जुलाई 2018

लेकिन वे अपने लेखन में ज़िंदा रहेंगे!

हेमंत कुमार झा

राजकिशोर के लेखन के अनेक रंग थे। उन्होंने उपन्यास लिखे, कविताएं लिखीं, व्यंग्य लिखे, अखबारों में नियमित स्तंभ लिखे, लेकिन युवा होती एक पूरी पीढ़ी के मानसलोक पर अमिट छाप छोड़ी उनके निर्भीक वैचारिक आलेखों ने। वे एक 'आइकॉन' बन गए। हिंदी पत्रकारिता में जो नाम, जो सम्मान उन्होंने पाया, उसके उदाहरण विरल ही हैं।

राजकिशोर ऐसे लेखक और संपादक थे जिनके वैचारिक ताप को सहने की शक्ति बड़े हिंदी अखबारों में नहीं रह गई थी। यही कारण है कि बतौर पत्रकार एक लंबी और यशस्वी यात्रा के बाद जब उन्हें किसी बड़े बैनर में संपादक होना चाहिये था, वे इस सीन में ही नहीं थे। लेकिन वे थे... और जहां वे थे वहीं हिदी पत्रकारिता अपने प्रतिमानों को गढ़ पा रही थी। वे उनकी आवाज थे जिनके विरुद्ध सत्ता-संरचना गिरोहबद्ध तरीके से षड्यंत्र कर रही है और जिन्हें हाशिये पर डाल कर एकायामी विकास की धारा का प्रवाह अबाधित और तीव्र किया जा रहा है। मुख्यधारा का मीडिया इन षड्यंत्रकारियों का टूल बन कर रह गया है और राजकिशोर जैसे जीवंत व्यक्तित्व इस व्यवस्था में फिट नहीं हो सकते थे। उन्होंने वैकल्पिक मंचों को स्थापित करने में अग्रणी भूमिका निभाई जहां पूंजी का प्रवाह तो नहीं था, लेकिन प्रतिबद्धताएं थीं, समर्पण था। उनके लेखन के अनेक रंग थे। उन्होंने उपन्यास लिखे, कविताएं लिखीं, व्यंग्य लिखे, अखबारों में नियमित स्तंभ लिखे, लेकिन युवा होती एक पूरी पीढ़ी के मानसलोक पर अमिट छाप छोड़ी उनके निर्भीक वैचारिक आलेखों ने। वे एक 'आइकॉन' बन गए। हिंदी पत्रकारिता में जो नाम, जो सम्मान उन्होंने पाया उसके उदाहरण विरल ही हैं। बीए, एमए करने के दौरान मैं राजकिशोर जी के आलेखों को नियमित पढ़ा करता था। उनकी भाषा, उनके अभिव्यक्ति कौशल और उनकी स्पष्ट वैचारिकी का खासा प्रभाव हमारी पीढ़ी पर था। फिजा बदल रही थी। 90 के दशक में सत्ता और कॉरपोरेट के गठजोड़ ने मीडिया के स्वरूप को तेजी से बदलना शुरू किया। संपादक और पत्रकार की भूमिकाएं बदल रही थीं, प्राथमिकताएं बदल रही थीं। नई सदी आते-आते बहुत कुछ बदल चुका था। आदर्श तिरोहित हो चुके थे और जनाकांक्षाओं के प्रवक्ता कॉरपोरेट के दलाल की भूमिका में आते दिखने लगे। चीजें गड्ड-मड्ड होने लगीं। मुझे अधिक नहीं पता, लेकिन अंदाजा लगा सकता हूँ कि बदलते माहौल में राजकिशोर जी जैसे लोगों का किस कदर दम घुटता होगा। लेकिन, वे लिखते रहे। उनकी कलम एक मशाल की तरह अंधेरों से लड़ती रही। साम्यवाद के अंतर्विरोध, मंडलवाद के वैचारिक भटकाव और मन्दिरवाद के खतरों पर उनकी निर्भीक टिप्पणियां सामने आती रहीं। कॉरपोरेटवाद के षड्यंत्रकारी रूप को पहचानने में उन्होंने शुरू से ही कोई गलती नहीं की, जिसका साक्ष्य 90 के दशक के शुरुआती वर्षों के उनके आलेखों में देखा जा सकता है। वे आने वाले समय की विभीषिकाओं की आहट सुन पा रहे थे। फेसबुक पर उनकी सक्रियता भी उनके वैचारिक आग्रहों को ही परिभाषित करती थी। इस मंच पर अक्सर वे कुछ अधिक तिक्त भी हो जाया करते थे। यह उनके भीतर के आक्रोश को व्यक्त करता था। सत्ता और कॉरपोरेट की दुरभिसंधियों के खिलाफ एक आग थी उनके भीतर जो अनौपचारिक होने पर कुछ अधिक ही भभक उठती थी। मुझे कभी उनसे मिलने का अवसर नहीं मिला। मैं बस उनका पाठक और प्रशंसक था...उन हजारों-लाखों लोगों की तरह, जो उन्हें पढ़ते हुए बड़े हुए थे और जिनके मानसिक विकास में उनके लेखन का महत्वपूर्ण योगदान था। एक सवा साल पहले फेसबुक पर उनकी लिस्ट में शामिल हुआ तो बहुत खुशी हुई। पोस्ट्स को पढ़ कर वे अक्सर कुछ टिप्पणियां भी करते थे। मेरे कुछेक पोस्ट्स पर तो उन्होंने अत्यधिक उत्साहित होकर प्रतिक्रिया दी। यह मेरे लिये रोमांचित करने वाला अनुभव था। पिछले साल एक दिन सो कर उठा तो मैसेंजर में उनका मैसेज देखा। उन्होंने मुझसे मेरा मोबाइल नम्बर मांगा था। मैंने तुरंत भेज दिया। कुछ दिनों बाद उनका फोन आया। उन्होंने बहुत देर तक मुझसे बात की, मेरे बारे में बहुत कुछ पूछते रहे। फिर, बिहार की शिक्षा पर बात की। उन्होंने बिहार की शिक्षा और इस संदर्भ में नीतीश कुमार की विफलता पर "रविवार डाइजेस्ट" के लिये मुझे एक आलेख लिखने को कहा। मैंने लिख कर भेजा जो प्रकाशित हुआ। मेरे आलेख से वे प्रसन्न थे और यही मेरा पुरस्कार था। उन्होंने 'रविवार डाइजेस्ट' में नियमित लिखते रहने का आग्रह भी किया। यद्यपि, मेरी अकादमिक व्यस्तताओं की वजह से यह अधिक सम्भव नहीं हो सका। लेकिन, लालू प्रसाद यादव पर मेरे एक लंबे और चर्चित फेसबुक पोस्ट को उन्होंने 'रविवार' में प्रकाशित किया। मैं उनसे व्यक्तिगत और वैचारिक, दोनों स्तरों पर जुड़ता जा रहा था। तभी, उनके इकलौते युवा पुत्र के आकस्मिक निधन की खबर सुनी। राजकिशोर जी के बारे में सोच कर मन रो उठा। कुछ शब्द ही नहीं मिला कि क्या कहूँ। लेकिन, यह दुर्धर्ष योद्धा तमाम भावनात्मक झंझावातों को अपने भीतर ही भीतर झेलते बेटे के निधन के चार-पांच दिन बाद ही वैकल्पिक राजनीति की बातें करता, वर्तमान सत्ता को उखाड़ फेंकने की ललकार लगाता नजर आया। मैं उनकी मानसिक मजबूती को देख कर दंग रह गया। लेकिन, वे पिता थे। 70-71 की उम्र में 40 साल के युवा पुत्र की मौत...। जरूर वे भीतर ही भीतर टूटे होंगे। यह टूटन इतनी जल्दी बिखराव में तब्दील हो जाएगी, किसी ने नहीं सोचा था। बेटे की मौत के महीने, सवा महीने बीतते बीतते...वे बिखर गए। राजकिशोर जी नहीं रहे...। लगता है, मेरे पथ का कोई दीपक बुझ गया। मर्माहत हूँ, उन तमाम लोगों की तरह, जो उन्हें प्यार करते थे। लेकिन, वे ज़िंदा रहेंगे, अपने शब्दों में, अपने विचारों में...। (लेखक मगध विश्वविद्यालय में हिंदी के असोसिएट प्रोफेसर हैं और पटना में रहते हैं)