अगस्त 2018

नजरें

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

कितने बेशर्म आशिक हैं ये आज के, इनका नजरें मिलाना गजब ढा गया...। इस गीत की तर्ज पर 20 जुलाई 2018 को कांग्रेस का मोदी सरकार के विरुद्ध लाया गया अविश्वास प्रस्ताव नजरों की भेंट चढ़ गया। राहुल गांधी पर देश की नजरें थीं। अविश्वास प्रस्ताव के पूर्व ही राहुल की समझ पर प्रश्न खड़े होना शुरू हो गए थे, लेकिन राहुल नजरों को लेकर आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे। लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर अपना भाषण उन्होंने मोदी और उनकी सरकार पर तीखे हमलों से शुरू किया। टीवी पर उनके भाषण में उनका अंदाज और जोश को देखकर आलोचक भी हतप्रभ थे। हमले तो वे पहले भी करते रहे थे, लेकिन पहले वे नजरअंदाज होते थे। जनभावनाएं मोदी और उनकी सरकार के मोहपाश में कैद थीं इसलिए राहुल की आवाज में दम नहीं दिखता था। सरकार की वादा खिलाफी से जनभावनाएं मोहपाश में बंधी न रह सकीं, वे धीरे-धीरे राहुल की ओर आकर्षित होना शुरू हो चुकी थी। अन्यथा, राहुल ने इसी लोकसभा में तीन वर्ष पूर्व नरेन्द्र मोदी के 10 लाख के सूट पहनने पर जो हमला किया था, वो अद्भुत था। राहुल बोले थे, आज कल चोर आते हैं, दिन दहाड़े आते हैं, लेकिन 10 लाख का सूट पहनकर आते हैं। मैं संसद की कार्यवाही टीवी पर देख रहा था। कांग्रेस मेज थपथपा रही थी और भाजपा बगलें झांक रही थी। कारण कि राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी का नाम नहीं ले रहे थे। भाजपा विरोध करके मोदी और 10 लाख का सूट स्वीकार नहीं कर सकती थी। उसे सांप सूंघ गया था, लेकिन वह मोदी सरकार से अपेक्षाओें का दौर था। राहुल बार-बार बोल रहे थे कि मोदीजी आप मुझसे नजरें नहीं मिला सकते। आपने फ्रांस से हेलिकाप्टर खरीदी में देश को धोखा दिया है। उनके प्रश्न मोदी को कठिनाई में डाल रहे थे, लेकिन नजरें नहीं मिला सकते हैं। यह बात कुछ अतिश्योक्ति पूर्ण लग रही थी, क्योंकि पहली बात तो यह कि राहुल गांधी की नजरों में कांग्रेस और मोदी की नजरों में भाजपा की पृष्ठभूमि दिखती है। दोनों ही नजरों में मोतियाबिंद होता रहा है। जिसका लोकतंत्र के अस्पताल में जनता डॉक्टर बन ऑपरेशन करती रही है, दूसरी बात मोदी राहुल से तो क्या, उनकी पार्टी और सरकार तो ठीक, देश की जनता से भी चार वर्षों से नजरें नहीं मिला रहे हैं। उनकी नजरें आसमान की ओर हैं। उनकी एक ही धुन है ‘‘आसमां पे है खुदा और जमीं पर हम’’। वहीं राहुल बगैर प्रधानमंत्री बने केन्द्र की सरकार रहे थे, उनकी पार्टी और देश उनकी नजरों की इनायत के इंतजार में कल भी थे और आज भी है। राहुल सत्तारूढ़ सरकार की नजरों में कुछ भी नहीं, बस हंसी के पात्र थे। सरकार और उनके भक्तों का एक ही तकिया कलाम था कि राहुल पप्पू है। कांग्रेस लगातार सत्ता में रहकर संघर्ष का रास्ता भूल चुकी थी। वो सत्तारूढ़ के हमले का जवाब जवाबदारी से दे नहीं पाती थी। यदि कभी देती भी थी तो 70 बरस का ठोंका उसके माथे पर ठोंक दिया जाता था। राहुल ने अविश्वास प्रस्ताव वाले दिन अपने भाषण में स्वयं ही यह कहा कि आप मुझे भले ही पप्पू कहते हैं, यह मैं जानता हूं, लेकिन मेरे दिल में आपके लिए प्यार है। यह कहकर वे फुर्ति से सीधे मोदी के पास पहुंचे। उनका इरादा मोदी से गले मिलना था। इस उम्मीद से कि वे उनके प्यार के इजहार पर उठकर गले मिलेंगे, लेकिन मोदी हतप्रभ थे। राहुल उनसे झुककर गले मिल लिए। स्पीकर सुमित्रा महाजन मुस्करा रही थीं। भाजपा के सांसद भी मुस्करा रहे थे। यह नजारा पूरे देश ने देखा। मीडिया से भी आवाज आना शुरू हो गई कि मोदी को राहुल से उठकर गले मिलना चाहिए था। एक घंटे बाद दृश्यांतर होता है। इसका अंदाज भी पूर्व से था। राहुल का ज्योतिरादित्य सिंधिया के बधाई देने पर पीछे मुड़कर आंख मारना कयामत ला देता है। सारे प्रश्न जो राहुल ने उठाए थे, अनुत्तरित रह जाते हैं। स्पीकर अपना पुराना रोल पार्टी प्रवक्ता का अदा करती हैं। मुस्कराहट कर्कशता में बदल जाती है। राहुल के मोदी से गले मिलने को अनुशासनहीनता करार देती है। वे निष्पक्षता की आसंदी पर बैठी हैं, उन्हें स्मृति ईरानी की सीटी में मधुर संगीत सुनाई पड़ता है, तब वे खामोश रहती हैं। सत्ता में बने रहने की यही सबसे बड़ी खूबी है। यह राजनीतिक पतन के दौर में स्पीकर पद का एक और अवमूल्यन है। कांग्रेस द्वारा लाये गये अविश्वास प्रस्ताव पर पूरे दिन रात तक चली बहस के बीच जो कुछ देखा, सुना, कहा गया, वह तो गायब हो गया है। राहुल गांधी के प्रश्न अनुत्तरित हैं। एक ही उत्तर है आंख मारना। एक ही उत्तर है गले मिलना। राहुल की गलती पर तिल का ताड़ बना देना और खुद की गलती को स्वीकारने के बजाय अपनी पीठ ठोंकना किसी भी सरकार से जनता का मोह भंग कराते हैं। किसी भी सरकार से मोह भंग कई घटनाओं से होता है, 15 लाख, नोटबंदी, जीएसटी, प्रतीकात्मक है। मोदी सरकार को 2019 तो क्या, 2024 में भी कोई हिला नहीं सकता है, वह सरकार 2019 में रहेगी या जाएगी के मोड़ पर आ गई है। गठबंधन देश बड़ी उम्मीदों के साथ पिछले चार वर्षों से एक सबल प्रतिपक्ष की उम्मीद कर रहा है। देश प्रतिपक्ष के साथ एक नीति कार्यक्रम आधारित गठबंधन की भी प्रतीक्षा कर रहा है, लेकिन सबल प्रतिपक्ष तो ठीक, सामान्य प्रतिपक्ष भी उभर कर नहीं आ सका है। नीति कार्यक्रम आधारित तो ठीक, सामान्य गठबंधन भी नहीं बन सका है। कांग्रेस अपनी ऐंठ की गठान खोल नहीं पाती है। खोलती है तो पुराने मुख्यमंत्री केन्द्रीय मंत्री जो कांग्रेस की लगातार चली सत्ता के दौर में बनते-बिगड़ते रहे हैं, वे अपने पुराने वैभव के सपनों में कांग्रेस को छोटे सहयोगी दलों से मिलने नहीं देते हैं। अमित शाह तो अश्वमेध का घोड़ा लेकर स्वयं निकले और भाजपा को सत्तारूढ़ करने के लिए पुराने राजाओं के अंदाज में वो काम करने लग गए, जो किसी भी राजनीतिक दल को लोकतंत्र में पतन के गर्त में ले जाते हैं। वहीं, कांग्रेस का घोड़ा और घुड़सवार दिखता तो है, लेकिन आधी हकीकत आधा फसाना बनके दिखता है। कांग्रेस कभी देश की एक छत्र पार्टी थी। आज वो अपने पुराने दिनों का सपना देख रही है। सपना देखना अच्छी बात है, लेकिन उससे अच्छी बात देश के लिए सपना देखने की होती है। देश भर में जितनी भी क्षेत्रीय पार्टियां हैं या अन्य तरह के गुट या संगठन हैं, वे सब कांग्रेस की ही सरकार के दिनों में उसकी अनदेखी या अन्याय से उपजी ताकतें हैं। आज भाजपा भी कांग्रेस की तर्ज पर चल रही है। उसका भी अपने सभी साथियों से गठबंधन टूट रहा है। यदि सत्ता का उपयोग देश बनाने में होगा तो जनता संतुष्ट होगी और सहयोगी दलों से निभती रहेगी। यदि सत्ता का उपयोग खुद की ताकत बढ़ाने में और सहयोगी दलों के साथ ही प्रतिपक्षीय दलों में तोड़फोड़ करने में होगा तो सहयोगी से दोस्ती में दरार पड़ेगी। जनता इस हकीकत को जानती है। इसलिए वो गठबंधन पर अविश्वास करती है, लेकिन जनता यह भी जान ले कि स्थायी सरकारें गठबंधन से भी ज्यादा कटु अनुभव देती आई हैं। स्था्ई सरकार नेहरू की थी, तो चीन से युद्ध हारे। इंदिरा गांधी की थी तो आपातकाल का दंश झेला। राजीव गांधी की थी तो शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट को नकारा। राममंदिर के ताले खुलवाए। देश में साम्प्रदायिक ताकतों को मजबूत करने का काम किया। नरेन्द्र मोदी आए उन पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं है स्थायी सरकार है। वे निरंकुश बन गए हैं उनके द्वारा किए गए वादों को याद दिलाने का साहस ना उनके दल में है और ना मीडिया में है। आजादी के 70 वर्ष के बाद हम इतने परिपक्व तो बन ही सकते हैं कि देश में सरकार स्थायी हो या अस्थायी सकेंगे चर्चा उसके नीति कार्यक्रम और विचार की कर सके। कांग्रेस को समझना होगा कि यदि वो गठबंधन नहीं बनाती है, तो उसे रायबरेली, अमेठी में भी संघर्ष करना है। उसे जहां वह बड़ी है बड़प्पन दिखाना होगा, जहां छोटी है वहां क्षेत्रीय दलों को बड़प्पन दिखाना होगा। कभी तुम झुक जाओं, कभी हम उठ जाएं, मिलने की सूरत बस यही निकलती है, को आत्मसात करना पड़ेगा। तभी ये सब खुद को, प्रतिपक्ष को और देश को सही दिशा दे सकेंगे। भाजपा कांग्रेस के गठबंधन पर प्रश्न खड़े कर रही है और खुद के गठबंधन की स्थिति इतनी खराब कर ली है कि कश्मीर की महबूबा, महाराष्ट्र की शिवसेना और आन्ध्र के चन्द्रबाबू तक कहानी खत्म नहीं हो रही है। आज उसके गठबंधन के सभी दल दुखी हैं। भाजपा को कर्नाटक के कुमार स्वामी की नजरों से टपके आंसू दिख रहे हैं। खुद के घटकों के आंसू नहीं दिख रहे हैं। आज की तारीख में भाजपा अपने को विश्व की सबसे बड़ी पार्टी कहती है, सांसद, विधायकों का संख्याबल उसके पक्ष में हो, लेकिन पूरे देश की पार्टी आज भी कांग्रेस है। वो सभी प्रांतों में नेता, कार्यकर्ता और वोट के साथ मौजूद है, जबकि भाजपा को कितने ही प्रांतों में अभी अपना खाता खोलना है। आने वाले कल में गठबंधन की राह पर जाना है। देश में पहली गठबंधन सरकार सन् 1957 में केरल में कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पार्टी की बनी थी। मुख्यमंत्री थानु पिल्ले थे। मजदूरों ने आंदोलन किया और सरकार ने गोली चला दी। मजदूर मारे गए। डॉ. लोहिया तत्कालीन कांग्रेस सरकार के विरुद्ध आंदोलन कर जेल में थे। उन्होंने जेल से ही कहा मुख्यमंत्री तत्काल इस्तीफा दें। आजाद भारत में कोई सरकार अपनी ही जनता पर गोली चलाए, तो उसे सत्ता में रहने का कोई हक नहीं है। गठबंधन और सरकार टूट गए। यह राजनीति के इतिहास में गर्व का पहलू है देश को दिमाग बनाना होगा कि सरकार टूटने से, गठबंधन टूटने से कोई नुकसान नहीं होता है। सरकार की वादा खिलाफी से, उसकी मौज-मस्ती से, ऐश-एश्वर्य, भोग-विलास से नुकसान होता है। पं. बंगाल ऐसा राज्य है, जहां ज्योति बसु के नेतृत्व में गठबंधन सरकार 25 वर्षों के करीब चली, लेकिन उन्होंने स्वयं की पार्टी माकपा का स्पष्ट बहुमत होते हुए भी सहयोगी दलों को अपने में मिलाने का या खोने का काम नहीं किया। यह गठबंधन की दिशा में सुखद अनुभव था। सन् 1977 में जनता सरकार बनी थी। यह सरकार जनसंघ सोशलिस्ट भारतीय क्रांतिदल संगठन, कांग्रेस आदि दलों के विलय से बनी थी। इस सरकार में बाहर नहीं अंदर गठबंधन थे। ढाई वर्ष में सरकार टूट गई। यह गठबंधन की दिशा में एक कटु अनुभव था। उसके बाद विश्वनाथ प्रतापसिंह, देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, चन्द्रशेखर की चालीस दिन की सरकार भी देश ने देखी। तब समझ में आया कि देश संविधान से चलता है चालीस हो या चार सौ, सरकार और जनता एक-दूसरे के पूरक हैं। सरकार नहीं, लोकतंत्र मजबूत होना चाहिए। जो सरकार को काम करने के लिए मजबूर कर सके। आज देश का जो राजनीतिक परिदृश्य है, उसमें भविष्य में कांग्रेस तो क्या भाजपा भी बगैर गठबंधन के सरकार नहीं बना सकेगी। देश को गठबंधन का अभ्यस्थ बनना पड़ेगा। कांग्रेस और भाजपा दोनों की स्थायी सरकारें देखी जा चुकी हैं। परिणाम ढाक के तीन पात रहे हैं। भाजपा ने तो अपने सहयोगियों की मान-मनव्वल शुरू कर दी है। कांग्रेस उत्तरप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक में गलती करते आई है। आगे भी वही गलती करते दिख रही है। कर्नाटक चुनाव पूर्व कांग्रेस जनता दल से गठबंधन करती तो वो प्रमुख और जनता दल (एस) सहयोगी की भूमिका में रहती। चुनाव परिणाम विपरीत आते ही कांग्रेस ने तुरंत अपने से छोटे जनता दल (एस) के कुमार स्वामी को मुख्यमंत्री मान लिया। यही बड़प्पन पहले ही दिखाते तो बाद में शर्मसार नहीं होना पड़ता। राहुल गांधी और उनकी टीम को अपना रंग-ढंग बदलना होगा। आज जो लोग गठबंधन बनाने के लिए राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए सबसे आगे थे, वे पीछे हो रहे हैं। बिहार में कांग्रेस प्रवक्ता शक्तिसिंह कोविन्द कह रहे हैं कि नीतिशकुमार आप हमारे साथ आ जाओ। शक्तिसिंह पहले ही गुजरात डुबो कर आए हैं। वे भूल रहे कि लालू यादव कांग्रेस के सबसे मजबूत सहयोगी हैं। इसलिए तेजस्वी यादव ने कह दिया है कि प्रधानमंत्री का फैसला चुनाव के बाद होगा। यह कांग्रेस की गठबंधन की दिशा में ईमानदार सहयोगियों की नजरअंदाजी का परिणाम है। अभी-अभी कहीं से यह आवाज आई है। कांग्रेस को गैर संघी प्रधानमंत्री भी मंजूर होगा। खबर का कोई हीला-हवाला नहीं है। यह उसी तरह की खबर है, जो प्रतिपक्षीय गठबंधन को बार-बार नुकसान पहुंचा रही है। कांग्रेस में राहुल को लेकर कोई किन्तु, परन्तु नहीं है। वहीं, लालू यादव, अखिलेश यादव, शरद पवार से लेकर गैर भाजपाई अधिकांश नेताओं को राहुल गांधी से दिक्कत नहीं रही है। इनमें से कोई भी अपने प्रांत से बाहर वजूद नहीं रखता है। सबको अपने-अपने प्रांतों में सरकार बनाना है। ये सभी कांग्रेस से दोस्ती चाहते हैं, ताकि इनकी दिल्ली मजबूत रहे। कांग्रेस भी इनसे दोस्ती चाहती है। लड़ाई सीटों की और उनके बंटवारे की है, लेकिन कांग्रेस और इन प्रांतीय दलों में ऐसे लोग काबिज हैं, जो गैर भाजपाई गठबंधन को अपने निहित स्वार्थों के कारण बनने देना नहीं चाहते हैं। कांग्रेस में ही एक तबका ऐसा है, जिसे सोनिया गांधी और राहुल गांधी पसंद नहीं रहे हैं, उनमें उन्हें ईसाई तत्व दिखता है। गठबंधन में सबसे बड़ी बाधक यही ताकतें हैं। लोकसभा में कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार के पक्ष में 325 और विरुद्ध में 126 मत, देश में आज की तारीख में प्रतिपक्ष और गठबंधन की स्थिति दर्शा रहे हैं। राहुल गांधी पप्पू हैं। भाजपा सरकार और मीडिया का बड़ा तबका निरंतर प्रचार करते हैं। अपने विरोधी को पप्पू कहकर भाजपा अपने उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकती है। यह अस्वीकार्यता ही उनकी सबसे बड़ी स्वीकार्यता है। धीरे-धीरे पप्पू पास हो रहा है। और अपने को सयाना समझने वाले फेल होकर आने वाले कल के पप्पू बनने की तैयारी कर रहे हैं।