जुलाई 2018

प्रणब के निहितार्थ

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

प्रणब मुखर्जी का संघ प्रमुख मोहन भागवत के आमंत्रण पर संघ के कार्यक्रम में बतौर अतिथि जाने ने देश को चौंकाया। पक्ष विपक्ष में लंबी तकरीरें हुईं। कांग्रेस सहित एक पक्ष का कथन था कि जाना गलत है, वहीं दूसरा पक्ष जाने की पैरवी कर रहा था। इसका उत्तर हां भी हो सकता था। हां इसलिए कि लोकतंत्र में कोई अछूत नहीं होता है। प्रश्न अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने का होता है और ना भी हो सकता था, क्योंकि ताउम्र धर्मनिरपेक्षता की वकालत करने वाले संघ और साम्प्रदायिकता से लड़ने वाले प्रणब मुकर्जी जब राष्ट्रपति नहीं, केन्द्र सरकार में मंत्री थे, तब उन्होंने कहा था कि संघ के तार आतंकवादियों से जुड़े हुए हैं। इसलिए उनके जाने, न जाने से अधिक सार्थकता इस बात में थी कि उनके जाने के निहितार्थ क्या थे? स्वयं की राह प्रशक्त करना थी या देश को राह दिखाना थी। संघ देश का गैर पंजीकृत राजनैतिक संगठन है। जो स्वयं को सामाजिक संगठन कहता है। वो सीधे चुनाव नहीं लड़ता है, पर चुनाव में टिकट वितरण से लेकर प्रचार तक की सभी भूमिकाएं निभाता है। आडवानी की जगह नरेन्द्र मोदी को 2014 का प्रधानमंत्री घोषित करता है। संघ बगैर भाजपा का पत्ता भी नहीं हिलता है। वो हर वक्त राजनीति करता है, लेकिन राजनीति को नकारता है। संघ अपनी इस कथनी-करनी के भेद को अस्वीकार करता है। वो भाजपा का मातृ संगठन है। भाजपा उसकी मातृ वंदना करती है। भाजपा को छोड़कर देश के सभी राजनीतिक दल उसकी आलोचना करते हैं। प्रणब मुखर्जी ताउम्र कांग्रेसी रहे। संघ के सबसे बड़े आलोचक रहे। कांग्रेस उनका मातृ संगठन है। उसने उन्हें गांव से उठाकर दिल्ली में केन्द्रीय मंत्रि मंडल में बड़े-बड़े पदों पर बैठाया और राष्ट्रपति बनाया। प्रणब बाबू के समर्थक जमीन से ऊपर उठकर भद्र लोक में विचरण करने वाले प्राणी हैं। कहते हैं कि प्रणब बाबू ने कांग्रेस को बनाया। क्या बनाया यह तो पं. बंगाल को देखकर समझ सकते हैं। अपनी जिंदगी में वे एक बार कांग्रेस से लोकसभा में पहुंच सके, वह भी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन से। ममता बनर्जी जैसे मैदानी ईमानदार नेताओं की कांग्रेस ने सदैव अवहेलना की। प्रणब मुखर्जी ताउम्र प्रधानमंत्री के सेवक की भूमिका में रहे। सत्तासीन को यह सेवक की मुद्रा सदा सुहाती है। बलिहारी हमारे मीडिया और यथेष्ठ जन की जिनकी प्रत्यंचा पर चढ़े तीर की तरह एक ही आँख होती है। प्रणब मुखर्जी के संघ में दिए गए भाषण में उन्हें खूबियां दिखती हैं। मुलायम-लालू का परिवारवाद दिखता है। ममता का गैर परिवारवाद नहीं दिखता। बिहार में चारा घोटाला होता है। अभियुक्त दोनों ही मुख्यमंत्री हैं एक जगन्नाथ मिश्र जगन्नाथ बाबू हैं, दूसरे लालू यादव चारा चोर हैं। मुलायम की दो पत्नी परिवार पर हंसी उड़ती हैं, लेकिन मामला अटलबिहारी का हो तो ऐसा नहीं होता है। उन्होंने शादी नहीं की, लेकिन दामाद रंजन भट्टाचार्य हैं, वे प्रधानमंत्री के पते पर जमीन खरीदते हैं। यह सब नजरअंदाज किया जाता है। मायावती के तो रंग को देखकर ही बदरंग टिप्पणियां करते हैं। वे भूल जाते हैं कि मायावती का रंग ही देश का रंग है। ये कृष्ण का भी देश है। लेकिन यहां काला अपने को सांवला, सांवला अपने को गोरा और गोरा एक विशिष्ठ बोध के साथ आत्ममुग्धता में जीता है। हमारे देश के बहुसंख्यक घरों में मायावती मिल जाएंगी। हम अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो गये लेकिन उनके रंग को अपने दिल-दिमाग में बसा कर बैठे हैं। अपने देश के रंग को समझ नहीं पा रहे हैं। इस सोच में पहला रंग जात का है, वो सबसे गहरा है। वो चमड़ी के अंदर है, जरा सा कुरोचो तो बाहर निकल आएगा। दूसरा रंग चमड़ी के उपर है, वो दिमाग के भीतर है। इन दो तरह के रंगों से ही प्रणब बाबू रंगीन हैं। वरना प्रणब बाबू कभी प्रणब यादव या प्रणव पासवान होते तो क्या वे वहीं हुए होते जो हुए ? इंदिरा गांधी के 1975 के आपातकाल के दौर में उनके प्रमुख सहयोगी रहे प्रणब बाबू। दोषी सिर्फ इंदिरा गांधी थीं। जगजीवन राम, हेमवती नंदन, बहुगुणा ने आपातकाल की आलोचना करते हुए लोकसभा चुनाव 1977 के पूर्व कांग्रेस छोड़ी थी। चन्द्रशेखर, मोहन धारिया, कृष्णकांत इंदिरा गांधी को आपातकाल लगने के पूर्व ही छोड़ चुके थे। प्रणब मुखर्जी इन्दिरा गांधी के समक्ष प्रणाम की मुद्रा में खड़े रहे। उनके इस गुण ने उन्हें ताउम्र सत्ता के शिखर पर बनाये रखा। राष्ट्रपति बनने के बाद हुए लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस 44 सीटों के निम्न और भाजपा 282 के उच्च सूचनांक पर पहुंच गई। वे कांग्रेस को कालातीत समझ भाजपा के सुनहरे कल में डूब गये। मनमोहन सिंह और प्रणब के अर्थशास्त्र में यही अंतर है। राष्ट्रपति के कार्यकाल में उन्होंने एक भी ऐसा काम नहीं किया, जो देश को दिशा देता। उत्तराखंड सरकार की राज्यपाल द्वारा अवैध बर्खास्तगी की अधिसूचना को उन्होंने स्वीकार किया। एक बार भी अपने अधिकार का उपयोग कर उसे वापस नहीं लौटाया। न्यायालय ने राह दिखाई। जज जोसफ ने उत्तराखंड सरकार को बहाल किया। वे मोदी सरकार की आंखों की किरकिरी बन गये। प्रणब बाबू मोती बन गये। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश हेतु कालोजियम ने जोसेफ का नाम दो बार भेजा जो वापस लौटा दिया गया। आम आदमी पार्टी के 22 विधायकों को जब दिल्ली के उपायुक्त ने अयोग्य घोषित किया, प्रणब मुखर्जी ने अनुत्तरदायी कार्य किया। उन्होंने इन विधायकों को अयोग्य घोषित करने पर मुहर लगाई। वे विधेयक को एक बार वापस कर देश को संदेश दे सकते थे। उन्होंने ऐसा नहीं किया। न्यायालय ने 22 विधायकों को योग्य घोषित कर फटकार लगाई। प्रणब मुखर्जी इसी तरह अपनी प्रधान सेवक की पुरानी भूमिका को धीरे-धीरे भाजपा की ओर शिफ्ट कर, मोहन भागवत, नरेन्द्र मोदी से दोस्ती करने लगे। दांव था दोबारा राष्ट्रपति बनने का, लेकिन राष्ट्रपति नहीं बनाया गया। आस कभी जाती नहीं है, और सत्ता की हो तो वो कभी मरती नहीं है। वे संघ के कार्यक्रम में पहुंच गये। कांग्रेस ने जाने का पहले विरोध किया वो गलत था। वो उसका प्रणब मुखर्जी की बेवफाई पर आत्म प्रलाप था। बाद में समर्थन किया। वो भी गलत था। वो मीडिया और तथाकथित भद्र लोक की मोदी प्रशंसा के दबाव से उपजा हीन बोध था। प्रणब मुखर्जी और मोहन भागवत दोनों ही के भाषण एक जैसे थे। दोनों ही जात, धर्म से ऊपर उठने की बात करते रहे। कहा, देश सभी धर्मों का है । यह तो संविधान में भी लिखा हुआ है। प्रणब मुखर्जी चन्द्रगुप्त मौर्य से शुरू हुए। 1270 से इस्लाम आगमन पर पहुंचे। मुगल काल और अकबर को भूल गये। संघ के साथ जो बैठे थे। भारत-पाक बंटवारा और गांधी की हत्या को भूल गये। मोहन भागवत से भविष्य के लिए रिश्ता निभाना था। प्रणब बाबू के मोह पाश में जकड़ा मीडिया और भद्र लोक उन्हें फिर श्रेष्ठता का प्रमाण पत्र देने लगे। देश के मौजूदा हालात और उससे उत्पन्न अनेक यक्ष प्रश्न खो गये। इतिहास में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं, जब लिया गया निर्णय नया इतिहास बना जाता है। प्रणब मुखर्जी ने वो अवसर गवांया है। आज देश में सबसे बड़ा संकट क्रेडिटिबिलिटी का है। उनकी सत्ता से दोस्ती की आदत रही है, फिर भी उनके राजनैतिक जीवन में कोई घोटाला नहीं है। भारतीय राजनीतिज्ञ की यह सबसे बड़ी पूंजी होती है। प्रणब मुखर्जी अपनी इस स्वीकार्यता का, बड़े होने का लाभ देश को दे सकते थे। वे संघ के मंच से गोल-गोल जलेबी बनाते रहे। वे दूध का दूध पानी का पानी कर सकते थे। वे दूध में जरा सा एक बूंद दही डालकर दही जमा सकते थे। देश के स्वास्थ्य के लिए दही बहुत जरूरी था। जयप्रकाश नारायण ने सन 1974 में ठीक निर्णय लेकर देश को सही रास्ता दिखाया था, लेकिन वे जयप्रकाश थे। ये प्रणब बाबू हैं। वो जयप्रकाश न बन सके। राजकिशोर गोपालदास नीरज ने कभी लिखा था- आये थे गागर बनकर सागर बनकर चले गए... राजकिशोर चले गए...। वे विचारों का सागर थे। इस सागर से वे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और मानवीय मूल्यों के मोतियों को गोते लगाकर ताउम्र निकालते रहे। राजकिशोर समंदर थे यह मैं एक पाठक के तौर पर जानता था। उनसे परिचय नहीं था। उनसे पहली मुलाकात अचानक हुई थी। उन्होंने पूछा आप रविवार क्यों निकाल रहे हैं। मैंने कहा विचार के लिए। उनका उत्तर था विचारों के लिए कौन निकालता है। मैंने विचार दोहराया। उन्होंने तपाक से कहा छोड़ो विचार-विचार इसके लिए कौन निकालता है। मैंने अपने स्वाभावानुसार कहा आप जो यह सब लिख रहे हैं, उसके लिए हमने लाठियां खाई हैं, जेल यात्राएं की हैं। उसके बाद खामोशी थी। कुछ बातें और हुई, बाद में उन्होंने अनिल जैन से जो उस वक्त मौजूद थे कहा मैं तो समझ रहा था, लोग धंधे के लिए निकालते हैं। ये मानसम्मान के लिए निकाल रहे होंगे, लेकिन ये मामला कुछ अलग दिखता है। इसके बाद राजकिशोर रविवार से जुड़े। रविवार का उन्होंने कायाकल्प किया। पहली बैठक में ही कहा देखिये विज्ञापन पत्रिका का सौन्दर्य है, विज्ञापन के बगैर पत्रिका अधूरी लगती है। हम निजी विज्ञापन नहीं लें तो अच्छा है। बाद में भुगतान करना पड़ता है, फिर भी मैं इस पर ज्यादा नहीं कहूंगा, लेकिन सरकारी विज्ञापन ले सकते हैं। कारण कि सरकार जनता की, पैसा जनता का है। हम रविवार जनता के लिए निकाल रहे हैं। वे अखबारों से आगे कविता, व्यंग्य, कहानी, उपन्यास, सामाजिक सरोकार आदि के साथ देश-दुनिया की राजनीति के गहरे जानकार थे। वि.वि. में छात्र उनके उपन्यास सुनन्दा की डायरी पर पी.एच.डी. कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प की चर्चाओं की शुरुआत में ही रविवार में उनका आलेख आया जो 6 पेज से अधिक का था। अमेरिकी अन्तर्मन को समझते हुए वहां के इतिहास, भूगोल, आर्थिक हालात, विदेशनीति, राजनीति के साथ चुनाव पर देश का पहला मौलिक विवरण था। वे जब रविवार को लेकर बैठते थे तो हेडिंग, लेखक, फोटो, प्रूफ रीडिंग, पेज, किस जगह कितने पॉइंट, शुरू से आखिरी पन्ने तक एकरूपता, कुछ इस कदर कि उन्हें सिवाय रविवार के दूसरी बात अच्छी नहीं लगती थी। इनमें त्रुटी होने पर तनाव में आ जाते थे। मैं कहता था भाई साहब धीरे आप 1977 के रविवावर है। आप के साथ काम कर सके ऐसे लोग कहां से लाएं ? वे शांत हो जाते थे, लेखन को लेकर एक व्यग्रता, एक बेचैनी उनमें बनी रहती थी। अपनी बेचैनी के साथ वे अचानक इस जहां से चले गए। उन्हें जिंदगी से कुछ नहीं चाहिए था, पर जिंदगी ने उनका जो हक था वो भी नहीं दिया। उलटा उनसे छीना, वो अकल्पनीय था। एक कड़वाहट उनमें कभी-कभी आ जाती थी, वो नीम के मानिन्द होती थी। उन्होंने समय के भाल पर लिखे को शायद पहले ही पढ़ लिया था। उन्होंने एक लेख भेजा था नास्तिकता के पक्ष में वो नहीं छापा गया। उसके लिए मैंने उनसे निवेदन किया था कि हम जो लिख रहे हैं, वो व्यवस्था पर चोट है। हमारा काम छैनी द्वारा पत्थर से मूर्ति बनाने का है। न कि उसे तोड़ने का है। डॉ. लोहिया ने कभी कहा था कि ‘राम, कृष्ण, शिव हुए या नहीं हुए, यह मैं नहीं जानता, लेकिन इस देश के करोड़ों लोगों के चेहरे पर उनका नाम लेने से जो चमक आती है, वो देने की मेरे पास कोई और सूरत नहीं है। देश के गली, गांव, चौपाल में लोग इनकी चौपाई, कथा, किस्से दोहराते हैं। आज उनका दुरुपयोग हो रहा है, कल सदुपयोग देश बनाएगा। कभी कभार ऐसी दिक्कत आने पर रविवार के विचारार्थ मान जाते थे। सब कुछ वे ही तय करते थे। मैं प्रधान सम्पादक हूँ, लेकिन हकीकत यही है वे प्रधान थे, यह मेरी खुश किस्मती रही कि मैं उनके साथ काम कर सका उनसे सीख और समझ सका। कहने को, लिखने को बहुत कुछ है रविवार में उनके रहने के दौरान के अनेक अनुभव हैं। वे सब इन पन्नों पर नहीं बांटे जा सकते हैं। हमारे यहां अच्छे इंसान के जाने के बाद अतिश्योेक्ति की बारिश होती है। जीते जी उसे प्यासा रहना पड़ता है। उनके ही शब्दों में जैसा उन्होंने कहा था- जिंदगी में वांटेड ही नहीं मिलता है, लेकिन जब किसी को अनवांटेड मिलता है तो बड़ा आश्चर्य होता है। यह भारत के हिंदी के प्रथम पंक्ति के लेखक की जिंदगी का फलसफा है। रविवार परिवार की ओर से उनकी स्मृति को सादर प्रणाम !