अगस्त 2017

नया दौर

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

अपनी बात

जदयू नेता शरद यादव कह रहे हैं कि रविवार बड़ा काम कर रहा है। वे इस वक्त राज्य सभा में हैं। लोक सभा में 7 बार एवं राज्य सभा में 4 बार, कुल 11 बार निर्वाचित हो कर जा चुके हैं। इस वक्त वे दोनों सदनों के सबसे वरिष्ठ सदस्य हैं। इंदिरा गांधी, अटल बिहारी के बाद तीसरे ऐसे राजनीतिज्ञ हैं, जो तीन प्रदेशों से निर्वाचित हो कर लोक सभा में पहुँचे हैं। देश के राजनेताओं में सर्वाधिक बार जेल जाने वाले और सर्वाधिक समय जेल में रह चुके संघर्षशील नेता हैं। कांग्रेस नेता, पूर्व लोक सभा सदस्य बालकवि बैरागी ने ताउम्र (वे अभी 87 वर्ष के हैं) अपने काव्य और राजनीति से देश का अँधेरा दूर करने के लिए कर्म एवं संघर्ष किया है। उनका फोन आया कि रविवार बहुत अच्छा निकाल रहे हो, लेकिन नोटबंदी और जीएसटी से बहुत बदहाली हो गयी है। छोटे-छोटे व्यापारी बर्बाद हो गये हैं। मैं अभी 7 हजार लोगों के जुलूस से आ रहा हूँ। इनके बारे में और लिखो। आजकल असली खबरें मीडिया से गायब हैं। म.प्र. के पूर्व एडवोकेट जनरल आनंद मोहन माथुर 90 वर्ष की उम्र में भी मौजूदा व्यवस्था के विरुद्ध संघर्षरत हैं, उन्होंने भी यही सब कहा है। प्रो. जयप्रकाश चौकसे दैनिक भास्कर में परदे के पीछे से कल, आज और कल में जो भी घटा या घट रहा है, उसे सिनेमा संसार की माला में पिरो कर इंसान की जिन्दगी के हर हिस्से के किस्से को विचारों के पसीने से गूँथ रहे हैं। उसे तय करने वाले, वे चाहे सत्ताधीश हों या अन्य कोई, उसका स्याह और उजला चेहरा दिखाने का काम अनेक वर्षों से लगातार कर रहे हैं। वे लिख रहे हैं कि रविवार उद्देश्यपूर्ण कार्य कर रहा है। रविवार के सम्पादक राजकिशोर भी वर्तमान स्थिति से चिन्तित हैं, वे रविवार के गुलदस्ते में कई तरह के फूल इकट्ठा कर उनसे इंसानियत की खुशबू बिखेर रहे हैं। वे पिछले पचास वर्षों से लगातार अपनी लेखनी से लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को समृद्ध कर रहे हैं। इन्दौर राइटर्स क्लब की बैठक में कवि सरोजकुमार अपनी कविता के माध्यम से कह रहे हैं कि बिकने-खरीदने का दौर है, लेकिन यह तो देखिए कि वे खरीदने आ रहे या आप बिकने जा रहे हैं। सही तो यही है कि बिकने वाले लाइन लगा कर खड़े हैं। खरीदने वाले तो किसी को भाव भी नहीं दे रहे हैं। ऐसी बातें, ऐसे ही जज्बात सब ओर से पत्रों में पढ़ने और मुलाकातों में सुनने को मिलते हैं। यह कहा इसलिए जा रहा है कि हमारा देश जीते हुओं को मारता है और मरने के बाद उनकी पूजा करता है। शब्द कड़वे हो सकते हैं, लेकिन हकीकत नहीं बदल सकती। ऊपर जिनके बारे में लिखा है, उनसे कोई सत्ता, धन, पद्मश्री, पद्मविभूषण या लाभ नहीं मिलेगा। वरन विचारों की रोशनी और संघर्ष का रास्ता मिलेगा, लेकिन हमारी पत्रकारिता बड़े ही संकुचित दायरों में सिमटी हुई है। पक्ष-विपक्ष में सोच-समझ कर चलती है। यदि पक्ष में लिख रहे हैं, किसी की तारीफ कर रहे हैं तो कोई निहित स्वार्थ है, विपक्ष में लिखो तो कोई लिखवा रहा है। कुल मिला कर उसमें आग्रह या दुराग्रह ढूँढ़ा जाता है। ऐसा बहुत बार होता भी है। लेकिन संघर्ष करने वालों के पक्ष में नहीं लिखना परिवर्तन करने वालों को नुकसान पहुँचाता है। 'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा, उनका भी अपराध' - यह रामधारी सिंह दिनकर बहुत पहले जेपी आंदोलन के दौर में लिख चुके हैं। जब से नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी है, तब से ऐसा क्या हो गया? रविवार तो बहुत पहले से प्रकाशित हो रहा है। सन 2004 से 2014 तक यूपीए सरकार थी। उसके बारे में रविवार ने क्या कुछ नहीं लिखा था। आज जो मोदी के लिए लिख रहे हैं, तब मनमोहनसिंह के लिए उससे भी तल्ख और तीखा लिखा था। तब तो ऐसा नहीं कहा गया था। बस यही अंतर है एक सरकार और दूसरी सरकार में, जिस पर इस दूसरी सरकार का ध्यान नहीं है। यह बहुत ही बारीक अंतर है, लेकिन बहुत ही गहरा है। आज सबकी जुबान पर एक ही बात है कि मीडिया मोदी-मय है, उनके अलावा कुछ भी नहीं दिखाया जा रहा है। जो भी विरोध में है, उसे कुचल दिया जायेगा। एनडीटीवी और प्रणय राय पर सीबीआई की कार्रवाई इसकी पुष्टि करती है। मोदी सरकार के पैरवीकार इस पर गुस्सा करते हैं, क्योंकि सत्ता जब अपनी आँखों पर गोल्डन ग्लास का चश्मा लगा लेती है, तब वह ऐसा ही करती है। उसे इंडिया टीवी के रजत शर्मा को पद्मभूषण और जी टीवी के सुभाष चंद्रा को राज्य सभा उचित लगता है। लालू यादव पर सीबीआई कार्रवाई कर रही है। कार्रवाई उचित भी हो सकती है, लेकिन लालू यादव, अरविंद केजरीवाल, पी चिदम्बरम, दिग्विजय सिंह के पुराने प्रकरण ही क्यों खुल रहे हैं? देश भर में दलित-अल्पसंख्यक-मुसलमान अपने आपको असुरक्षित महसूस क्यों कर रहे हैं? दलित युवक रोहित वेमुला की मौत पर सरकार की खामोशी और भाजपा की मुँहजोरी क्या बयां करती है? गाय, वेज-नानवेज के नाम पर सड़कों व ट्रेन में पिटाई, हत्याएँ और किसानों पर गोली देश-दुनिया में भारत का क्या संदेशा दे रही हैं? बहुत-से लोग आज के दौर को आपातकाल सन 1975 से भी कठिन बता रहे हैं। यह सरासर गलत है। मुस्लिम और दलित पर अलग से हमले को छोड़ कर उस वक्त की गयी सख्ती का हम आज अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं। मैं जो लिख रहा हूँ, उस दौर में ऐसा सोच भी नहीं सकते थे। आज आपातकाल तो नहीं है, लेकिन एक भय, एक खौफ, एक सन्नाटा जरूर है। हर दो, तीन माह में प्रधानमंत्री मोदी का बयान आता है। बयान इतना अच्छा होता है, लगता है कि यह सब जो हत्या-आत्महत्या का दौर चल रहा है, वह बकवास है। मोदी तो ईमानदारी से इन पर रोक लगाना चाहते हैं। फिर ऐसा क्या है कि यह सिलसिला रुकता ही नहीं है और बढ़ता ही चला जाता है? चलिए, ऐसा भी होता है कि आप रोक रहे हैं, लेकिन फिर भी 130 करोड़ के देश में कोई क्या करे, इक्का-दुक्का लोग या भीड़ ऐसी शर्मनाक हरकतें कर देती है, लेकिन क्या यह सबकुछ इतना सीधा-सीधा है, जैसा कि कहा या बोला जा रहा है? हकीकत इससे उलट है। ऐसा कहने और करने वाले लोगों के चेहरे पर कोई दुख-दर्द तो अलग, शर्म या पश्चात्ताप भी नहीं है। वरन, गुस्से और घमंड का भाव है। वह सब इसलिए, क्योंकि वे अपनी इस तरह की हिंसा को देशभक्ति और धर्म के प्रहरी की भूमिका में देख रहे हैं। यह तो हिन्दुत्व की अवधारणा नहीं है। यह ठीक उसी दिशा में जाने की पुनरावृत्ति है, जिस दिशा में कभी हिटलर गया था। वही उच्च आर्य रक्त की अवधारणा, वह शुद्ध बाकी अशुद्ध। इस्लाम के नाम पर आतंकवाद में भी तो यही हो रहा है। आतंकवाद के नाम पर जो भी हो रहा है, उसका इस्लाम से ठीक उसी तरह कुछ भी लेना-देना नहीं है, जिस तरह से गाय, बीफ, वेज-नानवेज, हिन्दू-मुसलमान का हिन्दुत्व से लेना-देना नहीं है। हमारा देश एक खूबसूरत धर्म-निरपेक्ष लोकतंत्र है। इसे अपने अंध धार्मिक सोच के तहत कुछ लोग कट्टर मजहबी मुस्लिम मुल्कों की राह पर ले जाना चाहते हैं। जिस बात से वे नफरत करते हैं, उसे ही अपना आदर्श बनाना चाहते हैं। लेकिन हमारे देश में यह संभव नहीं है। हमारा देश हिन्दू-मुसलमान का नहीं है, सिख-ईसाई का नहीं है। बौद्ध-जैन का नहीं है। दलित-पिछड़ों का भी नहीं है वरन इन सबके संगम से संगमंग हो कर निकली सैकड़ों-हजारों जातियों का है, जहाँ वे किसी भी पंथ, संप्रदाय की वाहक हों, लेकिन जरा-सा कुरेदो तो अन्दर से जाति की छुपी हुई चिनगारी ही निकलती है। यही कारण है कि आज भी ऑनर किलिंग एक ही पंथ-संप्रदाय की जातियों में होते हैं। इस चिनगारी ने दो हजार वर्षों से देश को बाँटा हुआ है। हम शक, हूण, खिलजी, तुर्क, तैमूर, तुगलक, मुगल, पुर्तगाली, अंग्रेजों से हारे और उनके गुलाम रहे हैं। जो भी आये, वे 500-1000 की संख्या में थे, देश करोड़ों का था, लेकिन जाति के कारण बँटा हुआ था, इसलिए हार गया। आजादी की लड़ाई में गांधी ने भी देश की इस कमजोरी को जेल में देखा था, देशवासी आते तो अंग्रेजों से लड़ कर थे, लेकिन एक साथ रोटी भी नहीं खा सकते थे। पुर्तगाली और अंग्रेजों को छोड़ कर बाकी जो भी हैं, वे देश छोड़ कर नहीं गये, यहीं की मिट्टी में रच-बस गये। हम सब उनका मिला-जुला संगम हैं। डॉ. लोहिया ने सन 1963 में फर्रुखाबाद से लोक सभा उपचुनाव जीता था। रात को जब कार्यकर्ता मिलने आये तो उनमें यादव भी थे। बातों में डॉक्टर साहब के मुँह से निकल गया कि यादवों ने जीत दिलवा दी। उनके वोट अच्छे मिले। सुबह यादवों का जुलूस आ गया। लोहिया गुस्सा हो गये। उन्होंने सर्किट हाउस के दरवाजे को बंद कर लिया और चुपचाप बैठ गये। दोपहर हो गयी तो सेवक नत्थीसिंह ने खिड़की खोल कर धीरे से कहा, कॉफी ले आऊँ? डॉक्टर साहब ने कहा, अंदर आ जाओ, दरवाजे में कुंडी नहीं लगी है। तब उन्होंने सबको इकट्ठा किया और कहा कि इस देश में चरवाहा (यादव), मरवाहा (दलित) और पुजारा (ब्राह्मण) में से किसी एक को इकट्ठा मत होने देना, अन्यथा सामाजिक विषमता दूर करने का आंदोलन मर जायेगा। उनका कहा सही साबित हुआ। यादवों को इकट्ठा कर लालू यादव, मुलायम सिंह ने और दलितों को इकट्ठा कर मायावती ने दलितों के आंदोलन का अपने निजी आचरण और परिवारवाद से बहुत बड़ा नुकसान किया है। इनके इस आचरण से अन्य पिछड़ी एवं दलित जातियाँ बँट कर हाशिये पर चली गयीं और सामाजिक विषमता का आंदोलन बिखर गया। तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। इस जाति व्यवस्था का लाभ देश की स्थापित शक्तियाँ इस कदर ले रही हैं कि उन्होंने मुल्क का सबसे बड़ा खलनायक लालू, मुलायम और मायावती को बना रखा है। वे इनके लिए जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग करते हैं और जिस तरह से इनका मजाक उड़ाते हैं और प्रत्युत्तर में अन्य नेताओं बाल ठाकरे और उनका परिवार, वसुंधरा, शरद पवार, अरुण जेटली, अमित शाह से ले कर शिवराजसिंह चौहान के लिए उन्हें साँप सूँघ जाता है। यह सब हजारों साल की जातीय संरचना के आधार पर बने दिमाग की एक बहुत बड़ी विसंगति है। इसे समझने के लिए समदृष्टि चाहिए, जिसका नितान्त अभाव है। एक बात हम कभी नहीं भूलें कि जो गलत होते हैं और अपनी गलती को नहीं मानते, वे अपने ही जाल में उलझते हैं। व्यक्ति है तो घर-परिवार को और सरकार है तो समाज एवं देश को खतरे में डालते हैं। कश्मीर, पाकिस्तान, चीन, नोटबंदी और जीएसटी की असफलता की दास्तान और और पुराने वादों की याद दिलाने में तो पूरा संपादकीय भर जायेगा। सरकार इन सभी मामलों में तानाशाह जैसा बर्ताव कर रही है। हर प्रश्न का एक ही उत्तर : कांग्रेस ने क्या किया? सरकार देशभक्ति का कार्य कर रही है और प्रश्नकर्ता को पाकिस्तानी बना दिया जाता है। इंदिरा गांधी ने जब सन 1975 में आपातकाल लगाया था, तब देश पचास करोड़ का था, डेढ़ से दो लाख लोग बन्द किये गये थे। उनमें गुंडे और स्मगलर भी थे। ट्रेन समय पर चलती थी और बैंक, सरकारी कार्यालय समय पर खुलते थे। आपातकाल 19 माह रहा था। सिर्फ इंदिरा गांधी और सत्ता की प्रशस्ति होती रही। सरकार के पक्ष के अलावा किसी भी अखबार में विरोध में खबर नहीं आयी थी। एक शब्द भी आने का मतलब जेल था। उस वक्त बालकवि बैरागी ने छुपे हुए व्यंग्य में कहा था : जोर-जोर से बोलो, चिल्ला-चिल्ला कर बोलो इंदिरा गांधी जिंदाबाद, बाकी दुनिया मुर्दाबाद। गोपालदास नीरज ने भी गाया था आंतरिक सुरक्षा अधिनियम के भय से कोयल ने गाना छोड़ दिया । गोरी ने पनघट पर जा कर गागर छलकाना छोड़ दिया। आपातकाल में आदमी बात करने में भी डरता था। लोकतंत्र के सभी स्तंभों पर पुलिस व सेना का पहरा था। न अपील, न दलील, न वकील। इससे गलतफहमियाँ इस कदर फैलीं कि संजय गांधी के अच्छे सूत्र, जिनमें से एक नसबंदी भी थी, खो गये। अफवाह ऐसी चली मानो पूरे देश की नसबंदी कर दी गयी हो। इंदिरा गांधी आत्ममुग्धता में चुनाव करवा बैठीं। चुनाव चिह्न गाय-बछड़ा था। वे और उनके पुत्र संजय गांधी अर्थात गाय-बछड़े सहित कांग्रेस पूरे उत्तर भारत से साफ हो गयी। इसका सबसे बड़ा कारण क्या था? वह एक ही था : इस देश की जनता ने हजारों वर्ष बाद गुलामी से मुक्त हो कर आजादी का स्वाद चख लिया था। आज का दौर कुछ यादों को ताजा करवा रहा है, लेकिन हजारों वर्ष की गुलामी ने दिमाग में ऐसा डर बैठा दिया है कि जो सत्ता में बैठ गया, सो बैठ गया। बहुत-से लोग उसके हटने को स्वीकार नहीं करते हैं। 1977 में इंदिरा गांधी का जाना और 1980 में पुन: आना लोकतंत्र का अद्भुत नजारा था। 1984 में राजीव गांधी की 425 और भाजपा की लोक सभा में 2 सीटें थीं, 1989-1991 में राजीव गांधी की लोक सभा में 190 सीटें थीं । 1992 में म.प्र. में मुख्यमंत्री पटवा 6 माह पहले ही चुनाव करवा बैठे थे। और अचानक दिग्विजय सिंह आ गये थे। ठीक उसी तरह 2003 में अटल बिहारी 6 माह पूर्व शाइनिंग इंडिया के नाम पर उतर गये और सोनिया गांधी आयीं, जिनका सब मजाक उड़ा रहे थे। 2014 में नरेन्द्र मोदी के वैभव में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल 70 में से 67 सीट लाये थे। देश की जनता के विवेक पर भरोसा रखिए। जनता ने हमेशा ठीक फैसला लिया है। अब अकल किसी के पास गिरवी नहीं है। हमारे देश के लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि मैं गलत हो सकता हूँ, लेकिन चयन सही का करूँगा। हमारा संविधान भी गलत (सजायाफ्ता) को चुनाव लड़ने से रोकता है, वोट डालने से नहीं। जिंदादिल कौम पाँच साल इंतजार नहीं करती, यह अब धीरे-धीरे चरितार्थ होता जा रहा है। इस बार एक अंतर अवश्य है, जिन्होंने कांग्रेस से नाराज हो कर, मोदी से मोहब्बत की है, उन्हें मोदी से नाराजगी करने में और कांग्रेस से मोहब्बत करने में बड़ी दिक्कत हो रही है। इधर कुआं उधर खाई दिख रही है। लेकिन यदि ऐसा ही चलता रहा और खौफ-सन्नाटा बढ़ता रहा तो नाराजगी मोहब्बत में और मोहब्बत नाराजगी में बदल जायेगी। देश 1977 की दिशा में जायेगा। कम या अधिक, यह भविष्य के गर्भ में है।