जुलाई 2018

स्त्रियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता!

डॉ. रश्मि रावत

राममनोहर लोहिया देश की विषम स्थिति के लिए जाति और योनि के कटघरे को जिम्मेदार मानते थे। उनका मानना था कि इन कटघरों में इतनी शक्ति है कि साहसिकता और आनंद की समूची क्षमता को ये खत्म कर देते हैं। राजकिशोर इन दो कटघरों से मुक्ति के लिए प्रतिबद्ध कलम के सेनानी थे। उन्होंने स्त्री-मुक्ति के प्रश्न पर बेहद गम्भीरता और व्यापकता के साथ चिंतना-सृजना की है।

पिछले ही दिनों किसी कार्यक्रम में विनोदपूर्ण लहजे में चुटकी लेते हुए राजकिशोर जी ने कहा कि ‘स्त्रियों से सम्बद्ध विषय गम्भीर विषय है और इसे केवल स्त्रियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।’ मैंने कहा हाँ स्त्री-मुक्ति का सवाल मनुष्य मात्र की मुक्ति से जुड़ा हुआ है और इस बार यह गलती होनी भी नहीं चाहिए कि सभ्यता के पुनर्निर्माण में आधी आबादी की सहभागिता न हो जैसा कि सभ्यताओं इतिहास रहा है, अभी तक जितनी भी क्रांतिया हुईं, वे सभी पुरुषों की, पुरुषों द्वारा और पुरुषों के लिए थीं। सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक सुधार के जितने भी प्रयत्न किए गए, उनसे पुरुष की ही हालत सुधरी और स्त्री हर नए बँटवारे के वक्त अपने हिस्से से वंचित कर दी गई। इन शब्दों में स्त्री-विमर्श पर कोई टिप्पणी है या फिर अपने दायित्व बोध को ही परिहास में उन्होंने व्यक्त किया? हर सैद्धांतिकी को आत्मावलोकन की जरूरत होती ही है। यदि स्त्रीवाद की अब तक की दशा और दिशा पर असंतोष का भाव भी इस कथन के पीछे रहा हो तो भी जिस ज्ञानात्मक संवेदना के साथ उन्होंने इस विषय पर काम किया है, कान उमेठने का हक उन्हें है। ये दर्शकदीर्घा से की गई टिप्पणी नहीं, एक तरह से आत्मविश्लेषण है। राममनोहर लोहिया देश की विषम स्थिति के लिए जाति और योनि के कटघरे को जिम्मेदार मानते थे। उनका मानना था कि इन कटघरों में इतनी शक्ति है कि साहसिकता और आनंद की समूची क्षमता को ये खत्म कर देते हैं। राजकिशोर जी इन दो कटघरों से मुक्ति के लिए प्रतिबद्ध कलम के सेनानी थे। स्त्री मुक्ति के संदर्भ में लोहिया का आह्वान पुरुष समाज के प्रति है क्योंकि स्त्री को दबाकर रखने वाली सांस्कृतिक, सामाजिक, साम्बधिक संरचनाओं की निर्मिति में पुरुष दिमाग का ही वर्चस्व रहा है। उनका सुझाव था कि पुरुष स्त्री के प्रति अपनी संकीर्ण धारणाओं से छुटकारा पाने के लिए अकेले में गहन आत्मालोचन करे, अपने दिमाग को बदले और सामाजिक स्तर पर स्त्री के आदर्श प्रतीक के बारे में भी सांस्कृतिक, साहित्यिक कोटि की बहस चलाई जाए। ‘कई सौ या हजार वर्ष से हिंदू नर का दिमाग अपने हित को लेकर गैर बराबरी के आधार पर बहुत ज्यादा गठित हो चुका है। उस दिमाग को ठोकर मार-मार के बदलना है। नर-नारी के बीच में बराबरी कायम रखनी है।’ राजकिशोर जी के लेखन में इस ठोकर के अनवरत सिलसिले मिलते हैं। उन्होंने स्त्री-मुक्ति के प्रश्न पर बेहद गम्भीरता और व्यापकता के साथ चिंतना-सृजना की है। बारीक से बारीक पहलू पर उनकी नजर गई है और वे निरंतर अपने औजारों को परखते और पैना करते चलते रहे। इन वैचारिक कसौटियों पर स्वयं को भी जाँचते रहे कि अपनी जीवन-प्रणाली में हम बराबरी के महाभाव को किस कदर शामिल करते हैं या नहीं करते हैं। स्त्री-लेखन को राजकिशोर जी सी संवेदना के साथ गम्भीरतापूर्वक पढ़ने वाले लेखक हिंदी जगत में गिने-चुने ही होंगे। अधिकतर विद्वानों की स्त्री विषयक बातें सुनते, पढ़ते हुए लगा ही नहीं कि जिस पुस्तक पर सार्वजनिक ढंग से अपने विचार प्रकट कर रहे हैं, उसका फ्लैप भी गहराई से पढ़ा हो, तनिक भी सचेतन कोशिश की हो गैर बराबरी के आधार पर गठित मानस संरचना के ठहरे जल में कंकड़ मारने की। वर्तमान युग के सबसे प्रासंगिक मुद्दे ने कहीं कोई हलचल ही इनकी अभ्यस्त विचार-सरणियों में नहीं पैदा की है तो नवीन समावेशी सभ्यता की निर्मिति की आकांक्षा में रची जाने वाली नई बातें, नई बोली-भाषा, नए प्रतीक क्योंकर समझ में आएंगे। जानना ही मानना है। पर जानने के लिए जिस प्रतिबद्धता, खुलेपन और गहरे सरोकार के साथ थोड़े से ममत्व की भी आवश्यकता होती है, वह कहाँ से आए। प्रभुत्व की सीट से खिसकना यों भी आसान नहीं होता। स्त्री-पुरुष सम्बंध दुनिया का जटिलतम सम्बंध है, इसलिए उसका अंतर्संघर्ष भी बहुआयामी है। स्त्री की ज्यादतर समस्याएँ सभ्यता की उपज हैं। इनका समाधान सभ्यता के पुनर्निर्माण से ही सम्भव है। यानी सभ्यता को सचमुच सभ्य बनाकर। जिन भी पुरुषों ने शासक-शासित, दमनकर्ता-दमित, वंचक-वंचित वाले मनोभाव को समझकर, इस युग्म-बुद्धि से ऊपर उठकर व्यक्ति और समाज को देखने-समझने-बदलने की कोशिश की है, उन्होंने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दायित्व निभाया है। राजकिशोर जी ने गहन प्रतिबद्धता और ममत्व से यह जिम्मेदारी वहन की। कुदालें चला-चला कर परम्परागत मानसिक गठन के अग्राह्य ढेले पत्थर बाहर फेंकने और मिट्टी के मोटे ढेलों को भुरभुरा बनाने का काम अपने लेखन में निरंतर किया है कि दिमाग ठस्स न रहे। मिट्टी इतनी भुरभुरी तो हो ही जाए कि नए बीजों को धारण कर सके। सही मौसम आने पर फलने-फूलने की स्थितियाँ भी बना ली जाएँगी। अक्सर स्त्रियों को एक ढीली-ढाली सामान्यता की कोटि में ठेल दिए जाने की कोशिश पुरुष बुद्धिजीवियों की रहती है। स्त्रियाँ रहस्यमयी होती हैं। स्त्रियाँ बातूनी होती हैं। स्त्रियों का गद्य, वायवीय, कठिन, अबूझ होता है।.....इत्यादि कितनी बातें अकसर स्त्री बुद्धिजीवियों के बारे में सुनने को मिलते रहती हैं। जबकि उनके लेखन को गहराई से पढ़ने की, समय की माँग के अनुरूप समझ की नई कोटियाँ विकसित करने की, भिन्न भाषा के स्वागत की और नए सौंदर्य बोध विकसित करने की कोई कोशिश नहीं की जाती। स्त्री रहस्य है जो अपरिचय से उत्पन्न होता है, उसे खुद को अनावृत करने का मौका ही नहीं दिया जाता। वह पुरुष के लिए आकर्षण का सबसे बड़ा बिंदु भले हो पर उसके जीवन का केंद्र नहीं है जिसे समझने के लिए वह अपनी ऊर्जा लगाए। बातूनीपन उन्हीं लोगों में सम्भव है जिन्हें अपने को सम्यक रूप से व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता। जिसे भी ध्यान से सुनना शुरू कर दें उसकी वाणी में स्थिरता, ठहराव, कसाव खुद ब खुद आने लगता है। उपेक्षा की तुलना में हस्तक्षेप हर तरह से बेहतर है। हस्तक्षेप प्रेम और विवेक का हो तो और भी बेहतर है। स्त्री के प्रति भावना खरी होने से ही उसे मानवीय बनाने की कोशिश उतनी ही निष्कपट, त्यागपूर्ण और दीर्घस्थायी होगी। स्त्री की स्वतंत्रता के लिए अनुकूलता पैदा करने का पुरुष वर्ग जितना सचेतन प्रयास करेगा उतना ही मुक्त, मानवीय वह स्वयं भी बनता जाएगा। उसके जीवन में प्रेम, प्रसन्नता और उत्साह का फूल खिलेगा। जॉर्ज बर्नार्ड ने कहा है कि स्त्री की आत्मा को कुचल कर पुरुष ने अपनी आत्मा को भी कुचल दिया है। जितने गहरे जुड़ाव के साथ पुरुषों की रचनात्मक अभिव्यक्तियाँ का आभ्यंतीकरण किया जाता है, यह सम्बद्धता स्त्री-रचनाओं को शायद ही प्राप्त होती है। राजकिशोर जी के लेखन में स्त्री के इतनी तरह के रूप मिलते हैं, जो गहरे सरोकार और विश्लेषण के बिना सम्भव नहीं हो सकता। ‘एक स्त्री वह है, जिसने उपभोक्तावाद को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है तथा अपने को शरीर से कुछ ज्यादा नहीं मानती। एक वह है जिसे प्रतिक्षण यह खटका लगा रहता है कि कहीं उसे सिर्फ शरीर न मान लिया जाए। एक वह है जो प्रेम और पूर्णता की तलाश में पुरुष-दर-पुरुष भटकती रहती है और इस सफर में जितना तृप्त होती है, उससे कहीं ज्यादा आहत। एक वह भी है, जिसने इस पूर्णता की प्राणपण से तलाश की, लेकिन उसका स्वाद कभी चखा ही नहीं। एक वह है जिसने दी हुई दुनिया को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है और पति तथा बच्चों से आगे कभी सोचा ही नहीं। एक वह है जो घर भी सम्भालती है और दफ्तर भी और इस क्रम में इस कदर पिस जाती है कि उसके अस्तित्व का कोई भी कोना सही-सलामत नहीं रह पाता। कभी-कभी वह आनंद और आश्रय की खोज में किसी पुरुष या पर-पुरुष की छाँह में खड़ी हो जाती है, लेकिन पाती है कि इस छाँह की जलन भी कम नहीं है। एक वह है जिसे घर से निकाल कर बाजार में बैठा दिया गया है और जिसने पुरुष को या तो ग्राहक के रूप में देखा है या फिर ‘प्रोफेशन टैक्स’ वसूलने वाले सरकारी गुंडे के रूप में। एक वह है जो सुहागन हो कर भी विधवा है, जिसका पति स्त्रीत्व के जादू की तलाश में कहीं और भटक रहा है। एक वह है जो सचमुच विधवा है और अपने कटु-तिक्त अनुभवों से लगातार महसूस करती रहती है कि लगभग प्रत्येक पुरुष उसे उसके वैधव्य की जेल से मुक्त कराने के लिए उतावला है, एक वह है जो विधवा होने पर पति की चिता पर चिन दी जाती है। एक वह है जो इस तरह चिनी तो नहीं गई, लेकिन जिसे रोज तरह-तरह से यह अहसास कराया जाता है कि वह अब अपनी उम्र से ज्यादा जी रही है तथा मामूली पेंशन से अधिक की हकदार नहीं है। एक वह है जो किसी के साथ सात फेरे लगाने की अपनी बलवती इच्छा को मन में दबाए रह गई। एक वह है जिसकी इच्छा पूरी तो हुई, लेकिन जिसे दुनिया का सबसे मीठा फल समझा था, वह रेत का लड्डू निकला। एक वह है जो विभाजन की इस पीड़ा से त्रस्त हो कर इस या उस किसी एक दुनिया को पूरी तरह अंगीकार कर लेती है।.....एक वह है जो न खुद सुख से रहती है और न अपने पति या बच्चों के सुख से रहने देती है। चिड़चिड़ाहट गुस्सा, गाली, असंतोष, अभद्रता, मारपीट और तानाशाही इसके अत्यंत परिचित लक्षण हैं। शायद ही कोई गाँव या मोहल्ला हो, जहाँ यह स्त्री चरित्र न पाया जाता हो।....एक वह है.........’ स्त्री के अनेकानेक रूप स्त्री-जीवन और उनकी रचनाओं को दायित्व बोध के साथ गहराई से देखने से ही नजर आ सकते हैं। अर्चना वर्मा, चित्रा मुद्गल, उषा प्रियम्वद, ममता कालिया, अनामिका, मैत्रेयी पुष्पा, प्रभा खेतान इत्यादि लेखिकाओं के रचना संसार में ये सब सजीव रूप में मिलती हैं। अर्चना वर्मा की कहानियों में भरे-पूरे वैवाहिक जीवन के भीतर अकेली पड़ती स्त्री, ममता कालिया की रचनाओं में परिवार संस्था को नया आयाम देते हुए अकेले रहने का चयन करती सक्षम स्त्री, अनामिका की रचनाओं में समकक्ष प्रेम का सहचर खोजती स्त्री, प्रभा खेतान में जड़ परम्परा को धता बता कर नए प्रयोग करती स्त्री, मैत्रेयी पुष्पा में नयी नैतिकता की माँग करती स्त्री, मृदुला गर्ग में स्त्रीत्व का उत्सव मनाती अकुंठ स्त्री......स्त्री-रचना-सागर की कुछ बूदें हैं, जिन्हें सप्राण ग्रहण करने के लिए दिमाग की भुरभुरी मिट्टी या पूर्वाग्रहरहित खुली दृष्टि की दरकार है। अब तक सत्ता की भाषा ही बुनियादी भाषा रही है इसलिए प्रेम की अवधारणा भी स्वामित्व की है। हमारी जीवन व्यवस्था का आधार सहकार और पूरकता उतना नहीं है, जितना प्रतिद्वंद्विता और दूसरों को वंचित करने की की इच्छा। इनका संज्ञान ले कर ही हजारों साल से तले आ रहे स्त्री-पुरुष सम्बंधों का मूल गणित समझा जा सकता है और उसे ठीक से समझ लेने से ही उसके तहत घटित जीवन-सत्यों से सही रिश्ता कायम किया जा सकता है। ज्ञान और संवेदना की नई कोटियाँ इसी से विकसित होंगी। गुणों या स्थितियों की विभिन्नता को तभी आदर मिलता है जब जीवन के प्रति अखंड और समग्र दृष्टि हो। स्त्री और पुरुष की भूमिकाएँ हर तरह से एक-दूसरे की पूरक हैं और उनमें जितना सहयोग तथा संतुलन होगा, मानव समाज उतना ही सुखी और समुन्नत हो सकेगा। एक-दूसरे के दोष देखने के बजाय स्थितियों को उनकी समूची ऐतिहासिकता में देखा जाना चाहिए। इतिहास के साथ सर्वश्रेष्ठ सलूक यही है कि उसे भविष्य के साथ उतना ही जुड़ने दिया जाए जितने के वह लायक है। राजकिशोर जी लेखक को अर्धनारीश्वर मानते हैं। किसी भी समाज की गाथा स्त्री-पुरुष संबंधों को पुनर्परिभाषित किए बिना कैसे लिखी जा सकती है? सत्ता पुरुषों की रही है इसलिए उनकी पहल का महत्व निर्विवाद रूप से ज्यादा है। लेकिन स्त्रियों को भी ये नहीं सोचना चाहिए कि पुरुष के आजाद करने से ही वे आजाद होंगी। स्त्री विमर्श को स्त्री की दासता और गढ़न के साथ पुरुष की दासता और गढ़न को भी समझने की जरूरत है। समता और संवेदना पर आधारित दुनिया को बनाने के लिए स्त्री-पुरुष को परस्पर सहयोग से कर्मरत होना चाहिए जबकि स्त्री विमर्श पुरुषों के सिए माँगपत्र ही प्रस्तुत करता रहा है। अपने-अपने भीतर और बाहर भी समग्र दृष्टि से देखने की आवश्यकता ही उनके उस वक्तव्य में रही होगी। (लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ ही विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित लिखती हैं)