जुलाई 2018

क्षेत्रीय दलों के हाथ में है 2019 की कुंजी

अनिल सिन्हा

कई राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां ही सत्ता-संघर्ष के केंद्र में हैं। इन इलाकों में राष्ट्रीय पार्टियां वास्तव में परिधि पर हैं। सच्चाई तो यह है कि 2019 में भाजपा को असली टक्कर यही पार्टियां दे रही हैं। कुछ राज्यों में तो उनकी इतनी ताकत है कि वे कांग्रेस और भाजपा से एक साथ लोहा लेने की स्थिति में हैं।

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली की एक राजनीतिक घटना काफी महत्वपूर्ण थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और आम आदमी पार्टी सरकार के दो मंत्री, सत्येंद्र जैन तथा गोपाल राय उपराज्यपाल के आवास पर धरने पर बैठ गए। उनकी मांग थी कि उपराज्यपाल हस्तक्षेप करें और उनकी सरकार के आईएएस अधिकारियों को सरकार के साथ काम करने के लिए कहें। उनकी शिकायत थी कि पिछले तीन महीनों से अधिकारी काम नहीं कर रहे हैं। केंद्र सरकार उनकी बात पर जरा भी ध्यान देने के लिए तैयार नहीं थी और बगैर उसके हस्तक्षेप के कुछ होने वाला नहीं था। सिसोदिया और जैन अनशन पर चले आए थे। मोदी सरकार ने उनकी बात सुनने के बजाय अपनी पार्टी के नेताओं को ही आंदोलन पर उतार दिया और दिल्ली भाजपा के नेता भी मुख्यमंत्री के कार्यालय में जवाबी धरने पर बैठ गए। गतिरोध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। विपक्षी कांग्रेस भी केजरीवाल के खिलाफ अघोषित रूप से भाजपा का ही साथ दे रही थी। ऐसे में, एक मामूली से हस्तक्षेप ने तस्वीर ही बदल दी। चार गैर-भाजपा मुख्यमंत्री-आंध्र के चंद्राबाबू नायडू, पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी, केरल के पिनाराई विजयन और कर्नाटक के कुमारस्वामी दिल्ली के मुख्यमंत्री के समर्थन में उतर आए। दूसरे दिन ही, केंद्र सरकार का रवैया बदल गया और गतिरोध खत्म होने की घोषणा हो गई। हालांकि, मीडिया ने इस घटना के इस पहलू को सामने नहीं लाया। यह एक बड़ी घटना थी। जाहिर है कि मोदी सरकार इन मुख्यमंत्रियों को राज्यों के साथ उचित व्यवहार नहीं करने का आरोप लगाने का मौका नहीं देना चाहती थी। यह भारत के संघीय ढांचे में क्षेत्रों की राजनीतिक ताकत का अहसास कराता है। मोदी के राष्ट्रीय रंगमंच पर आने के बाद लगने लगा था कि अब क्षेत्रीय पार्टियों का जमाना लद गया है। लोगों को लगने लगा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सत्ता में आना एक ऐसी राजनीतिक घटना है, जो क्षेत्रीय ताकतों को हाशिए पर धकेल देगी। लेकिन कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों ने बता दिया कि क्षेत्रीय पार्टियों की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। महाराष्ट्र के उपचुनावों ने भी यही साबित किया। वहां शिव सेना और एनसीपी ने अपनी ताकत दिखाई और गोंदिया-भंडारा की लोक सभा सीट एनसीपी ने जीत ली और पालघर की सीट पर शिव सेना ने भाजपा को भारी टक्कर दी। उत्तर प्रदेश के उपचुनावों ने भी यही दिखाया। अगर हम ध्यान से देखें तो कई राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां ही सत्ता-संघर्ष के केंद्र में हैं। इन इलाकों में राष्ट्रीय पार्टियां वास्तव में परिधि पर हैं। सच्चाई तो यह है कि 2019 में भाजपा को असली टक्कर यही पार्टियां दे रही हैं। कुछ राज्यों में तो उनकी इतनी ताकत है कि वे कांग्रेस और भाजपा से एक साथ लोहा लेने की स्थिति में हैं। देश के नक्शे पर नजर दौड़ाने पर पश्चिम बंगाल ओडिसा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलांगना, तमिलनाडु, जम्मू तथा कश्मीर जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां ही महत्वपूर्ण दिखाई देती हैं। बाकी कई राज्यों में भी क्षेत्रीय पाटियों की भूमिका भले ही निर्णायक न हों, उनकी अच्छी-खासी भूमिका तो है ही। अगर क्षेत्रीय क्षत्रपों का नाम लें तो शरद पवार, उद्धव ठाकरे, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक लालू प्रसाद, चंद्रा बाबू नायडू, नवीन पटनायक, मायावती तथा नीतीश कुमार ऐसे नेता हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना नामुमकिन है। लोक सभा के 2019 में होने वाले चुनावों के नजदीक आने के साथ ही यह सवाल महत्वपूर्ण होता जा रहा है कि भाजपा को पटखनी देने में विपक्षी पार्टियां कामयाब हो पाएंगी या नहीं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी पार्टी को ताकत देने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों हुए विभिन्न चुनावों के नतीजे बताते हैं कि उन्हें अभी मीलों दूर जाना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता में वापस आने से रोकने का काम उनकी पार्टी अकेले नहीं कर पाएगी। मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने की संभावना कहीं से दिखाई दे रही है तो यह क्षेत्रीय पार्टियों से ही। क्षेत्रीय पार्टियां भी हरकत में आ चुकी हैं। पिछले दिनों आरएसएस और भाजपा की रणनीति में आए परिवर्तनों पर भी गौर करने की जरूरत है। उन्होंने अपना फोकस बदल लिया है। गोरक्षा के नाम पर हो रहे आक्रमण अभी ठंडे पड़ गए हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह देश के नामी लोगों से मिलने के लिए देश के दौरे पर निकल पड़े हैं। उनकी सूची में क्षेत्रीय दलों के नेताओें के नाम भी शामिल हैं। शिव सेना की राजनीतिक बदसलूकी को नजरअंदाज करके वह उद्धव ठाकरे से भी मिल आए। क्षेत्रीय दलों के बारे में भाजपा के रवैए को समझना मुश्किल नहीं है। उसे अंदाजा हो गया है कि आने वाले समय कठिनाई वाले हैं। भाजपा की रणनीति के हिसाब से ही आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की उपस्थिति में हुए चर्चित कार्यक्रम में यह कह डाला कि दूसरों की विविधता को स्वीकार करना चाहिए। यह संकेत उन संगठनों के लिए है जो विविधता में यकीन रखते हैं। इतना तो निश्चित है कि यह न तो आरएसएस की पुरानी नीति को त्यागने और न ही विविधता के दर्शन को अपनाने के लिए है। संघ ने समय-समय पर ऐसे अवसरवादी कदम उठाए हैं, जब भी उसे संभावनाएं दिखी हैं। मीडिया ने मोदी की लोकप्रियता की ऐसी तस्वीर बना कर रखी है कि कई लोगों को लग सकता है कि भाजपा अपनी लोकप्रियता के चरम पर पहुंच कर ऐसा क्यों कर रही है? लेकिन पिछले दिनों हुए चुनावों के नतीजों और देश की आर्थिक हालत पर गौर करने से इस सवाल का जवाब आसानी से मिल जाता है। लोक सभा के ज्यादातर उपचुनाव भाजपा ने हारे हैं। राज्यों के ज्यादातर चुनावों में भी उसे तिकड़म की जीत ही हासिल हुई है। उसने ऐसे तिकड़म हर जगह किए हैं और कांग्रेस के भ्रष्ट लोगों को भी बड़े पैमाने पर पार्टी में शामिल किया है। इसके बावजूद वोटों के प्रतिशत में वह कहीं भी 2014 की लोकप्रियता कायम नहीं रख पाई और जहां भी विपक्षी एकता हो गई, वहां उसे मुंह की खानी पड़ी है। इस एकता को तोड़ने के लिए जरूरी हो गया है कि संघ परिवार अपना चेहरा सौम्य करे, ताकि दूसरे दल उसके साथ रह सकें। जहां तक अर्थव्यवस्था का हाल है तो यह एकदम बुरी हालत में है। बैंकिंग क्षेत्र में डूब जाने वाले पैसे की राशि बहुत ज्यादा बढ गई है। बाहर के जो पैसे देश के बाजार में लगे हैं, वे भी तेजी से बाहर जा रहे हैं। रोजगार की हालत कैसी है, इसे बताने की जरूरत नहीं है। सरकार कॉरपोरेट के चंगुल में इस तरह फंसी है कि वह बर्बाद हो गई खेती के लिए कोई बड़ा पैकेज नहीं दे सकती है। इसके लिए उसे कॉरपोरेट क्षेत्र को दी गई लाखों करोड़ रुपयों की छूट में तुरंत कटौती का फैसला करना पड़ेगा, ताकि जरूरी पैसा निकाला जा सके। वह इतने हंगामे के बावजूद तेल की कीमत कम करने को तैयार नहीं हो रही है, क्योंकि आम लोगों से मिल रही आमदनी का जरिया वह छोड़ नहीं सकती। लोगों को साथ बांधे रखने का सांप्रदायिक फार्मूला भी चल नहीं पा रहा है। इसे कम से कम उत्तर प्रदेश के उपचुनावों ने तो पूरी तरह साबित कर दिया है। भाजपा और संघ को यह लगने लगा है कि नरेंद्र मोदी अकेले दम पर चुनाव की नाव पार नहीं लगा सकते हैं। ऐसे में, मोदी और भाजपा के सामने क्षेत्रीय पार्टियों को साथ लाने के अलावा कोई उपाय नहीं है। कांग्रेस और राहुल गांधी ने क्षेत्रीय ताकतों को पहचानने में देरी नहीं की है और वह विपक्ष को जोड़ने की कोशिश भी कर रहे हैं। वह भाजपा विरोधी पार्टियों को साथ लेकर महागठबंधन बनाने को लेकर जरूरी तत्परता भी दिखा रहे हैं। वह वही तरीका अपनाना चाहते हैं, जिसे अपना कर भाजपा ने 2014 में जीत हासिल की थी और बाद में इसे उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव तथा त्रिपुरा समेत बाकी पूर्वोत्तर राज्यों में दोहराया था। यह तरीका था छोटी-छोटी पार्टियों को साथ लेकर बड़ी पार्टियों को पराजित करने का। गुजरात में राहुल ने यही तरीका अपना कर जिग्नेश मेवानी और हार्दिक पटेल जैसी स्थानीय शक्तियों को साथ लेकर भाजपा को अच्छी टक्कर दी थी। लेकिन पार्टी नेताओं के दबाव में यह रणनीति वह कर्नाटक में लागू नहीं कर पाए । हालांकि चुनाव नतीजे आने के बाद उन्होंने जेडीएस से हाथ मिलाने में देरी नहीं की और उसकी भरसक भरपाई कर लीं। यह सच्चाई है कि आंध्र प्रदेश में चंद्रा बाबू नायडू की तथा तेलंगाना में टीआरएस की पार्टियां हैं, जिन्हें अब कांग्रेस से नहीं, भाजपा से डर लग रहा है। फिलहाल उड़ीसा के नवीन पटनायक फिलहाल मिले-जुले संकेत दे रहे हैं। लेकिन उनका भाजपा के साथ आना संभव नहीं दिखाई देता है। पार्टी के सांसद जय पांडा के पार्टी छोड़ने से तो यही लगता है, क्योंकि पांडा का भाजपा से नजदीकी संबंध है। वह उसकी नीतियों के प्रबल समर्थक रहे हैं और ज्यादा संभावना यही है कि अगले चुनावों में वह भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे। नवीन पटनायक के लिए कांग्रेस के साथ जाना संभव नहीं है क्योंकि अधिकतर जगहों पर उनका मुकाबला उसी से है। यही वजह है कि वह भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी बनाए रखना चाहते हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए भाजपा एक सहज पसंद हो सकती थी। एनडीए में वह पहले भी रह चुकी हैं। लेकिन बंगाल को कब्जे में लेने की जल्दबाजी में भाजपा ने वह मौका खो दिया है। फिलहाल, ममता के लिए भाजपा नंबर एक दुश्मन है। उसके लिए यह सहूलियत की बात भी है, क्योंकि इससे मुसलमानों का समर्थन उसके लिए पक्का हो जाता है। उत्तर प्रदेश में दो क्षेत्रीय दलों-मायावती की बसपा और अखिलेश की समाजवादी पार्टी का आना तो पक्का हो ही गया है। उनके साथ अजीत सिंह की आरएलडी तथा कांग्रेस का आना भी पक्का है। उत्तर प्रदेश और बिहार में एनडीए की पार्टियां कुछ विपरीत संकेत दे रही हैं। उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर तथा बिहार में उपेंद्र कुशवाहा तथा रामविलास पासवान के अलावा नीतीश कुमार भी ऐसे ही संकेत दे रहे हैं। लेकिन बिहार में एक भाजपा विरोधी गठबंधन तो पहले से अस्तित्व में है। यह है तेजस्वी का आरजेडी, कांग्रेस और शरद यादव का लोकतांत्रिक जनता दल। वामपंथी दल-सीपीआईएमएल, सीपाएम तथा सीपीआई-भी इसमें आ जाएंगे। सांप्रदायिक भाजपा को रोकने का सारा दारोमदार अब क्षेत्रीय दलों पर ही है, क्योंकि सभी पार्टियों को साथ लेकर भाजपा विरोधी आंदोलन चलाने की मजबूत रणनीति कांग्रेस बना नहीं पाई है। क्षेत्रीय दलों का ही भय है कि भाजपा को चार साल के निरंकुश शासन के बाद सहिष्णुता की चादर ओढ़ने की जरूरत पड़ गई है। लेकिन क्षेत्रीय दल केंद्र के स्तर पर निरंकुशता को रोकने में अहम भूमिका भले ही निभाते हैं, उनकी कार्यशैली और नीतियां भी लोकतंत्र को मजबूत करने में मदद नहीं करती हैं। वे भी परिवारवाद, पार्टी के भीतर लोकतंत्र के अभाव तथा कॉरपोरेट से मिलीभगत की महामारी से बड़े दलों की तरह ही ग्रस्त हैं। नए-नए बने लोकतांत्रिक जनता दल और वामपंथी पार्टियों के कार्यक्रम और उनकी नीतियों को छोड़ दें तो किसी भी पार्टी के पास कोई स्पष्टता दिखाई नहीं देती। कांग्रेस और भाजपा, दोनों कॉरपोरेट समर्थक हैं, लेकिन भाजपा में एक और गंभीर बीमारी है-सांप्रदायिकता की। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)