जुलाई 2018

आपातकाल स्मरण, संघर्ष और सबक

जयशंकर गुप्त

आपातकाल और उस अवधि में हुए दमन-उत्पीड़न और असहमति के स्वरों और शब्दों को दबाने के प्रयासों को न सिर्फ याद रखने बल्कि उनके प्रति चौकस रहने की भी जरूरत है ताकि भविष्य में कोई सत्तारूढ़ दल और उसका नेता वैसी हरकत और हिमाकत नहीं कर सके जैसा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में किया था।

प्रायः प्रत्येक वर्ष, 25-26 जून को आपातकाल की बरसी मनाई जाती है। इस साल भी मनाई गई। आपातकाल के काले दिनों को याद करते हुए लोकतंत्र की रक्षा की कसमें खाई गई। वाकई आपातकाल और उस अवधि में हुए दमन-उत्पीड़न और असहमति के स्वरों और शब्दों को दबाने के प्रयासों को न सिर्फ याद रखने बल्कि उनके प्रति चौकस रहने की भी जरूरत है ताकि भविष्य में कोई सत्तारूढ़ दल और उसका नेता वैसी हरकत और हिमाकत नहीं कर सके जैसा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25-26 जून 1975 की दरम्यानी रात में किया था। उस कालीरात को देश को आपातकाल और सेंसरशिप के हवाले कर नागरिक अधिकार एवं स्वतंत्रताएं छीन ली गई थीं। राजनीतिक विरोधियों को उनके घरों, ठिकानों से उठाकर जेलों में डाल दिया गया था। अभिव्यक्ति की आजादी पर सेंसरशिप का ताला जड़ दिया गया था। पत्र-पत्रिकाओं में वही सब छपता और आकाशवाणी पर वही प्रसारित होता था जो उस समय की सरकार चाहती थी। प्रकाशन-प्रसारण से पहले सामग्री को प्राधिकृत अधिकारी के पास भेज कर उसे सेंसर करवाना पड़ता था। तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो क्या आज स्थिति उस समय के आपातकाल से बहुत ज्यादा भिन्न है। इस पर चर्चा से पहले इंदिरा गांधी के आपातकाल के बारे में कुछ बातें। आपातकाल की पृष्ठभूमि इंदिरा गांधी 1971 के आम चुनाव में बैंकों के राष्ट्रीयकरण, राजाओं के प्रिवी पर्स की समाप्ति जैसे अपने फैसलों पर आधारित गरीबी हटाओ के नारे के साथ प्रचंड बहुमत के साथ सत्तारूढ़ हुई थीं। उन्होंने अपने प्रचारतंत्र और मीडिया का सहारा लेकर अपनी गरीब हितैषी और अमीर विरोधी छवि बनाई थी। लेकिन आगे चलकर गुजरात के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में छात्रावास में बढ़ी फीस और घटिया भोजन की आपूर्ति के विरोध में शुरू हुए छात्र आंदोलन ने नव निर्माण आंदोलन का व्यापक रूप धर लिया था। इस आंदोलन की परिणति राज्य में कांग्रेस की सत्ता से बेदखली के रूप में हुई थी। और फिर बिहार आंदोलन ने, जिसने आगे चलकर देश भर में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति आंदोलन का रूप धारण कर लिया था, केंद्र में शक्तिशाली इंदिरा गांधी की सरकार को भी भीतर से झकझोर दिया था। इस आंदोलन को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर प्रायः सभी गैर कांग्रेसी दलों का सहयोग-समर्थन था। असंतोष के स्वर कांग्रेस के भीतर सक्रिय चंद्रशेखर, मोहन धारिया, रामधन जैसे पूर्व समाजवादी युवा तुर्क नेताओं की ओर से भी उभरने लगे थे। तभी 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा का ऐतिहासिक फैसला आ गया। सिन्हा ने रायबरेली में इंदिरा गांधी से पराजित समाजवादी नेता राजनारायण द्वारा उनके संसदीय चुनाव को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका पर फैसला सुनाते हुए श्रीमती गांधी के चुनाव को अवैध घोषित करने और लोकसभा की उनकी सदस्यता रद्द करने के साथ ही उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था। लेकिन, अपने फैसले पर स्थगनादेश भी खुद ही जारी करते हुए जस्टिस सिन्हा ने श्रीमती गांधी को सुप्रीम कोर्ट में उनके फैसले के खिलाफ 20 दिनों के भीतर अपील दायर करने की अनुमति भी प्रदान की थी। इंदिरा गांधी की अपील पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 24 जून को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर स्थगनादेश जारी करते हुए यह व्यवस्था भी दी थी कि इस मामले में आखिरी और पूर्ण फैसला आने तक श्रीमती गांधी प्रधानमंत्री बनी रह सकती हैं। वह संसद की कार्यवाहियों में भाग भी ले सकती हैं, लेकिन सदन में किसी मुद्दे पर वोट नहीं कर सकतीं। दूसरी तरफ, श्रीमती गांधी पर अंदर और बाहर से भी पद त्याग के लिए दबाव बनने लगा था। उनके पद त्याग नहीं करने की स्थिति में अगले दिन 25 जून को जयप्रकाश नारायण एवं सम्पूर्ण विपक्ष ने दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में एक लाख से अधिक लोगों की रैली-सभा कर देशवासियों से अनिश्चितकालीन देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया था। यहां तक कि सेना और पुलिस से भी सरकार के गलत आदेशों को नहीं मानने का आह्वान किया गया था। इसी मैदान में जेपी ने राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर कविता की पंक्ति-'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है,' का उद्घोष किया था। जेपी ने अपने भाषण में कहा था, ''मेरे मित्र बता रहे हैं कि मुझे गिरफ्तार किया जा सकता है क्योंकि हमने सेना और पुलिस को सरकार के गलत आदेश नहीं मानने का आह्वान किया है। मुझे इसका डर नहीं है और मैं आज रामलीला मैदान की इस ऐतिहासिक रैली में भी अपने उस आह्वान को दोहराता हूं, ताकि कुछ दूर, संसद में बैठे लोग भी सुन लें। मैं सभी पुलिस कर्मियों और जवानों का आह्वान करता हूं कि इस सरकार के आदेश नहीं मानें, क्योंकि इस सरकार ने शासन करने की अपनी वैधता खो दी है।'' जेपी को वहीं से गिरफ्तार कर लिया गया। कांग्रेस के अंदर भी चंद्रशेखर, रामधन, मोहन धारिया और कृष्णकांत जैसे युवा तुर्कों के इंदिरा विरोधी स्वर तेज होने लगे थे। लेकिन बाहर और अंदर से भी बढ़ रहे राजनीतिक विरोध और दबाव से निबटने के नाम पर श्रीमती गांधी ने पद त्याग करने के लोकतांत्रिक रास्ते को चुनने के बजाय अपने छोटे बेटे संजय गांधी, कानून और न्याय मंत्री हरिराम गोखले और वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे जैसे कुछ खासुलखास सलाहकारों से मंत्रणा के बाद 'आंतरिक उपद्रव' की आशंका के मद्देनजर संविधान की धारा 352 का इस्तेमाल करते हुए आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से देश में 'आंतरिक आपातकाल' लागू करने का फरमान जारी करवा दिया था। देशवासियों को अगली सुबह आकाशवाणी पर श्रीमती गांधी ने राष्ट्र के नाम जारी अपने संदेश में कहा, ''भाइयों और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे आतंकित होने की जरूरत नहीं है।'' उन्होंने आपातकाल को जायज ठहराने के इरादे से विपक्ष पर साजिश कर उन्हें सत्ता से हटाने और देश में आंतरिक उपद्रव की स्थिति पैदा करने का आरोप लगाया और कहा कि सेना और पुलिस को भी विद्रोह के लिए उकसाया जा रहा था। उन्होंने कहा, ''जबसे मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी राजनीतिक साजिश रची जा रही थी।'' आपातकाल तो इस देश में भारत-चीन युद्ध के समय 1962 में तथा भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय 1971 में भी लगा था लेकिन वह दूसरे तरह के आपातकाल थे। उनका कारण देश पर बाह्य आक्रमण था जबकि 1975 में आपातकाल आंतरिक अशांति की आशंका को आधार बनाकर थोपा गया था। चीन और पाकिस्तान से युद्ध के समय का आपातकाल 1975 के आपातकाल से बिलकुल अलग था। बाह्य आक्रमण के समय लगे आपातकाल में देश के नागरिकों के मौलिक अधिकार खत्म नहीं किए गए थे। जबकि 25-26 जून 1975 की दरमियानी रात आपातकाल लागू होने के साथ लोकतंत्र, मौलिक अधिकारों, नागरिक आजादी एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने का खेल शुरू हो गया। रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर देश में न पहुंचे इसलिए, दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई। रात को ही इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आर के धवन के कमरे में बैठ कर संजय गांधी और ओम मेहता उन लोगों की लिस्ट बना रहे थे जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था। पूरे देश को राजनीतिक विरोधियों के लिए जेलखाना बनाने की तैयारियां परवान चढ़ने लगीं। 27 जून को प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई थी। इसके विरोध में 28 जून को इंडियन एक्सप्रेस, स्टेट्समैन और नई दुनिया जैसे अखबारों ने सम्पादकीय की जगह को खाली यानी 'ब्लैंक स्पेस' छोड़ दिया था। बाद में सरकार ने ब्लैंक स्पेस पर भी पाबंदी लगा दी थी। सबसे दिलचस्प तरीका टाइम्स ऑफ इंडिया ने निकाला था। 28 जून को क्लासिफाइड विज्ञापन वाले स्टाइल में स्मृति शेष वाले पन्ने पर उसने जो छापा वह सिर्फ आपातकाल का विरोध नहीं बल्कि विरोध का एक आइडिया भी था। देखें क्या विज्ञापन छपा था।- "O' Cracy, D.E.M., beloved husband of T। Ruth, loving father of L.I. Bertie, brother of Faith, Hope and Justicia, expired on June 26। लेकिन आगे चलकर हमारा मीडिया प्रतिरोध या कहें कि सांकेतिक विरोध को भी जारी नहीं रख सका। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के शब्दों में कहें तो ''झुकने को कहा गया था लेकिन हमारा मीडिया आपातकाल में रेंगने लगा था।'' सच तो यह है कि आपातकाल में मीडिया ही नहीं, न्यायपालिका भी डर गई थी। दरअसल, आपातकाल में सबसे भयानक था संविधान के अनुच्छेद 21, 22 को खत्म कर देना। इससे लोगों की नागरिक आजादी खत्म कर दी गई थी। किसी को भी कभी भी हिरासत में लिया जा सकता था। इससे जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आपातकाल में नागरिकों के मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं को रद्द करने को जायज ठहराते हुए नागरिकों के जीने के अधिकार भी छीन लिए जाने की ताईद की थी। बहरहाल, आपातकाल लागू होने के बाद मोरारजी देसाई, चंद्रशेखर, अशोक मेहता, मधु लिमये, राजनारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी सहित तत्कालीन विपक्ष के तमाम बड़े-छोटे नेता-कार्यकर्ता आंतरिक सुरक्षा कानून (मीसा) और भारत रक्षा कानून (डी आई आर) के तहत गिरफ्तार कर जेलों में ठूंस दिए गए थे। राजनीतिक विरोधियों को उनके घरों, ठिकानों से उठाकर जेलों में डाला जाने लगा। उन्हें प्रताड़ित किया गया। कइयों की तो जान भी चली गई जबकि जार्ज फर्नांडीस और कर्पूरी ठाकुर जैसे कुछ बड़े नेता भूमिगत भी हो गए। बाद में उन्हें भी 'डायनामाइट कांड' के अभियुक्त के रूप में गिरफ्तार कर लिया गया। इंदिरा गांधी के इस अलोकतांत्रिक फैसले और अपनी गिरफ्तारी पर लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इतना भर कहा था, 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि।' लेकिन, इंदिरा गांधी ने इसका सबक तब तक नहीं लिया, जब तक, मार्च 1977 के आम चुनाव में उन्हें और उनकी पार्टी को भारी और अपमानजनक पराजय का सामना नहीं करना पड़ा। वह स्वयं रायबरेली में राजनारायण और उनके चहेते बेटे संजय गांधी अमेठी से अपेक्षाकृत अनजान रवींद्र प्रताप सिंह से चुनाव हार गए। दरअसल, आपातकाल एक खास तरह की राजनीतिक संस्कृति और प्रवृत्ति का परिचायक था, जिसे लागू तो इंदिरा गांधी ने किया था लेकिन बाद के दिनों-वर्षों में और आज भी वह एकाधिकारवादी प्रवृत्ति, कमोबेस सभी राजनीतिक दलों और नेताओं में देखने को मिलती रही है। भाजपा के वरिष्ठ और बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी ने हमारी मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में ही इन प्रवृत्तियों के मौजूद रहने और आपातकाल के भविष्य में भी लागू किये जाने की आशंकाएं बरकार रहने का संकेत देकर इस धारणा को और प्रामाणिकता प्रदान की थी। आज दो साल बाद स्थितियां ठीक उसी दिशा में जाते हुए दिख रही हैं। देश आज अंध राष्ट्रवाद और धार्मिक कट्टरपंथ के सहारे एक अराजक माहौल और अघोषित आपातकाल की ओर ही बढ़ रहा है। सत्ता पोषित और समर्थित भीड़ यह तय करने में जुट गई है कि हमें क्या खाना है, क्या पहनना है, क्या बोलना है, क्या देखना और पसंद करना है, कैसे जीना है। कहीं भी उत्तेजित और उन्मादी भीड़ सरे राह और रेल गाड़ियों में भी किसी की पिटाई कर उसकी जान ले सकती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ी साफ दिख रही है। प्रेस और मीडिया पर भी सरकारी विज्ञापनों, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग जैसी सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल कर असहमति के स्वरों को दबाने के रूप में एक अलग तरह की 'अघोषित सेंसरशिप' के संकेत साफ दिख रहे हैं।