जून 2018

कर्नाटक के बहाने

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

कर-नाटक का मंचन हो चुका है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और 2019 भारत मंचन की तैयारी है। सबसे पहले तो नाटक वो नहीं है, जो हम आए दिन देख रहे हैं। नाटक यथार्थ की अनुभूति होती है। रामायण की रामलीला से लेकर कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतलम्, शेक्सपीयर का हेमलेट, बबन खान का अदरक के पंजे, बसंतपोत्दार का एकल मंचन, भगतसिंह जैसे अनेक नाटक हमें कथानक से जोड़कर उसके हर पात्र की जिन्दगी से रूबरू कराते हैं। नाटक प्राचीन विधा है। जो सौ वर्षों में फिल्मों में ढल गई है। फिल्मों में कई रीटेक की गुंजाइश होती है। नाटक में सेकंड की गुंजाइश नहीं है। नाटक हवा में तार पर चलना है। आवाज उतार-चढ़ाव, मुस्कान, ठहाका, दर्द की अलग-अलग अभिव्यक्ति जिसमें चूक की कोई गुंजाइश नहीं होती है। कर्नाटक को हम नाटक नहीं कह सकते हैं। चुनाव का समूचा परिदृश्य लोकतंत्र का फूहड़ प्रहसन था। उसमंर जनता से जुड़े मूल मुद्दे खो गये, यर्थात लुप्त हो गया । समूचे घटनाक्रम में लोकतंत्र की खूबसूरती, न्यायपालिका वाले दृश्य में दिखती है। मौजूदा हालात पर रामलीला जैसा मंचन होना था। रामलीला में पूरा रामराज्य दिखता है। भगतसिंह का किरदार निभाते हुए वसंत पोत्दार भगतसिंह से रूबरू कराते थे। राहुल गांधी अकेले ही वसंत पोत्दार के एकल नाटक भगतसिंह जैसा मंचन कर रहे थे। पूरे चुनाव में राहुल गांधी के साथ न तो कनेक्टिविटी थी और न ही कलेक्टिविटी थी, कनेक्टिविटी से आशय वे कर्नाटक को आत्मसात न कर सके। दलित जो वहां का 20 फीसद सबसे बड़ा हिस्सा है उन्हें छू (कनेक्ट) न सके। यह 2019 की दिशाहिनता थी। कलेक्टिविटी से आशय है जो दृश्य कुमार स्वामी के शपथ मंच पर था, वो कर्नाटक चुनाव में उपस्थित न हो सका। सभी राजनीतिक दल कांग्रेस के साथ कर्नाटक के चुनाव में जुड़ (कलेक्ट) न सके। शपथ मंच पर जिस तरह से गलबाहिया हो रही थी। खासतौर पर सोनिया गांधी, मायावती से जिस तरह लिपट रही थी। वह 2019 की दिशा थी। सोनिया गांधी ने अटल बिहारी के 2003-04 के शाइनिंग इंडिया के पूरे चुनाव में दो बातें हर वक्त बोली थीं। महंगाई, बेरोजगारी। इन दो लफ्जों का रिश्ता मुल्क के 90 फीसद लोगों से होता है, मीडिया, राजनीति और देश के अन्य मुखर तत्व जो देश-दुनिया पर बहस करते हैं, वे इन दो लफ्जों के ऊपर होते हैं, उन्हें इनसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। राहुल गांधी उनकी नुमाइंदगी कर रहे थे। वे उन्हें मंदिर-मंदिर धुकवाकर भाजपा से प्रतियोगिता करवा रहे थे। तर्क था कि राहुल कांग्रेस की मुस्लिम परस्त छवि को ठीक कर रहे हैं। राहुल की यह वो भूल थी, जिसे वे पहले गुजरात चुनावों में कर चुके थे और अब पुन: कर्नाटक में कर रहे थे। कांग्रेस अपने इतिहास को भूल रही थी। महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी ने इस देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को ऊंचाइयों पर पहुंचाया था। राजीव गांधी से उनके सिपहसलारों ने पहले शाहबानो प्रकरण में मुस्लिम तृष्टिकरण करवाकर और बाद में संतुलन बनाने के लिए राम मंदिर के दरवाजे खुलवाकर देश को साम्प्रदायिकता के कुचक्र में फंसा दिया था। कुचक्र से कभी फायदा नहीं होता है। कांग्रेस की 1984 की 414 सीटें 1989 में 190 पर पहुंच गई थीं। देश ने एक बड़ी उम्मीद के साथ कांग्रेस को ठुकरा कर नरेन्द्र मोदी को चुना था। आज चार वर्ष पूरे हो रहे हैं, काला धन की वापसी होगी। पन्द्रह लाख रुपए प्रत्येक व्यक्ति के खाते में जमा होंगे। प्रतिवर्ष दो करोड़ लोगों को रोजगार मिलेगा। किसानों को फसल का डेढ़ से दो गुना मूल्य मिलेगा। अफसरों पर लगाम कसी जाएगी। उद्योग-व्यापार को प्रोत्साहन मिलेगा। ऐसे अनेक यक्ष प्रश्न खड़े हैं, बीते चार वर्षों में क्या हुआ है? डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ने के रोज रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। महंगाई आसमान पर है। बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कश्मीर के हालात हर दिन बिगड़ रहे हैं। केन्द्र-प्रदेश दोनों में सरकार भाजपा की है और प्रश्न करने वाले देशद्रोही हैं। राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के साथ कबड्डी का तू-तू का मैच खेल रहें हैं। उन्हें भाजपा को उसकी शैली में जवाब देना बन्द करना चाहिए। अन्यथा वे भाजपा से हलके पड़ जाऐंगे और देश के मूल मुद्दे खो जाएंगे। उन्हें मुद्दो पर मोदी सरकार को जनता की अदालत में लाना चाहिए। राजनीति आज के लिए नहीं आने वाले कल के लिए होती है। आज के लालच में मूल मुद्दों से भटकने से आज तो जाता ही है, आने वाला कल भी खो जाता है। राहुल गांधी की जवाबदारी है कि वो भाजपा को अपने रास्ते पर लाए, न कि उनके रास्ते पर जाएं। कांग्रेस भाजपा के हिन्दुत्व से डरकर खुद को बड़ा हिन्दू सिद्ध करने के रास्ते पर जिस तरह से चल रही है, वह कांग्रेस को उसके बचे-खुचे जनाधार दलित, पिछड़े, आदिवासी, मुसलमान से दूर कर देगा। पूरे देश में इन लोगों को जब भी कोई विकल्प मिला, इन्होंने कांग्रेस को उसकी ऐसी अवसरवादी आदतों के कारण छोड़ दिया है। राहुल गांधी का यह कदम देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को तोड़कर पाकिस्तान की साम्प्रदायिकता की राह प्रशस्त करेगा। कांग्रेस 2014 के चुनाव भाजपा के हिन्दुत्व से नहीं, वरन अपनी सरकार की असफलताओं से हारी थी। अपनी उस अकर्मण्यता का चेहरा वो भाजपा के हिन्दुत्व के मुखोटे से ठीक करना चाहती है। भाजपा धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुसलमान का और कांग्रेस हिन्दुत्व के नाम पर भाजपा से पहले हिन्दू का वोट नहीं ले सकती है। यह सामान्य ज्ञान की बात है, इसे कांग्रेस समझ नहीं पा रही है। 10 लोकसभा उपचुनाव में और उसके पहले दिल्ली बिहार पंजाब, गोवा, उत्तराखंड और त्रिपुरा की जनता भाजपा को हरा चुकी है। छद्म हिन्दुत्व को ठुकरा रही है। कांग्रेस उसे गले लगा रही है। कांग्रेस का समूचा खासतौर पर ब्राह्मण सवर्ण नेतृत्व अपने खोए हुए जनाधार ब्राह्मण, सवर्ण में अपना भविष्य तलाश रहा है। उसे समझना होगा कि वो कितने ही मंदिर धोकले, कितनी ही जोर से जयश्री राम बोल ले वो इस मामले में भाजपा के बराबर नहीं पहुंच पायेगी। इस देश का उदार हिन्दू कांग्रेस के कर्म और आचरण पर अवश्य वोट दे सकता है। यह भ्रम फैलाया जा रहा कि राहुल के मंदिर धोकने से हिन्दू वोट बढ़ रहा है। उसकी नाराजगी कम हो रही है। जबकि हकीकत यह है कि उदार हिन्दू का भाजपा से मोहभंग हो रहा है। विकल्प में उसे कांग्रेस दिखती है। कांग्रेस की वही पुरानी सूरत देखकर वो परेशान हो जाता है। उसके एक ओर कांग्रेस है, जिसे उसने ठुकराया है। दूसरी ओर भाजपा है, जिसे उसने अपनाया है। उसके लिए इधर कुआं, उधर खाई वाली स्थिति है। वे कांग्रेस के हिन्दुत्व से नहीं वरन् भाजपा की वादा खिलाफी से बदल रहे हैं। इंदौर की महेश नगर कॉलोनी में 250 घर हैं। यह माहेश्वरी, जैन आदि वणिकों की कॉलोनी है। यहां 250 में से 10-15 घर कांग्रेसी हैं। यहां रहने वाले एक नेता सन् 1993 में कांग्रेस से विधानसभा चुनाव लड़े थे। उन्हें यहां से 35 वोट मिले थे। महेश नगर से ठीक लगी हुई हरिजन कॉलोनी है, दोनों ही के बीच पहुंचने का मार्ग नहीं है मकानों की दीवार है उन सब पर जाति की दीवार है। ये एक-दूसरे को जानते पहचानते नहीं हैं। इनका आपस में किसी भी दुख-सुख में आना-जाना नहीं है। कांग्रेस के एक तीन बार के ब्राह्मण मंत्री हैं। वे 75 वर्ष के हैं, कुछ वर्ष पूर्व तक चुनाव लड़ने का विचार रखते थे और कहते थे कि महेश नगर में मेरे 50 घर हैं, जहां पर मैं खाना खा सकता हूं। इन्हें हरिजन कॉलोनी के घर मालूम नहीं हैं। महेश नगर के 250 में से जिस तरह 240 घर भाजपा के हैं, वैसे ही हरिजन कॉलोनी के 250 में से 240 घर आज भी कांग्रेस हैं। महेश नगर में मतदान होता है, 80 फीसद। हरजिन कॉलोनी में होता है 60 फीसद। कांग्रेस महेश नगर में वोट तलाश रही है। उसे हरिजन कॉलोनी दिखाई नहीं देती है। चुनावों में कर्नाटक के इतिहास उसकी संस्कृति से वहां के उद्योग व्यापार, किसान, मजदूर के हालात से बिजली-पानी, चिकित्सा, शिक्षा की स्थिति से अवगत कराना था। कांग्रेस ने लिंगायत का पत्ता खेला, कुछ लिंगायत कॉलेज, अस्पताल के मालिक अल्पसंख्यक के नाम पर फायदा ले सकते थे। लिंगायत जनता का इससे कुछ लेना-देना नहीं था। यह कांग्रेस की लोकसभा चुनाव के पूर्व सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने वाली चाल थी। लिंगायत जनता प्रलोभन और पावर के अंतर को समझ गई थी। वो पूर्व में जे.एस. पटेल, येदियुरप्पा, रामकृष्ण हेगड़े, देवराज अर्स में अपना पावर देख चुकी थी। कांग्रेस का लिंगायत पत्ता उलटा गिरा। राज्यपाल एक गौरवान्वित पद है। इसका धीरे-धीरे पतन होता रहा। आज स्थिति यह है कि हुजूर ने कहा कि बैठ जाओ तो पहले तो बैठ जाते थे, आजकल बैठने का कहो तो लेट जाते हैं। इनके इसी लेटने की अदा ने कर्नाटक में बहुमत प्राप्ति के लिए पहली बार सात दिन की जगह पन्द्रह दिन की गलती करवाई। दूसरी बार विधानसभा अध्यक्ष गलत आदमी को बनाने से बाजी भाजपा के हाथ से चली गई। भाजपा की स्वयं की आत्मरक्षा की बेताबी में यह प्रश्न खो गया कि विधायक क्या सिर्फ बिकने की वस्तु है? उन्हें छुपाकर रखना पड़ता है? कर्नाटक चुनाव के सभी वाहक अपने अतीत को भूलकर प्रतिपक्षी के अतीत को खंगालते रहे हैं। ये एक-दूसरे के अतीत को बतलाते-बतलाते खुद का अतीत भूल जाते हैं। मूल मुद्दों से दूर हटकर देश की जनता की व्यथा को भी भूल जाते हैं। उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय टेका लगा-लगाकर समय-समय पर लोकतंत्र की लाज बचाते आए हैं। आजकल इसके चीरहरण की हर संभव कोशिश की जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों ने भीष्म पितामाह की परम्परा को नकारते हुए चीर हरण के खिलाफ आवाज उठाई थी। कर्नाटक उसी का सुफल है। आखिरी दौर में मंच पर अद्भुत नजारा था, जो इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौर के 1977 के चुनावों की याद दिला रहा था। इंदिरा गांधी ने 19 माह की तानाशाही के बाद अचानक चुनावों की घोषणा की थी। सभी राजनीतिक दल जिनकी विचारधारा अलग-अलग थी। आपस में कोई तारतम्य नहीं था, इस डर के कारण इकट्ठे हो गए थे। कि इंदिरा गांधी जीत गईं तो पुन: तानाशाही आ जाएगी। वे चुनाव जीत भी गए। फिर किस कदर लड़े क्या हश्र हुआ? सब जानते हैं। ढाई वर्ष बाद ही 1980 में पुन: इंदिरा गांधी आ गई थीं। इन सबका सबब यह है कि सरकार को डराना नहीं वरन् जनता से डरना चाहिए। सबब यह भी है कि जो इकट्ठे हुए हैं, उनके पास कोई विचार, कार्यक्रम और उसकी सशक्त रूप रेखा होना चाहिए। उसको जनता के वोट की इज्जत करना चाहिए। घोषणा पत्र में और चुनाव में किए गए वादों को याद रखना चाहिए। इस नाटक की बगैर रीटेक की फिल्म ने अपनी सारी खराबियों को दिखाते हुए लोकतंत्र को कमजोर किया है। इसकी अंतिम परिणति येदियुरप्पा के इस्तीफे ने लोकतंत्र को मजबूती दी है। देश में चल रहा नया मिथक पैसे और पॉवर से सब कुछ खरीदा जा सकता है, उसे तोड़ा है। इसका सबब यह है कि कोई खुदा न बने। लोकतंत्र में सब बन्दे हैं।