इस मुल्क के आदमी के दिमाग में फंसा हुआ है। सदियों से मुसलमान इन सब जातियों के साथ गली-मोहल्लों, गांव, शहर में रह रहा है। उद्योग-व्यापार कर रहा है। लेकिन एक हिन्दू और है, वह दलित है। वह कहीं नहीं है। न गांव-गली, मोहल्ले में, न ही बस्ती-शहर में। वो सबसे दूर जहां से उसकी छांव भी नहीं पड़े, दूर बसाया गया है। उसे छूना भी पाप माना गया है। इसलिए वो चाय, खान-पान की दुकान तो ठीक ठेला-गुमटी भी नहीं लगा सकता है। वो उद्योग-व्यापार में भी नहीं है। यह एक अदृश्य भारत है। इसलिए आप चिंता मत करिए, साम्प्रदायिकता कुछ भी नहीं है, जात ही सब कुछ है। जात ही हिन्दू-मुसलमान के नाम पर 1947 में दंगे कराकर दस से पन्द्रह लाख लोगों का 1984 में एक ही रात में तीन हजार सिक्खों का और जात ही बार-बार आरक्षण के नाम पर कत्ल और दंगे कराती है। इसलिए आप हिन्दू-मुसलमान को लेकर चिंतित मत होइये। यह जात घूमकर न जाने कब, कहां, किस जात का मरण पर्व बन जाती है। जब जात का कचरा दिमाग से निकलेगा, तभी देश बनेगा। आज लोकतंत्र के लिए और उस पर हो रहे हमलों के लिए चिंता करना जरुरी है। यह सुनकर नैयर साहब के चेहरे पर चमक और खुशी आ गई थी। वो जाति साम्प्रदायिकता और तानाशाही तीनों से ताउम्र लड़ने वाले इंसान थे। उन्होंने भारत-पाक बंटवारे की विभिषिका झेली थी। उन्होंने 1975 में आपातकाल लगने पर इंदिरा गांधी का विरोध किया था। तानाशाही के खिलाफ आजादी और लोकतंत्र की आवाज लगाई थी। जेल जाकर आपातकाल का दंश झेला था। उस वक्त यह नहीं मालूम था कि नैयर साहब से यह आखिरी मुलाकात है। पन्द्रह दिन बाद ही उनके दुनिया से रुखसत होने की खबर आ जाएगी। मुझे खुशी और फख है कि पत्रकारिता के उस नायक के समक्ष उनके दिल-दिमाग को सुकून दे सकें, ऐसी सार्थक चर्चा हमसे और हमारे साथ गए साथियों से हो सकी थी। हम किस दिशा में जा रहे हैं, हमें क्या हो गया है। हमारे मुल्क का दलित पिछड़ा हिन्दूत्व की चादर ओढ़कर अपनी जात छुपाकर उंची जात वाले के बराबर दिखने की चाहत में हिन्दू हो रहा है। वहीं सवर्ण हिन्दूत्व की चादर ओढ़कर खुद को प्रथम दर्जा और मुसलमान को द्वितीय दर्जे का नागरिक बनाना चाहता है। दोनों ही चादर मैली है फटी हुई है उसमें जाति के अनगिनत छेद है। जिनसे प्यार की खूशबु नहीं वरन एक दूसरे के लिए नफरत की बदबू आती है। अटलबिहारी वाजपेयी के अंतिम दर्शन को जा रहे स्वामी अग्निवेश से मारपीट की जा रही है। अभी कुछ दिन पूर्व झारखंड में भी उनके साथ ऐसा ही हादसा हो चुका था। अटल बिहारी तो उदार रहे थे, उनके समर्थक इतने कट्टर कैसे हो गए। वे उन्हें कैसी और कौन-सी श्रृद्धांजलि दे रहे हैं? मेले में एक बच्चा घुम गया। वो रो रहा था, मां को लोगों ने ढूंढा, वह नहीं मिली। सबने उससे पूछा तेरी मां कैसी है। वो बोलता है, सबसे अच्छी, सबसे सुन्दर। अचानक उसकी मां सामने आ गई। वो मां से लिपट गया। सबने देखा कि सौंदर्य के मापदंडों से उसकी मां बिल्कुल अलग थी। माँ कैसी भी हो हर बच्चे को सबसे प्यारी अपनी माँ लगती है। भारत उसके हर देशवासी की आत्मा है। उसकी मां है। आज उस मां के नाम पर घर को तोड़ा जा रहा है। मां के बेटों को सड़कों पर सरेआम मारा जा रहा है। उस मां के सब ही देशवासी, 135 करोड़ ही बच्चे हैं। पाकिस्तान पड़ोस में है, वो एक बेटे की नहीं सभी बेटों की मौसी है, यदि एक बेटे से यह कहा जाए कि मौसी को मां मान लो तो क्या यह संभव है। मां कभी बंटती नहीं है। और जब-जब भी बंटी है, इतिहास गवाह है घर हो या देश वो टूटा है, बेटे कमजोर हुए हैं। कुलदीप नैयर का दिल स्याहलकोट और लाहौर के नाम से धड़कता था। अब नैयर साहब की वो पीढ़ी जो पाकिस्तान छोड़कर भारत आ गई थी। भारत-पाक फिर मिलेंगे यह सोचते-सोचते इस दुनिया को अलविदा कह चुकी है। आजादी के पूर्व और बाद दोनों ओर के ही कुछ लोगों की फितरत का शिकार दोनों मुल्क होते रहे हैं। आज भी हम उसी फितरत के शिकार हो रहे हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश, भारत एक हो सके यह सपना था, जो सपना ही रह गया है। हम इस सपने को जिंदा रखें कुलदीप नैयर को यही श्रृद्धांजली हो सकती है।