सितम्बर 2016

हाउ टू मीट, हाउ टू सिट एंड हाउ टू ईट बट दे डोंट नो हाउ टू ट्रीट

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

इंदौर के एक विधायक ने प्रधानमंत्री के शहीद आजाद की जन्मस्थली आगमन पर अखबार में विज्ञापन दिया। उसमें आदिवासी उन्मूलन लिखा गया है। हंगामे के साथ मामला राज्यसभा तक पहुंच गया। विधायक का कथन है कि उनका आशय उन्मूलन नहीं, उन्नयन था। मुझसे कुछ ने पूछा यह उन्मूलन क्या है? उन्नयन क्या है? जब आज के पढ़े-लिखों की यह स्थिति है तो विधायक से जो गलती हुई है, वह भाषा की अज्ञानता है, विधायक को जब उच्च हिन्दी का ज्ञान नहीं है, तो उन्हें अपनी सामान्य बोलचाल की भाषा में काम करना चाहिए, जिससे भाषा के पाखंड का बवंडर खड़ा न हो। इसी तरह करीब 30-35 वर्ष पूर्व म.प्र. विधानसभा में आठ आदिवासी विधायकों ने हिन्दी में शपथ ली थी। उनसे उच्चारण में गलती हो गई। मीडिया ने उनका मजाक उड़ाया था। वे सब दूर अपमानित हुए थे। उनकी मातृभाषा आदिवासी थी। उनका कोई कसूर नहीं था, लेकिन हिन्दी के पंडित अन्य भारतीय भाषाओं के साथ वही अन्याय करते हैं, जो अंग्रेजी वाले हिन्दी वालों के साथ करते रहे हैं।

भाषा मतलब बोली। यह बोली इंसान के आचार-विचार, व्यवहार का इजहार है। संप्रेषण का माध्यम है। इसमें जिन्दगानी है, विकास की कहानी है। यह भाषा दुनिया के विकसित देशों के लिए सही अर्थों में बोली है, लेकिन हमारे देश में यह बंदूक की गोली है। दुनिया को इसने जिंदा किया है, स्वस्थ मानसिकता दी है, आगे बढ़ाया है। हमारे यहां इसने मारने का काम किया है, बीमार मानसिकता दी है। पीछे किया है। अपनी मातृभाषा इंसान की नैसर्गिक ताकत होती है। इसमें अन्य देशी भाषा जुड़ जाए, यह उस नैसर्गिकता की उपलब्धि हो सकती है। इनमें रिश्ता बड़ी बहन, छोटी बहन का हो सकता है। माँ मौसी का हो सकता है। इसमें विदेशी भाषा जुड़ जाए तो रिश्ता दोस्ती का हो सकता है, लेकिन देश में विदेशी भाषा ने यह रिश्ता मालिक-नौकर का बना दिया है। दरअसल, भाषा तीन युगों का षड्यंत्र है। पहले संस्कृत, ‍फिर फारसी और बाद में अंग्रेजी। हमारे देश पर जिस-जिस ने जब-जब राज किया, उन्होंने राज करने की बोली अलग और जनता की बोली अलग रखी। राजाओं के समय पंडितों की चली, सम्मान संस्कृत को मिला। बादशाहों के समय काजी-मुल्लाओं की चली, सम्मान फारसी को मिला। अंग्रेजों के समय अंग्रेजों की चली, सम्मान अंग्रेजी को मिला।

कभी देश ने नारा लगाया था। अंग्रेजी में काम न होगा। फिर से देश गुलाम न होगा। तब अंग्रेजी विरोध की लहर आई थी, लेकिन अंग्रेजियत उसको खा गई। आज देश, काल और परिस्थितियां बदल गई हैं। आज अंग्रेजी इस देश के खून में घुस चुकी है। अब खतरा अंग्रेजी से नहीं, अंग्रेजियत से है। अंग्रेजी एक भाषा है, भाषा कोई बुरी नहीं होती है। सब खूबसूरत होती हैं। शेक्‍सपियर हो या कालीदास दोनों एक से बढ़कर एक हैं, लेकिन फर्क यह आ गया है कि पानी हमारे मुल्क में वाटर हो गया है। जवाहरलाल नेहरू जेएन हो गए। रामचन्द्र आरसी, अब्दुल रहमान एआर, मां मम्मी, बाबूजी डेडी हो गए हैं। यह सब भाषा की खूबसूरती है, गतिशीलता है, निरतंरता है। तकलीफ की बात यह है कि पानी छोटा और वाटर बड़ा नजर आता है। माँ कमजोर और मम्मी ताकतवर नजर आती है। हाउ टू मीट, हाउ टू सिट एंड हाउ टू ईट बट दे डोंट नो हाउ टू ट्रीट तो हमारे देश में सिखा रहे हैं, लेकिन हाऊ टू ट्रीट हम भूले हुए हैं। हम हर मामले में हाऊ टू ट्रीट, मतलब व्यवहार में फर्क करते हैं। भाषा भी उनमें से एक है। कोई भी जगह हो, कहीं भी हो, पांच लोग हों या पचास लोग, ट्रेन में या प्लेन में हों। दो लोगों को भी अंग्रेजी आती हो या एक को भी आती है, तो वह अंग्रेजी में बोलने लगता है। नो ‘No’ पर यस ‘Yes’ भारी है एक टूटी-फूटी अंग्रेजी की लाइन सही हिंदी पर भारी है।

अंग्रेजी अंग्रेजों की मातृभाषा है, लेकिन उनके यहाँ लैटिन अंग्रेजी हावी है। यह अंग्रेजों के अभिजात्य वर्ग की भाषा है। आजकल हमारे देश के अंग्रेजी बोलने वालों पर भी यह लैटिन अंग्रेजी भारी पड़ रही है। इसी तरह उर्दू पर फारसी और हिन्दी पर संस्कृत भारी रही है। मराठी, बंगाली, सिन्धी, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, आदि बोलने वाले के उच्चारण में हिन्दी की स्पष्टता नहीं आ पाती है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी, माँ से बच्चे तक आते-आते स्पष्टता आ जाती है। हिन्दी अभी-अभी डेढ़-दो सौ वर्षों में विकसित हुई भाषा है। यह अन्य भारतीय भाषाओं की बड़ी बहन थी। बड़ी बहन तो बढ़ती चली गई। आज यह करीब 70-80 करोड़ लोगों की भाषा बन गई है। लेकिन यह अन्य भारतीय भाषाओं का जो उसकी छोटी बहनें थीं, ख्याल नहीं कर सकी। बहन ने ही बहन से प्यार नहीं किया। यदि देश भर के स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई के साथ एक दो भारतीय भाषाओं को जोड़ा जाता तो सभी भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे के नजदीक आतीं, एक-दूसरे के प्रति समझ और सम्मान बढ़ता। देश खिल उठता, एकता की दिशा में यह ठोस कदम होता। इसके नहीं होने में भी मूल कारण अंग्रेजी ही रही है, यह महारानी बन गई और अन्य भाषाएँ दासी बन इसकी चाकरी में लग गईं। महारानी को पंख लग गए। वो पूरे देश के गाँव, गली-मोहल्लो में फैल गई। आज देश भर में सभी दूर अंग्रेजी मीडियम के बोर्ड लिखे दिख जाएंगे। आगे बढ़ने के लिए योग्यता का यही मापदंड है।

आजादी के पहले सदियों से हमारे देश में पंजाब में पंजाबी और उर्दू , बंगाल में बंगाली, गुजरात में गुजराती, महाराष्ट्र में मराठी, उत्तर प्रदेश में अवधी-ब्रज, मालवा में मालवी, तमिलनाडु में तमिल, सिंध में सिंधी, केरल में मलयालम, कश्‍मीर में कश्‍मीरी आदि और उसमें भी स्थानीय भाषाएं थीं। यहां रहने वालों की कोई भी जाति हो मजहब हो, महाराष्ट्र का मराठी, बंगाल का बंगाली और गुजरात का गुजराती ही बोलता था। उत्तर प्रदेश के अवध में अवधी थी। तुलसीदास ने रामायण अवधी में ही लिखी है। रसखान ने ब्रजभाषा में, रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी और मुंशी प्रेमचंद ने उर्दू में लिखा है। साहिर ने ‘मन तड़पत हरिदर्शन को’ लिखकर और रफी ने इसे गाकर सिद्ध किया कि भाषा किसी जाति या धर्म की बपौती नहीं होती, वह सिर्फ मातृभाषा होती है। दुर्भाग्य कि आजादी के बाद भाषा को जाति से जोड़कर देश तोड़ने का काम किया गया है। हिंदी फिल्मों में कैफी आजमी, जाँनिसार अख्तर के गाने या नीरज के गीत हों, अमृता प्रीतम की कविता या खुशवंत सिंह के लेख, इनमें कहीं हिंदी, कहीं उर्दू है, मैं जो यह लिख रहा हूँ, उसमें भी हिंदी के साथ उर्दू है और अन्य भारतीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी भी शामिल है। शुद्धता का आग्रह ही दुराग्रह बनकर सबकुछ अशुद्ध कर देता है। गाँव का आदमी जब शहर आता है तो वह कोर्ट को कोरट, मजिस्ट्रेट को मजिस्टर, स्टेशन को टेशन, डॉक्टर को डाक्साब कहता है। भाषा को ठीक करना भी जरूरी है। यह होता रहेगा, लेकिन जो शब्द हमारी भाषा में घुल-मिल गए हैं, वो ही हमारी असली बोली हैं।

हिन्दी के पंडितों ने रेलगाड़ी को लौहपथगामिनी, द्रुतगति वाहिनी, एयरकंडीशन को वातानुकूलित, राष्ट्रपति, कुलपति आदि ऐसे अनेक शब्द रच दिए, जिन्होंने भाषा को क्लिष्ट, गरिष्ठ बनाया है। दक्षिण भारत में आज भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा कहने के विरोध में पूरी जनता और लोकसभा, राज्यसभा में दक्षिण भारत के सांसद खड़े हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि उन पर हिन्दी थोपकर हिन्दी वाले राज करेंगे। उन्हें नीचा दिखाएंगे। इसीलिए वे हिन्दी के बदले अंग्रेजी को गले लगाए घूमते हैं। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है, लेकिन हम घटनाओं से सीखते नहीं, वरन् बिगड़ते हैं। आप फिल्मी सितारों को देखिए, फिल्म फेयर अवॉर्ड को देखिए, ये दूध-रोटी हिन्दी की खाते हैं, लेकिन बच्चे अंग्रेजी के पैदा करते हैं। हमारा देश सिर के बल चलकर विकास पथ पर अग्रसर है। बच्चे के घर में नल और गाँव में कुआं है और स्कूल में नल को टेप, कुएं को वेल याद करता है। बगीचों में सभी पेड़-पौधों के नामकरण अंग्रेजी में हो गए हैं। जूही, चमेली, रातरानी की खुशबू गुम हो गई है। हम प्रकृति को समझ ना सके इसीलिए नेचर बन गए हैं। इसीलिए आज प्रकृति से खिलवाड़ जारी है।

भाषा के जातीय और सांप्रदायिक आग्रहों ने भी हमारे देश की एकता को अवरुद्ध किया है। सिक्ख समाज की शादी की पत्रिका कभी बहुत मुश्किल से ही गुरुमुखी में आती थी, बाद में हमेशा अंग्रेजी में आने लगी। सरदारनी एंड सरदार सॉलिसीटर यूवर प्रेसेंस से शुरू होती थी। बेचारे सरदार और सरदारनी तो ठीक, कई बार दूल्हा-दुल्हन को भी नहीं मालूम होता था कि यह क्या बला है। मुस्लिम समाज ने भी हिंदी में शादी की पत्रिका नहीं छपाई। उसने भी उर्दू या अंग्रेजी को अपनाया। यह सब गुरुद्वारों और मस्जिदों से निकली तहरीर थी। इसमें आजादी के बाद भाषाई आधार पर जनगणना में अबोहर फाजिल्‍का का विवाद भी मुख्य कारण थे, लेकिन हिंदी वालों की विचित्रता देखिए, वे भी अंग्रेजी में शादी की पत्रिका छपाकर अभिजात्य दिखने की चाहत के साथ विकास की वैतरणी पार करने लगे।

आजकल यह विकास की गंगा वाट्स एप पर बह रही है। सौ दो सौ के ग्रुप में दस बीस को गलत, सही अंग्रेजी आती है, वे उधार का माल गुलामी की भाषा में परोसकर समाज एवं देश की चिंता कर रहे है। इनमें अधिकांश में जातिगत साम्प्रदायिक आग्रह या हलकी राजनीति होती है, जो देश को कमजोर करती है। अंग्रेजी में इसे असभ्यता कहते हैं। ये लोग इसमें अपना गौरव ढूंढ़ रहे हैं। कई बार लिखा जा चुका, कहा जा चुका है, सब जानते हैं कि दुनिया में आगे वही बढ़ा है, विकसित देश वही है, जिसे अपनी मातृभाषा पर गर्व है। जापान, जर्मनी, इटली, फ्रांस, अमेरिका, इंग्लैंड, रूस, चीन अपनी मातृभाषा से उठे हैं और दुनिया में गर्व से सीना तान कर खड़े हैं।

उ.प्र. में दयाशंकर ने अपनी मातृभाषा में मायावती पर दया दिखाई है, प्रत्युत्तर में मायावती और भी दयावान हो गईं। इसमें बेवहज मातृभाषा में नारी का अपमान किया गया है। हमारे देश में मातृभाषा और नारी एक-दूसरे के पूरक हैं, दोनों ही अपमान की वस्तु बना दिए गए हैं। अंग्रेजी बोलने वाले मुझे एक जगह बहुत ही खूबसूरत दिखते हैं। वे गाली अंग्रेजी में नहीं बक पाते। यदि ब्रह्माण्ड में जैसा कि हम जो भी बोलते हैं वह रिकार्ड हो जाता है, तो निश्चित मानिए कि कभी रिकॉर्ड को सुना गया तो ब्रह्माण्ड में सबसे अधिक जो निकलेगा, वो हमारी माँ-बहन पर मातृभाषाओं में दी गई गालियाँ ही होंगी। भाषा के पतन में क्या यह सोच और दृष्टि जवाबदार नहीं है?

अगले पचास बरस बाद संभव है कि स्थानीय भारतीय भाषाएं लुप्त हो जाएं। हिन्दी भी गुम होने लगे, जिस तरह आठे उठे चौसठ और साते साती उनपचास इतिहास की धरोहर बन रहे हैं और सबसे ज्यादा अंग्रेजी हो जाए। लेकिन इस प्रश्न का उत्तर सदैव अनुत्तरित रहेगा कि हमारी लोक भाषा में क्या कमी थी कि वो इतिहास बन गई ? आजकल एक नई शुरुआत हो गई है। बच्चों के स्कूल से घर पर पहले संदेश आते थे कि ये स्कूल में हिंदी बोलते हैं। अब संदेश आते हैं कि ये हिंदी में गाने गा रहे हैं, उन्हें अंग्रेजी गाने सिखाइए अन्यथा बाद में पछताएंगे। उम्मीद करें कि आने वाले कल में ये अंग्रेजी से तैयार बच्चे पहले अपनी मातृभाषा सीखेंगे, समझेंगे, उसका सम्मान करेंगे और अंग्रेजीयत से लड़ेंगे।