नवम्बर 2016

अपनी बात

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

अपनी बात

अपने इतिहास और संस्कृति पर हर देश को गर्व होता है। हजारों वर्ष के इतिहास और संस्कृति में गर्व और शर्म दोनों का ही सम्मिश्रण होता है। इसी से कोई देश बनता है। दुनिया में जो भी देश आगे बढ़ा उसने अपने शर्मनाक अतीत से सबक लिया है और गौरवपूर्ण अतीत से समझ ले कर आगे बढ़ा है, लेकिन जिन देशों ने इससे उलट किया है और अतीत की बुराइयों से सबक नहीं लिया है और उन्हें अपना गौरव बता कर इतिहास को उलट-पुलट करने में लगे रहे हैं, वे अपना वर्तमान भी धूमिल कर रहे हैं। शायद हम भी उसी राह के मुसाफिर हैं। हमारी संस्कृति और इतिहास ज्ञात-अज्ञात का भँवरजाल है। उसमें हम सदियों से डूबते- तैरते चले आ हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में ईश्वर और 33 करोड़ देवी-देवता हैं जो अजन्मे हैं। राम-कृष्ण जैसे ईश्वर के अवतार हैं जिन्होंने पृथ्वी पर मानव रूप में जन्म लिया है और ईश्वर रूप में पूज्य हैं। यह सब हमारा अज्ञात इतिहास है, लेकिन ज्ञात से भी बढ़ कर है। इनके बाद बुद्ध, महावीर से ले कर गुरु नानक तक एक ज्ञात इतिहास की श्रृंखला है। मोहम्मद और ईसा भी इसी की एक कड़ी हैं। जिस तरह बुद्ध भारत के हो कर चीन-जापान आदि के हैं, उसी तरह मोहम्मद और ईसा भी भारत के हैं। ये सभी हमारे देश के करोड़ों लोगों के दिल-दिमाग पर राज करते हैं। उनका दिल इनके नाम से ही धड़कता है और अंत समय में इनका नाम स्मरण करते हुए अलविदा कहते हैं। हमारी संस्कृति और इतिहास के दो ही प्राण तत्व थे और हैं - एक धर्म और दूसरा जाति। हमारे वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, गीता, बाइबिल, कुरान, बुद्ध, महावीर, नानक की वाणी से कहीं तो कहीं ताम्रपत्रों, शिलालेखों में ढल कर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च में ईश्वर- अल्ला, गॉड-गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। कहीं ये मूर्ति के आकार में तो कहीं निराकार, तो कहीं ग्रंथ रूप में पूजित बन गए। इन्हें पूजित करने वाले पंडित, मुल्ला, पादरी, ईश्वर, अल्ला, गॉड के प्रतिनिधि बन कर देवदूत हो गए। यही सब धर्म बन गया। धर्म के पंथ और सम्प्रदाय बन गए। हजारों वर्ष तक दुनिया इन्हीं से चली और आज भी चल रही है। दुनिया के ज्ञात-अज्ञात इतिहास में न मालूम कितने युद्ध और विध्वंस धर्म के लिए हुए और आज भी हो रहे हैं। धर्म प्राणवान, ऊर्जावान था, धर्म निष्प्राण बन गया। धर्म रास्ता दिखाता है, धर्म ने रास्ता बन्द कर दिया। ईश्वर का नाम लेते ही करोड़ों लोगों के चेहरे पर जो चमक आती है दुनिया में उसे चमकाने की कोई दूसरी सूरत नहीं बन सकी। कहीं दूसरी सूरत बनी तो उसने भी इंसान को ईश्वर माना। हमारे देश ने तो इंसान और ईश्वर को भी अपने-अपने स्वार्थों के हिसाब से बाँट दिया, जिसकी सब से पहले दुष्परिणति जाति व्यवस्था के रूप में सामने आई। हमारे देश को, उसकी संस्कृति को, उसके ताने-बाने को इसने तोड़ दिया और इंसान-इंसान के बीच जाति का एक अभेद्य लौह कवच बना दिया। यह हमारे पिछले 2000 वर्षों का काला अध्याय है। हमारे देश में पिछले दो हजार वर्ष में जो भी विदेशी हमलावर आया वह संख्या में पाँच सौ से ज्यादा नहीं था। शक, हूण, मंगोल, गजनी, खिलजी, तैमूर, तुर्क, तुगलक, मुगल, पुर्तगाली और अंग्रेज इन सब ने हमें हराया, क्योंकि हम जाति और अंधविश्वास में फँसे हुए थे। पुर्तगाली और अंग्रेज को छोड़ कर बाकी के सब यहीं रच-बस गए। हमारा देश इन सब का ही मिला-जुला संगम है। इतिहास और संस्कृति को ले कर एक बहस और है कि पहले आर्य आए या द्रविड। उस पर भी एक बहस और है कि इन सब से पहले आदिवासी ही भारत के मूल निवासी थे। हम इसे कहीं से भी शुरू करें, लेकिन इतना याद रखें कि इतिहास की फितरत से देश का नुमसान होता है। यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान, सहित दुनिया के जितने भी विकसित देश हैं, उनमें जाति की खाई नहीं है। कहीं थे तो छोटे-मोटे गड्ढे थे जिन्हें उन्होंने भरा है। चीन करीब 175 करोड़ का देश है और वहाँ एक ही जाति हॉन 95 प्रतिशत है। हमारे यहाँ हजारों जातियाँ हैं और उनकी भी उपजातियाँ हैं। जाति के इतिहास और संस्कृति को देखने की सब की अपनी-अपनी दृष्टि होती है और हर जाति दूसरे से बड़ी होती है। ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, नाई, धोबी, तेली, तम्बोली, अहीर, कहार, महार, शूद्र, अतिशूद्र इन सब में भी जातियाँ हैं, जिनमें सदियों से रोटी और बेटी का व्यवहार नहीं है। एक तिहाई आबादी यानी करीब 35 करोड़ दलित तो अदृश्य भारत हैं। हम अपने हाथों अपने पाँवों पर कुल्हाड़ी मारते हैं और दूसरों को दोष देते हैं। हम बँटे हुए खंड-खंड हैं। अपनों से प्यार नहीं करते और अखंड की बात करते हैं। हमारे देश की संस्कृति और इतिहास की गाथा यही सब कह रही है। कबीर, नानक ने इसमें परिवर्तन के बीज डाले, लेकिन फसल यथास्थिति की ही तैयार हुई। सूर, तुलसी, रहीम, रसखान ने भक्ति के रस घोले। महाराष्ट्र से फुले, उत्तर से दयानंद, दक्षिण से बापन्ना और बंगाल से राममोहन राय से ले कर गांधी, लोहिया, अम्बेडकर जैसे मनीषियों के संघर्ष की एक यात्रा है, जिसमें उन्होंने मानवता के लिए अथक प्रयास किए। लेकिन हमारा देश इन सब को घोंट कर पी गया। हमारे ज्ञान-विज्ञान, पुरातत्व, कला-शिल्प, शिक्षा, चिकित्सा, प्रकृति, नदी, पहाड़, पेड़, पौधे, पशु, पक्षी, आचार, विचार, व्यवहार, रंग, नस्ल सहित पूरी जिंदगी धर्म में डूबी हुई है। इसके बाद भी सभी मामलों में हमारी स्थिति सब से खराब क्यों है? हम ने दुनिया को शून्य दिया, जिससे गणित बना। फिर क्या कारण है कि पिछले 2000 साल में हमने कोई आविष्कार नहीं किया? हमारी संस्कृति सखा भाव से ओत-प्रोत रही है। कृष्ण द्वारा रुक्मणी का अपहरण कर किए गए प्रेम विवाह-सी मिसाल पूरी दुनिया में कोई दूसरी नहीं है, फिर उनका देश प्रेम के खिलाफ कैसे खड़ा हो गया ? कृष्ण की आठवी पत्नीं आदिवासी थी। वह अंतरजातीय विवाह था। धर्म और धर्मगुरुओं ने इतना बड़ा तत्व, जो देश को बदल देता, सदियों से जनता को नहीं समझाया। राम-सीता के बगैर, शिव-पार्वती के बगैर और कृष्ण-राधा के बगैर अधीर है। उस देश की नारी के हिस्से गुलामी, यंत्रणा और पीड़ा ही आई। मीरा को जहर दिया और उनके परिवार की 550 महिलाओं को पति के युद्ध में हारने पर जौहर कर मरना पड़ा। इंदौर की अहिल्या बाई को उनके ससुर मल्हारराव होलकर ने सती हो कर मरने से बचा लिया। लेकिन स्वयं अहिल्या बाई रानी हो कर भी अपनी बेटी और बहू को सती होने से नहीं बचा सकीं। अहिल्या बाई ने अनेक अच्छे काम किए, उनकी चर्चा होती है। लेकिन जो वे नहीं कर सकीं और जिन मल्हारराव ने इतना बड़ा काम किया उनकी कोई चर्चा नहीं होती, क्योंकि सती और जौहर को, जो हमारी शर्म के पहलू हैं, हम आज भी गर्व पर्व समझते हैं। हमारे खजुराहो, अजंता, एलोरा सहित दक्षिण भारत के मंदिरों में नग्न मूर्तियाँ हैं। ये दुनिया को हमारे सौन्दर्यबोध का, हमारी उदारता और प्रेम का संदेशा हैं। लेकिन हम खुद ही इनके दुश्मन बन गए हैं। हमारा सौन्दर्यबोध कहीं खो गया है। इसीलिए हम प्रेम तत्व से दूर हो रहे हैं। हम काले हैं, साँवले हैं, हजारों बरस में विदेशों से आ कर यहीं रच-बस गई संस्कृतियों और अंग्रेजों के प्रभाव से हमारा सौन्दर्यबोध गोरा रंग बन गया। हम मध्यम उँचाई के देश हैं, लेकिन हम लम्बाई को श्रेष्ठता मानने लगे। चीन, जापान ठिगने हैं, फिर भी श्रेष्ठ हैं, हम उनसे कुछ सीख न सके, कृष्ण से राधा लम्बी हैं, यह समझ न सके। 'काकड़ पत्थर जोड़ कर मस्जिद लई बनाइ। ता पर मुल्ला बाँग दे क्या बहरा भया खुदाय॥' कबीर दास जी ने 550 बरस पहले मुगल सल्तनत में यह बात कही थी और 'पत्थर पूजे हरि मिले तो में पुजूँ पहाड़।' यही नहीं, 'मूँड़ मुड़ाए हरि मिले तो हर कोइ लेय मुँड़ाय। बार-बार के मूड़ते भेड़ ना बैकुंठ जाय।' जैसी बात भी तब कही। उस समय न तो किसी सल्तनत ने, मुल्ला या साधु ने उन पर हमला बोला, आज बोलने पर संकट खड़ा हो रहा है। आधुनिक शिक्षा हमें घमंडी और धर्म पाखंडी बना रहा है। इन सब हालात के बावजूद जो पिछले हजारों वर्ष में नहीं हुआ वह पिछले 200 वर्ष में, उसके बाद जो 100 वर्षों में, 50 वर्षों में 25 वर्षों में और पिछले 10 वर्ष और 5 वर्ष में हुआ वह मानव के विकास यात्रा की अद्भुत कहानी है। इसमें उसके जिंदा रहने के उपचार हैं तो मरने के सारे प्रबंध भी। यह कहाँ जा कर रुकेगी, इसका किसी को अंदाजा नहीं है। हम सती प्रथा से आगे निकल चुके हैं, लेकिन बाल विवाह से निकलने की कोशिश कर रहे हैं, विधवा विवाह हो रहे हैं, परिवार नियोजन आ गया है। लड़की शिक्षा ही नही वरन उद्योग-व्यापार, नौकरी करते हुए, हवाई जहाज उड़ा रही है। घूँघट, बुरका चल रहा है लेकिन जींस-टॉप भी चल निकला। लोक भाषाएँ लुप्त हो रही हैं। मातृभाषा दासी बन गई है। विदेशी भाषा अंग्रेजी महारानी बन गई है। विज्ञान ने क्रांति कर दी है, चकमक पत्थर से माचिस तक आने में हजारों वर्ष लगे। लेकिन माचिस ने लाइटर से तत्काल आग लगवा दी है। इस आग ने मोटरसाइकिल, कार, बुलेट ट्रेन, हवाई जहाज, फोन, मोबाइल, प्रिंट मीडिया, टीवी, कम्प्यूटर, इंटरनेट की एक नई संस्कृति खड़ी कर दी है। हमारे मुल्क में इस नई संस्कृति के साथ में आज भी हजारों वर्ष पुरानी बैलगाड़ी, घोड़ा गाड़ी चल रही है। बैल से खेती और जादू-टोना से इलाज हो रहा है। हम नालंदा, तक्षशिला को अपनी शिक्षा और चन्द्रगुप्त को अपने इतिहास का गौरव बताते हैं। लेकिन ये सब कहाँ और क्यों नष्ट हो गए? लार्ड मैकाले हमारे यहाँ शिक्षा लाए, वह हमारे देश के अनूकूल नहीं है, इसलिए हम हमेशा उसकी आलोचना करते हैं। लेकिन हम तो वह भी नहीं ला सके। यदि वह शिक्षा नहीं आती तो हम कहाँ होते? एक यूरोपियन आ कर हमारी ब्राह्मी लिपि पढ़ कर चला गया, लेकिन मोहनजोदड़ो की लिपि पढ़ना बाकी है। हमारा पुरातत्व, हमारा इतिहास भी लुप्त है। जो है वह अपनी-अपनी सुविधा और स्वार्थ का गठजोड़ है। वह उस मोहम्मद शाह तुगलक की तरह है जिसके दरबार में अशोक का ब्राह्मी लिपि में लिखा एक स्तम्भ रखा हुआ था। तुगलक कहता था, यह खुदा ने मेरी प्रशस्ति में लिख कर भेजा है। प्रिसेंच नाम के एक यूरोपियन ने भारत आ कर 24 वर्षों तक अशोक के ताम्रपत्रों, शिलालेखों का अध्ययन कर ब्राह्मी लिपि खोज ली और उसे पढ़ कर दुनिया को बताया कि चन्द्रगुप्त के समय सिकंदर ने लाहौर तक जा कर खून की नदियाँ बहाई थीं। चन्द्रगुप्त की एक पीढ़ी के बाद अशोक ने, जो चन्द्रगुप्त के पोते थे, यूनान में दुर्भिक्ष पड़ने पर भारत से खाद्यान्न और दवाई भिजवाई थी। यह दुनिया को भारत की संस्कृति का वह संदेशा था जिसे अशोक के करीब 2000 साल बाद कबीर के शब्दों में इस तरह समझा जा सकता है कि जो ताको काटा बुए वा को बोउ तू फूल। आज कहाँ है हमारी वह संस्कृति? आज कश्मीर 115 दिन से भूखा-प्यासा और हमारा देश मोदी के लखनऊ के रावण दहन की रामायण और मुलायम के महाभारत में डूबा हुआ है। हम ने अपने इतिहास और संस्कृति से न तो सबक और न ही प्रेरणा ली है। हम भँवर जाल से तैर कर बाहर आने को तैयार नहीं हैं। हमें डूबने और डुबाने में ही मजा आता है।