जुलाई 2018

बौद्धिकों में कबीर और आम नागरिक का ज़मीर

कविता कृष्णपल्लवी

राजकिशोर हिन्दी पत्रकारिता में राजेन्द्र माथुर, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, प्रभाष जोशी आदि की परम्परा की अंतिम कड़ी थे, लेकिन प्रभाष जोशी के हिन्दूवादी परम्परा-प्रेम से वह सर्वथा अछूते थे। राजकिशोर जी ने न कभी बहती गंगा में हाथ धोया, न ही कंबल ओढ़कर घी पीया। बौद्धिकों के बीच वह कबीर थे और लेखन की दुनिया में आम नागरिक का ज़मीर थे।

राजकिशोर जी के निधन से हिन्दी पत्रकारिता की दुनिया में वस्तुपरकता, जनपक्षधरता और लोकतांत्रिक मूल्यों की जगह कुछ और छीज गयी। संवाद का दायरा थोड़ा और सँकरा हो गया। एक ऐसे अँधेरे समय में उनका जाना हुआ, जब उनका होना सबसे अधिक ज़रूरी था। धार्मिक कट्टरता, असहिष्णुता, बौद्धिकों के अवसरवा़द और सांस्कृतिक-राजनीतिक पतन के इस घटाटोप में कबीरी फक्कड़पन और दोटूकपन के साथ सच बोलने और सवाल उठाने वाली उस आवाज़ की उपस्थिति बेहद ज़रूरी थी। अपने निधन से एक माह पहले ही वह एक भारी सदमें से गुज़रे थे। ब्रेन हैमरेज़ से उनके चालीस वर्षीय इकलौते बेटे का निधन हुआ था। अपार धीरज और जीवट के साथ वह अपना दु:ख पीकर शोक संतप्त पत्नी को संभालते रहे और तीन-चार दिनों के भीतर ही फेसबुक और लेखन की दुनिया में सक्रिय हो गये। सामाजिक सरोकारों की दुनिया में व्यस्त होकर अपनी निजी पीड़ा को वह विसर्जित कर देना चाहते थे, लेकिन तमाम जिजीविषा और युयुत्सा के बावजूद, उनका हृदय शायद यह बोझ बर्दाश्त नहीं कर सका। राजकिशोर जी से मेरा परिचय अधिक पुराना नहीं था। कुछ ही वर्षों पहले सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में हमारी मुलाकात हुई थी। फिर जल्दी ही वह इतने अनौपचारिक और आत्मीय हो गये, मानो ऐसे समवयस्क हों जिससे वर्षों की मैत्री हो। फेसबुक पर राजनीतिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक विषयों पर मैं जो पोस्ट डालती थी, उनपर प्राय: वह टिप्पणी करते थे और कोई प्रश्न यदि महत्वपूर्ण लगे तो तुरत फोन लगाकर बात करते थे। सप्ताह में तीन-चार बार उनसे बात हो ही जाती थी और कभी-कभी तो फोन पर ही आधा घण्टा-एक घण्टा तक की लम्बी बहसें भी। मुझे जीवन में बहुत कम ऐसे लोग मिले हैं जो इतने जनवादी ढंग से, इतना स्पेस देते हुए और इतनी खुशमिजाजी के साथ बहस करते हों। वैचारिक मतभेद को कभी वह मनभेद के स्तर तक नहीं आने देते थे। आत्मीयता प्रकट करने का उनका अपना अंदाज़ था। हर कुछ दिनों बाद वह सम्बोधन बदल दिया करते थे। परिचय के शुरुआती दिनों में वह मुझे 'कविता कृष्णपल्लवी', कहकर सम्बोधित करते थे, फिर 'पल्लवी', फिर 'के के', और फिर 'कविता'। 'रविवार डाइजेस्ट' के लिये जब उन्होंने लिखने का प्रस्ताव रखा तो कई महीनों तक मैं टालती रही। मुझे डर था कि सामाजिक कार्यों की अपनी व्यस्तताओं के कारण नियमितता का निर्वाह शायद मेरे लिये कठिन होगा। लेकिन राजकिशोर जी ने लगातार दबाव बनाकर स्तम्भ-लेखन के लिये विवश कर दिया। लगभग हर बार मैं अपने स्तम्भ की सामग्री निर्धारित समय-सीमा से दो,तीन या चार दिन बाद ही भेज पाती थी। राजकिशोर जी कहते थे, ''सामाजिक कामों में व्यस्तता के नाते मैं तुम्हें इतनी विशेष छूट दे देता हूँ, लेकिन फिर भी कोशिश करो कि सामग्री समय से भेज दो।'' फेसबुक पर पोस्ट की गयी मेरी हर कविता पर वह ज़रूर बात करते थे। सबसे ज्यादा खुशी वह मेरी उन टिप्पणियों पर ज़ाहिर करते थे जो साहित्यिक-बौद्धिक जगत में व्याप्त अवसरवाद और छद्म-वामपंथियों के दुरंगेपन पर केन्द्रित होती थीं। एक गाँधीवादी-समाजवादी होते हुए भी राजकिशोर पारंपरिक अर्थों में गाँधीवादी-समाजवादी नहीं थे। गाँधी के ग्राम-स्वराज्य की अवधारणा और अहिंसा की विचारधारा से वे गहरायी से प्रभावित थे, लेकिन गाँधी की सनातनी हिंदू सोच के विपरीत वह कट्टर नास्तिक और जाति व्यवस्था के घोर विरोधी थे। स्त्री-प्रश्न पर भी उनकी सोच पारंपरिक गाँधीवादी सोच के विपरीत थी। पारिवारिक और सामाजिक दायरे में वह स्त्रियों की पूर्ण स्वतंत्रता और स्त्री-पुरुष समानता के उत्कट समर्थक थे। वह मुखरता के साथ भारतीय राज्यसत्ता द्वारा कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों की जनता के दमन पर भी स्टैण्ड लेते थे। छत्तीसगढ़ और देश के अन्य हिस्सों में माओवादियों के आन्दोलन और उसके दमन को वह भारतीय राज्य की नीतिगत विफलता मानते थे। विकास के नाम पर आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों के ग़रीबों के, बल-प्रयोग अथवा पूँजी की मार से, विस्थापन को वह पूरे देश के लिये विनाशकारी मानते थे और अपनी कई हालिया टिप्पणियों में भारतीय राष्ट्र को उन्होंने 'विफल राज्य' (फेल्ड नेशन) की संज्ञा दी थी। नवउदारवाद की नीतियों के वह उत्कट विरोधी थे और इसके लिए न केवल भाजपा और कांग्रेस को, बल्कि सभी चुनावी दलों को जिम्मेदार मानते थे। नवउदारवाद के विरोध की सही रणनीति क्या हो, इसपर हमलोगों की कईबार लम्बी बातें हुईं। हर बार इस संवाद का अंत एक खुली बहस के रूप में होता था। मैं समाजवादी परियोजना का पक्ष लेती थी और राजकिशोर जी ग्राम स्वराज्य की गाँधीवादी यूटोपिया की व्यवहारिकता सिद्ध करते थे। हम एक-दूसरे की अवस्थितियों की आलोचना करते थे और अंत इस निष्कर्ष पर होता था कि इन असहमतियों पर मिलकर लम्बी बात करनी होगी। कई ऐसे मसले थे, जिनपर मिलकर लम्बी बातचीत करने पर सहमति बनी थी। वह देहरादून आकर कुछ दिनों साथ रहने को भी तैयार थे। अफसोस, वे लम्बित बहसें अब लम्बित ही रह जायेंगी। अभी कुछ ही महीनों पहले की बात है जब राजकिशोर जी ने अपना शेष जीवन वैकल्पिक राजनीति के निर्माण में लगाने का विचार सार्वजनिक तौर पर (सोशल मीडिया पर) रखा था और मित्रों के विचार मांगे थे। मुझसे उन्होंने कहा कि वह नवउदारवाद और साम्प्रदायिकता के विरोधी, जनवादी चेतना के उन तमाम बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को लेकर एक पार्टी बनाना चाहते हैं, जिनका वर्तमान चुनावी राजनीति और एन.जी.ओ. सुधारवाद से मोहभंग हो चुका है। मैंने उन्हें अपनी राय देते हुऐ कहा कि मात्र इन साझा मुद्दों पर कोई पार्टी यदि बन भी जाये तो बिखर जायेगी और यह कि, विचारधारा और वैकल्पिक कार्यक्रम पर एकता के बिना कोई पार्टी नहीं बन सकती। मेरा कहना था कि धार्मिक कट्टरपंथी फासीवाद और नवउदारवाद के विरुद्ध जुझारू जनान्दोलनात्मक चरित्र वाले एक संयुक्त मोर्चे का निर्माण आज की फौरी ज़रूरत है। आज की दूसरी ज़रूरत है कि निष्प्राण हो चुके जनवादी और नागरिक अधिकार आंदोलन को एक व्यापक जनाधार पर तृणमूल स्तर से संगठित किया जाये। इन दो प्रश्नों पर राजकिशोर जी काफी हद तक सहमत भी हुए थे। वह इस विश्लेषण को पूरी तरह मानते थे कि साम्प्रदायिक फासीवाद नवउदारवाद की राजनीति है और यह वित्तीय पूँजी की सेवा करता है, लेकिन साथ ही, यह मध्यवर्ग का एक धुर-प्रतिक्रियावादी सामाजिक आंदोलन है जो तृणमूल स्तर से एक कैडर-आधारित संगठन द्वारा खड़ा किया गया है। अत: इसे मात्र चुनाव में हराकर पीछे नहीं धकेला जा सकता। प्रगतिशील युवाओं और मेहनतकशों का तृणमूल स्तर से संगठित सामाजिक आंदोलन ही इसका जवाब हो सकता है। मेरे तर्कों से सहमत होते हुए राजकिशोर जी ने मजाकिया अंदाज में कहा था, ''तुम मुझे मार्क्सवादी तो कभी नहीं बना पाओगी, लेकिन मार्क्सवाद के तुम्हारे वाले ब्राण्ड से व्यावहारिक स्तर पर कई जगह मैं खुद को सहमत पाता हूँ। मैं कठमुल्ला नहीं हूँ और हमेशा तार्किक विचारों को अपनाता रहता हूँ। साम्प्रदायिक फासीवाद और इसके प्रतिरोध की रणनीति के बारे में अब मैं भी कुछ ऐसा ही सोचता हूँ।'' मज़दूरों के बीच हमलोगों के काम के बारे में उनकी विशेष दिलचस्पी थी। गत दिसम्बर या जनवरी के महीने में उन्होंने एक बार इच्छा जाहिर की थी कि वह हमलोगों के साथ कार्यक्षेत्र में कुछ दिन रहकर जमीनी तौर पर हमलोगों का काम देखना चाहते हैं। मैंने उन्हें समझाया था कि मज़दूर बस्तियों में हमलोगों की जैसी दिनचर्या, खानपान और भागदौड़ रहती है, वह उनकी सेहत और उम्र को देखते हुए उनके लिए कठिन होगी। फिरभी उन्होंने कहा था कि हमलोगों के बीच वह कभी कुछ दिन ज़रूर बिताना चाहेंगे। राजकिशोर हिन्दी पत्रकारिता में राजेन्द्र माथुर, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, प्रभाष जोशी आदि की परम्परा की अंतिम कड़ी थे, लेकिन प्रभाष जोशी के हिन्दूवादी परम्परा-प्रेम से वह सर्वथा अछूते थे। उनकी पीढ़ी के कई सारे प्रतिभाशाली और प्रखर समाजवादी रुझान वाले पत्रकारों को उम्र की ढलान पर सत्ता के गलियारों में घूमने या ताकतवरों के रंगमहल में पीछे से घुसने का चस्का लग गया। कइयों ने तो पंजा या कमल को हृदय से लगा लिया और नेताओं के भाषण लिखने वाले भाड़े के कलमघसीट बन गये। लेकिन राजकिशोर जी ने न कभी बहती गंगा में हाथ धोया, न ही कंबल ओढ़कर घी पीया। बौद्धिकों के बीच वह कबीर थे और लेखन की दुनिया में आम नागरिक का ज़मीर थे। मुझे गर्व है कि उनके अंतिम दिनों में उनकी मित्रता मुझे नसीब हुई। उनके साथ मेरी बहस जारी रहेगी और उनसे सीखना भी जारी रहेगा। जो हिन्दी समाज, हिन्दी पत्रकारिता और इस विशाल देश की जनता की जिंदगी, सपनों और संघर्षों को लेकर सोचते और चिंता करते हैं, उन्हें राजकिशोर की कमी आने वाले लम्बे समय तक खलती रहेगी। हालांकि हिन्दी पत्रकारिता और समूचे बौद्धिक जगत में आजकल जिन धूमकेतुओं ने धमाचौकड़ी मचा रखी है, वे राजकिशोर होने का महत्व समझ ही नहीं सकते। उनके लिऐ राजकिशोर के न होने का उसी तरह कोई मतलब नहीं है, जैसे कि उनके होने का कोई मतलब नहीं था। (लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता और अध्ययनशील टिप्पणीकार हैं। देहरादून में रहती हैं)