सितम्बर 2017

शुभ संकेत

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

अपनी बात

देश आजाद हुआ। नेहरू प्रधानमत्री बने। डॉ. लोहिया, जयप्रकाश, अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली, मधुलिमये, एस.एम.जोशी,एन.जी. गोरे, मामा बालेश्वर दयाल से लेकर इंदौर के गंगाप्रसाद तिवारी, बिहार के रामानंद तिवारी, रीवा के जमुनाप्रसाद शास्त्री जैसे सैकड़ों-हजारों लोग, जिन्होंने गांधी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़ी थी, जेल यात्राएँ कर यातनाएँ भोगी थीं, सत्ता के साथ नहीं गये,देश-प्रदेश में मंत्री नहीं बने। कारण कि ये लोग एक नया समाजवाद लाकर लोकतंत्र को मजबूत बनाना चाहते थे। इन्होंने कांग्रेस के विरोध में प्रतिपक्षी के रूप में सोशलिस्ट पार्टी बनायी। सन 1952 के प्रथम आम चुनाव हुए। नेहरू आजादी की लड़ाई के हीरो थे,देश नेहरू के आभामंडल की गिरफ्त में था। सोशलिस्टों की जमानतें जब्त हो गयीं। सन 1957 में सोशलिस्ट पुन: पराजित हुए। सन 1957 में देश की पहली कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट संयुक्त सरकार केरल में बनी। उसने एक आंदोलन में मजदूरों पर गोली चला दी। कई मजदूर मर गये। डॉ. लोहिया जेल में थे, उन्होंने कहा: जो सरकार अपने ही लोगों पर गोली चलाये, वह जनता की सरकार नहीं हो सकती। उन्होंने जेल से ही मुख्यमंत्री थानुपिल्लै को इस्तीफा देने के निर्देश दिये। कालांतर में पार्टी के दो टुकड़े हो गये : डॉ. लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी। बाद में ये संसोपा और प्रसोपा कहलायीं। चुनावों में मिल रही लगातार पराजय और उससे मिल रहे अपमान और पीड़ा से जयप्रकाश आहत तो थे ही,उन्होंने दुखी होकर राजनीति छोड़कर सर्वोदय की राह ले ली। डॉ. लोहिया संघर्ष की राह में अकेले पड़ गये। विधानसभाओं और लोकसभा में वे विधायक और सांसद जिताकर भेजते रहे। संख्या कम होती थी, लेकिन संघर्ष व्यापक होता था। सारा अपमान और पीड़ा वे झेलते रहे,तब उन्होंने पुस्तक लिखी : 'सरकारी, मठी और कुजात गांधीवादी।' सरकारी मतलब प्रधानमंत्री नेहरू और उनकी कांग्रेस, जो अपने आपको गांधी का वारिस बताते थे। मठी मतलब जयप्रकाश आदि लोग, जो अपने को गांधीवादी कहते थे, लेकिन राजनीति छोड़कर सर्वोदय में चले गये थे और कुजात मतलब जात बाहर गांधीवादी, डॉ. लोहिया जैसे लोग, जिन्हें गांधीवादी मानने में भी कष्ट होता था। डॉ. लोहिया सन 1963 में उप-चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुँचे। उन्होंने जो कहा और किया, उसका इतिहास गवाह है, जिसकी कद्र आज पूरी दुनिया करती है। इसालिए उन्होंने कहा था : लोग मेरी बात सुनेंगे। लेकिन मेरे मरने के बाद। आजादी के 70 वर्ष बाद देश का ब्रह्म वाक्य, जिसमें भक्ति और मोक्ष दोनों का प्रभाव है, राम नाम सत्य है। सत्य ही में गत्य है,आज सत्ता नाम सत्य है, मंत्री बने गत्य है, में बदल चुका है। राजनीति के गिरते स्तर और नेताओं की गिरावट के दौर में शरद यादव का सत्ता को ठुकराकर केन्द्रीय मंत्री नहीं बनना देश के लोकतंत्र के लिए उजली राजनीति की दिशा में एक मजबूत कदम है। शरद यादव ने आजादी की लड़ाई और समाजवादी आंदोलन के त्याग और संघर्ष की विरासत को सिद्ध कर एक नयी राह दिखलायी। लेकिन हमारा देश जिंदा इंसान को नहीं मानता है। उसकी मौत के बाद उसकी पूजा करता है। हमारे पुराण-शास्त्र सिखाते हैं: कोउ नृप होय, हमें का हानी। राजा, आग, पानी से बचकर रहो। ऐसे देश में केन्द्र में बड़ा मंत्री पद छोड़ना असफलता कहलाता है। सफलता-असफलता की सबकी अपनी-अपनी परिभाषा होती है। जयप्रकाश ने इस पर कविता लिखी थी, जिसका भाव है कि सफलता-असफलता की परिभाषा जंग से भिन्न रही है:परिभाषा मेरी जग ने जब जब जिन्हें माना सफलता मेरी, वही थी असफलता मेरी, और जग ने जब जब माना जिन्हें असफलता मेरी वही थी सफलता मेरी। जयप्रकाश 1947 में नेहरू मंत्रिमंडल में मंत्री और 1977 में प्रधानमंत्री बन सकते थे, लेकिन नहीं बने थे। एक लोकतांत्रिक देश में अमित शाह राजशाही के अंदाज में अश्वमेध के घोड़े को लेकर विजय पताका लहराते चल पड़े हैं, जिसमें युद्ध, मार-काट सब जायज है। चाहिए सिर्फ विजय। इसके विपरीत शरद यादव का लोकतंत्र के रथ पर सवार होकर लोक के साथ संवाद करने के लिए निकलना, साझा विरासत बचाने के लिए निकलना आने वाले कल के लिए लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है। साझा विरासत देश में पैसा, पावर, प्रतिष्ठा पाने के लिए आज एक अंधी दौड़ मची हुई है। एक-दूसरे से आगे निकलने की। क्यों, किसलिए? शायद नहीं मालूम। देश की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा, उसके अध्यक्ष अमित शाह,मोदी ने पीले चावल भेजकर एक निमंत्रण पूरे देश के राजनेताओं को दिया हुआ है कि आइए, भाजपा ग्रहण कीजिए, आपकी हैसियत से ज्यादा जो चाहेंगे मिलेगा। विधायकी, मंत्रित्व, मुख्यमंत्रित्व और केन्द्र में मंत्रित्व। ये बहुत ही वैचारिक लोग हैं। ये इंसान-इंसान में भेद नहीं करते हैं। सबको एक जैसा मानते हैं, इन्होंने भाजपा को जो भी आये'ये घर खास खुदा का है'बना रखा है। इनके भक्त भी इसे अक्षरश: मान रहे हैं। इन्हें कांग्रेस-मुक्त नहीं, वरन अब तो प्रतिपक्ष-मुक्त भारत बनाना है। आप इनकी सरपरस्ती कबूल करिए, सब गुनाह माफ; यदि कबूल नहीं है, तो सजा के लिए तैयार रहिए। इसकी बानगी नीतीश कुमार के नये मुख्यमंत्रित्व में उजागर होती है। नीतीश कुमार को पहले मोदी से नफरत हुई,राजग का बरसों का सशर्त गठबंधन, जिसमें राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता बाहर थे, तोड़ा। 2014 का चुनाव लड़ा। मोदी सफल और नीतीश साफ हो गये। अचानक उन्हें अँधेरे में लालू की लालटेन दिखने लगी। कल तक का जंगल राज लालटेन की रोशनी में खूबसूरत दिखने लगा। फिर न जाने क्या हुआ कि तेजस्वी यादव पर सीबीआई का प्रकरण लगते ही वापस मोदी बगैर शर्त के ही खूबसूरत और लालू बदसूरत दिखने लगे। उन्होंने जिस गठबंधन के साथ चुनाव जीता था, उसे छोड़कर भाजपा के साथ बगैर नया जनादेश लिये ही सरकार बना ली। भाजपा की,मोदी की सरपरस्ती कबूल करली ली। इस सत्ता रूपांतरण के बाद तेजस्वी यादव द्वारा नीतीश के विधानसभा में दिये गये भाषण का एक संवाद काबिले गौर है कि नीतीश जी, कैबिनेट की पहली बैठक में मैंने प्रस्ताव रखा था, जो मैंने पास भी करवाया था, कि मंत्री के पास कोई फाइल दस्तखत के लिए नहीं आयेगी। हम क्या जानें कि लोहा, सीमेंट कितनी लगेगी,क्या भाव की लगेगी। कुछ मंत्रियों ने उसका विरोध किया था। वे यहीं बैठे हुए हैं,उनके नाम बताइए। सब जानते हैं कि मंत्री फाइल दस्तखत करने के लिए क्यों बुलाते हैं। यदि मैंने यह प्रस्ताव पास नहीं करवाया होता तो मुझ पर पाँच-सात नये प्रकरण दर्ज हो जाते। सच तो यह है कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तब ही से वे हीनता ग्रंथि से ग्रस्त थे। एक तो उनके विधायकों की संख्या लालू से कम थी। दूसरे, लालू यादव के मुकाबले बिहार में उनका कद छोटा था। तीसरे, तेजस्वी यादव में उन्हें नया मुख्यमंत्री दिख रहा था। चौथे, उनके घोटाले और पुराने प्रकरण उन्हें डरा रहे थे। सुशील मोदी 12 वर्ष प्रतिपक्ष में और 12 वर्ष उप-मुख्यमंत्री के रूप में 24 वर्षों के उनके चोली-दामन के साथी थे। स्वाभाविक है कि नीतीश दिख तो लालू के साथ रहे थे, लेकिन शुरू से सुशील मोदी के साथ ही थे। मुख्यमंत्री पद की चाहत की गिरावट ने भारतीय राजनीति का एक अक्षम्य अध्याय लिख दिया। हजार वर्षों की गुलामी ने हमारे तन-मन में, चेतन-अचेतन में एक कुसंस्कार, जिसे बहुत-से लोग जाने-अजाने में संस्कार मानते हैं, भर दिया है। उसीकी दुष्परिणति है किआजादी के बाद मिली सत्ता, जो मिली तो स्वराज के लिए थी, लेकिन कुछ लोग के राज में बदल गयी। लोकतंत्र के चारों स्तम्भ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिकाऔर मीडिया के साथ अन्य महत्वपूर्ण लोगों की जीवन पद्धति पुराने राजा-महाराजाओं पर भारी है। आगे-पीछे सैकड़ों सरकारी, गैर-सरकारी गाड़ियाँ दौड़ती हैं। किसी की शादी हो तो इनके आगमन से ही नवयुगल के विवाह की सफलता-असफलता का सूचकांक तय होता है। मौत है तो मरने वाले सहित उसके पूरे परिवार की प्रतिष्ठा और मरने वाले का पुण्य परिलक्षित होता है। ये लोग तो ठीक, इनके इर्द-गिर्द वाले भी किसी जगह लाइन में नहीं लगते हैं। कोई- सा भी कार्यक्रम हो, मुशायरा, कवि सम्मेलन, नाटक, फिल्म इनका स्थान प्रथम पंक्ति में मुफ्त में आरक्षित होता है। हमारे देश के किसी भी गली-मोहल्ले, गाँव शहर में इंसान की हैसियत इनसे रिश्तों के आधार पर तय होती है। मुख्यमंत्री यदि किसी के कंधे पर हाथ रख दे तो कितने ही हाथ उस कंधे के कदमों में झुक जाते हैं। कलेक्टर से दोस्ती है तो आप शहर अपनी उँगलियों पर चला सकते हैं। आप नहीं चलायेंगे तो निश्चिंत रहिए, लोग चलवाने आ जायेंगे। दीवाली पर इन लोगों के यहाँ मिठाइयों के इतने डिब्बे और गिफ्ट आते हैं कि आप देखकर चकरा जायेंगे। पुराने जमाने के राजा, महाराजा, बादशाह, शहंशाह, राजकुमार, युवराज, जागीरदार,जमींदार,सरमायेदार, ठिकानेदार, जिनसे आजादी के बाद आजादी की बात लिखकर भगतसिंह फाँसी पर चढ़ गये। लेकिन यह भगतसिंह को भी नहीं मालूम था कि नयी-नयी शक्लों में पुरानों के साथ नये राजा भी लोकतंत्र की पेटी से जन्म लेकर इस तरह सामने आयेंगे। भारत रंग, नस्ल, जाति और मजहब का दुनिया का सब से विविधता लिये विचित्र, किन्तु सत्य देश है। हर फासले-दर-फासले पर बोली, रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज एक-दूसरे से भिन्न मिलेंगे। जातियाँ, उनमें भी उप-जातियाँ मिलेंगी। अंग्रेज एक-रंग हैं, एक-जैसे हैं। चीनी चपटी नाक, छोटी आँख, छोटे कद वाले हैं। जापान, कोरिया भी छोटा कद, छोटी नाक, छोटी आँख वाले हैं, लेकिन चीन से भिन्न हैं। अमेरिका काला और गोरा है। भारत में छोटे, मध्यम, लम्बे सभी तरह की ऊँचाइयों के लोग हैं। माथे किसी के चौड़े, लंबे, किसी के छोटे-चपटे हैं। कोई काला वह भी गहरा, जिसमें अफ्रीकी रंग दिखे, तो कोई सामान्य काला, साँवला, गेहुँआ, गोरा और गुलाबी रंग वाला है। वहीं तीखी, चपटी, सुतवाँ, छोटी-बड़ी, गोल नाक के साथ तीखी, बड़ी, छोटी, गोल और विभिन्न रंगों की आँखें जैसे पीली, गुलाबी, मंजरी, सुनहरी, नीली, काली आदि इतने तरह की आँखें हैं कि उनमें पूरी दुनिया डूबी हुई है। सभी तरह की शक्लें, इतने-इतने तरह की हैं कि यह भारत को दुनिया का एक बहुरंगी, बहुआयामी देश बनाती हैं, जिसमें हजारों साल से यहाँ आने वालों का और फिर यहीं रच-बस जाने का तन-मन-धन का इतिहास छुपा हुआ है। यह हजारों साल से सतत बनता आ रहा, चला आ रहा सिलसिला है, ताना-बाना है। इसमें प्यार का पैगाम है तो नफरतों की सौगातें भी हैं। इसमें छुआछूत का दर्द है तो उसे मिटाने का संकल्प भी है। जाति की जंजीर हैं, तो उसे तोड़ती बेड़ियाँ भी हैं। हर तरह का जुल्म है तो संघर्ष की कहानियाँ भी हैं। गुलामी की बेबसी है, तो आजादी की गूँज भी है। चाँदी की दीवारें हैं तो पसीने की खुशबू भी है। आज इसकी खामियों को खूबियाँ और खूबियों को खामियाँ बतला कर हजारों साल के ताने-बाने को तोड़ने का काम किया जा रहा है। इसे कितना भी तोड़ो, यह और मजबूत बन कर निकलता है। खलील जिब्रान साहब की पंक्तियाँ हैं : तुम दिन के सूरज के सामने आजाद हो। तुम रात के चाँद और सितारों के सामने आजाद हो। तुम वहाँ भी आजाद हो जहाँ न दिन का सूरज है और न ही रात के चाँद और सितारे हैं। तुम ब्रह्माण्ड में आँखे मूंद लेने के बाद भी आजाद हो। लेकिन, तुम गुलाम हो उसके जिससे तुम प्यार करते हो और गुलाम हो उसके जो तुम से प्यार करता है