जुलाई 2017

कहने को अन्नदाता

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

इंदौर शहर का मल्हारगंज स्थित टोरी कॉर्नर बन रही स्मार्ट सिटी का हिस्सा है, हाल ही में यहाँ बगैर मुआवजा दिए लोगों के आशियाने तोड़े गए हैं। गाँव से आई महिलाएँ पुलिस, दरोगा को मुआवजा देकर यहीं पर चूसने वाले आम की छकड़ी लेकर बैठी हैं। मैं उनसे आम लेता हूँ, सब मिलाकर एक के पास साढ़े चार किलो, दूसरी के पास ढाई किलो आम निकलते हैं, दाम साठ रुपए किलो हैं। सभी का मूल्य चार सौ बीस रुपए होता है। एक का दो सौ सत्तर रुपए, दूसरी का एक सौ पचास रुपए बनता है। महिलाएँ यह गुणा-भाग नहीं जानतीं। वो मुझसे कहती हैं बाबूजी म्हारे समझ नी पड़े आप बता दो, मैं समझाता हूँ, लेकिन समझ ना पातीं, फिर कहती हैं आप ही बाँट दो। आजादी के सत्तर बरस बाद गाँव से आकर आम बेचने वाली महिला के लिए शहर में कोई जगह तय नहीं है। उसे आज भी गुणा-भाग नहीं आता है। पुलिस, नगर निगम के रहमो-करम पर जीवन यापन करना पड़ता है। यह स्थिति शहर से लगे हुए गाँव की है। दूर की तो हम कल्पना कर ही सकते हैं। आम ले कर मैं रास्ते में गौराकुंड पर अपने एक नजदीकी के यहाँ चाय पीने रुक जाता हूँ, उनसे किसान आन्दोलन की बात करता हूँ और आम की बात बताता हूँ वे एक नई बात बताते हैं। उनका बच्चा स्कूल में ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ रहा, 93% मार्क्स लाया है, लेकिन शिक्षक कुछ नाराज हैं, शिक्षक कह रहे थे बादल काले होते हैं, वो बोला नहीं सर बादल तो सुनहरे होते हैं, शिक्षक काले और वो सुनहरे पर अड़ गये। अंत में उसने शिक्षक से कहा सर यह आपको, मेरे को और यहाँ सबको काले बादल दिख रहे है। लेकिन खेत में पानी की आशा में, आकाश में किसान को सुनहरे दिख रहे हैं। यह अपवाद है...काश कि देश के सब बच्चे ऐसा सोच और समझ सकते। शिक्षा की शुरुआत में बच्चों को सबसे पहले अक्षर ज्ञान कराया जाता है। उसे ‘ग’ गणेश का, ‘क’ कमल का, ‘ख’ खरगोश का अक्षर और चित्र के माध्यहम से सिखाया जाता है, आजकल यह सब अंग्रेजी में भी सिखाया जा रहा है। शहरों में पली-बढ़ी और पढ़ रही पीढ़ी अपनी संस्कृति, इतिहास और भूगोल से अनभिज्ञ है। वो नहीं जानती कि शहर में परिश्रम कर रहे मेहनतकश गाँव में अपना घर-परिवार छोड़कर आए हैं। वह नहीं जानती की गाँव से शहर आकर घागरा-लुगड़ी में, धोती-कुर्ते, पगड़ी, लुंगी, पजामें-कमीज, टोपी में मजदूरी करने वालों की वेशभूषा, भाषा बीते हुए कल के, उसके नाना-नानी, दादा-दादी का प्रतिबिम्ब है। यदि बच्चों को ‘ग’ गाँव का, ‘ख’ खेत का, ‘क’ किसान का पढ़ाया जाता और उसकी असलियत को समझाया जाता तो आज गाँव-किसान की यह दुखद स्थितियाँ नहीं होती। बिछौना धरती को करके अरे आकाश ओढ़ ले... यह गाना किसान की जिन्दगानी है, जिस धूप में हम झुलसते हैं, ठंड में ठिठुरते हैं, और बरसात में गीले होने से डरते हैं, किसान, उसके खेत इन सबके लिए तरसते हैं। प्रकृति उसका यौवन है, सूरज, चांद, सितारे उसकी असली रोशनी हैं। पेड़ पौधे, फल-फूल, फसल उसका असली श्रृंगार है। हमारे लिए ये सब बेगाने हो गए हैं। हम इन्हें भूल चुके है अलविदा कह चुके हैं। अखबारों में देख लेते है पुस्तकों में पढ़ लेते है। सांप, बिच्छु, टिड्डी, चुहें, सूअर आदि जंगली जानवर किसान को जंगल और खेत में काटते है, फसल को चट कर जाते है। सूखा और बाढ़ आज भी उसके खेत को सुखाते हैं, डुबाते हैं, रुलाते हैं। शहर में जिम और क्लब बढ़ रहे हैं, जहां पसीना बहता है, सुबह पैदल सैर करने वालों की तादाद बढ़ रही है। यह सब अच्छा है, इससे जीवन बेहतर हो रहा है, जिंदगी बढ़ रही है। लेकिन किसान खेत तक पैदल चलकर जाता है, खेत में पसीना बहाता है, जिससे रोटी खाता है, उसके पास खेती के अलावा और धंधा नहीं है। उसकी फसल सूख जाए या डूब जाए तो उसकी खुद की रोटी के भी लाले हैं। वो कहलाता अन्नदाता है, लेकिन स्वयं हमेशा दुर्भिक्ष, अकाल, कुपोषण का शिकार हो मरता आया है। विपरीत हालातों में वो कर्ज के बोझ तले दब जाता है। बैंक और साहूकार उसे तड़पाते हैं। विवश हो वो आत्महत्या करता है, लेकिन इस बार वो मरने के बजाय लड़ना पसंद करता है और आन्दोलन करता है। बगैर किसी राजनीतिक दल और नेता के शुरू हुआ आन्दोलन तीव्र गति पकड़ लेता है। सरकार को समझ में नहीं आता कि यह अचानक क्या हो गया। मध्य प्रदेश में शिवराज सरकार आंदोलन को तोड़ने का षड्यंत्र कर समझौते की झूठी घोषणा करती है। किसान उत्तेजित होता है। आंदोलन तीव्र होता है और किसान को मुआवजे में गोली मिलती है। सरकार मरने वालों को असामाजिक तत्व घोषित करती है फिर सरकार कांग्रेस के दामन में अपना चेहरा छिपाकर आरोप लगाती है कि कांग्रेस भड़का रही है। इस बार चेहरा छुप नहीं पाता है। डरकर मुख्यमंत्री एक करोड़ रुपया प्रति मौत देने की घोषणा करते हैं, जिसके निहितार्थ सब समझते हैं। हमारी सेना में नेता, उद्योगपति, व्यापारी, अधिकारी, मीडिया या अन्य किसी वर्ग से नहीं, वरन् गाँव से अधिसंख्य जवान जाते हैं। जो लोग सेना और शहीद की रात-दिन दुहाई देते हैं। काश वो समझ पाते कि शहीद ही किसान है और किसान का बेटा ही शहीद है। आज के नीरो आठ नवम्बर की रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1000 और 500 के नोट बंद कर देश को खिलजी की राह पर छोड़ दिया था। खिलजी वंश के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने बगैर सोचे-समझे उद्दंडता से बाजार नियंत्रण नीति कठोरता से लागू की थी। कोई कम तौलता था तो उसका उतना ही मांस काट लेते थे। इससे देश की आर्थिक स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। आज देश के हालात कमोवेश वैसे ही हैं। नोट बंदी से किसान की फसल खेत से उठ न सकी। नया बीज वो बो न सका, देश में आवागमन ढप था। ट्रक के पहिए जाम थे, इसने उद्योगों के उत्पादन, व्यापारी के व्यापार की,बिल्डरों के बिल्डिंग बनाने की रफ्तार को तोड़ दिया, नोट बंदी की भयावहता का अंदाज सिर्फ इससे लगा सकते हैं कि आज सिर्फ भवन उद्योग में 15 लाख मजदूरों का रोजगार छिन गया है, इसी तरह निजी कर्मचारियों की एक बहुत बड़ी तादाद की दफ्तर से छँटनी हो गई है। मोदी ने 2 करोड़ नौकरी प्रतिवर्ष देने का वादा किया था, हुआ उलटा। नई नौकरियाँ तो सृजित हो ना सकीं, पुरानी और चली गई हैं। आज देश में 30 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं, उद्योग, व्यापार, मजदूर, किसान सब कर्ज मंदी और बेरोजगारी की चक्की में पिस रहे हैं। उत्तर प्रदेश का चुनाव परिणाम अखिलेश मुलायम के फूहड़ प्रहसन का समापन था, प्रधानमंत्री ने इसे अपनी नोट बंदी की सफल फिल्म बता दिया। पंजाब की फ्लॉप फिल्म को वे भूल गए। प्रधानमंत्री की विश्व परिक्रमा तब भी जारी थी, जो आज भी जारी है। भारत सरकार अपने नोट पर लिखती है कि मैं धारक को... अदा करने का वचन देता हूँ। भारत सरकार वचन भंग की दोषी है। उसने धारक का विश्वास तोड़ा है। उसने धारक के तो घर के अन्दर तक का, बूढ़े पिता का, माँ, बहन, बेटी के पास रखे गुप्त खजाने का, जो उसके सुख-दु:ख का साथी था,हिसाब ले लिया। सबको चोर भी कह लिया। लेकिन वो खुद आज तक बता न सकी कि उसके खजाने में कितनी राशि आई है। यदि राशि बताई तो पकड़ा जाएंगे। जनता पूछेगी कि पाकिस्तान से कितनी मुद्रा पकड़ाई? मायावती, मुलायम के घर में कितने हजार-पाँच सौ के नोट दबे रह गए? कितना कालाधन पकड़ में आया? नए नोट छापने में तीस हजार करोड़ रुपए क्यों लगाए? तीन महीने तक देश को खून के आंसू क्यों रुलाया ? आंसू अब सूख गए हैं। औद्योगिक उत्पादन की वृद्धी दर घट कर अप्रैल में 3.1 प्रतिशत रह गई। इसके पहले यह 2.6 प्रतिशत बताई गई थी। इस गिरावट का आकलन करने के लिए गत वर्ष के नतीजे देखना जरूरी है। गत वर्ष अप्रैल में औद्योगिक उत्पादन की दर 6.5 प्रतिशत थी। इस के मूल में खनन, बिजली और मैन्युफैक्चरिंग का कमजोर होना है। खनन का नतीजा अप्रैल में 4.2 प्रतिशत रहा। जो एक साल पहले 6.7 प्रतिशत था। सबसे ज्यादा गिरावट बिजली उत्पादन में हुई। यह पिछले वर्ष 14.4 प्रतिशत थी, जो इस वर्ष गिरकर 5.4 प्रतिशत पर आ गई। खेती के बाद निर्माण और उत्पादन रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है। नोट बंदी ने सरकार द्वारा इस दिशा में चलाए जा रहे मेक इन इंडिया, र्स्टारअप इंडिया, स्किल इंडिया को भी असफलता के गर्त में पहुँचा दिया है। सरकार ने लागत मूल्य और उस पर 50% लाभांश देने की घोषणा की थी, वो मिल न सका। भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार सुब्रह्मण्यम द्वारा सुझाए गए लागत मूल्य तो ठीक, उससे 10 से 20% कम पर देश के कुल अनाज में से सिर्फ 40% अनाजों की ही खरीदी की जा सकी। किसान का कर्ज और बढ़ गया। उसे लाभ की जगह लागत में ही 20 % का नुकसान था। अर्थात वो पुराने कर्जे से तो उबर न सका था। और यह नया बोझ उस पर लद गया। बाकी अनाज खरीदा न गया। ये तो सरकार की खरीदी की लिस्ट में थे, जो लिस्ट में नहीं थे, उनकी स्थिति क्या रही होगी ? इसका अंदाज इससे लगा सकते हैं कि इन्दौर के पीपल्याहाना चौराहे पर किसान 50 किलो आलू की बोरी 100 रुपए में दे रहा था। और कोई नहीं ले रहा था। किसान को अपनी सब्जी, फल और खाद्य का जितना दाम मिलता है, उससे 5-10 और 50 गुना पर भी हमने बिकते देखा है। लेकिन इसका लाभ किसान को नहीं मिल सका है। हमारे देश में हर उत्पादन का दाम उसका उत्पादक तय करता है। एक किसान ही है, जिसका भाव मंडी, बाजार और सरकार तय करती है। मध्य प्रदेश के मुख्यदमंत्री शिवराजसिंह चौहान कभी परिवार और अपने चहेते उद्योगपतियों, अफसरों सहित प्रदेश के विकास की खोज में जाते रहते हैं। इस बार सरकार के खर्च पर प्रदेश का प्रशासन ठप कर डेढ़ माह नर्मदा परिक्रमा करने लग गए। जब किसानों पर गोली चली, उस समय देश के कृषि मंत्री राधारमण रामदेव के योग के साथ स्वयं नृत्य कर रहे थे। कुछ लोगों को सिर्फ राहुल गांधी का विदेश जाना दिखता है, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री का नहीं दिखता, यह एक आँख से देखना ही ऐसा दृष्टिदोष है, जो सत्ता को सही की जगह गलत मार्ग पर ले जा रहा है। कभी हमने किसानों की आत्महत्या के दौर में रविवार में लिखा था कि जब रोम जल रहा था, तब नीरो बंसी बजा रहा था। इतना तो सब जानते हैं, लेकिन उसके बाद की कहानी नहीं जानते। नीरो के बगीचे में पार्टी चल रही थी, उसमें रोम के मंत्री, अधिकारी, सेठ, साहूकार, बुद्धिजीवी पत्रकार मौजूद थे। उस जमाने में बिजली तो थी नहीं, इसलिए लकड़ी में आग लगाकर रोशनी हो रही थी, लकड़ी कम पड़ने पर वहां के मजदूर-किसान को लकड़ी की जगह आग में डालकर रोशनी की जा रही थी। पी. सांई नाथ ने इस पर डाक्युमेंट्री बनाई है। वे प्रश्न करते हैं कि नीरो तो था ही ऐसा लेकिन बाकी के लोग क्या कर रहे थे। मध्य प्रदेश में छह किसानों को मारने के बाद, मुख्य मंत्री शिवराजसिंह ने उपवास कर प्रायश्चित करने का नया विधान रचा। बैठने के लिए एयरकंडीशन युक्त डोम बनवाया। उसमें किसानों के लिए जीने और मरने की सौगंध खाने लगे। उन्होंने मृत किसानों में से एक के परिवार में जोड़तोड़ कर किसी को बुलवाया। भारतीय क्या, दुनिया की किसी और संस्कृति में मरने वाले के घर जाने की परंपरा है। उनमें इतना नैतिक बल भी नहीं था कि वे मृत किसानों के घर जाकर अपनी गलती का कुछ प्रायश्चित तो कर आते। वे प. बंगाल में ममता बेनर्जी के जनता के बीच जाने से भी कुछ नहीं सीख सके। वे डेढ़ माह तक सरकारी नर्मदा परिक्रमा के बजाय किसानों के बीच जाकर उनका असली दु:ख-दर्द समझते और उसे दूर करने की कोशिश करते तो आज अच्छे दिन की जगह यह बुरे दिन नहीं आते। अब वे घबराहट में हैं, जिसे उनके चेहरे पर पढ़ सकते हैं, यह कुर्सी की कितनी और जनता के दर्द की कितनी है, उसे सब समझते हैं। उपवास स्थल पर मुख्यमंत्री कार्यालय शुरू हो गया था। न मालूम क्या हुआ, शायद दिल्ली वालों ने समझाया कि सरकार भी तुम, गुनाहगार भी तुम और उपवास भी तुम तो जनता क्या करेगी। वो प्रदेश भर में उपवास पर बैठ जाएगी। कांग्रेस की दुकान प्रदेश भर में मुफ्त में खुल जाएगी। शाम को घोषणा हो गई कल सुबह साढ़े ग्यारह बजे वे उपवास तोड़ेंगे। सुबह उन्होंने डम्पर, चक्का, व्यापमं और रेत से बने चांदी के गिलास में जूस पीकर उपवास तोड़ दिया। आज देशभर में एक डर-आशंका का वातावरण है। सरकार गर्व में चूर है। देश के सब चैनल ईमानदार है। सिर्फ एनडीटीवी ही बेईमान हैं, उस पर सीबीआई की मार है। सरकार और उनके भक्त पारसमणि हैं। वे जिसे छू लें, जो उन्हें छू ले, वो खरा सोना बन जाता है। जो मोदी और भक्त की हाँ में हाँ मिलाए वो देश भक्त है, ना वाला गद्दार है। हाँ वाले के लिए देश है, ना वाले के लिए पाकिस्तान है। हाँ वाला शहीद है, ना वाला असामाजिक तत्व है। जो प्रश्न करेगा, उस पर प्रतिप्रश्न है। जो हाँ करेगा, उसके लिए सत्ता की छाँव घनेरी है। जो ना करेगा उसे धूप में जलना होगा। कभी दौर था कि रैदास ने अपने प्रभु की भक्ति में कहा था : प्रभु जी तुम चंदन हम पानी। अब दौर है भक्त कह रहे हैं : प्रभु जी तुम मक्खन, हम दूध-दही, देश है हमारी रोटी-चपाती।