मार्च 2018

गृहस्थ

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

राम के साथ सीता हैं। उसमें भी राम से पहले सीता हैं वो सीताराम हैं। कृष्ण के साथ राधा हैं, वो राधा-कृष्ण हैं। विष्णुस के साथ लक्ष्मी हैं, हनुमान ब्रह्मचारी है लेकिन गृहस्थ राम-सीता के अनन्य भक्त हैं। शिव के साथ पार्वती हैं। उन्हें पार्वती से अप्रतिम प्यार है। सती की देह को कांधे पर रखकर पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं। जहां-जहां सती के अंग गिरते हैं, वे पूजा और साधना के शक्ति पीठ बन जाते हैं। भारत में ऐसे 52 शक्ति पीठ हैं, उनमें भी सबसे प्रमुख कामाख्या पीठ है, वहां पार्वती की योनि गिरी है। उस देश में ऐसा क्या हुआ कि नारी से प्यार करना तो दूर उसका इजहार करना भी गुनाह बन गया। गृहस्थी को स्वार्थ पतन और साधुत्व को त्याग और मोक्ष का मार्ग मान लिया गया। पच्चीस सौ बरस पहले बुद्ध, महावीर, ईसा हुए। बुद्ध और महावीर ने राजपाट के साथ गृहस्थी छोड़ पत्नी का त्याग किया। बुद्ध से बना बौद्ध धर्म, चीन-जापान सहित बहुत दूर तक पहुंचा, लेकिन भारत में अपनी जड़ें नहीं जमा सका। महावीर का जैन धर्म दुनिया तो क्या, अपने ही देश में अपरिग्रह, प्रेम, अहिंसा का सही संदेशा दे न सका। पंद्रह सौ बरस पहले मोहम्मद ने धर्म की खातिर वतन छोड़ा, लेकिन गृहस्थी और परिवार का त्याग नहीं किया। युद्ध किए और इस्लाम को आसपास के मुल्कों में विस्तारित किया। ईसा गृहस्थ नहीं थे, उन्हें कीलों से ठोंककर क्रॉस पर चढ़ा दिया गया, लेकिन ईसाइयत दुनिया की ताकत बन गई। सम्राट अशोक और बादशाह अकबर दोनों ही गृहस्थं थे, सम्राट अशोक कलिंग युद्ध में विजय प्राप्त कर राजपाट, घर-परिवार का त्याग कर बौद्ध भिक्षु बन गए। वहीं बादशाह अकबर ने जोधाबाई से विवाह किया। जोधाबाई को महारानी बनाया और उनके बेटे जहांगीर को अपना उत्तराधिकारी बना भारत वर्ष का बादशाह बनाया। इतिहास में अशोक गृहस्थी छोड़कर और अकबर गृहस्थी को अंगीकार कर महान कहलाए। नानक, कबीर, रैदास से लेकर महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी आदि की लंबी आदर्श गृहस्थ की परम्परा है। महात्मा गांधी गृहस्थ थे, कस्तूरबा ने आठ बच्चों को जन्म दिया। डॉ. लोहिया ने शादी नहीं की और जयप्रकाश नारायण ने प्रभावती से शादी तो की, पर गृहस्थ नहीं बने। तर्क था कि गृहस्थ बनने से परिवार नाम की इकाई जन्म लेती है। उसमें मां-बाप, बेटा-बेटी, भाई-बहन और रिश्ते इंसान को निजी स्वार्थों में घेरते हैं, वो कमजोर बनता है। यदि ऐसा था, तो उनके आदर्श गांधी थे और वे तो गृहस्थ थे। लेकिन यह भी सच है और भारत के सन्दर्भ में ज्यादा सच है कि परिवार इंसान को कमजोर करता है। सिर्फ एक बेटी के जन्म लेने से आदमी चिंता में डूबकर पैसे इकट्ठे करना शुरू कर देता है। यह आज के शिक्षा और जागरूकता के दौर में भी हमारे मुल्क की कड़वी हकीकत है। नरेन्द्र मोदी गृहस्थ होकर भी गृहस्थ नहीं हैं। तर्क है कि उनके कोई बाल-बच्चे नहीं हैं इसलिए वे ईमानदार रहेंगे। इसके उलट मनमोहन सिंह गृहस्थ होकर भी सद्गृहस्थ हैं। उनका भरा-पूरा घर-परिवार है, भाई बहन, पत्नी बेटी-दामाद, सब कुछ हैं। उनके प्रधानमंत्रित्व के 10 वर्षीय कार्यकाल में एक भी किस्सा सामने नहीं आया उनकी सफेद कुर्ते-पाजामे में अपनी छोटी मारुति कार के साथ एक निर्लिप्त इंसान की छवि सबके दिमाग में अंकित है। हमारे देश में साधु-संत, महात्मा, योगी, फकीरों की एक लम्बी श्रृंखला है, जिन्होंने पूरी दुनिया को धर्म, दर्शन अध्यात्म का संदेशा दिया है। इसके ठीक विपरीत राजा-महाराजा से लेकर ताकतवर लोगों के जुल्म-अन्याय, भोग-विलास की लंबी इंतेहा है। शायद इसी से यह ख्याल देश के दिमाग में बैठ गया कि गृहस्थी छोड़ त्यागी होना श्रेष्ठता की निशानी है। कालान्तर में परिवार की कमजोरी और उससे उत्पन्न स्वार्थों के कारण बगैर कुछ करे-धरे सबकुछ प्राप्त करने के लिए लोग परिवार को छोड़ साधु-संत, बाबा, महात्मा, काजी, मुल्ला, फकीर, गुरु, फादर बनने लगे। अपनी सांसारिक समस्याओं के निदान के लिए लोग इनके पास जाने लगे, जिन्हें ये इस लोक में माया का और परलोक में मुक्ति-मोक्ष का मार्ग दिखाने लगे। इनमें कितने त्यागी और सिद्ध थे और कितने पाखंडी, इसको तय करना कल भी मुश्किल था और आज भी है। हमारे यहां एक कहावत है कि या तो ठगाये रोगी या ठगाये भोगी। हमारे यहां एक कहावत और भी है कि सबसे कठिन गृहस्थ धर्म है। आदमी गृहस्थ होकर भी सद्गृहस्थ हो सकता है। गृहस्थ होकर स्वार्थी और दुष्ट हो सकता है। त्यागी हो कर पाखंडी हो सकता है और त्यागी होकर देश-समाज के लिए आदर्श हो सकता है। आज स्थिति यह है कि देश में आए दिन कोई न कोई बाबा, साधु की पोल खुल रही है। देश के सबसे बड़े व्यापारी बाबा रामदेव हैं और सबसे बड़े प्रान्त के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं दोनों ही गृहस्थ नहीं हैं। समझ में नहीं आ रहा है कि गृहस्थ में कितना त्योग-भोग है या संन्यास में कितना योग-भोग है, असल बाबा कौन है, असल योगी कौन है? सब कुछ गंडमगड्ड है। घोटाला नीरव मोदी बैंकों से दस हजार चार सौ करोड़ का घोटाला कर कह रहे हैं कि बैंकों ने मुझ पर ज्यादती की है। मेरा ब्रॉड खराब कर दिया। मैं पैसे चुका रहा था। मुझ पर 10 हजार करोड़ की रकम का कर्ज नहीं है। पांच हजार करोड़ का ही है। नीरव मोदी के खाते में बैंक ने पांच हजार करोड़ को ब्याज पर ब्याज चढ़ाकर बताया हो। यह एक हद तक सही भी हो सकता है। नीरव मोदी की पहले ही दिन पांच हजार करोड़ की प्रॉपर्टी भी जब्त कर ली गई। जबकि उसकी अन्य सम्पत्तियां और शोरूम जब्त होना बाकी रह गए। यह सब भी नीरव मोदी की बात की पुष्टि करते हैं। लेकिन उनका यह कथन पूरे प्रकरण का एक अधूरा पक्ष दर्शाता है। सामान्यता बैंक मूलधन में परेशानी आने पर ब्याज आदि में लेनदार से समझौता करती है। लेकिन उक्त प्रकरण में ऐसा नहीं किया गया। उसका सबसे बड़ा कारण है नीरव मोदी द्वारा की गई कागजों की हेराफेरी, जिसमें एक ही ग्यारंटी के कागज जिस पर करीब पच्चीस करोड़ की ग्यारंटी थी, उससे 43 बार लोन लिया गया है। यह सब लेन-देन बैंक के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से किया जा रहा था। अचानक एक नए अधिकारी आ गए, उन्होंने इस घोटाले को पकड़ लिया। यह घोटाला उनके पकड़ने के बाद भी दबाया जाता रहा। एक जागरूक वकील ने गुजरात उच्च न्यायालय में याचिका और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के यहां शिकायत दर्ज करवाई, लेकिन नतीजा सिफर रहा। इस पूरी घटना और उसमें छुपे घटनाक्रम को जब हम समझेंगें तो समझ में आयेगा कि यह कोई पहली और आखिरी घटना नहीं है। सिर्फ गुजरात के ही नामालूम कितने डायमंड व्यापारियों ने इसी तरह से बैंकों से लाखों करोड़ रुपए उठाए हुए हैं। अभी-अभी नब्बे व्यापारियों के नाम भी सामने आ गए हैं। यह सब इसलिए संभव हो जाता है, क्योंकि रुपये उठाने वाले पहले अधिकारियों से हाथ मिलाते हैं। उनसे सांठ-गांठ कर सरकार के मुखियाओं अर्थात् मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री तक रिश्ते बनाते हैं। इनके साथ परिवार सहित विदेश यात्राओं पर जाते हैं। जिससे रिश्तों में मधुरता आती है। मधुरता की मिठास के मानिन्द महंगे-महंगे गिफ्ट और फिर लेन-देन अधिकारी-नेता को चमत्कृत कर देते हैं। इस तरह से एक अदृश्य मोह पाश में सब फंस जाते हैं। ये सब मिलकर देश की जनता के धन का चीरहरण करते हैं। जिस तरह से दंगों में दंगाई तो भाग जाते हैं, लेकिन निरीह जनता को गोली लग जाती है, ठीक वैसी ही स्थिति आज हमारे देश की अर्थव्यवस्था की हो चली है। ललित मोदी, विजय माल्या, नीरव मोदी जैसे घोटालेबाज लोग देश को चूना लगाकर भाग रहे हैं। बदले में बैंकों ने सख्ती भारत के समस्त ऋणी खाताधारकों पर कर दी है। पहले महीने ही उन्हें नोटिस और तीसरे महीने सीधे एनपीए घोषित कर रहे हैं। बैंक द्वारा उद्योग व्यापार करने के लिए दिए जाने वाला ऋण काम करने के लिए होता है। उद्योग के उत्पादन में देरी हो सकती है, व्यापारी के माल या पेमेंट आने में दो-चार महीने की रुकावट हो सकती है। इसलिए बैंकों को कार्यवाही की समय सीमा अकाउंटिंग वर्ष अर्थात् एक वर्ष होना चाहिए थी। पहले बैंकों के कर्णधारों ने एक वर्ष, तीन वर्ष तो ठीक, कई-कई वर्षों तक पैसे वसूलने की कोई कार्यवाही नहीं की, उलटे ऋण पर ऋण और उसे चुकाने के लिए और नए ऋण दे कर, अपने पुराने ब्याज को समायोजित कर खुद को ईमानदार और लाभ का बैंक दिखाते रहे। उद्योगपति भी बैंक को ही नहीं, पब्लिक इश्यू निकालकर शेअर बेचकर जनता को चूना लगाते रहे। पहले की ये उदारता भी गलत थी। उसने हमारी अर्थव्यवस्था में नकली तेजी का तूफान खड़ा किया। देश तूफान में अपनी नाव और जहाज को जैसे-तैसे चला रहा था। ऐसे में नरेन्द्र मोदी की नई सरकार आ गई। उन्होंने पहले नोटबंदी फिर जीएसटी लाकर देश के उद्योगपति, व्यापारी, मजदूर किसान सबको नकदी (कैश) के तूफान से निकालकर बगैर नकदी के (कैशलेस) के सूखे रेगिस्तान में खड़़ा कर दिया। इस रेगिस्तान में किसान की फसल, उद्योगपति के उद्योग और व्यापारी के व्यापार की कमर टूट रही है। मजदूर पहले ही मजदूर था, वो अब और मजबूर है और देश की अर्थव्यवस्था चकनाचूर है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने बैंकों की इस धोखाधड़ी से आहत होकर अपनी छुपी हुई चाहत के लेख लिखे हैं। वे इंदिरा गांधी के बैंक राष्ट्रीकरण को इसका कारण मान उसे पाप की संज्ञा दे रहे हैं। वे निजी बैंकों की पैरवी कर रहे हैं। उनका यह लेख देश को संदेश देता है कि देश में लोकतंत्र कमजोर हो, तो अंग्रेजों को पुन: देश सौंप गुलामी स्वीकार कर लो। यदि अम्बानी के चचेरे भाई ने बैंक का पैसा लूटा है, तो देश के बैंक अम्बानी आदि पूंजी वाले हाथों में देकर देश की पूरी दौलत उन्हें सुपुर्द कर दें। यदि चोर ने आपके घर में चोरी की है, तो पूरा घर चोर के हवाले कर दें। अमेरिका में सन् 2006 से 2008 तक जब घोर मंदी आई थी तब उसका सबसे बड़ा कारण वहां के निजी बैंकों का डूबना था। उस दौर में यदि हमारी अर्थव्यवस्था खड़ी रही थी तो उसका सबसे बड़ा कारण बैंकों का राष्ट्रीयकृत होना था। इसीलिए इंदिरा गांधी द्वारा किया गया बैंक राष्ट्रीयकरण लोकतंत्र की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था। उसका सबब यह था कि यदि बैंक जनता द्वारा चुनी हुई सरकार के हाथों में है, तो वे जनता के काम आवेंगे। वे गांवों में गैर लाभकारी जगहों में देश के गरीबों को विकास के लिए धन लगायेंगे। जो कालांतर में देश के लाभ में तब्दील हो जायेंगे, यदि वही बैंक निजी हाथ में है, तो पूंजी वालों के निजी स्वार्थ के काम आयेंगे। जिससे कुछ लोग ही देश की सम्पदा के मालिक हो जावेंगे। हालांकि हो अभी भी बहुत कुछ निजी जैसा ही रहा है। यह सामान्य ज्ञान की बात है कि बैंकों का काम ऋण देना है, लेकिन वो पात्र को देना है उसके कुपात्र होने पर उसे ऋण नहीं देना और धोखाधड़ी करने पर पकड़ना सरकार की जिम्मेदारी होती है। जिसको निभाने में वर्तमान सरकार विफल रही है। इसके बदले में सरकार ललित मोदी, विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विपुल अम्बानी आदि की धोखाधड़ी और उनके देश छोड़ भागने का दोष कांग्रेस को दे रही है।कांग्रेस सिर्फ दूरदर्शन पर जवाब दे रही है। दृश्यान्तर कुछ इस तरह का है कि प्रतिपक्ष कांग्रेस की चाल आज भी सत्तासीन लगती है और सत्तारुढ़ भाजपा की चाल आज भी प्रतिपक्षीय दिखती है। ऐसा लगता है कि चाल, चरित्र और चेहरे अपने-अपने हितों के मुताबिक कभी धूप तो कभी छांव हो रहे हैं। मुस्कुराहट जब 2017 में देश की औद्योगिक उत्पादन दर 3.1 प्रतिशत रह गई थी, इसके पहले अप्रैल में औद्योगिक उत्पादन की दर 6.5 प्रतिशत थी। खनन का नतीजा अप्रैल में 4.2 प्रतिशत रहा था। जो एक साल पहले 6.7 प्रतिशत था। देश की अर्थव्यवस्था की जीडीपी दर 8 प्रतिशत से गिरकर 6.4 प्रतिशत रह गई थी। ऐसे दौर में सन् 2014 में मोदी के आने से लेकर अभी-अभी फरवरी में बजट आने तक शेअर बाजार ऊंचाईयां छू कर हंस रहा था। सरकार ने शेयर बाजार के लाभ पर दस प्रतिशत टैक्स लगाकर शेयर बाजार को धराशायी कर उसकी हंसी भी छिन ली। यह छूट मनमोहनसिंह सरकार ने 2006 में शुरू की थी। तर्क था कि देश में उद्योग व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए यह जरूरी है। इनके बढ़ने से रोजगार बढ़ेगा, यह हुआ भी, लेकिन कुछ इस तरह हुआ कि हजार, लाख और लाख, करोड़ और करोड़, अरब और अरब, खरब हो गए। इसका सबसे बड़ा प्रमाण जो जमीन पांच-दस हजार रुपये एकड़ की थी, वो दस लाख रुपये और एक करोड़ रुपए एकड़ होने लगी। जमीनों की इन बढ़ती कीमतों को देखकर लक्ष्मीपति अर्थात बड़े से बड़ा धनवान भी जमीन के सामने स्वयं को दरिद्र या कमजोर समझने लगा। देश में सबसे बड़ा पौने दो लाख करोड़ रुपये का 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो गया। केन्द्रीय मंत्री ए. राजा एक वर्ष जेल हो आए, अब न्यायालय कह रहा है कि कोई घोटाला नहीं हुआ था। सब मनगढ़ंत था। जिस आवंटन का क्रियान्वयन ही नहीं हुआ, तो उसका घोटाला कैसा? अब नरेन्द्र मोदी सरकार आ गई है, नोटबंदी, जीएसटी लागू हो गई है। सारे आंकड़े उलटे हो रहे हैं। खरब अरब में, अरब करोड़ में, करोड़ लाख में और लाख हजार में, हजार सैकड़ा में और सैकड़ा सड़क किनारे बेरोजगार बैठा है। यह मनमोहन से मोदी और अब मोदी से कहां तक की यात्रा है, देखिए यह कहां जाकर रुकती है या आगे निकलती है।