जुलाई 2018

कश्मीर से खेलती केन्द्र सरकार

हिदायत उल्लाह खान

पीडिपी और भाजपा के साझा एजेंडा में तमाम बातों के अलावा कश्मीर मसले पर सिर्फ अलगाववादी संगठनों से नहीं बल्कि पाकिस्तान से भी बातचीत करना शामिल था। कश्मीरी पंडितों को फिर से घाटी में बसाने का कार्यक्रम उसी एजेंडा का हिस्सा बना था। लेकिन इन दोनों ही अहम मसलों पर केंद्र सरकार ने सूबे की सरकार को एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने दिया। जाहिर है कि कश्मीर को लेकर केंद्र के खाने के दांत और दिखाने के दांत अलग-अलग हैं।

तोद पर हाथ फेर कर खाने को बे-स्वाद नहीं कहा जाता, पर भाजपा यही कर रही है। तीन साल उसने पीडीपी के साथ सरकार चलाई और अब उसे पता चला महबूबा मुफ्ती तो आतंकवाद के खिलाफ गम्भीर नहीं हैं। उनके साथ काम नहीं किया जा सकता है। असल में सियासी पार्टियों को लगने लगा है, वो जो घालमेल करते हैं, उसे कोई देख नहीं रहा है, जबकि उसे सिर्फ देखा ही नहीं, समझा भी जा रहा है, फिर चाहे वो नीतीश की गुलाटी हो या कांग्रेस का कुमारस्वामी प्रेम...इसमें भाजपा के पीडीपी से दूर जाने को भी रखा जा सकता है। क्या कश्मीर में आतंकवाद अभी बड़ा है? क्या जब महबूबा और भाजपा का गठबंधन हो रहा था, दोनों सरकार चलाने की बात कर रहे थे, तब शांति थी? क्या इन तीन सालों में शांति रही है? क्या पहली बार कोई सिपाही शहीद हुआ है? या किसी पत्रकार को गोली मारी गई है? ये सब तो कश्मीर में होता रहा है। इन तीन सालों में दर्जनों सैनिक शहीद हुए। सैकड़ों हिंदुस्तानियों को जान गवांना पड़ी है, लेकिन तब खून में उबाल नहीं आया, वो जो अभी शहादत हुई हैं, उसने बैचेनी बढ़ा दी, जबकि बैचेनी तो कुछ है और उसका बिल यहां फाड़ा जा रहा है। आज भाजपा को महबूबा का तरीका पसंद नहीं आ रहा है, जबकि वो तो कश्मीर से आतंकवाद को खत्म करने के लिए पीडीपी के साथ गईं थीं, लेकिन उससे कुछ हुआ नहीं और जब समझ आया कश्मीर का हल नहीं निकाला जा सकता है तो आतंकवाद में इज़ाफ़ा दिखने लगा है और बढ़ती कट्टरता भी उसे परेशान करने लगी है। असल में उसने जो बेमेल रिश्ता बनाया था, उसकी उम्र पर सबको शक था, पर मोदी और अमित शाह को कांग्रेस मुक्त भारत बनाना है, जिसके चक्कर में गुड़ से तो परहेज़ करने का ढोंग करते रहे, पर चाशनी पीने से उन्हें गुरेज़ नहीं है। जिस तरह से उन्होंने पीडीपी का दामन झटका है, उससे तो लग रहा है रमजान में जो शांति मुहिम शुरू की गई थी, उसमें भी काली दाल ढूंढी जा सकती है। तभी तो भाजपा कह रही है हमने तो शांति के लिए रमजान में भी सीजफायर किया, आतंकियों को छोड़ा, पत्थरबाजों को अच्छा बनाने-बनने की मोहलत दी, लेकिन वो तो सुधरने को तैयार ही नहीं हैं। इसलिए हम सरकार से हट रहे हैं। पर क्या जब शांति वार्ता नहीं हो रही थी या सीजफायर नहीं किया गया था, तब सब कुछ ठीक था। तब भी तो गोलियां चल रही थीं। लोग मर रहे थे और क्या पीडीपी से दूर हट कर भाजपा इस बात की गारंटी दे सकती है, वो कश्मीर में शांति ला देगी, क्योंकि मुद्दा राज्य सरकार का नहीं, केंद्र सरकार का है और केंद्र में तो भाजपा की बाहुबली सरकार है, जिसने आम चुनाव के वक्त कई मसले हल करने का वादा किया था, जिसमें कश्मीर भी शामिल था, पर क्या यहां कुछ सुधार हुआ है? राष्ट्रपति शासन लगने के बाद भी आतंकी अपनी हरकत से बाज नहीं आते हैं और कश्मीर में अमन नहीं होता है तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? अगर राज्यपाल के पास ताकत आने के बावजूद पाकिस्तानी घुसपैठ को रोका न जा सका है या पाकिस्तान में खौफ पैदा न किया जा सका है कि वो भारत के घरेलू मामले में दखलअंदाजी ना करें। तो फिर जवाब कौन देगा? अभी तो पड़ोसी मुल्क ये सब खुलेआम कर रहा है और चीन उसका साथ दे रहा है, जबकि मोदी ने सिर्फ पाकिस्तान को उसकी औकात बताने का वादा नहीं किया था, चीन का भी हिसाब करने की बात हुई थी, पर कुछ नहीं बदला है। आगे भी उस में कुछ सुधार नहीं हो सकता है, सिर्फ चुनावी वादे थे, जो एक-एक करके लगातार दम तोड़ते जा रहे हैं। दरअसल अभी दिक्कत आम चुनाव हैं, जो सिर पर आते जा रहे हैं और विपक्ष भी कश्मीर को मुद्दा बना रहा है जो मोदी-अमित शाह ने महबूबा-महबूबा किया था, उसका जवाब अब भाजपा के पास खत्म होता जा रहा था। फिर उसे हिंदुत्व की तरफ लौटना है। उसी के दम पर अगला चुनाव लड़ना है। ऐसे में महबूबा मुफ्ती मिसफिट हो जाती हैं, इसलिए रमजान के सीजफायर को मौका बनाया गया और शांति दूत बनते हुए महबूबा से हाथ जोड़ लिए गए। जो माहौल भाजपा या मोदी का कुछ दिन पहले था, उसमें भी बदलाव आ रहा है। कर्नाटक के अलावा कई उपचुनाव हुए हैं, जहां वो कमजोर हुई है। इसके बाद उसे बदलाव तो करना था, जिसकी शुरुआत उसने कश्मीर से की है, पर क्या इस बदलाव को कुबूल किया जाएगा। महबूबा मुफ्ती को साथ लेकर आतंकवाद पर नकेल नहीं डाली जा सकती, इस बात को समझने में भाजपा को तीन साल लग गए। क्या उसे नहीं पता था, ये वही मुफ्ती है, जिनके अलगाववादियों से करीबी ताल्लुकात रहे हैं और उन्होंने आजाद कश्मीर तक की बात की है। क्या यहां पाकिस्तान परस्ती नहीं थी? क्या महबूबा के कहने पर मोदी एंड कंपनी ने वो सब नहीं किया जो कोई और सियासी पार्टी करती तो देशभर में हंगामा हो जाता?