अक्टूबर 2017

हवा का रुख

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के लोग आने वाले कुछ ही समय में अपने सुख-दुख को वोट के माध्यम से अभिव्यक्त करेंगे। नर्मदा सरोवर बांध को नरेन्द्र मोदी अपनी उपलब्धि के रूप में दिखला रहे हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि म.प्र. के पुनर्वास की तलाश में भटकते ग्रामीण अपना दर्द किसे दिखलायेंगे। कांग्रेस की दिल्ली की 2004-2014 की सत्ता ने भाजपा को गुजरात में लगातार कायम रखा था। आज देश में कांग्रेस नहीं, भाजपा सरकार है और गुजरात अब दिल्ली की हकीकत को समझ रहा है और यह भी समझ रहा है कि बनारस की गंगा एक इंच भी साफ न हो सकी है, अब सरदार सरोवर का पानी उसके टूटे सपनों को पूरा नहीं कर सकेगा। अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के पास बेरोजगारी दूर करने का कोई फॉर्मूला नहीं है। वे उजड़े उद्योग-व्यापार, परेशान मजदूर-किसान की बदहाली को सत्ता के नशे में समझने की तैयार नहीं हैं। सूरत में व्यापारियों ने जीएसटी के विरोध में दो माह बंद रखा, कमोबेश देश में सूरत के समर्थन में अन्य शहरों ने भी रखा बंद। लेकिन निरंकुश सत्ता के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। इंदौर के सराफा व्यापारियों ने एक्साइज लगाये जाने पर दो माह कारोबार बंद रखा, लेकिन दिल्ली का दिल नहीं पिघला, वे खामोश हो गए। यह खामोशी आने वाले कल में टूटेगी। राहुल गांधी तो अमेरिका में जाकर मंजूर कर रहे हैं कि सन् 2012 में कांग्रेस में घमंड आ गया था। मोदी को भी शायद 2019 में सत्ता गंवाकर पुन: अमेरिका में जब वे प्रधानमंत्री नहीं थे, एक सामान्य राजनीतिज्ञ के रूप में गये थे और जिस तरह सड़क पर खड़े होकर अमेरिका के सबसे बड़े टॉवर को देख रहे थे, वहां पुन: जाकर सब कुछ समझ में आ जायेगा, लेकिन घमंड की बात मंजूर करेंगे या नहीं, कह नहीं सकते हैं। लोकतंत्र में जनता अपने गुस्से को अभिव्यक्त करने का अंतिम अस्त्र जो उसे हजारों वर्ष की गुलामी के बाद लोकतंत्र और आजादी की रक्षा के लिए वोट के रूप में मिला है, उसे आजमाना कभी नहीं भूलती है। गुजरात के हाल ही में सम्पन्न पंचायत चुनावों में लगभग 2 दशकों से सत्ता पर काबिज बीजेपी को ग्रामीण इलाकों में भारी नुकसान उठाना पड़ा है। यहाँ पर पंचायत चुनावों में कांग्रेस ने बीजेपी को जबरदस्त झटका दिया है। कांग्रेस ने बीजेपी की 31 में से 21 जिला पंचायतों पर कब्जा कर लिया है। जानकारी के मुताबिक गुजरात के तालुका पंचायतों में 4778 सीटें थीं, जिनमें कांग्रेस ने 2509 जीती हैं, वहीं बीजेपी ने 1981 जीती हैं। मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के गांव खरोड़ और उनके तालुका पंचायत बहुचराजी में भी हार का सामना करना पड़ा है। चुनावी नतीजों पर नज़र डालने पर कुछ और चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। विधानसभा सीटों के लिहाज से इन नतीजों को देखा जाए तो 182 विधानसभा क्षेत्रों में से 90 पर कांग्रेस को बढ़त मिली है, जबकि बीजेपी 72 सीटों पर आगे रही है। फिलहाल बीजेपी के पास 116, जबकि कांग्रेस के पास 60 सीटें हैं। सन 1970-71 में इंदिरा गांधी ने लोकसभा में 352 सीटें, 2014 के नरेन्द्र मोदी की 282 सीटों के मुकाबले प्राप्त की थीं। मोदी के 2014 के 31 फीसद के मुकाबले तब 43.68 फीसद वोट लाकर विजय पताका फहराई थी। उनके साथ बांग्लादेश विजय, 550 राजाओं के प्रीवीयर्स की समाप्ति और बैंकों के राष्ट्रीयकरण के अद्भुत काम जुड़े हुए थे। आज के नरेन्द्र मोदी के पास कौन सी उपलब्धि है? कालाधन वापसी, हर खाते में पंद्रह लाख, एक करोड़ बेरोजगार को प्रति वर्ष नौकरी, जन लोकपाल, कश्मीर की बदहाली, नोटबंदी, जीएसटी, गिरती जीडीपी, डूबती अर्थव्यवस्था, इन सबको बलाये ताक पर रखकर, लोकतंत्र के सभी स्तंभों की उपेक्षा। इंदिरा गांधी के खिलाफ सन 1973 में गुजरात में महंगाई को लेकर आंदोलन शुरु हुआ था, जो सन् 74 आते-आते देश भर में फैल गया। 1975 में आपातकाल और फिर 1977 में इंदिरा गांधी की हार की कहानी देश जानता है। कभी-कभी इतिहास अपने को दोहराता है। कभी 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के रायबरेली से लोकसभा चुनाव रद्द करने का फैसला सुनाया था। ठीक वैसा ही फैसला चुनाव आयोग ने अहमद पटेल के गुजरात से राज्यसभा निर्वाचन में अरुण जेटली आदि की पुरजोर वकालत के बाद अमित शाह-मोदी के खिलाफ सुनाया है। गुजरात में हार्दिक पटेल से शुरु हुए आंदोलन की आंच जेएनयू, दिल्ली, राजस्थान से होते हुए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पहुंच चुकी है। सरकार हर आंदोलन में षड्यंत्र सूंघती है। वो आंदोलनकारी पर ही आरोप लगाना शुरु कर देती है। यह हम देश में पिछले तीन वर्षों में सत्ता के विरोध में उठते हर स्वर के लिए देख रहे है। कोई भी आंदोलन किसी के भड़काने से नहीं, वरन दुख तकलीफ और दबे हुए गुस्से का इजहार होता है। आज सत्ता हवा का रुख समझने को तैयार नहीं है। इतिहास अपने को कितना बदलेगा, यह भविष्य के गर्भ में है। कैशलेस : अभिशाप या वरदान ? खिलजी वंश के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने बाजार नियंत्रण नीति बड़ी कठोरता से लागू की थी। कोई कम तौलता था तो उसका उतना ही मांस काट लेते थे। इससे देश की आर्थिक स्थिति नियंत्रण के बाहर हो गई। नरेन्द्र मोदी ने 8 नवम्बर को रात 8 बजे नोटबंदी कर देश को खिलजी की राह पर छोड़ दिया। ‘सत्ता में आने या सत्ता बचाने के लिए शासक इसी तरह के ऊलजलूल कदम उठाते हैं। इतना बड़ा चौंकाने वाला निर्णय करने वालों के पास एक चिंतन, एक दृष्टि, और भविष्य की एक सशक्त रूपरेखा होती है। जिससे किसी मुल्क की किस्मत बदलती है। दुर्भाग्य कि नोटबंदी का इतना बड़ा निर्णय करने वालों के पास इसकी प्रारम्भिक तैयारी भी नहीं थी। यदि होती तो बीमार के इलाज का, किसान की फसल का, शादी-ब्याह का, लाइन में खड़े होकर मरते-पिसते आदमी का कोई हल अवश्य होता।’ ‘0 बटा घाटा = सन्नाटा’ आज अक्षरश: घटित हो रहा है। रविवार में नोटबंदी के साथ ही हमने आलेख में जो कहा था। उपर लिखा उसी का एक अंश है। देश की अर्थव्यवस्था आज चौपट हो चुकी है। देश में नकद (कैश) व्यवस्था सदियों से चली आ रही है। यह एक वरदान था, जिसे अभिशाप में बदल दिया गया है। इस देश का किसान, व्यापारी अपनी धोती की गांठ में बनियान और बंडी की जेब में लाखों रुपये खोंसकर मंडी, दुकान लाता-ले जाता रहा है। पूरी अर्थव्यवस्था ही नकदी पर अवलम्बित थी। ये एटीएम-पेटीएम, बैंक, चेक, और कई तरह के टैक्स हमारे देश में आधुनिकीकरण के साथ आये। वह भी अंग्रेजी भाषा में। बेचारा काम करने वाला व्यापारी-उद्यमी इसमें सदैव ही उलझा रहा। टैक्स का टैक्स भरता रहा, ऊपर से चोरी का आरोप सहता रहा। नकदी स्वयं के आत्मविश्वास और जिससे व्यवहार हो रहा है, उसके प्रति नकद या उधार के रूप में विश्वास की प्रतीक थी। नोटबंदी को एक वर्ष होने को आ रहा है। उद्योग-व्यापार का नकद गायब है। वो नोटबंदी के कुचक्र में न मालूम कहां और किस अंधकार में घुस गया है। जिससे उद्योग, व्यापार रोजगार की गति टूट गई है। परिणाम स्वरूप आज वे आर्थिक दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं। यह टूट कई तरह से कहर ढहा रही है। नोटबंदी ने ब्याज पर पैसा चलाने वालों का पैसा डुबा दिया है। इसका विस्फोट आने वाले कल में सामने आ जाएगा। यह पैसा सेवानिवृत्त शासकीय-अर्धशासकीय व्यक्ति, बुजुर्ग, महिला से लेकर ब्याज का व्यापार करने वालों का चेक और नगद के रूप में चलायमान रहता आया है। हमारे देश में उद्योग, व्यापार, रोजगार में बाजार के इस पैसे का बहुत बड़ा योगदान होता है। इसका अंदाज सिर्फ एक चीज से लगा सकते हैं कि देशभर में नोट बंदी को एक वर्ष होने को आ रहा है और निर्माण-उद्योग बंद पड़ा है। किसी ने किसी मल्टी के फ्लेट का ‘फ’ भी फलित होते नहीं देखा है। निर्माण में लोहा, लकड़ी, सीमेंट, ईंट, गिट्टी पत्थर सहित सैकड़ों उद्योग और उनके सहायक उद्योग-व्यापार अलग से होते हैं। वह सब आज तितर-बितर होकर बिखर चुके है। राजस्थान के सीकर में पशु मेला सम्पन्न हो गया। यह देश का एक बड़ा पशु मेला होता है, जिसमें सभी तरह के जानवरों का क्रय-विक्रय होता है। पशु पालकों का इस बार विश्वाास टूटा हुआ था इसलिए मेला असफल हो गया। पशुओं के आवागमन के दौरान गाय के नाम पर मारपीट, हत्याओं के जो कृत्य देश में हो रहे हैं। इससे पशु पालकों के मन में डर बैठा हुआ था। वहीं, एक प्रश्न भी उठता है कि टीवी पर बैठकर कुछ अर्थशास्त्री अभी भी नोटबंदी और जीएसटी में आने वाला सुनहरा कल ढूंढ़ रहे हैं। इन्हें किसान की जिंदगी और कृषि व्यवहार का जरा भी अंदाजा नहीं है। मेले में कई पशु लाखों में भी बिकते हैं और 10 हजार से ऊपर के लेनदेन पर कानूनन रोक है तो किसान मेले में चेक से भुगतान कैसे करेगा ? हम यूरोप नहीं है जो शतप्रतिशत शिक्षित है। हमारा देश- काल और उसकी परिस्थितियां भिन्न है। आने वाले कल में वो कम्प्यूटर, एटीएम, पेटीएम में अपने को कितना बदल सकेगा ? लेकिन उसे कैशलेस किया जा रहा है। हमारे देश में वित्तीय व्यवस्था चलाने में आंगड़ियों की भूमिका भी रही है। आपको यदि मुम्बई या अन्य कहीं 10 लाख रुपये नकद देना है, तो आप उनके इंदौर दफ्तर में दे दीजिए। वे आपको एक नोट का नम्बर देंगे, वो नम्बर बताने पर मुम्बई में रुपए सामने वाली पार्टी को तत्काल मिल जाते थे। यह बगैर टैक्स का पैसा था, इससे देश का उद्योग-व्यापार चलता था, लेकिन काले धन के नाम पर आज बंद हो चुका है, इसे उन्होंने बंद करवाया है, जिन्हें काले धन ने सरकार में बैठाया है। जो आज भी खुद के खर्चों और चंदे का हिसाब नहीं देते हैं। दूसरी तरह के आगड़िया राजनीति में भी है। अधिकारी... मंत्री को, मंत्री... मुख्यमंत्री को और मुख्यमंत्री... दिल्ली के नाम पर दबाव बनाकर या गलत काम कर पैसा वसूली करते है। पहले तरह के व्यापार में आगड़िये 10 लाख भेजने के 500 रुपए लेते रहे हैं। जबकि दूसरी तरह के आगड़ियों द्वारा कितना पहुंचता है, इसकी किसी को जानकारी नहीं होती है। आज पहली बंद कर दी गई है और दूसरी चालू है। पहले आगड़िये से देश की अर्थव्यवस्था चल रही थी, जबकि दूसरी से बिगड़ती थी। पहली से रोटी, रोजगार मिलता था, दूसरी उसे छीन रही है। आज अर्थव्यवस्था वैश्विक हो चुकी है। इस वैश्विक अर्थव्यवस्था का मुकाबला हमें डॉलर और पौंड से करना है। मनमोहनसिंह और चिदबंरम की क्षमताओं को उनके विरोधी भी नकार नहीं सकते हैं। इन्होंने देश में उदारीकरण के साथ एक तंत्र विकसित किया था। भ्रष्टाचार ने इस पर ग्रहण लगा‍ दिया। मोदी ने देश में आशा का संचार किया, लेकिन उन्होंने देश का वित्तमंत्री अरूण जेटली को बना दिया। वे वित्त के नहीं कानून के जानकार हैं। दुर्घटना का होना तय था वो हो गई। आज देश के वित्त की गाड़ी पटरी से उतर गई है। घायल कितने हैं और मर कितने गए हैं, इसके आंकड़े किसी के पास नहीं है। मनमोहन सिंह सरकार हालात के मद्देनजर टैक्स प्लॉन करती थी। देश को आज उनकी याद आ रही है, सन् 2008 में एक्साइज 10% थी, उद्योगों में मंदी आई। सरकार ने 2009 में एक्साइज 8% कर दी। आर्थिक स्थिति ठीक होने पर फिर 10% कर दी। 2011 और जनवरी 2012 तक यह स्थिति 10% ही रही। फरवरी 2012 से इसमें बढ़ोतरी कर 12.36% कर दी। 2014 तक इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं की गई। 2014 में मोदी के आने पर देश की अर्थव्यवस्था मंदी की ओर अग्रसर होने लगी। वे आजाद भारत के सबसे कम बहुमत 31% के प्रधानमंत्री थे। पं. नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पी नरसिम्हाराव के बाद मनमोहनसिंह भी 2004 में 35.4% और 2009 में 37.22% के प्रधानमंत्री थे, लेकिन मोदी को सबसे अधिक जनमत का सबसे योग्य प्रचारित किया गया। मोदी... मोदी के नारों से चहुंदिशाएं गुंजाएमान होने लगी। नारों के नशे ने उन्हें मदान्ध कर दिया। आर्थिक मंदी की गिरफ्त से देश को निकालने के बजाए उन्होंने अतिरेक में नोटबंदी लागू कर देश की जनता को कड़कड़ाती ठंड में नंगा खड़ा कर दिया। वो रोयी तो गुस्सा होने लगे और ठंडा पानी उस पर उड़ेल दिया, चिल्लाने पर उसका खाना-पीना बंद कर दिया। वो कुपोषण का शिकार हो गयी। इलाज के बदले जीएसटी ले आए, आज वो सभी तरह से बीमार होकर मर रही है और सरकार निरंकुश बनती जा रही है।