अप्रैल 2108

गुड, बेटर और बेस्ट

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

किसी भी व्यक्ति, घर, परिवार, समाज, व्यवसाय या देश को चलाने के लिए कुछ नीति, सिद्धांतों का पालन करना पड़ता है। व्यापार में कहा जाता है कि ये सौ साल की पेढ़ी है। इसका सबसे बड़ा कारण होता है, आचरण, व्यवहार, ईमानदारी, बुद्धि, कौशल। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति, व्यापारी या सरकार किए गए वादों को भूलकर जोड़-तोड़ और झूठ को अपनी चतुराई और बुद्धिमानी समझने लगते हैं, ऐसी स्थिति में व्यापारी है तो उसे बाजार में दीवालिया और चुनी हुई सरकार है तो जनता द्वारा ठुकराया जाना निश्चित है। भाजपा को गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार में सबक सिखा कर जनता ने मोदी सरकार के पिछले साढ़े तीन वर्षों पर अपनी राय व्यक्त कर दी है। हालांकि यह जवाबदारी मीडिया की भी थी, लेकिन उसने सरकार के गलत कामों, उसके दल-बदल से लेकर देशभर में चल रहे जाति, धर्म, सम्प्रदाय के वितंडावाद को लगातार योग्यता और होशियारी बताया। जनसमस्याओं के लिए आवाज उठाने की जवाबदारी प्रतिपक्ष की थी, खासतौर पर कांग्रेस की, जो सबसे बड़ा दल है, लेकिन वो दूरदर्शन पर प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निभाता रहा। जितने भी उसने दर्शन कराये, दर्शन देता रहा। देश भर में कोई व्यापक जन आंदोलन या नीति कार्यक्रम आधारित गठबंधन का संदेश नहीं दे सका। गोवा में चुनाव हुए थे। कांग्रेस बड़ा दल था, लेकिन सरकार भाजपा की बन गई। मेघालय में भाजपा के दो विधायक थे, कांग्रेस के 22 थे, लेकिन सरकार भाजपा की बन गई। त्रिपुरा में कांग्रेस के 28 में से 22 विधायकों को भाजपा ने टिकट दे दिया, वो जीत गए। सरकार भाजपा की बन गई। म.प्र. में एक बड़े उद्योगपति को जो कांग्रेस का विधायक था, भाजपा में ले आए और मंत्री बना दिया। गुजरात में कांग्रेस के पूर्व व वर्तमान विधायकों को भाजपा से टिकट दे दिया। यही हाल उत्तरप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब के कर दिए। पूरे देश में अमित शाह का अश्वमेध का घोड़ा निकल पड़ा। मीडिया और भाजपा बड़े घमंड से प्रशासितगान गाने लगे। वे भूल गए कि लोकतंत्र में यह राजशाही लोक का अपमान होता है। आप पुराने जमाने के तोप, तीर-तलवार की जगह लालच, धनबल, बाहुबल या सेनापतियों से (सीबीआई या अन्य) डरा दबा सकते हैं, लेकिन जनता का दिल नहीं जीत सकते हैं। भाजपा अपने हर वादे को कुछ इस तरह भूली कि विदेशों से कालाधन लाना सपना बन गया। नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था चौपट कर दी। कैश जो देश का वरदान था, उसे अभिशाप में बदल दिया। जीएसटी लगाकर व्यापार चौपट कर दिया। किसान की फसल का वादे के मुताबिक डेढ़ा तो कहां उचित दाम भी नहीं दिया। महंगाई सुरसा की तरह बढ़ती रही। बेरोजगारी की रफ्तार तेज होती चली गई। रोजगार के अवसर सिमटते गए। जनता की जिन्दगी बेहतर से बदतर बनने लगी। जनता के इस दर्द को दिखाने का उत्तरदायित्व मीडिया का था, वो अखबारों में औचित्यहीन खबरें और टीवी पर भारत-पाक के छदम् युद्ध, जादू-टोने दिखाता रहा। कश्मीर की हालत दिन पर दिन बदतर होती गई। सैनिक शहीद होते रहे। सरकार भाजपा की और कसूरवार प्रतिपक्षीय दलों को बनाया गया। इन पर कोई भी कुछ बोल या लिख दे, तो वो देशद्रोही घोषित होने लगा। सरकार और राजनीतिक दलों को समझना होगा कि सच छुपाते अंधियारे में भी जनता ने असली सूरत को पहचानना सीख लिया है। नेता से ज्यादा होशियार जनता हो गई है। यह जनता बार-बार प्रमाणित कर रही है। सन् 2003 में अटल बिहारी सरकार ने छह माह पूर्व चुनाव करवा लिए थे। शाइनिंग इंडिया में वो असल भारत को न देख सके। जनता महंगाई, बेरोजगारी से त्रस्त थी। नतीजा चुनाव में मिली पराजय था। सन् 2014 मई में नरेन्द्र मोदी के वैभव के तीन माह बाद दिल्ली विधानसभा चुनावों में केजरीवाल को 70 में से 67 सीटों पर विजयी बनाना जनता का कमाल था। जनता की जागरूकता के इस दौर में नेताओं की दिशाहीनता जनता के हितों पर कुठाराघात है। आज पुन: महंगाई और बेरोजगारी का दौर है। सरकार विश्व विजय पर निकली हुई है और अपने देश में हर मोर्चे पर पराजित हो रही है। जनता के लिए इधर कुआं उधर खाई है। लेकिन वो गुड, बेटर या बेस्ट के बजाय, खराब, बहुत खराब और बहुत-बहुत खराब में फर्क समझने लगी है। यह समझ ही आने वाले कल में गुड...गुड...गुड करेगी। .. पुरुषोचित सत्ता के दर्प से ‘पोस्टमार्टम’ श्रीदेवी की मौत एक रहस्य है। वह स्वाभाविक मौत, आत्महत्या या हत्या के त्रिकोण में उलझी एक अबूझ पहली है। जिसके हर उत्तर के बाद नए प्रश्न खड़े हो जाते हैं। श्रीदेवी की मौत ने कुछ ऐसे प्रश्न भी खड़े किए हैं, जिनके उत्तर सबके पास हैं, किन्तु हजारों साल की गुलामी और नारी के प्रति दृष्टि दोष के कारण या तो देखने को तैयार नहीं हैं या देख नहीं पा रहे हैं। प्रश्न है- तानाशाही और लोकतंत्र के अन्तर का। दुबई एक सुल्तान की सल्तदनत है, जहां इंसान की जिन्दगी सुल्तान के हाथों में कैद है। वहीं भारत में इंसान की जिन्दगी इंसान के हाथों में महफूज है। चुनाव में मतपत्र पर ठप्पा लगाकर वो अपनी तकदीर तय करता है। यदि उसे कुछ गलत लगता है, तो वो तकदीर को अपने हाथों से फिर बदलता है। देश संविधान के तहत चलाया जाता है, यही कारण है भारत में एक चोरी की रिपोर्ट का खात्मा भी जब तक चोर या माल नहीं पकड़ाता है, तब तक नहीं होता है। यदि कोई मंत्री या बड़े पद वाला व्यक्ति क्यों न हो, यदि वो भ्रष्टाचार, बलात्कार, हत्या या अन्य अपराध करता है, तो उस पर विधि अनुसार कार्रवाई होती है। उसे गिरफ्तार कर जेल भी भेजा जाता है। इन सभी मामलों में कभी कोई अपराधी या अपराध रहस्य की परतों में समा जाते हैं, तो ऐसे उलझे हुए प्रकरणों को भी दस-बीस वर्षों बाद पुन: स्पेशल सेल के श्रेष्ठ अधिकारियों को जांच के लिए दिया जाता है। ऐसे कई प्रकरणों में वर्षों बाद अपराध से पर्दा उठा और अपराधी पकड़ाए हैं। श्रीदेवी के प्रकरण में पहले खबर आई कि मौत हार्ट अटैक से हुई है। फिर दुबई के शासन ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट जारी कर दी कि मौत दम घुटने से हुई है। प्रकरण का खात्मा किया जाता है। यह दुबई में तो ठीक था, क्योंकि वहां एक सुल्तान की हुकूमत है, लेकिन भारत एक लोकतंत्र है, यहां के मीडिया, राजनीतिक दलों और सरकार का दम किस वजह से घुट रहा था कि वे चुप्पी लगा गए। साथ ही मीडिया उसमें भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने श्रीदेवी की मौत के बाद भी उसकी जिन्दगी का पुरुषोचित सत्ता के कुंठित दिमाग से बने चाकू से अनेकों बार पोस्टमार्टम किया। एक घंटे में सभी टीवी चैनल यह रिपोर्ट ले आए कि उन्होंने 18 बार, 32 बार और 43 बार स्लिम रहने के लिए ऑपरेशन करवाए। इस तरह मानो डॉक्टरों ने हॉस्पिटल से पहले ही सब जानकारियां इकट्ठी करवा ली थीं। जनता में यह भ्रम फैला दिया गया कि कॉस्मेटिक सर्जरी की दवाइयों की वजह से हार्ट अटैक आया। जबकि मौत तो दम घुटने से हुई थी। डॉक्टरों के पेनल टीवी पर बहस करने लगे। नारी के सुन्दर दिखने की चाहत पर हमले शुरू हो गए। जिसमें सदा की तरह नारी भी साथ देने लगी। बहस चली कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियां सुन्दर दिखने के लिए हजारों करोड़ के मेकअप का सामान बेचती हैं। यह सच भी है, लेकिन सच का एक पक्ष है। यह बहस करने वाले भूल गए कि दुनिया में स्लिम बनने का कोई इलाज नहीं है। सिवाय संतुलित पौष्टिक आहार और एक्सरसाइज के। कोई भी दवा, पावडर या ऑपरेशन मोटापा कम कर फोरी राहत दे सकते हैं, लेकिन स्लीम फिट शरीर नहीं दे सकते। इंदौर के अरविंदो हास्पिटल में रोज चार, साल में पन्द्रह सौ और पिछले चार वर्ष में छह हजार से अधिक सर्जिकल ऑपरेशन मोटापा खत्म करने के लिए किए जा चुके हैं। इस ऑपरेशन में लाखों रुपये खर्च होते हैं। पेट की आहर नली को काटकर दो साल के बच्चे के माफिक बना दिया जाता है। कायदे से यह ऑपरेशन उन लोगों के लिए उचित है, जो किसी असाध्य बीमारी से ग्रसित हैं। व्यायाम नहीं कर सकते हैं, लेकिन यह ऑपरेशन करवाने वाले अधिकांश लोग जबान पर रोक नहीं लगाने वाले और व्यायाम से दूर रहने वाले होते हैं। इनमें से अधिकांश लोग ऑपरेशन के कुछ वर्षों बाद पुन: मोटे होने लगते हैं। हमारे यहां इन सब चीजों पर किसी तरह की कोई बहस और शोध नहीं है। मीडिया की नजर इस ओर नहीं पड़ती है। वो भूल जाते हैं कि हेमा मालिनी 69 वर्ष की उम्र में स्टेज पर नृत्य के लगातार तीन घंटे के कार्यक्रम आज भी देती हैं। नृत्य भारत का आदिसत्य है, देवी-देवता भी इसे करते आए हैं। भारत की प्रचीन कला और शिल्प इसकी गवाही दे रहे हैं। श्रीदेवी भी नृत्य की उसी परम्परा की वाहक थीं। दुर्भाग्य है कि नरेश अग्रवाल जैसे लोग जो कई बार स्वार्थ के लिए दल-बदल चुके हैं, वे एक बार पुन: समाजवादी पार्टी से राज्यसभा नहीं मिलने पर भाजपा में आकर जया भादुड़ी के लिए नाचने-गाने वाली दूषित पुरुषावली का इस्तेमाल कर रहे हैं जबकि वे स्वयं राजनीति के प्रदूषण हैं, जिन्हें भाजपा गले लगा रही है। इसी तरह की सोच के कारण श्रीदेवी मौत के बाद भी बार-बार मर रही है। यदि पुरुष को शेव करना है, मूंछ रखना है, कट शेव रखना है, टीशर्ट पहनना है, बनियान पहनना है, चड्डी पहनना है या धर्मेन्द्र से लेकर सलमान खान तक अपने शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन करना है। क्रीम, पावडर, डाई, विग का उपयोग करना है। पढ़ने के लिए चश्मे, खाने के लिए दांत लगवाना है, ऐसे नामालूम कितने जतन करता है, तो यह उसके अपने विवेक की बात है, एकाधिकार है और यह कोई बुरी बात भी नहीं है। ठीक इसके विपरीत नारी के मेकअप पर, उसके पहनावे पर प्रश्न खड़े करना, उसकी बिंदिया को सौभाग्य और लिपिस्टिक को दुर्भाग्य मानना, आज भी हिन्दुस्तान के एक बहुत बड़े तबके की मानसिकता है। जो हर अच्छी चीज को गड़बड़ कर देती है। अभिनेत्री श्रीदेवी सूरत और सीरत दोनों का ही एक श्रेष्ठ संगम थी। उनमें मधुबाला की आंखों सी गहराई, वो भी नामालूम कितनी अदाओं के साथ थी। नरगीस सा अभिनय, मीना कुमारी सा दर्द, वैजयंती माला, हेमा मालिनी-सा नृत्य और ऐश्वर्या राय सी देहयष्टि का सर्वोत्तम स्वरूप थी। इसलिए वो देवी नहीं श्रीदेवी थी। वो एक लम्हा थी, जिसकी चांदनी में इंडिया नहाया है। एक-दो बार नहीं, तीन सौ से अधिक बार फिल्मों में उनके उत्कृष्ट अभिनय को देखकर भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के फिल्म संसार में ऐसी कितनी अभिनेत्री हैं, जिन्होंने 54 वर्ष की उम्र में 50 वर्ष अभिनय के नाम पर दिए हों। वो भी अनेकानेक भाषाओं में तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम के बाद हिन्दी फिल्मों में काम करके। रहस्यों की परतों में जाएं तो लगता है कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कारण घर परिवार से लेकर बाहर तक बहुत-सों के चेहरे पर प्रश्न खड़े करते हैं, लेकिन यह जितना सही लगता है, उतना ही गलत भी हो सकता है। सिर्फ अंदाज ही लगा सकते हैं। लेकिन परिवार और सरकार दुबई की खात्मा रिपोर्ट से एक दिन में कैसे संतुष्ट हो गए? वे भूल गए कि भारत में हर इंसान की जिन्दगी अहं है। फिर वो तो श्रीदेवी थीं, जो भारत की अमूल्य सम्पदा थीं, जिन्हें पद्मश्री से नवाजा गया था, लेकिन वे उससे भी बढ़कर थीं, वो दक्षिण भारत में जन्म लेकर, कर्म और संघर्ष करते हुए उत्तर भारत की कुछ इस कदर हो गर्इं कि उनके अंतिम दर्शन के लिए दक्षिण भारत से और देशभर से आकर लाखों लोग तीन दिन तक मुम्बई की सड़कों पर दुबई से उनके आने का इंतजार करते रहे। वह भी तब, जबकि पर्दा गिर चुका था, और श्रीदेवी हवा हवाई हो चुकी थीं। इसके बावजूद बीस हजार से अधिक लोगों ने घंटों लाइन में खड़े रहकर, धक्के खाकर श्रीदेवी की पार्थिव देह को श्रद्धासुमन अर्पित किए। इस सबको देखने और समझने के लिए पुरुषोक्त चालबाज चश्मा उतारना पड़ेगा।