मई 2018

सदबुद्धि

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। आज से साढ़े चार वर्ष पूर्व उन्हें भाजपा के गोवा अधिवेशन में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था। उम्मीद लालकृष्ण आडवाणी की थी, लेकिन संघ ने मोदी को चुना, मोदी का गुणगान इस तरह हुआ, जैसे वे ही सब कुछ हैं। लेकिन हकीकत वो नहीं, जो दिख रही, मोदी हर सप्ताह मन की बात करते हैं। देश में दुनिया में हर वक्त बोलते हैं। लेकिन जो साधु-साध्वी उनके मंत्रिमंडल में हैं, उनके सांप्रदायिक बयानों पर खामोश रहते हैं। गाय, वेज-नानवेज, दलित उत्पीड़न, आरक्षण पर खामोश रहते हैं। संसद में ऐसे मुद्दों से बचने के लिए अनुपस्थित रहते हैं। अभी कठुआ उन्नाव पर मौन रहे। संघ ने लालकृष्ण आडवाणी को वानप्रस्थ में धकेल दिया। आडवाणी ने संघ से ऊपर उठने की कोशिश की थी। जिन्ना की मजार संघ को रास नहीं आई थी। मोदी अंदर की हकीकत को जानते हैं। मोदी के पास प्रधानमंत्री के रूप में संवैधानिक अधिकार तो हैं, लेकिन एक संविधान वहां भी है, जहां से उन्हें तय किया गया है। यदि संघ का फरमान आ जाए तो वे नतमस्तक हैं। देश में 125 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी भी है, उसका नेतृत्व राहुल गांधी के हाथों में है। सीताराम केसरी के बाद सन् 1998 में यदि सोनिया गांधी ने आकर कांग्रेस का नेतृत्व नहीं संभाला होता तो कांग्रेस सैकड़ों टुकड़ों में बंट जाती। एक-एक प्रांत में कई-कई पार्टियां होतीं। बाद में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद ठुकराकर और राहुल गांधी ने उनका अनुकरण कर देश के दिल में एक जगह बनाई। 2004 से 2014 का सत्ता पर्व उसी का फल था। पद-प्रतिष्ठा नेता को एक आत्ममुग्धता या अहम् में भर देती है। यह इंसानी फितूर है। दुनिया में जहां-जहां जितनी ज्यादा जागरूकता होगी, यह उतना ही कम होगा। इसके सद्परिणाम हैं, तो दुष्परिणाम भी हैं। यही कालांतर में तानाशाही में बदलते हैं। इंदिरा गांधी का आपातकाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अभी-अभी कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने अपनी नर्मदा परिक्रमा पूरी की है। यह उन्होंने छह माह में 3400 किलोमीटर पैदल चलकर पूरी की है। दिग्विजय सिंह की इस यात्रा ने मध्यप्रदेश और खासतौर पर नर्मदा किनारे से जुड़े 120 विधानसभा क्षेत्रों की जनता को झकझोरा था। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की राजकीय फाइव स्टार नर्मदा यात्रा के मुकाबले दिग्विजयसिंह की यात्रा कष्टदायक थी। यात्रा के समापन पर राहुल गांधी के आने की चर्चा थी, लेकिन वे नहीं आए। कांग्रेस के नेता-कार्यकर्ता आधे ही रह गए। यही कांग्रेस की कार्यशैली रही है। कांग्रेस ने शरद पवार, ममता बैनर्जी जैसे अनेक मैदानी नेताओं को अपने इसी अहम् बोध में खोया। कांग्रेस सिमटते-सिमटते सिर्फ दो प्रांत में रह गई है। लेकिन सोनिया-राहुल की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। वे देश में कहीं भी चले जाएं पांच-दस हजार इकट्ठे हो जाएंगे। आडवाणी कहीं चले जाएं तो, और मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे तो पचास लोग भी नहीं दिखेंगे। संघ का भी यही हाल है। वो भी मानता है कि उसकी वजह से आप हैं। ज्यादा अक्ल तरक्की में बाधा है। सुब्रह्मण्यम स्वामी इसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं। कोई कितना ही मैदानी क्यों न हो, संघ वाला यह मानता है कि आप संघ की ताकत से चल रहे हो। ठीक उसी तरह से जैसे कांग्रेस सोनिया गांधी से चलती है। इनके बीच शरद यादव, सीताराम येचुरी, डी.राजा, शरद पवार, ममता बैनर्जी, मायावती, लालू यादव, अखिलेश यादव, करुणानिधी, नवीन पटनायक, चन्द्रबाबू नायडू, राजशेखर रेड्डी, सी. चन्द्रशेखर राव, उद्धव ठाकरे आदि नेता है। इनमें समाजवादी, कम्युनिस्ट विचारधाराओं के हैं, साथ ही जातिगत, सामाजिक, आर्थिक, क्षेत्रीय विषमताओं के विरोध में संघर्ष से निकले नेता भी हैं। जिस तरह संघ के बगैर भाजपा और राहुल के बगैर कांग्रेस की गति नहीं है। वैसे ही भाजपा और कांग्रेस की इनके बगैर गति नहीं है। इनके बीच दोस्ती-दुश्मनी चलती रहती है। जब हारते हैं, कहीं पिटाई होती है, तो आपस में प्यार बढ़ने लगता है। प्यार से जब सत्ता मिलती है तो झगड़ा करने लगते हैं। इन सबको कितनी सद्बुद्धि आती है, इस पर देश की सद्गति तय होगी। -- सर्वोच्च न्यायालय ने दलित के रपट लिखाते ही प्रकरण दर्ज होने के अधिकार पर रोक लगाकर दलित के आत्मरक्षा के अबोध अस्त्र को छीनने का काम किया है। वो आत्मरक्षा के इस अस्त्र को अभी उठाना भी नहीं सीख पाया था। उसे यह अस्त्र सन 1989 में दिया गया था। (दलित पर जुल्म-अन्याय देश की संस्कृति थी और उसे सहना दलितों की परम्परा) हजारों में कोई एक दलित जुल्म होने पर थाने जाकर रपट लिखाने की हिम्मत करता था और वहां बैठा ठाकुर-सवर्ण उसे भगा देता था। सन 1989 का कानून उसकी इस लाचारी को कुछ ताकत मिल सके, उस दिशा में छोटा-सा प्रयास था। सवर्ण वर्ग के कुछ लोगों द्वारा निर्णय का इस तरह समर्थन किया गया, मानो दलित इसका दुरुपयोग कर अत्याचार कर रहा था। इस निर्णय के विरुद्ध दलित ने जनआन्दोलन किये। जिसका समर्थन सभी राजनीतिक दलों ने इच्छा या अनिच्छा से किया। उच्च कर्णधारों के बयान आये कि दलितों का समर्थन हमारे देश के सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने का काम कर रहा है। प्रश्न उठता है यदि सामाजिक सौहार्द बिगड़ रहा है, तो सुधरा कब था? जब-जब सामाजिक विषमता की खाई को पाटने के प्रयास हुए हैं, तब एकता की ऐसी ही छद्म आवाजें उठी हैं। जौहर और सतीप्रथा समाप्त करने पर यही सब कहा गया था। शिक्षा और जागरूकता ने कुछ परिवर्तन अवश्यऔ किए हैं, लेकिन सतही हैं। दलित ही नहीं, वरन दहेज और नारी के मामलों में इसीलिए विशेष कानून बनाए गए। दहेज के कारण बेटी का जन्म लेना अभिशॉप था, इसकी आग में बेटियाँ जल कर या जलाकर मार दी जाती थीं, इसीलिए दहेज विरोधी कानून बना। इसमें दलितों के लिए बने कानून की तरह ही तुरन्त प्रकरण दर्ज कर जमानत नहीं दिए जाने की व्यवस्था थी। किसी प्रकरण में दुरुपयोग हुआ तो स्वर उठने लगे कि दहेज के नाम पर ज्यादती हो रही है। यह वही थे, जो बात तो अच्छी करते हैं, लेकिन परिवर्तन के पीछे छुपे दर्द को नहीं समझते हैं। नारी पर बलात्कार आदि के लिए भी दलित और दहेज जैसा कानून बनाया गया। लेकिन अपवाद स्वरूप कहीं दुरुपयोग हुआ तो नारी के विरोध में स्वर उठने लगे। आज यही स्थिति दलित के मामलों में भी बन रही है। सच तो यह था कि दलित थाने में रिपोर्ट लिखाने का साहस ही नहीं कर सकता था। जिस तरह बलात्कार या दहेज की सताई नारी रिपोर्ट लिखाने की हिम्मत नहीं कर सकती थी। वो बलात्कार के बाद समाज में जी नहीं सकती थी। इस डर से कि समाज में क्या मुंह दिखाएगी? उससे शादी कौन करेगा? दहेज के बाद घर आ गई तो दोबारा शादी कैसे होगी? ऐसे अनेको प्रश्न थे, जिनके उत्तर नहीं थे, इसीलिए नए कठोर कानून बनाये गये। क्या इन मामलों में देश बदला? दहेज बंद हो गया? नारी पर बलात्कार खत्म हो गए? दलितों की तो जिंदगी ही एक यक्ष प्रश्न रही है। यह कैसे मान लिया गया कि वे इतने मजबूत हो गए कि सवर्णों के हितों पर कुठाराघात कर रहे हैं? क्या किसी ने सोचा कि सदियों से दलित को लेकर बिगड़ा दिमाग बदल गया है? अत्याचार खत्म हो गए हैं? आज उसकी आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति क्या है? जो शक्तियां सदियों से इन्हें कुचलते आई थीं, वे बगैर सोचे-समझे झूठे इल्जाम लगा रही हैं। यदि दलित के मामले में अपवाद स्वरूप कोई दुरुपयोग हो गया, तो क्या बड़ी मुश्किल से मिला आत्मरक्षा का अस्त्र उससे छीन लिया जाएगा। आजकल दो बातें खास तौर पर हो रही हैं। एक हिन्दू-मुसलमान, दूसरी दलित-हिन्दू। दोनों में भी गुमराह किया जा रहा है। हिन्दू-मुसलमान की सांप्रदायिकता तो आजादी की लड़ाई से शुरू हुई, जो आजादी के बाद परवान चढ़ी है। हजारों वर्षों में देश में सैकड़ों राजा-महाराजा, बादशाह हुए, 300 वर्ष मुगल और 200 वर्ष अंग्रेज रहे, लेकिन दंगे नहीं हुए। ब्राह्मण, बनिया, नाई, धोबी, तेली, तंबोली, अहीर जैसी सैकड़ों जातियां और मुस्लिम साथ-साथ रहे। इनके घर, दुकान एक साथ रहे। सिर्फ एक जाति दूर रही, वो न मोहल्ले में रही, न बाजार में थी, वह दलित थी। असल सांप्रदायिकता तो उसके साथ हुई, जिसे बगैर दंगे के मार दिया गया। वो एक अदृश्य भारत बन गया। सदियों से चले आ रहे जुल्म अन्याय की जब बात होती है, तो बहस करने वाले उसका दोष पुरानी पीढ़ी को देने लगते हैं या वर्ण व्यवस्था की पैरवी करने लगते हैं कि हम बीते हुए कल के गुनाहगार क्यों बने? जबकि हकीकत तो यह है कि होटलों में शादी-ब्याह में कुछ वेटर दलित बन गए हैं। उसे बड़े गौरव के साथ बताया जाता है, लेकिन इस गौरव की पृष्ठभूमि में इंसानियत दबी हुई है। पुरानी पीढ़ियों ने दलित के हाथ से खाना-पानी तो ठीक, उसकी परछाई भी अपने ऊपर नहीं पड़ने दी। वेटर बनने से बस, ट्रेन, प्लेन में साथ बैठने से क्या वो आपके बराबर हो गया है? कितने ब्राह्मण सवर्ण के घर हैं जिनके किचन में आज भी दलित जा सकता है? यह आज भी सपना है। सिर्फ पानी पिलाने में ही देश की तबीयत खराब हो जाएगी। यह आज की कड़वी हकीकत है। किसी अपवाद की पूंछ पकड़कर लोकतंत्र की वैतरणी पार नहीं की जा सकती। पूरी बहस और लड़ाई मूल लक्ष्य को खूंटी पर टांग कर एक-दूसरे पर थोपी जा रही है, जिसके मूल में आरक्षण है। उसका जहर जेहनों में इस कदर घोल दिया गया है कि इसमें दलित और दलित बन रहा है। हजारों तरह के उद्योग-व्यापार हैं, दलित कौन से उद्योग व्यापार में हैं? उसका कोई होटल तो ठीक, शहर से दूर कोई खाने का ढाबा भी है? कोई चाय का ठेला है ? जाति से बने दिमाग ने उसे हाशिए पर डाल दिया है। दलित आरक्षण का हल्ला बहुत ज्यादा और गल्ला खाली है। न्यायालयों में कोई आरक्षण नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के 757 न्यायाधीशों में एक-दो दलित दिख पाते है। प्रथम श्रेणी, आईएएस, आईपीएस के लिए उनके आरक्षित पद अपवाद स्वरूप ही भरते हैं। वे भी आंखों में चुभते हैं। सदियों से देखने की दृष्टि ही ऐसी रही है। दलित देश का छटा हिस्सा है, शिक्षा और नौकरी में उनकी आरक्षित सीट भर नहीं पाती है। उसे बाद में सवर्ण ही भरता आया है और भर रहा है। आजकल एक दुश्चक्र चल पड़ा है। गरीब ब्राह्मण, सवर्ण अपनी गरीबी-बेरोजगारी के लिए दलित को दोषी मान बैठा है। उसकी नजर में उन्नत बना दलित खटकता है। वह उसके आरक्षण को खत्म करने की बात करता है, लेकिन उसे सोचना होगा यदि उन्नत दलित का आरक्षण खत्म भी हो गया तो उसे कोई लाभ नहीं होने वाला, लेकिन दलित का बेटा नौकरी नहीं करेगा तो क्या करेगा ? वो कपड़े की, जौहरी की, किराने की दुकान तो ठीक, चाट-पकौड़ी या चाय का ठेला भी नहीं लगा सकता। इसके लिए जरूरी है शर्मा भोजनालय, अग्रवाल चाट, जैन रेस्टोरेन्ट, पंजाबी ढाबा। यह आज का असली भारत है। आधुनिकता ने कुछ ऊपरी सूरत बदल दी हो, लेकिन जरा सी चमड़ी कुरेदो तो दिमाग वही जाति आधारित है। गरीब ब्राह्मण, सवर्ण को यह भी समझना होगा कि उ.प्र. में 2000 नौकरियों के लिए 17 लाख आवेदन आए थे। नौकरी कुछ हाथों के लिए और हाथ करोड़ों। आरक्षण खत्म भी हो जाए तो हाथ खाली ही रहेंगे। सबको हाथों की मुट्ठी बंद करना होगी और उसे एक-दूसरे पर नहीं वरन उनकी ओर तानना होगी, जिनके हाथों में उसकी तकदीर है, जिन्होंने नौकरी और बेहतर जिंदगी देने का वादा किया था।