जुलाई 2018

माओवाद और डायनवाद के बीच

राजकुमार कुम्भज

देश के गृह मंत्रालय का कहना है कि माओवादी घटनाओं में चालीस फीसदी की कमी आई है, किन्तु ये डायन के नाम पर हो रही हत्या की घटनाएं क्या दर्शाती हैं? इस तथ्यात्मक सूचना के क्या मायने निकाले जाने चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्र में जब माओवादी ताकतों का दबदबा बना रहता है, तब तक तो सब कुछ ठीक-ठाक है, डायन-तत्व भी दबे-छुपे बैठे रहते हैं, किन्तु जैसे ही माओवादी ताकतों का खौफ खत्म होने लगता है, तो डायन बताकर किसी को भी मौत के घाट उतार दिया जाता है?

झारखंड में एक माओवादी नेता का खौफ खत्म होते ही गांव के लोगों ने एक पति-पत्नी को पीट-पीटकर मार डाला और आश्चर्य की बात यह भी है कि मार डाले गए दंपति उक्त माओवादी नेता के सगे मौसा-मौसी थे। झारखंड में झाड़-फूंक, भूत-प्रेत, डायन-बिसाही और अंधविश्वासनों की भरमार है। यह हत्या उसी मानसिकता की उपज है, जो झारखंड की सामाजिकता का हिस्सा बन गई है, कहना अन्यथा नहीं होगा कि डायन-बिसाही बताकर निर्दोषों की जान ले लेने वाले अंधविश्वासी लोग माओवादियों से खौफ खाते हैं। माओवाद से डरने वाले ‘डायन’ का आरोप लगाकर किसी को भी मार देते हैं। माओवाद और डायनवाद के बीच लोकतांत्रिक शासन कहां है? दो मई सन् दो हजार अठारह के दिन झारखंड की राजधानी रांची जिले के नामकुन प्रखंड स्थित हुआ गहातु पंचायत के सुकरीडीह गांव में लोहारसिंह मुंडा और उसकी पत्नी कैरीदेवी की पंचायत बैठक में ही सबके सामने पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। लोहारसिंह मुंडा और कैरीदेवी सक्रिय माओवादी नेता कुंदन पाहन के सगे मौसा-मौसी थे। वर्ष 2008 में इस दंपती डायन-बिसाही होने का आरोप लगाते हुए पंचायत ने आठ हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया था। तब कुंदन पाहन ने अपने भाई श्याम पाहन से गांव-पंचायत के कुछ प्रभावशाली लोगों को फोन करवाया था। जाहिर है कि फोन ‘अनुनय-विनय’ की ज्ञात शब्दावली से मुक्त ही रहा होगा, तभी तो गांव-पंचायत ने इस मामले से अपने न सिर्फ हाथ पीछे खींच लिए, बल्कि लोहारसिंह मुंडा से वसूली गई आठ हजार रुपये की जुर्माना राशि भी वापस लौटा दी। यह करिश्मा माओवादी नेता कुंदन पाहन के खौफ का ही था कि जिसने माओवाद और डायनवाद के बीच एक पर्याप्त दूरी का पुल बना रखा था। किन्तु अबकी बार जब यही गांव-पंचायत बैठी तो नजारा बदला हुआ था, गांव वही था, गांव-पंचायत भी वही थी और आरोपी भी वही थे। नहीं था तो बस कुंदन पाहन का ख़ौफ नहीं था। वर्ष 2017 में झारखंड राज्य सरकार की आत्मसमर्पण नीति के तहत माओवादी नेता कुंदन पाहन समर्पण कर चुका था, जिससे सुकरीडीह गांव के जन-सामान्य में कुन्दन पाहन का ज़रा भी डर नहीं रह गया था, नतीजा यह निकला कि कुंदन पाहन के सगे मौसा-मौसी के खिलाफ माहौल फिरसे दूषित होने लगा। गांव के लोगों में अंधविश्वास की धारणा गहरे तक जड़ें जमा चुकी थी। वे अब भी मानते थे कि लोहारसिंह मुंडा और कैरीदेवी ही उनके यहां हो रही हर किसी अनहोनी के असल जिम्मेदार हैं और जब तक उनका सफाया नहीं किया जाएगा, गांव के लोगों का ये दोनों सफाया करते रहेंगे। हालांकि वर्ष 2008 में कुंदन पाहन से खौफ खाकर गांव-पंचायत ने मुंडा दंपति पर लगाया आठ हजार रुपये का जुर्माना वापस कर दिया था, किन्तु बावजूद इसके किसी भी अनिष्ट के लिए अंध-विश्वास को विस्तार देने वालों ने, सामान्य लोगों को भीतर तक डरा रखा था, डरे हुए लोग ही या तो आत्महत्या कर लेते हैं या फिर किसी की भी हत्या कर देते हैं। गांव सुकरीडीह में किसी भी अनिष्ट का आरोपी मुंडा दंपति को ही ठहराया जाने लगा। यहां तक कि किसी भी सामान्य-सी मृत्यु तक के लिए लोहारसिंह मुंडा और कैरीदेवी ही दोषी करार दे दिए गए। अभी कुछ ही दिन पहले एक ग्रामीण बिंदु मुंडा की बेटी का देहांत सांप डंसने से हुआ था, किन्तु उसके लिए भी लोहारसिंह मुंडा और कैरीदेवी को ही आरोपी घोषित कर दिया गया। इस तरह यहां अंधविश्वास की जीत होती रही। तो क्या माओवादी नेता कुंदन पाहन का खौफ वाजिब था? तो क्या ग्रामीणों का अंधविश्वास दूर करने के लिए माओवाद जरूरी है? तो क्या भूत-प्रेत, झाड़-फूंक, डायन-बिसाही और अंधविश्वासों से मुक्ति के लिए माओवाद ही अंतिम अरण्य है? तो फिर ये क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि तब सरकार और पुलिस का काम तथाकथित आत्म समर्पण करवाने से आगे भी कुछ रह जाता है या नहीं? क्या तथाकथित विकास का नगाड़ा बोगस नहीं है? लोकतंत्र में डायन का क्या काम? आजादी के सत्तर बरस बाद देश में अशिक्षा और अंधविश्वास का ये आलम है कि लोग डायन से डरते हैं और अगर डायन माओवाद से डरती है, तो फिर धिक्कार का असल अधिकारी कौन है? देश के गृहमंत्रालय का कहना है कि माओवादी घटनाओं में चालीस फीसदी की कमी आई है। माओवादियों की रीढ़ तोड़ने में सुरक्षाबल कामयाब हुए हैं, हिंसा की वजह से होने वाली मौतों में भी 38 से 40 फीसदी तक की गिरावट देखी गई है। यहां तक कि माओवादियों के भौगोलिक क्षेत्र को तीस फीसदी तक समेट देने में भी सफलता मिली है, किन्तु फिर ये डायन के नाम पर हो रही हत्या की घटनाएं क्या दर्शाती हैं? दूसरी तरफ इस तथ्यात्मक सूचना के क्या मायने निकाले जाने चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्र में जब माओवादी ताकतों का दबदबा बना रहता है, तब तक तो सब कुछ ठीक-ठाक है, डायन-तत्व भी दबे-छुपे बैठे रहते हैं, किन्तु जैसे ही माओवादी ताकतों का खौफ खत्म होने लगता है, तो डायन बताकर किसी को भी मौत के घाट उतार दिया जाता है? डायन होने का अंध-विश्वास नया नहीं है। सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में डायन के नाम पर जर्मनी में सैकड़ों हत्याएं हुई हैं। सोलहवीं सदी में अकाल के लिए डायनों को ही जिम्मेदार माना गया था। डायन-हत्याएं अंधविश्वास के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। संसार के किसी भी कालखंड में ऐसा कोई भी समाज नहीं रहा है, जिसमें डायनों का कोई जिक्र ही न हुआ हो। भारत में तो इनकी भरमार है ही, किन्तु ग्रीक, रोम, जर्मनी, चीन, इंग्लैंड और अमेरिका जैसे देशों तक में एक दौर ऐसा रहा है कि डायनों के नाम पर अंधविश्वासियों ने बेहत उत्पात मचाया, लेकिन ये सब बातें गुजरे जमाने की हैं, अब तो लोकतंत्र और माओवाद है। हमेशा ही दावा किया जाता रहा है कि माओवादियों के साजो सामान की सप्लाई लाइन बंद कर दी गई है और उनकी संख्या व गतिविधियों में भी लगातार गिरावट आ रही है, किन्तु फिव भी यही देखा व पाया गया है कि थोड़े-थोड़े अंतराल से वे किसी न किसी बड़ी घटना को अंजाम देने में कामयाब हो ही जाते हैं। खुद सरकारी घोषणाओं में पिछले पांच बरस से कहा जाता रहा है कि माओवादियों ने दक्षिण छत्तीसगढ़ के सुकमा और ओडिसा के सीमावर्ती जिलों के साथ, उत्तर में पश्चिमी झारखंड तक एक मजबूत गलियारा बना लिया है, जो उनके लिए शरणस्थली से कहीं अधिक सप्लाई पाइपलाइन के काम आएगा। वर्ष 2008 में जब माओवाद चरम परथा, तब देश के 20 राज्यों के 208 जिलों को माओवाद प्रभावित क्षेत्र घोषित किया गया था और तब इनमें से 87 जिलों में हिंसक घटनाएं दर्ज की गई थीं। देश के गृह मंत्रालय ने भी तब से देश के 30 जिलों को सबसे अधिक माओवाद प्रभावित क्षेत्र की श्रेणी में रखा है। ये सभी 30 जिले ज्यादातर तो छत्तीसगढ़, ओड़िसा, आंध्र और तेलंगाना के ही हैं, किन्तु इन्हीं में से कुछ जिले बिहार व झारखंड के भी शामिल हैं, जो सबसे अधिक माओवाद प्रभावित क्षेत्र की श्रेणी में रखे गए हैं। बड़े पैमाने पर आत्म समर्पण रणनीति के तहत उनकी गिरफ्तारियां और सरकारी विकास योजनाओं के असर में माओवादियों की संचालन क्षमता तथा उनकी इच्छाशक्ति दोनों को ही क्षति पहुंचाई है। अन्यथा नहीं है कि अनेक बाधाओं के बावजूद कुछेक कल्याणकारी योजनाओं सहित संचार की बेहतर व्यवस्था ने माओवादियों के आधार वर्ग को गहरे तक प्रभावित किया है। अब तो माओवादी भी मानने लगे हैं कि उनके असल प्रभावित क्षेत्र उनके हाथ से निकल चुके हैं और बची-खुची जगहों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है, लेकिन हैरानी हो सकती है कि माओवादियों की बची-खुची ताकत भी कुछ इतनी ज्यादा महत्वपूर्ण और खास है कि वे सुरक्षाबलों की टुकड़ियों को निशाना बना ले जाने में सफल हो जाते हैं। भारत सरकार की ओर से नोटबंदी के बाद दावा किया गया था कि माओवादियों द्वारा खरीदे जा रहे गोलाबारूद-हथियार पर रोक लग गई है और अब वे सरकारी सुरक्षा दस्तों के मुकाबले कहीं भी ठहर नहीं पाएंगे, किन्तु सब जानते हैं कि सरकार का यह कथित दावा सिरे से ही गलत साबित हुआ है। सवाल यही है कि अगर माओवादियों की सप्लाय पाइपलाइन पर सरकार की कड़ी नजर है, तो फिर उनके पास इतनी भारी मात्रा में गोला बारूद हथियार कहां से आ जाते हैं कि वे आधुनिकतम तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बारूदी सुरंगें बिछाकर विस्फोट करने में सफलता पा जाते हैं? जाहिर है कि स्थानीय पुलिस-प्रशासन, स्थानीय लोग और सुरक्षाबलों के खुफिया-तंत्र में आपसी तालमेल व्यवस्थित नहीं है। माओवादी दस्ते अपनी बड़ी से बड़ी योजना को अंजाम तक पहुंचाने में सफल हो जाते हैं और सरकारी महकमों सहित खुफिया तंत्र को कोई खबर तक नहीं लग जाती है। समानांतर व्यवस्था के तहत अखिल आदिवासी भारत सरकार तक का गठन कर लिया जाता है। माओवाद और डायनवाद के बीच यह एक नई मुसीबत आ गई है। झारखंड में भूख से मरने वालों का सिलसिला थमा नहीं है। गिरिडीह में तीन दिन से कुछ नहीं खाने वाली 58 वर्षीय सावित्रीदेवी की मौत के दूसरे दिन एक और आदिवासी महिला चतरा की 45 वर्षीय मीना मुहसर भी चार दिन से भूखी रहने की वजह से मर गई। प्रशासन की लापरवाही के कारण जिसका राशनकार्ड ही नहीं बन पा रहा था, तो वह राशन कैसे पा सकती थी? इस लापरवाही व अकर्मण्यता के लिए किस कुंदन पाहन को पुकारें? किसी भी सभ्य समाज में भूख से मौत हो जाना, शर्म व चिंता का विषय है। कृषि-प्रधान कहे जाने वाले हमारे देश के आजादी के सत्तर बरस बाद भी भूख से मरने की खबरों को निरंतरता विस्मयकारी ही नहीं, बल्कि हाहाकारी भी है। विचार किया जाना चाहिए कि अमीरी और गरीबी के बीच गैर-बराबरी की यह जो बेहद लंबी-चौड़ी खाई फैली-पसरी है। कैसे मिटाई जाए? शासन-प्रशासन की उदासीनता और लापरवाही को क्यों व कब तक क्षम्य माना जाता रहेगा? देश में न तो अनाज की कमी है और न ही अकाल जैसी कोई प्राकृतिक आपदा ही सामने है। वर्ष 1856 में अकाल पड़ा था और लॉर्ड क्लाइव भूखी जनता के लिए किसी भी किस्म की सरकारी सहायता उपलब्ध नहीं करवा सका था। तब ब्रिटिश संसद ने लार्ड क्लाइव से इस उदासीनता तथा अमानवीय व्यवहार का कारण पूछते हुए लार्ड को फटकार लगाई थी। आजाद भारत में गैर-जिम्मेदारियों का अंबार इतना विस्तृत है कि कौन किसे फटकार लगाए? खैर, इस विषय पर कुछ अलग से चिंता व चिंतन किए जाने की जरूरत है। फिलहाल डायन-बध पर आते हैं। सुकनीडीह गांव के जिस लौहारसिंह और कैरीदेवी को डायन-बिसाही के शक में मार डाला गया, उस पर पैंतीस हजार नकद, एक बैल, छ: खस्सी, आठ मार्ग-बतख और एक सूअर का जुर्माना लगाया गया था। दंपती पर जुर्माना लगाने का ह़क इस इलाके के एक प्रभुत्वशाली भगत ने अंजाम / भगत दिया था। जुर्माना अदा करने की खातिर दंपति को अपनी जमीन बेचनी पड़ी थी। बावजूद इसके भगत ने उन दोनों को भूत-प्रेत होने के शक से मुक्त नहीं किया और आतंकित गांववालों ने उन दोनों को अंतत: मार डाला, लेकिन अब वे सभी पुलिस की गिरफ्त में हैं। वर्ष 2008 में तो माओवादी नेता कुंदन पाहन की धमक ने इन्हें बचा लिया था, लेकिन इस बार बेचारे मारे गए, तो क्या माओवाद के आतंक से डरने वाले डायन के शक में किसी को भी मारते रहेंगे? (लेखक वरिष्ठ कवि और टिप्पणीकार हैं)