जनवरी 2018

जो छूट गया था

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव परिणामों पर बहुत कुछ कहा-लिखा जा चुका है, फिर भी जो छूट गया है, उसका उल्लेख करना जरूरी है। राजनैतिक दलों और उनके नेताओं को इन चुनावों से क्या सबक हासिल हुए।मोदी के साढ़े तीन वर्षों में कितना विकास है या वो कितना पागल हैं। आने वाले 10 राज्यों के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव कौन-सा मोड़ लेंगे।आने वाले कल में देश की दशा और दिशा क्या रहेगी। इस तरह के अनेक प्रश्नों के उत्तर इन चुनावों ने अधूरे छोड़ दिए है।

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव परिणामों पर बहुत कुछ कहा-लिखा जा चुका है, फिर भी जो छूट गया है, उसका उल्लेख करना जरूरी है। राजनैतिक दलों और उनके नेताओं को इन चुनावों से क्या सबक हासिल हुए। मोदी के साढ़े तीन वर्षों में कितना विकास है या वो कितना पागल हैं। आने वाले 10 राज्यों के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव कौन-सा मोड़ लेंगे। आने वाले कल में देश की दशा और दिशा क्या रहेगी। इस तरह के अनेक प्रश्नों के उत्तर इन चुनावों ने अधूरे छोड़ दिए है। गुजरात की 80 विधानसभा सीटें आदिवासी बाहुल्य हैं। यह बस्तर और झारखंड के बाद देश का तीसरा आदिवासी आबादी वाला इलाका है। लेकिन जो गलती आजादी के बाद से आज तक होती आई, वहीं गलती इन चुनाव में भी की गई है। इन चुनावों में आदिवासियों की घोर उपेक्षा की गई है। ‘जनता दल यू’ के पिछले 35 वर्षों से लगातार जीतते चले आ रहे आदिवासी विधायक छोटू भाई बसावा इस बार अपने बेटे को भी चुनाव जीताकर लाए हैं। पूरे चुनावी परिदृश्य में और उसके बाद वे कहीं भी नहीं दिख रहे हैं। छोटू भाई आदिवासी हैं। आदिवासी का मतलब है - जल, जंगल, जमीन, पहाड़,वृक्ष, फल, फूल जो बोलते नहीं हैं। बोलते हैं, तो झूठ बोलना इन्हें नहीं आता है। हम बोलते हैं, हमारे नेता बोलते हैं और इतना बोलते हैं कि बोलना ही आज देश की समस्या बन गया है। इसका खामियाजा यह है कि जो जल था, वो तो छिन गया और दूसरा कोई पानी इन तक पहुंचा ही नहीं है, उसे विकास पी गया। जंगल कट चुके हैं, जमीन इनके पास थी नहीं, जो है वो कुछ उपजाऊ, ज्यादा पहाड़, पथरीली और बंजर है, वो भी धीरे-धीरे विकास के हाथों में चली गई है। अब ये कहने को हवा का झोंका है, खुशबू की बहार है, और प्रकृति है, लेकिन असलियत में इनके ऊपर जुल्म है, शोषण है, उसके बाद भी इनमें श्रम और ईमानदारी है। ये वही छोटू भाई हैं, जिन्होंने अभी छह माह पूर्व गुजरात के राज्यसभा चुनाव में भाजपा द्वारा 10-20 करोड़ की दी गई पेशकश को ठुकरा कर कांग्रेस के अहमद पटेल को वोट दिया था। जिससे अहमद पटेल आधे वोट से चुनाव जीते थे। गुजरात में 22 वर्षों बाद इस तरह की जीत हासिल कर भाजपा के अभेद्य किले में दरार डाली थी। चुनाव में छोटू भाई की इस आंखों देखी हकीकत की कोई चर्चा नहीं थी, क्योंकि ये आदिवासी हैं जो नेता और मीडिया की अंतिम प्राथमिकता है। जो यह भी नहीं जानते कि चिमन भाई 28 बरस पहले जब मुख्यमंत्री बने रहे थेख्‍ तब गुजरात में जनता दल के 7 विधायक थे। तब छोटू भाई ने दल बदलकर उनके मंत्रि मंडल में जाना मंजूर नहीं किया था। बिहार में नीतीश कुमार ने छह माह पूर्व जब लालू यादव और कांग्रेस के साथ चल रही गठबंधन सरकार को तोड़कर भाजपा के साथ सरकार बनाई थी। जनता दल यू के नेता शरद यादव ने नए गठबंधन को स्वीकार नहीं किया था। अरुण जेटली के केबिनेट मंत्री बनने के निमंत्रण को ठुकराया था। तर्क यह था कि जनता ने पुरानी गठबंधन सरकार को निर्वाचित किया था। यह जनादेश की अवहेलना है। जनता दल टूट गया। छोटू भाई नीतिश कुमार के साथ नहीं, वरन् शरद यादव के साथ गए। जनता दल का चुनाव चिह्न नीतिश कुमार के पास रह गया। इसलिए उन्होंने भारतीय आदिवासी पार्टी के बैनर के तहत कांग्रेस से गठबंधन कर चुनाव लड़ा। कांग्रेस ने उनके गठबंधन को चार सीटें देकर इतिश्री कर ली। वो भूल गई कि छोटू भाई गुजरात विधानसभा के वरिष्ठ तम विधायक हैं। कांग्रेस-भाजपा दोनों से ही पिछले 35 वर्षों से चुनाव जीतते चले आ रहे हैं। कांग्रेस अहमदाबाद, वडोदरा और सूरत में ही सूरत दिखाती रही। यदि उसने आदिवासी क्षेत्रों में वर्षों से चले आ रहे अपने जनाधार पर ध्यान केन्द्रित किया होता, तो सूरत बदली जा सकती थी। कांग्रेस ने हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश पर ध्यान केन्द्रित किया वो ठीक था, लेकिन छोटू भाई को भूलना बड़ी भूल थी। लगातार 60 साल सत्ता में रहने से कांग्रेस और कांग्रेसियों में दाता का भाव आ गया है। लोकतंत्र में दाता और याचक नहीं हो सकते। कांग्रेस को इसका लगातार खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। फिर भी दाता का भाव नहीं जाता। उन्होंने छोटू भाई को 4 सीटें देकर अपने दाता का कर्तव्य निभा दिया। कांग्रेस को अपनी इस गलती को आगे सुधारना होगा। देशभर में वोटों के ध्रुवीकरण की प्रक्रिया में कांग्रेस की मूल पूंजी दलित आदिवासी और अल्पसंख्यक वोट हैं। जहां-जहां भी इस वोट बैंक को भाजपा को छोड़कर कोई दूसरा ठिकाना मिला, इसने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है। उत्तरप्रदेश, बिहार इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। भाजपा की सबसे बड़ी पूंजी सवर्ण, उच्च जाति के वोट हैं, लेकिन वो धीरे-धीरे कांग्रेस के वोट में सेंध लगा रही है। कांग्रेस का उच्च-जातीय नेतृत्व अपने अहम् में डूबा रहता है। इसलिए उसकी सोच में नीचे का इंसान नहीं, वरन् उच्च जातीय अभिमान के साथ ‘नीच’ आ जाता है। यह वही मणिशंकर अय्यर हैं, जिन्होंने गुजरात में चाय वाले के नाम पर अपनी इसी सोच के तहत एक पूरे वर्ग का अपमान किया था। साथ ही यह भी जान लें कि इन्होंने ही सन् 1989 में मंडल आयोग का विरोध कर देश के सभी दलित आदिवासी, पिछड़ों का अपमान किया था। इसी तरह के लोग हैं, जो कांग्रेस की लुटिया डुबाते आए हैं और आज भी डुबो रहे है। ये चुनाव पुराने फिल्मी गीत तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय, न तुम जीते न हम हारे के जैसे ही कुछ बन गए हैं। चुनाव हो तो कुछ इस अंदाज में रहे थे, जैसे अशोक और कलिंग के युद्ध की तैयारी हो रही है। परिणाम आते ही सब बुद्ध बन गए हैं। लेकिन बुद्ध होने में और दिखने में उतना ही अंतर होता है, जितना बुद्ध और बुद्धू में। आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया का एक हिस्सा होते हैं। उसमें कभी-कभी कटुताएं भी आती हैं, लेकिन वो भुला दिये जाने योग्य होती हैं। आजकल उनमें लगातार गिरावट आ रही है। राहुल गांधी ने इस चुनाव में गिरते स्तर को ऊंचा उठाया है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह और पूर्व सेनाध्यक्ष सहित अन्य पर पाकिस्तान के साथ षड्यंत्र रचने का आरोप लगाकर पद और गरिमा को ठेस पहुंचाई है। 2017 के बाद 2018 तक कम से कम दस राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं। उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव हैं। भारतीय जनता पार्टी कह रही है कि प्रतिपक्षी 2019 को भूल जाएं। प्रतिपक्षी दल को उन्हें यह कहने की जरूरत नहीं है। जबरन याद दिला रहे हैं, वो तो पहले ही भूले हुए हैं। कांग्रेस सबसे बड़ा दल है, चूंकि वो पूरे देश में है, इसलिए उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है लेकिन उसकी इस संदर्भ में कोई तैयारी नहीं है। राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए हैं, उनके पुराने आचरण, कर्म एवं व्यक्तित्व पर ध्यान दें तो समझ में आता है कि वे सत्ता के लिए लालायित नहीं रहते हैं। सन् 2004 में अपनी मां सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने में उन्होंने और उनकी बहन प्रियंका वाड्रा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके बाद वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के 10 वर्षीय कार्यकाल में प्रधानमंत्री बन सकते थे। सन् 2014 से चली आ रही असफलता के दौर में राहुल गांधी पर सर्वाधिक हमले हुए हैं। जिनका उल्लेख करना यहां जरूरी नहीं है, इसके बावजूद राहुल गांधी ने अपने औचित्य को सिद्ध किया है। प्रतिपक्ष में राहुल गांधी का विरोध स्वाभाविक है, जो उनकी ताकत को दिखलाता है, लेकिन कांग्रेस में जो लोग राहुल का विरोध कर रहे थे, वे सत्ता के बगैर छटपटाने वाले या अपने जातीय अभिमान में डूबे हुए लोग थे। उनकी अपनी कोई जमीन नहीं थी। राहुल गांधी के बगैर कांग्रेस अधूरी है, जिस तरह समाजवादियों और जनता दल के जॉर्ज फर्नांडीस, शरद यादव, मुलायमसिंह यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार, अखिलेश यादव, रामविलास पासवान, देवगौड़ा आदि के रूप में 8-10 टुकड़े हो गए, उसी तरह राहुल के बगैर एक-एक प्रांत में कांग्रेस के कई टुकड़े हो जाते और कहीं इधर कहीं उधर बिखरे दिखाई देते। राहुल गांधी की उदारमना छवि बनाते-बनाते उन्हें उदार हिन्दू बनाना ही नहीं, दिखाना भाजपा की पुनरावृत्ति है। भाजपा इससे जबरन घबरा रही है। वो भूल रही है कि राहुल गांधी कितने ही बड़े हिन्दू हो जाएं, कट्टर हिन्दुओं का यकीन संघ और भाजपा में ही रहेगा। ठीक उसी तरह, जिस तरह भाजपा कितनी ही धर्मनिरपेक्ष हो जाए, इस देश के अल्पसंख्यकों का यकीन उसमें नहीं रहेगा। कांग्रेस अपनी नाकामियों से चुनाव हारती चली जा रही है और वो हिन्दुत्व में अपना चेहरा देख रही है, जबकि देश के बहुसंख्यक हिन्दू आज भी भाजपा के विरोध में हैं। भाजपा की केन्द्र में बनी सरकार 31 प्रतिशत वोटों की सरकार है। मतलब 69 प्रतिशत भाजपा के विरोध में हैं। इसके 14 से 15 प्रतिशत मुस्लिम एवं अन्य अल्पसंख्यक भी निकाल दें, तो 54-55 प्रतिशत हिन्दू भाजपा विरोधी दलों के साथ हैं। कांग्रेस अपनी जमीनी हकीकत को पहचान कर भी नहीं पहचान पा रही है। राहुल गांधी को हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी जैसे जनआंदोलन के नेताओं और चुस्त-स्फूर्त मैदानी नेताओं को आगे लाना होगा। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही 2019 में महागठबंधन के तहत चुनाव में उतरेगी। भाजपा जहां अकाली दल, चंद्रबाबू नायडू, शिवसेना सहित 15 से 20 दल और कांग्रेस भी लालू यादव, अखिलेश यादव, शरद पवार सहित 15-20 दलों के साथ उतरेगी। राहुल गांधी को चाहिए था कि वे अपने गठबंधन को गुजरात में दिखलाते। उससे भी ज्यादा बेहतर होता कि उत्तर प्रदेश में दिखलाते। देर तो हो चुकी है, लेकिन अब और देर मोदी के नाम 2019 लिख देगी। उन्हें यह गठबंधन आज ही बनाना होगा। देश की जनता को यकीन दिलाना होगा कि महागठबंधन सिर्फ चुनाव के लिए नहीं, वरन् एक नीति कार्यक्रम के आधार पर लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और विकास के नए भारत के लिए बनाया गया है। भाजपा के आज लोकसभा में 282 और कांग्रेस के 44 सांसद हैं। यदि सभी परिस्थितियां भाजपा के प्रतिकूल और कांग्रेस के अनुकूल कर दी जाएं तो भाजपा 282 से 182 हो सकती है और कांग्रेस 44 से 144 तक जा सकती है। ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रभपति भाजपा को बड़ा दल होने के नाते सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे। लेकिन यदि कांग्रेस भाजपा से कम सीटें लाती है और उनका गठबंधन अधिक सीटें लाता है तो राष्ट्रपति को बड़े गठबंधन के तहत कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए बुलाना पड़ेगा, उसके लिए जरूरी है ईमानदार गठबंधन, जो चुनाव के वक्त नहीं, चुनाव के पूर्व देश में गठबंधन चलाकर दिखलाए। इन चुनावों का सबब यह भी है कि देश में 11 करोड़ आदिवासी हैं। संविधान के अनुच्छेद 5 में इनके लिए जो प्रावधान निश्चित किए गए थे, उन्हें आजादी के 70 वर्षों बाद भी लागू नहीं किया गया है। यही कारण है कि आदिवासियों की दशा दिन पर दिन बिगड़ी है। आधुनिक विकास का खामियाजा इन्हें भुगतना पड़ा है। आदिवासी क्षेत्र की प्राकृतिक खनिज संपदा दुनिया की संपदा का दसवां हिस्सा है। जो सबसे धनवान है, वो सबसे गरीब बना दिया गया है। क्योंकि राजनीति धनवान को और धनवान, गरीब को और गरीब बनाने की होती रही है। अनुच्छेद 5 का मूल भावार्थ ही यही है कि इनकी संपदा लूट कर ले जाने वालों पर रोक लगाना है। यदि अनुच्छेद 5 लागू हो गया होता तो पत्थर, कोयला, खनिज, वनोपज सहित इनकी समस्त तरह की संपदा का बड़ा हिस्सा इनको ही मिलता। आदिवासी क्षेत्रों में उद्योग, व्यापार, सरकारी- गैरसरकारी नौकरी में इनका हक होता। जिससे इनका शोषण नहीं होता और जिंदगी में लाचारी नहीं आती। जिससे नक्सलाइट आदि बीमारियां नहीं आती। यदि इन चुनावों में बहस होती और आदिवासी जागरूक बनता तो राज्यसभा, लोकसभा में अनुच्छेद 5 लाना और पास कराना पड़ता। मैं इनके लिए जब यह लिख रहा हूँ, तब मुझे ख्याल आ रहा है कि इस देश के कट्टर उच्च जातिवादी सोच को यह आदिवासी विचार नागवार लगेगा। जो हिन्दुत्व के नाम पर न सिर्फ भाजपा में, वरन इस देश के सभी राजनीतिक दलों मेंअपनी नफरत की सोच के साथ मौजूद है। यह सोच कट्टर हिन्दू और कट्टर मुसलमान को एक अतिवादी खतरनाक अंधे मोड़ की ओर ले जाती है। इसी सोच ने सन 1947 में भारत-पाक विभाजन में 16-17 लाख इंसानों का कत्ल किया था। इसी सोच ने 1984 में दिल्ली में 5 हजार से अधिक सिक्खों का एक रात में खून किया, 1992 में पूरे देश को जलाया और 1993 में मुम्बई में बम विस्फोट कर इंसानों के चीथड़े किए थे। इसी सोच ने गोधरा 2002 कराया और 1989 में मंडल आरक्षण के नाम पर पूरे देश में दंगा कराया था। धर्म दीर्घकालीन राजनीति है, जो सदियों से चली आ रही है, लेकिन राजनीति अल्पकालीन धर्म है, धर्म और राजनीति का यह संतुलन जब भी गड़बड़ाता है, दोनों ही जगहों के गलत लोगों को फायदा पहुंचाकर उनसे मनमानी करवा कर समाज और देश को नुकसान पहुंचाता है। देश के सभी नेताओं को धर्म और राजनीति को अपना हथियार नहीं, वरन औजार बनाना होगा। जिससे वो देश का नवनिर्माण कर सकें। सभी राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को अब यह समझ जाना चाहिए कि इस देश की जनता उनसे ज्यादा समझती है। गुजरात में चुनाव जीते आदिवासी विधायक छोटू भाई बसावा के विरुद्ध उनके ही नाम का उम्मीदवार पुराने जनता दल यू के बैनर तले नीतीश कुमार ने लड़ाया था। आदिवासी जनता ने असली छोटू भाई और असली भारतीय आदिवासी पार्टी को पहचान लिया और छोटू भाई को 35000 से अधिक वोटों से जिताया। इसलिए ये चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए ही चेतावनी है। यह चेतावनी देश के उस पूरे राजनीतिक परिदृश्य के लिए है, जो वोट की ताकत घटाकर, नोट की ताकत बढ़ा रहा है, जो इंसान की जिंदगी की बेहतरी को मुद्दा बनाकर चुनाव जीतता है और उसकी जिंदगी को बदतर बनाने के सभी कारनामें करता है। जो लोकतंत्र में चुनाव जीतकर सेवक की भूमिका को भूलकर शासक की भूमिका में आ जाता है। यह चुनाव ना तुम जीते, न हम हारे, जो ठीक करेगा, वो ही आगे बढ़ेगा का संदेश दे रहा है, लेकिन इसमें छुपे हुए उन निहितार्थ को भी पहचानना होगा, जो उलटा संदेश भी दे रहे हैं।