फरवरी 2018

न्याय-अन्याय

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

बाबारह जनवरी 2018 शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों ने जो काम किया है, इसने देश में लोकतंत्र की लड़ाई का नया स्वर्णिम अध्याय लिख दिया है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर आरोप लगाते हुए कहा है कि हमारे देश का लोकतंत्र खतरे में है। इस शब्द में छिपी हुई निहित कथा को समझा जा सकता है। वो ताकतें जिन्हें सत्ता की सुहानी छांव अच्छी लगती है, जिन्हें किसी को दर्द हो रहा हो, चाहे भूख से या चोट से, उस पर चीखना तो ठीक, बोलना भी नागवार लगता है। इन चार न्यायाधीशों के इस लोकतंत्र उद्घोष पर तकलीफ हो रही है। इसी तरह की यथास्थिति और अवसरवादी ताकतों ने ही देश को हजारों वर्षों तक गुलाम बनाकर रखने में मदद की है। लोकतंत्र की इस उद्घोषणा ने पूरे देश को चौंका दिया। सब ओर सन्नाटा था। उस सन्नाटे को तोड़कर कुछ आवाजें आना शुरू हो गर्इं। वे लोकतंत्र के पक्ष वालों की नहीं थीं, वरन् लोकतंत्र को खंडित करने वाली आवाजें थीं। समझने वाले उसी समय समझ गए थे कि ये सत्ता में बैठी सत्ता के साथ खड़ी ताकतें इन न्यायाधीशों की तरह-तरह से चरित्रहनन शुरू कर देगी। और शुरू भी हो गया। मीडिया तोड़-मरोड़कर बातें पहुंचाता रहा, हमारे प्रतिपक्ष से कोई सबल आवाज उठ नहीं सकी। वैसे इन चारों न्यायाधीशों को भी इसकी समझ थी, किन्तु उन्होंने अपनी आत्मा की आवाज को सुनकर देशहित की पैरवी करना मंजूर किया। इस इंकलाब के साथ कि हम हमारी आत्मा की आवाज पर काम कर रहे हैं। 20 वर्ष बाद आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी। 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगनमोहन लाल सिन्हा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के रायबरेली से लोकसभा निर्वाचन को अवैध करार दिया था। यह निर्णय देश की न्यायापालिका इतिहास में एक मील का पत्थर है। श्रीमती गांधी इसके प्रत्युत्तर में न्याय प्राप्त करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय जा सकती थीं। लेकिन उन्होंने 25 जून 1975 को आपातकाल लगाकर न्यायपालिका, कार्य पालिका, विधायिका, मीडिया सबको अपने अधिकार में ले लिया। उन्होंने चुनी हुई संसद का 5 वर्ष का कार्यकाल जो 1975 में समाप्त हो रहा था, उसे एक वर्ष बढ़ा 1976 कर दिया। 19 माह आपातकाल रहा। लाखों लोग जेल में रहे। प्रेस पर सेंसरशिप रही। अखबारों में सिर्फ श्रीमती गांधी की प्रशंसा होती थी। श्रीमती गांधी ने भ्रमवश मार्च 1977 में चुनाव करवा लिए। चुनाव में वे, उनके पुत्र संजय गांधी सहित पूरी कांग्रेस बुरी तरह परास्त हो गई। देश में जनता सरकार आ गई और पुन: लोकतंत्र स्थापित हो गया। आपातकाल का एक अच्छा पक्ष भी था, डर के कारण ट्रेन, सरकारी कार्यालय समय पर चलते थे। गुण्डों, स्मगलर आदि को भी जेल में डाल दिया गया था। विनोबा भावे ने इसे अनुशासन पर्व कहकर इसकी प्रशंसा की थी। ठीक उसी तरह जिस तरह मोदी सरकार को आजकल छद्म हिन्दुत्व के नाम पर महिमा मंडित किया जा रहा है। जबकि लोकतंत्र के सभी स्तंभों पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष नियंत्रण किया जा रहा है, जिससे भविष्य की तानाशाही का खतरा मंडरा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के चारों न्यायाधीशों ने न्यायपालिका के संदर्भ में इसे इंगित कर देश को सचेत रहने का संदेशा दिया है। इंदिरा गांधी ने जजों को अपने पक्ष में फैसला देने के लिए ना तो प्रलोभन दिया था और न ही मजबूर किया था। उन्होंने सीधे आपातकाल लगाकर अपनी कुर्सी बचाई थी। आज सीधे-सीधे नहीं, वरन् उलटे तरीके से लोकतंत्र के सभी स्तंभों की आजादी को तानाशाही में बदला जा रहा है। दिखता सब कुछ है, सबको दिख भी रहा है, लेकिन समझ नहीं पड़ता है कि हकीकत क्या है? आजादी के बाद से लेकर सन् 1975 के वक्त तक कांग्रेस लगातार सत्ता में रहते आई थी, लेकिन उसके बिगड़ने की शुरुआत आजादी के बाद सत्ता में आते ही हो चुकी थी। प्रतिपक्ष भी 1967 में संविद सरकार बनाकर बिगड़ने की शुरुआत कर चुका था। फिर भी ईमानदार प्रतिपक्ष था। आज कांग्रेस बिगड़ते-बिगड़ते प्रतिपक्ष में धूल-धूसरित हुई पड़ी है। जबकि कल का प्रतिपक्ष आज सत्तारूढ़ है, लेकिन बिगड़ने में पुरानी कांग्रेस को पीछे छोड़ चुका है। दोनों में अंतर करना मुश्किल है। एक से बढ़कर एक हैं, लेकिन ये जैसे भी हैं सत्ता और प्रतिपक्ष चाहे किसी भी दल के हों और कैसे भी हों, इनका बना रहना बहुत जरूरी है। इनके बने रहने में ही देश का लोकतंत्र बना रहेगा। लोकतंत्र से खूबसूरत कुछ भी नहीं है। अंग्रेजों ने हमारे देश में जिस तरह रेल आदि सेवाएं शुरू कीं, उसी तरह न्याय प्रणाली भी शुरू की। अंग्रेजों के जाने के बाद रेल तो रुक-रुक कर चलती रही, दुर्घटनाएँ भी कम होने के बजाय बढ़ती रहीं। शताब्दी और बुलेट ट्रेन अपनी गति दिखाती रहीं, लेकिन हकीकत में झारखंड,झाबुआ और बस्तर की अनदेखी होती रही। हमारी न्याय प्रणाली भी ठीक इसी तरह देश, काल, परिस्थितियों के अनुसार आकार नहीं ले सकी। न्याय की भाषा अंग्रेजी थी वो अंग्रेजी ही रही और उसकी ताकत पैसा बन गया। इन दोनों ने मिलकर न्याय को नहीं, अन्याय करने को अपनी योग्यता बनाया। न्यायपालिका की हठधर्मिता का अंदाजा सिर्फ एक चीज से ही लगाया जा सकता है कि देश में किसी भी पेशे में सर्वाधिक छुट्टियां और हड़ताल का आज तक आकलन किया जाए, तो वह न्यायालयों द्वारा ही की गई, निकलेंगी। लेकिन इसमें सुधार की गुंजाइश नहीं थी, क्योंकि लोकतंत्र के सभी स्तंभों के विरोध में बोला जा सकता है, जांच हो सकती है, सजा हो सकती है, लेकिन न्यायपालिका के खिलाफ बोलना तो ठीक, उसकी ओर ऊंगली उठाना भी न्यायपालिका की मानहानि माना गया। जस्टिस काटजू ने कुछ वर्ष पूर्व भ्रष्टाचार के मामलों में मुलजिम जज अशोक कुमार को सुप्रीम कोर्ट में प्रमोशन एवं एक्सटेंशन देकर तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा स्वयं को बचाने का खुलासा किया था। (जज अशोक कुमार और यूपीए सरकार के दिवंगत होने के बाद) यही नहीं, एनडीटीवी को एक इंटरव्यू में जस्टिस काटजू ने बताया था कि जस्टिस लाहोटी सहित सुप्रीम कोर्ट के तीन पूर्व चीज जस्टिस अपने-अपने समय में उस जज को लेकर समझौते करते रहे हैं। जब एंकर ने पूछा कि ये तीन चीफ जस्टिस ऐसा क्यों करेंगे? काटजू ने गुस्से में कहा कि आप उन्हीं से पूछिए। काटजू से पूछा गया कि वह इतने साल बाद क्यों बोले? तो काटजू ने ईयर फोन निकालकर इंटरव्यू बीच में ही बंद कर दिया और चले गए। (सच तो यह है कि समय गुजर जाने के बाद देर से बोली गई बात चाहे वह सच ही क्यों न हो, उसे सच की श्रेणी में नहीं लिया जा सकता। जब तक कि बोलने वाले के मुंह पर पट्टी बांधकर उसे बंधक बनाकर नहीं रखा गया हो) काटजू तो चले गए, लेकिन हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में जजों की चयन प्रक्रिया और उसके लिए बनाए गए कॉलेजियम पर सवाल कर उसे कटघरे में खड़ा कर गए। इस वाकये से हमारे देश ने जाना कि उसके हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और उसमें बैठकर देश को न्याय देने वाले न्यायाधीशों के फैसलों में और उनको चुनने वाले कॉलेजियम की गोपनीयता में कई तरह के कीटाणु हैं, चाहे वे तत्कालीन स्वार्थ के हों, भ्रष्टाचार के हों, भाई-भतीजावाद के हों या भविष्य के प्रलोभन हों। काटजू यूपीए सरकार के जाने और मोदी सरकार के आने पर इसलिए बोले, क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि में जांच आयोग आदि में रिटायर्ड जजों की नियुक्तियां पद, प्रतिष्ठा, बंगला, वेतन सहित सुख-सुविधाएं छुपी होती हैं। इनकी कोई समय-सीमा नहीं होती यदि होती भी है तो बढ़ती रहती है। सुख-सुविधाएं बदस्तूर चलती रहती हैं, हमारे देश के बुद्धि के शिखर पुरुष अपने ज्ञान का उपयोग कितना देशहित में और कितना स्वहित में करते हैं, उसी की एक परिणति है न्याय व्यवस्था का उक्त पतन। सन् 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल के रेल मंत्री ललितनारायण मिश्र, जो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के बड़े भाई भी थे, वे बिहार में एक बम विस्फोट में मार दिए गए थे। करीब 40 वर्ष बाद 8 दिसम्बर 2014 को इसका फैसला सेशन न्यायाधीश ने दिया, इसके बाद ऊपर की कोर्ट चल रही है। यह अंतराल हमारी न्याय व्यवस्था की हकीकत को बयां कर रहा है। न्यायालय आज बहुत कुछ बाजार जैसे बन गए हैं और उस कहावत को चरितार्थ करते हैं कि न्याय लेने वही आए, जिसके पांव में चांदी और हाथ में सोने के कड़े हों। अदालत में क्लर्क रिश्वत लेकर तारीख बढ़ाते रहते हैं, नकली गवाह आदि विभिन्न दरों पर मिल जाते हैं। इनके लिए दलाल उपलब्ध रहते हैं। अधीनस्थ न्यायालय के बाद उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालय हैं। इनमें देश के कितने लोग जा सकते हैं? कितने न्याय पा सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट में तो वकील लाखों रुपए में एक बार ख़ड़े होते हैं। यदि बोर्ड पर केस आ गया और वकील दूसरे जज के बोर्ड पर है, तो वकील का इंतजार नहीं होगा। केस की तारीख भी नहीं बढ़ेगी और आप केस हार जाएंगे। इसके बाद वकील से फीस भी वापस नहीं मिलेगी। वकीलों में इतनी नैतिकता भी नहीं कि जितने केस लड़ सकते हैं, उतने ही लें। ऐसे भी बहुत से किस्से हैं कि आप उनके घर या ऑफिस जाएं तो खुद तो चाय पीते हैं, लेकिन जिनसे लाखों रुपयों की फीस लेते हैं उनसे चाय का भी नहीं पूछते हैं। बुद्धि के इन महारथियों ने अपनी समस्त मेघा शक्ति न्याय दिलाने में नहीं, वरन् न्याय लंबित करने में अर्थात अन्याय स्थापित करने में खर्च की है। उसमें भी दुर्भाग्य यह है कि देश के विधि मंत्री भी अधिमान्यता प्राप्त इस किस्म की प्रजाति के श्रेष्ठ पुरुष ही बनते आए हैं। शांति भूषण आदि कुछ लोग इसके अपवाद भी हैं। न्यायालयों में ऊपर से नीचे तक वर्षों से लंबित लाखों प्रकरण और न्यायाधीशों के खाली पद इसकी गवाही दे रहे हैं। हमारे वकील और जज काला कोट और हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में काला चोंगा, वह भी गले में फंदे के साथ पहनते आए हैं। यह अंग्रेजों की देन थी, यूरोप ठंडा मुल्क है। वहां यह पहनावा शत प्रतिशत ठीक है। भर गर्मी में भारतीय वकीलों ने फटी कॉलर और पसीने के दाग वाले एक कोट में अपनी वकालत की पूरी जिन्दगी निकाली है। आजकल कपड़ा सस्ता और फीस अच्छी हो गई है। काले कोट में भी कुछ छूट मिली है, फिर भी गरमी में काला कोट और गल में फंदा, साथ में अंग्रेजों का आधिपत्य हमारी गुलामी की मानसिकता का इजहार करता रहा और कर रहा है। कई विषमताओं के बाद भी जिस तरह हमारे देश का लोकतंत्र चल रहा है निर्णय बुलेट (गोली) से नहीं बैलेट (मतपत्र) से हो रहा है, वैसी ही हमारी न्याय पालिका भी चल रही है। कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया की अपनी-अपनी खूबियां और खामियां रही हैं। लेकिन आज तक न्यायपालिका पर कोई बहस नहीं हुई है, न ही हो सकती है। हमारे संविधान निर्माताओं ने यह तय किया है, संविधान से बढ़कर कुछ भी नहीं है। उन्होंने आजादी की लड़ाई की तपन को झेलकर संविधान के पन्ने तैयार किए हैं। देश, काल, परिस्थितियों के अनुसार उनमें संशोधन भी हुए हैं। कुछ उचित तो कुछ अनुचित, लेकिन सब निर्वाचित सरकारों ने किए हैं। जो संविधान के प्रावधानों में अंतर्निहित हैं। लेकिन संविधान को ताक में रखकर कुछ लोगों द्वारा की जा रही मनमानी और उस पर सरकार की अप्रत्यक्ष स्वीकृति कुछ और ही बयां कर रही है। न्यायपालिका की आंखों पर पट्टी इसलिए बंधी होती है कि वो निष्पक्ष न्याय कर सकें, लेकिन आज हालात विपरीत दिशा में जा रहे हैं। इसका नया पैंतरा है न्यायालयों से जमानत नहीं दी जाना। ए. राजा, कनीमोझी को एक वर्ष से ऊपर जेल में रखा गया। सीबीआई जज ने अभी जो फैसला दिया है और उसमें जो लिखा है उसमें किसी किन्तु-परन्तु की गुंजाइश नहीं है, लेकिन देश की सरकार और उसमें बैठे कानून मंत्री अरुण जेटली इसमें भी न्यायपालिका को निर्देश देते लग रहे हैं। न्यायापालिका को ये दिशा-निर्देश ही भविष्य के अशुभ संकेत हैं। ए. राजा जैसे नमालूम कितने प्रकरण हैं। यदि वे बरी हो जाते हैं, तो उनको दी गई सजा का खामियाजा कौन भुगतेगा। ये ऐसे यक्ष प्रश्न हैं, जिनके उत्तर कोई एक न्यायाधीश या सरकार या प्रतिपक्ष नहीं दे सकता है। सब एक दूसरे में गुथे हुए हैं। इसके सद्परिणाम भी हैं और दुष्परिणाम भी हैं। आजकल दुष्परिणाम बढ़ रहे हैं। लेकिन सद्परिणाम बढ़ सकें, यही चेलमेश्वंर सहित सर्वोच्च न्यायालय की चारों न्यायाधीशों की सद्इच्छा है।