जुलाई 2018

सरोकारी व्यंग्य का सुखद झौंका

जवाहर चौधरी

कुछ लोगों की शिकायत है कि लेखक, खासकर व्यंग्य लेखक सिर्फ लिख रहे हैं, वे पढ़ते नहीं हैं। व्यंग्य के मानक से अपरिचित रह कर वे स्वयं से भी न्याय नहीं कर रहे हैं। ऐसे में कैलाश मंडलेकर का सद्यप्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘लेकिन जाँच जारी है’ एक सुखद व्यंग्य झोंके की तरह दिखाई देता है।

इन दिनों व्यंग्य लेखन में एक आभासी उत्सव का समय है। एक उफान सा आया हुआ है। फेसबुक, वाट्सएप, ब्लॉग और दूसरे कई माध्यमों ने प्रकाशन के अवसर सुलभ करा दिये हैं। कुछ भी लिख कर आराम से अपनी वाल पर व्यंग्य के नाम पर चेंप दीजिये, दूसरा कोई माने न माने आप तो मान ही रहे हैं। रही बात 'लाइक' करने की तो 'लाइक' यहाँ एक कर्ज है, जितने बाँटोगे, उतने मिल ही जायेंगे। एक प्रतिष्ठित अख़बार तो लम्बे समय से चुटकुलों को व्यंग्य शीर्षक के अंतर्गत छापता है। अंग्रेजी माध्यम वाली नयी पीढ़ी के उसके पाठक चुटकुलों को ही हिंदी व्यंग्य समझ रहे हैं। अगर सिपाही की छाती पर लगी पट्टी पर सचिन तेंदुलकर लिखा है तो वह सचिन तेंदुलकर ही है भले ही उसे बल्ला पकड़ना भी नहीं आता हो। कालमों में छपने वाले 'व्यंग्य' लेखों की भी हालत पतली है। किसी पर कुपित हो रहे हैं, कहीं कोई शिकायत है, कोई विरोध है या फिर कोई सपाट सा विवरण ही क्यों न हो रिपोर्टिंग की तरह, आज सब व्यंग्य है। अख़बारों ने कालम तय कर रखे हैं, उन्हें रोज कोई सामग्री चाहिए जगह भरने के लिए, सो जो आ रहा है, वही व्यंग्य कालम में छप रहा है। कुछ लोगों की शिकायत है कि लेखक, खासकर व्यंग्य लेखक सिर्फ लिख रहे हैं, वे पढ़ते नहीं हैं। व्यंग्य के मानक से अपरिचित रह कर वे स्वयं से भी न्याय नहीं कर रहे हैं। ऐसे में कैलाश मंडलेकर का सद्यप्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘लेकिन जाँच जारी है’ एक सुखद व्यंग्य झोंके की तरह दिखाई देता है। पैंतालीस से अधिक रचनाओं वाले इस संग्रह में सभी व्यंग्य विषय चयन के स्तर पर ही चौंकाते हैं। कैलाश जी की विशेषता है कि उनकी व्यंग्य दृष्टि वहां से मुद्दे उठाती है जहाँ माना जाता है कि वे गुम हो चुके हैं। एक सीधी सरल भाषा में वे अपनी बात कहते कब मुजरिम को कटघरे में खड़ा कर देते हैं पता ही नहीं चलता है। बैक बेन्चर्स की ओर से आ रही हंसी ठिठोली भी नेपथ्य में चलती रहती है। पाठक जब व्यंग्य की मुख्यधारा तक आता है, उसे टीस भी महसूस होती है और हँसाना-मुस्कराना मानो अपराधबोध देने लगता है। शीर्षक रचना 'लेकिन जांच जारी है' कालाहांडी के उस प्रसंग पर है, जिसमें दाना मांझी अपनी पत्नी की लाश कंधे पर लाद कर पैदल ही अपने गाँव की ओर निकला है। साथ में बेटी है और सड़क पर तमाशाइयों का हुजूम। कैलाश लिखते हैं - ‘दरअसल इस कृत्य के माध्यम से दाना मांझी इस सरकार और समाज को आईना दिखा रहा था, जो इन दिनों सेल्फी की आत्मरति में मसरूफ हैं। इस दुखदायी घटना की एक बानगी यह भी है कि यहाँ लाश सिर्फ दाना मांझी के कन्धों पर ही नहीं थी, जो तमाशाई थे, वे भी लगभग मुर्दे ही थे। और इस तरह एक मुर्दा कई मुर्दों के बीच से गुजर रहा था। उस दिन मुर्दों की रेलमपेल मची थी कालाहांडी में। जिन्दा केवल दाना मांझी था।’ यहाँ व्यंग्यकार बड़े सरोकार के साथ है और मनुष्यता के पक्ष में अपनी पूरी ताकत के साथ खड़ा है। एक रचना 'आया अटरिया पे चोर' में वह कहता है ‘ऐसा नहीं है कि चोरी केवल चड्डी पहन कर की जाती है। सूट और कलफदार कपड़े पहन कर भी लोग चोरियां करते हैं। ….जो लोग किडनी चुरा लेते हैं वे डाक्टर कहलाते हैं। ये उनकी मानव सेवा ही है। …यार परमात्मा ने आपको दो दो किडनियां दे रखी हैं, जबकि आपका काम एक किडनी से चल जाता है। ऐसे में कोई डॉक्टर एक किडनी निकाल कर किसी को लगा देता है तो क्या गलत करता है। भाई साब आप दो-दो किडनियों का अचार डालोगे क्या ? जबकि किडनी का तो कमबख्त अचार भी नहीं डलता है।’ इसी तरह 'स्वच्छता अभियान' में कैलाश जी का कहना है -’ असल में गाँव इतना बिखरा-बिखरा और कूड़ों के ढेर से अटा पड़ा था कि लोग भ्रमित हो रहे थे कि शुरू किधर से करें और अंत कहाँ हो। कार्यकर्ताओं का तो यहाँ तक कहना था कि इन झोपड़ों पर पहले एक रोड रोलर चला दिया जाये और जमीन सपाट हो जाने के बाद सफाई का सोचा जाये।’व्यंग्यकार का काम एक चौकीदार का है। उसे वह सब दिखता है जो चालाकीपूर्ण है। कुछ और रचनाये हैं जो व्यंग्यकार के सरोकार स्पष्ट करती हैं- कर्ज का बुखार, बाढ़ दो दिन का मेला, खूंटे पर टिका लोकतंत्र, झोलाछाप डॉक्टर, गोरी चाली नोट बदलावे, देश बदल रहा है, सावधान सड़क बन रही है, जागो ग्राहक जागो, अतिक्रमण,पहली बारिश और शहर की सड़कें तथा और भी कई। संग्रह की एक और मनमौजी रचना है 'उसने कहा हाय !'। नायक अलमारी का कुंडा लगवाने के लिए सगीर भाई की दुकान पर है और सामने वाले घर से ‘पहले खिड़की से अपनी हरी-हरी चूड़ियों वाला हाथ हिलाया, जिसे मैंने ठीक से देखा नहीं या अनदेखा कर दिया। उसने मेरे इस घामड़पन का बुरा नहीं माना। वह उठी और दरवाजे का पर्दा हटा कर खड़ी हो गई, फिर काफी खुल्लम खुल्ला ढंग से हाय! कहा। कह कर भीतर चली गयी।’ इस काल्पनिक घटना का सिरा पकड़ कर लेखक ने सूक्ष्म अवलोकन और मनोवैज्ञानिक ऊंच नीच की सैर करवाई। कैलाश मंडलेकर के व्यंग्य एक सामाजिक जिम्मेदारी की तरह सामने आते हैं। उनके शब्द हँसाने-मुस्कराने के साथ हमें अन्दर तक झककोरते भी हैं। पाठक आक्रोशित होता है और ग्लानि से भी भर उठता है कि आखिर हम कैसा समाज रच रहे हैं अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए। कैलाश जी अध्ययन-मनन से समृद्ध हैं, खूब पढ़ते हैं। इसलिये उनकी अधिकांश रचनाएँ बड़े फलक का निर्माण कराती है। पुस्तक- लेकिन जाँच जारी है लेखक- कैलाश मंडलेकर संसकरण - नवम्बर -2017 प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर -302006 मूल्य - 150 रु।