नवम्बर 2017

विश्वविद्यालय कितने विश्वव्यापी

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

विश्वविद्यालय छात्र के विश्वव्यापी बनने का स्थान है। हमारी शिक्षा पद्धति, शिक्षक, कुलपति कैसे और क्या है?

विश्वविद्यालय छात्र के विश्वव्यापी बनने का स्थान है। हमारी शिक्षा पद्धति, शिक्षक, कुलपति कैसे और क्या है? सब कुछ तय करने वाले सत्तासीन कितने सर्वव्यापी हैं, उससे किसी मुल्क और उसकी शिक्षा की दिशा और दशा बनती-बिगड़ती है। देश में शिक्षा जिसे हम लार्ड मेकाले की शिक्षा कहते हैं, इसकी शुरुआत अंग्रेजों ने की थी। इसके पूर्व हमारा इतिहास शिक्षा के मामले में पाटलीपुत्र, तक्षशिला और नालंदा की गौरव गाथा गाता है कि ये कभी शिक्षा के विश्व केन्द्र थे। चीनी यात्री व्हेनसाँग भारत आया था, उसने इनका वर्णन किया है। नरेन्द्र मोदी कह रहे हैं, कि व्हेनसाँग ने उनके जन्म स्थान वडनगर का वर्णन किया है। अब प्रधानमंत्री को भी अपने जन्म स्थान का गौरव बढ़ाने के लिए व्हेनसाँग का सहारा लेना पड़ रहा है। देश में ऐसा क्या हुआ कि उसकी शिक्षा के गौरव के किले खंडहरों में तब्दील हो गये और इतिहास विलुप्त हो गया ? इन बुलंद खंडहरों से कभी भी कोई ऐसी शिक्षा और रीति-नीति क्यों नहीं निकल सकी, कि हम कह सकते कि खंडहर बता रहे हैं इमारत कभी बुलंद थी? देश पिछले 2000 वर्षों में हार-अपमान के दल-दल में फंसा रहा। भारत की जलवायु, प्रकृति और कृषि इतनी शानदार थी कि दुनिया को आकर्षित करती थी। इसे देखकर शक्, हुण, मंगोल, खिलजी, तुर्क, तुगलक, तैमूर, मुगल, पुर्तगाली और अंग्रेज भारत आए, जो भी आए, वे 500-1000 से ज्यादा नहीं थे। अंग्रेज और पुर्तगाली को छोड़कर कोई भी भारत से नहीं गया। सब यहीं रच-बस गये। भारत उन सबका मिला-जुला संगम है। ये सब इसलिए राज कर पाए कि देश जाति व्यवस्था में बंटा था। महात्मा गाँधी ने इसे आजादी की लड़ाई में समझा, जब वो जेल में थे, तब उनके साथ जो बंद थे, वे बंद तो आजादी के लिए हुए थे, लेकिन एक-दूसरे के साथ खाना तो ठीक, पानी भी नहीं पी सकते थे। कारण था जाति। जिसने सदियों से इंसान को बांटकर अंधविश्वास और पाखंड का पहाड़ खड़ा कर दिया था। उन पहाड़ों से निकली कुपरम्पराओं ने आज भी देश के तन-मन को बीमार बना रखा है। जो विदेश से आई दवा और सर्जरी से जिंदा रहता है, लेकिन गणेशजी की सर्जरी को गौरव गाथा बताकर बीते हुए कल को विज्ञान के रूप में परिभाषित करता है। जिसकी दुष्परिणिती गणेशजी को दूध पिलाने में परिलक्षित होती है। भारत ने शून्य खोजा। दुनिया शून्य से सौ पर पहुंची, वहां विज्ञान अवतरित हुआ। हम शून्य विहीन बन गये। चिकित्सा और शिक्षा सरकार की अंतिम प्राथमिकता है। बरसात के बाद तपिश के मौसम में प्रदूषित पानी पीने और गंदगी से उत्पन्न मच्छरों के काटने से हर साल देश का बड़ा हिस्सा बीमार पड़ता है। इस बार पुराने रिकॉर्ड टूट गए हैं। इंदौर में दो माह से डॉक्टरों के यहां सड़क तक लंबी लाइन है, अस्पतालों में बिस्तर नहीं हैं। शहर सोया रहा। अब नींद खुली है। अखबार छाप रहे हैं कि सैकड़ों मौत हो चुकी हैं और डेढ़ लाख बीमार हैं। ये आंकड़े और इलाज दोनों अंदाज के हैं। हर घर में लोग बीमार है महीनों हो गये चलना-फिरना तो दूर उठता-बैठना मुश्किल है। उठते हैं तो दोबारा चपेट में आ जाते हैं। बीमारी क्या है ? डॉक्टर कह रहे हैं कि हम नहीं जानते। बहुत से मरीजों के खून की जांच में डेंगू, चिकनगुनिया, स्वाइन-फ्लू आता है। बहुतों में कुछ भी नहीं आता। बस अंदाज से इलाज कर रहे हैं। कभी विदेशों से आए टीके ने देश से पोलियो को समाप्त किया था। पिछले एक दशक से अधिक समय में चिकनगुनिया ने नए विकलांग बना दिए हैं। सरकार तुरंत काम करती है। उसने विकलांग को दिवयांग बनाकर सबकुछ शब्दों से ठीक कर दिया है। विश्वविद्यालयों में ज्ञान और विज्ञान पर शोध नहीं है। सदियों से तुलसी, हल्दी, ग्वारपाटा, नीम, आंवला, लहसुन, बिलोहा आदि न मालूम कितनी चीजें देश का प्राण तत्व हैं। जिनसे हमारे बड़े-बुढों ने जीने की राह तलाशी थी। हम उनकी पूंछ पकड़ कर आधुनिक विज्ञान को चुनौती देते हैं। इसी लिए हमारी अमूल्य सम्पदा नैसर्गिक और प्राकृतिक जड़ी-बुटियां विलुप्त हैं। हम इन पर शोध कर दुनिया का भला कर सकते हैं। लेकिन खुद का भला भी नहीं कर पा रहे हैं। हमारे देश में हर दूसरा आदमी डॉक्टर है। बगैर किसी जानकारी के बीमार को दवा बताने को तैयार रहता है। क्योंकि ये हमारे चेतन अवचेतन में बसी हुई है। रामदेव ने देश की इसी मानसिकता को भुनाया है। आज वे देश के प्रथम 10 धनवानों में शामिल हो गए हैं। विश्वविद्यालयों से विज्ञान की गूंज सुनाई नहीं पड़ती है। नेताओं और धर्म गुरुओं के गलत कथनों ने देश में ज्ञान-विज्ञान की शोध रोक दी है। ये सारी बीमारियां यूरोप-अमेरिका आदि विकसित देशों में नहीं होती हैं। इसलिए इनकी जांच, कारगर दवा, टीके और वैक्सीन ईजाद होने में देरी हो रही है। हमारे देश में इलाज एलोपैथी से होता है, जिसे विदेशी कहा जाता है और जो स्वदेशी से ज्यादा देशी है और देश की जिंदगी बढ़ा रही है, ये विदेशी शोध से देश और विदेश में तैयार की जाती हैं। इसके बाद भी शोध चलता रहता है। दुष्प्रहभाव आने पर उस दवा को बंद कर नई दवा ईजाद की जाती है। हमारे कुछ नेता और धर्मगुरु इनकी विदेशी कहकर आलोचना करते हैं। जबकि खुद बीमार होने पर अस्पताल में भर्ती होकर इनसे ही इलाज कराते हैं। बीमार पड़ने पर किसी दिन रामदेव भी अस्पताल में इलाज करवाते हुए दिखेंगे। विश्वविद्यालय जिन्दगी का वह प्रथम सौपान है, जहां पहुंचकर छात्र तरुणाई की उमंग, उफनती लहरों पर सवार हो एक नए विश्व से विश्व व्यापी बनने के लिए साक्षात्कार करता है। छात्र विश्वव्यापी तो ठीक है, देशव्यापी भी नहीं बन सका है। जहां बगैर टाटपट्टी-छत, दूषित पानी, गंदगी, मच्छर, जानवरों से परिपूर्ण और शिक्षकों से अपूर्ण विद्यालय हैं। वहां के महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय कैसे होंगे, इसकी हम कल्पना कर सकते हैं। एक शब्द में कहें तो सब बदहाल है। जिन्हें ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र बनना था, वे परीक्षा लेने और डिग्री देने के केन्द्र बनकर रह गए हैं। इसका प्रमाण देशभर में चलती ट्यूशन एवं कोचिंग क्लासेस हैं। आजादी के बाद हमारे देश में इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों की जरूरत थी। देश के चहुँमुखी विकास के लिए बांध, पुल, सड़कों के साथ रेल और प्लेन की जरूरत थी। इनको बनाने के लिए हमारे पास इंजीनियर नहीं थे। आज देश में इंजीनियर हैं, पर नौकरी नहीं है, सरकार की प्राथमिकता बुलेट ट्रेन है। आज देश में डॉक्टर हैं, पर इलाज नहीं है। डॉक्टर बनने की दो नम्बर की फीस एक से दो करोड़ है। गांवों में डॉक्टर नहीं हैं, अस्पताल नहीं हैं, जहां अस्पताल है, उनमें ऑक्सीजन नहीं है, सैकड़ों बच्चे बगैर ऑक्सीजन के मर जाते हैं। सरकार अपने सत्ता धर्म में लग जाती है। कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड करीब 700-800 साल पहले शिक्षा के विश्व केन्द्र बने। यहां से दी गई शिक्षा ने ब्रिटेन में ज्ञान-विज्ञान का ऐसा दिल-दिमाग बनाया कि उसमें जहां एक ओर साहस था, जिसके कारण आधी दुनिया में उनका झंडा लहराया। वहीं दूसरी ओर एक वैज्ञानिक दृष्टि भी थी। उससे अपने अधीनस्थ मुल्कों में विकास कर, स्वयं के देश को सर्वश्रेष्ठ विकास की सबसे ऊंची पायदान पर पहुंचाया। ब्रिटेन की जनसंख्या आज करीब सात करोड़ होगी। जब उन्होंने आधी दुनिया पर शासन किया, तब जनसंख्या पचास लाख भी नहीं थी। हमारे देश में जनसंख्या को जाति और धर्म के खानों में बांट कर एक गलत बहस चलाई जाती है। जर्मनी जनसंख्या के बल पर नहीं, वरन शिक्षा के बल पर आगे बढ़ा है। द्वितीय विश्वयुद्ध में बर्बाद हो गया था। पश्चिम और पूर्वी जर्मनी में बंट गया था। जो हिस्सा पश्चिम देशों अर्थात् यूरोप से लगा रहा, उसने शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। जिसने उसे दुनिया की अर्थव्यवस्था में सर्वोच्च स्थान पर पहुंचा दिया। जापान विज्ञान को आत्मसात कर हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी और भूकंपों के बाद उठ कर खड़ा हो जाता है। भारत में विदेशों से पाश्चात्य संस्कृति की बुराइयां आई हैं। बनारस विश्वविद्यालय की नई चीफ प्रॉक्टर डॉ. रायना सिंह जो विदेश से प्रशिक्षित होकर आई हैं, उन्होंने आते ही छात्र-छात्राओं की शराबनोशी की पैरवी की है। वैज्ञानिकता कोसों दूर है। विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी की कृत्रिम फसल उगाई गई, लेकिन भारतीय भाषाओं के असली बीज को रोपा नहीं गया। आज भारत का नागरिक अपने ही देश को नहीं जानता है। यदि आजादी के बाद यह नीति बनाई गई होती कि वि.वि. से डिग्री के साथ किसी भी प्रदेश की कला-संस्कृति, इतिहास, भूगोल के साथ दो भाषाओं का आना जरूरी है तो देश की एकता की दिशा में यह एक मजबूत कदम होता। आज भी पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण भारत और उनके अन्तर्गत शामिल प्रदेश एक-दूसरे से अनजान हैं। दक्षिण भारत में तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम पास होकर भी उतने ही दूर हैं, जितने दूर मध्यप्रदेश में झाबुआ, छत्तीसगढ़ में बस्तर और राजस्थान में रेगिस्तान है। विश्वविद्यालयों से सही इतिहास सामने आना चाहिए था। हमारा इतिहास विलुप्त है, जो भी है, आधा-अधूरा है। किंवदंती के रूप में है। उसकी वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिह्न है। इतिहास में उसके लिखने वाले की विचार-धारा परिलक्षित होती है। इतिहास लिखने वालों के विचार और दृष्टि, धर्म, जाति, संप्रदायों के आग्रहों-दुराग्रहों से ऊपर होना जरूरी है। भाट चारणों ने बीते हुए कल में राजा की चमचागीरी में गलत इतिहास लिखा और आज भी लिख रहे हैं। मोहम्मद शाह तुगलक के दरबार में एक पत्थर का स्तूप था, जिस पर ब्राह्मी लिपि में कुछ खुदा हुआ था, उनके दरबारी कहते थे कि खुदा ने बादशाह के इस्तकबाल में आसमान से यह लिखकर भेजा है। यह तो भला हो यूरोप के पुरातत्वविद प्रिसेंज का जिसने लगातार 24 वर्ष तक सम्राट अशोक के शिलालेखों और स्तम्भों का अध्ययन कर ब्राह्मी लिपि खोजी, जिससे दुनिया को सम्राट अशोक और भारत की महान परम्पराओं की जानकारी मिली। सदियों से संस्कृति और धर्म ने देश को जोड़कर रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है, अलग-अलग पंथ सम्प्रदाय ने देश को जोड़कर रखा है, जनता के बीच आजादी से पहले कभी भी आपस में कोई दंगे, हिंसा या युद्ध नहीं हुए। जो भी हुए, एक राजा से दूसरे राजा और एक राज्य से दूसरे राज्य के मध्य हुए। यदि हिंदू राजा शिवाजी थे तो उनके सेनापति और सैनिक मुस्लिम भी थे। यदि मुस्लिम बादशाह औरंगजेब थे तो उनके सेनापति और सैनिक हिंदू भी थे। मुगल शासन करीब 300 वर्ष रहा। चारों तीर्थ, बारह ज्योर्तिलिंग सहित अनगिनत मंदिर जैसे थे, वैसे ही रहे। आज धर्म के नाम पर अधर्म हो रहा है। पैसा, पद, पॉवर पाने का यह सबसे सुगम मार्ग है। विश्वविद्यालयों से चित्र, कला और शिल्प के कोई विश्वव्यापी आकार नहीं निकल सके हैं, जबकि रवि वर्मा और हुसैन इस देश की मिट्टी से निकले थे। आज ताजमहल पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। हमारा इतिहास क्या था और क्या बताया जा रहा है। अजंता-ऐलोरा और ताजमहल के माध्यम से हमने पूरी दुनिया में कला, शिल्प और प्रेम का परचम लहराया है। भारत का हर नागरिक अपने इतिहास की इन धरोहरों पर गर्व करता है। अशोक चन्द्रगुप्त का पौत्र था। चन्द्रगुप्त के समय सिकंदर ने यूनान से आकर भारत के रावी के तट पर कत्लेआम कर खून की नदियां बहाई थीं। लेकिन वापस लौटना पड़ा था। उसी सिकंदर के यूनान में दुर्भिक्ष पड़ा, बीमारियाँ फैली तो चन्द्रगुप्त के पौत्र अशोक ने भारत से खाद्यान्न और दवाइयाँ भिजवाई थीं। यह थी भारत की संस्कृति जो ‘‘ताको काटा बोए ताको बोई तो फूल’’ जो चन्द्रगुप्त के 2000 साल बाद कबीर के मुख से निकली थी, हमारी वो संस्कृति आज फूल के बदले कांटे बो रही है। आज रोहिंग्या मुसलमानों के मामले में संकीर्ण मार्ग, वो भी झूठे तथ्यों के आधार पर प्रचारित किया जा रहा है, जबकि हमारे देश का तराना है मेहमां जो हमारा होता है वो जान से प्यारा होता है। विश्वविद्यालयों के चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रशिक्षण केन्द्र हैं। आज छात्रसंघ चुनाव कुछ ही जगहों पर हो रहे हैं। व्यवस्था में बैठे लोगों को इनसे डर लगता है। छात्रसंघ चुनावों की बुराइयों को दिखाकर शिक्षा के नाम पर झूठी बहस चलाकर इन्हें रोका गया है। देश की चुनाव प्रणाली यदि खराब है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि चुनाव पर रोक लगा देंगे। हकीकत यह है कि आज का छात्र कल का नागरिक है। प्रेम की खुशबू की पहली आहट विश्वविद्यालय हैं। अनेक अवरोधों के बाद आज देश में वो घट रहा है, जो हजारों साल में नहीं हो सका। कभी भारत का आदमी किशोर अवस्था में बहन की, युवा अवस्था में पत्नी की और बुढ़ापे में बेटी की रक्षा में अपनी सारी ऊर्जा खपा देता था। पिछले 10-20 वर्षों में क्रांति आई है।आज माता-पिता की पहली प्राथमिकता शिक्षा है। उनके छोटे से छोटे बजट में भी पहला हिस्सा शिक्षा का होता है। विश्वविद्यालयों में सहशिक्षा है। जाति की बेड़ियां टूट रही हैं। इसने क्रांति कर दी है । अन्तरजातीय विवाह हो रहे हैंऔर इनकी संख्या दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ रही है। आने वाली पीढ़ी विश्वास भी नहीं करेगी कि देश में कुछ ही समय पहले लड़की घर की चौखट भी नहीं लांघ सकती थी। किसी लड़के से बात तक नहीं कर सकती थी। एक ही जाति में कोई बिचौलिया या माँ-बाप जिससे तय कर दे, उससे शादी होती थी। आज लड़के-लड़की साथ-साथ घूम रहे हैं। यहाँ से चली हवा देश के गली-गाँव, मोहल्लों में पहुंच चुकी है, जिसमें आने वाला सुनहरा कल छिपा हुआ है। हजारों वर्षों से देश की शिक्षा रामायण, गीता, पुराण, कुरान, बाइबिल, जैन, बौद्ध, गुरु ग्रंथ आदि से चलती आई है। ये धर्म का मार्ग प्रशस्त करती है, लोक से ज्यादा परलोक की चिंता करती है। इनसे इन्सान की नैतिकता, आचरण, आस्था, पूजा और प्रार्थना जुड़ी होती है। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, ईसा, मोहम्मद से लेकर नानक, कबीर, मीरा, सूर, तुलसी, रहीम, रसखान, जायसी, दयानंद से विवेकानंद तक लम्बी परम्परा है। देश के दिल-दिमाग इनसे ही धड़कते और चलते हैं। इन्होंने इंसान के अंतर्मन को छुआ है। इन्हीं का असर है कि कई तरह की नफरतों के दौर गुजरे, जिसमें इंसान पतन के गर्त में गिर गया। लेकिन इंसानियत उठकर फिर खड़ी हो गई। कलिंग युद्ध की हिंसा और नरसंहार के बाद सम्राट अशोक से अहिंसा का भिक्षु अशोक इसी धरा पर अवतरित हुआ है। यह था पूरब के अध्यात्म का संदेश, जिससे पूरी दुनिया ने मानवता की राह तलाशी, लेकिन वो खुद पश्चिम के विज्ञान को अंगीकार नहीं कर सका है। आज शिक्षा घमंडी और धर्म पाखंडी बना रहे हैं। हर चीज महंगी है। सबसे सस्ता इंसान है। सत्तासीन की सभी तरह की तबीयत विदेशों में ठीक होती है। वो अध्यात्म और विज्ञान दोनों का अमृतमंथन कर खुद अमृत और जनता को विषपान करा रहे हैं।