जून 2017

स्मार्ट सिटी के पहले

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

किसी भी मुल्क की प्रगति को मापने का एक पैमाना रोटी-कपड़ा-मकान है। रोटी आधी रूखी-सूखी खा कर, कपड़े से आधा तन ढँक कर इनसान जिन्दगी गुजार लेता है, लेकिन जीने के लिए एक घर चाहिए होता है, जिसकी तलाश में वह पूरी जिंदगी गुजार देता है, फिर भी उसे घर नसीब नहीं होता है। अमूमन एक आदमी पूरी जिन्दगी में यदि बना पाता है तो एक ही मकान बना पाता है। आजकल विकास के बढ़ते कदमों ने बढ़ते शहरों में बनते बँगलों, फ्लैट्स और कॉलोनियों ने करोड़ों लोगों के घर के सपने पूरे किये हैं, इसके बावजूद करोड़ों लोग आज भी घर की तलाश में हैं। मानव की विकास यात्रा शुरू होते ही घर वजूद में आ गया। सब से पहले आवासीय बसाहट नदी किनारे शुरू हुई। दिल्ली,इलाहाबाद, बनारस, हरिद्वार, पटना, नासिक, उज्जैन हजारों वर्ष पुराने हैं, ये नदी किनारे हैं। नल-बिजली थे नहीं, इनसान पानी के लिए नदी और रोशनी के लिए चाँद-सूरज पर अवलम्बित था। पानी की यात्रा नदी से कुएँ, बावड़ी तक और रोशनी चकमक पत्थर से आग तक पहुँची। हजारों साल तक दुनिया ऐसे ही चली। झोपड़ी में शुरू हो कर राजमहल तक पहुँची। पत्थर, चूना, लकड़ी से निर्मित पक्के निर्माण भी प्रचलन में रहे, लेकिन वे अधिकांशतः मंदिर, मस्जिद और राजमहल की शक्ल में रहे। कुछ भव्य घर सेठ,साहूकार और मंत्री-दरबारी को भी उपलब्ध रहे। अधिकांश जनता का नीचे धरती, ऊपर आसमान या झोपड़ी, कच्चे घरों में ही आशियाना था। सीमेन्ट, लोहे का प्रवेश पिछले सौ बरस की घटना है। वरना सदियों से इनसान घर का सपना देखते-देखते ही दुनिया से रुखसत होता रहा है। यह कड़वी हकीकत है, जो आजादी के सत्तर वर्ष बाद भी देश के बहुत बड़े तबके के सामने सिर उठाये खड़ी है। पिछले सौ वर्षों में दुनिया में विज्ञान ने क्रान्ति ला दी है, जिसका लाभ यूरोप, अमेरिका आदि कई विकसित देशों ने लिया है। वहाँ आवास, व्यवसाय, उद्योग, हरित, मनोरंजन, खेल-कूद से ले कर मार्ग आदि पर समूची तकनीक लागू की गयी है। धूप, हवा,पानी को केन्द्र में रख कर विकास योजना का क्रियान्वयन किया गया है। पुराना यूरोप भी पहले भारत जैसा ही था। उस युग में कार, बस आदि नहीं थे। इसलिए वहाँ के पुराने शहरों लंदन, पेरिस, रोम, सेंट पिट्सबर्ग, कैम्ब्रिज आदि में गलियाँ सँकरी हैं। हममें और उनमें फर्क यह है कि वे गंदगी को जानते भी नहीं हैं। वहाँ सैकड़ों वर्षों में भी गलियों में कोई एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा है। हम आधुनिक बने, विज्ञान से जुड़े हैं, लेकिन आज गाँव हो या शहर, उन में बसी गंदी बस्तियाँ, झुग्गी-झोपड़ी, कॉलोनियाँ, बँगले, मल्टी-मॉल सभी बरसात के पानी में डूब रहे हैं। पानी के निकास के सब रास्ते बंद कर दिये गये हैं। गाँवों और शहरों में विकास की विकृत कहानी लिखी जा रही है। आज गाँवों में पुराने घास-फूस, लकड़ी, कवेलू, टीन-चद्दर के घर पक्के निर्मार्णों में तब्दील हो रहे हैं। शहरों में नई कॉलोनियाँ, मॉल-मल्टी बन रहे हैं। ये कहीं बाहरी क्षेत्र में, तो कहीं पुराने शहर की चाल, बाड़ों आदि में बन रहे हैं। निर्माण गाँवों में हो या शहर में, अधिकांश गलत है। धूप, हवा, रोशनी का कोई तालमेल नहीं है। प्रगति के साथ जो उत्पादन बढ़ा, उसने प्लास्टिक आदि से बनी चीजों का अम्बार लगा दिया है। कहीं भी नजर घुमायें, गंदगी के ढेर दिखते हैं, उन्हें खाते हुए पशु दिखते हैं। यह बढ़ती गंदगी मच्छरों, कीटाणुओं को जन्म देती है। गटरों और ड्रेनेज लाइन पर दुकान-मकान आदि बने हुए हैं। नीचे गंदा पानी मल के साथ जमा रहता है, जिसकी बदबू हवा में घुली रहती है। जब बरसात आती है, तो पानी के बहाव से ड्रेनेज का मल पानी में मिलता है, पूरा देश मलेरिया, चिकनगुनिया, डेंगू, स्वाइन फ्लू, किडनी, लीवर, कैंसर आदि बीमारियों की गिरफ्त में आता है। उल्टी, दस्त, बुखार, कंजेक्टिवाइटिस, पीलिया आदि होता रहता है, सब को इसकी आदत पड़ गई है, इन्हें बीमारी में नहीं गिनते हैं। बरसात के बाद गली -मोहल्लों में डॉक्टरों के यहाँ से अस्पतालों तक लम्बी कतारें इसे बयान करती हैं। आज अंधी दौड़ है। लोग एक-दूसरे को धक्का दे कर आगे बढ़ रहे हैं। किसलिए? नहीं मालूम। इसने इनसान से इनसान को दूर कर दिया है। प्रेम का मूल भाव गायब है। जितनी महँगी कॉलोनी, बँगला, कोठी, आप उतने बड़े आदमी हैं। जाति के आधार पर भी कॉलोनियाँ बन गयी हैं, जिसने सामाजिक सौहार्द और भाईचारे का कबाड़ा कर दिया है। पहले मोहल्ले थे, जिनमें चाल, बाड़े आदि थे, एक-एक चाल-बाड़े में पचासों परिवार रहते थे। हमारे देश की बसाहट ही ऐसी थी कि उसमें अमीर-गरीब, छोटी-बड़ी जाति वाले गाँव हो या शहर, सभी गली-मोहल्ले में पास-पास रहते थे। जीवन पद्धति भी ऐसी थी कि सभी एक-दूसरे पर अवलम्बित थे। सुख-दुख बाँटते थे। छोटे-बड़े व्यक्ति की शिक्षा-चिकित्सा की एक जैसी व्यवस्था थी। सिर्फ राजा और उसके बाद अंग्रेजों के लिए कुछ व्यवस्थाएँ अवश्य अलग थीं। हाँ, एक बहुत बड़ा पाप भी था, हर गाँव, शहर में दलितों को बहुत दूर कोने में बसाया गया था, जहाँ से उनकी हवा या छाया भी नहीं पहुँच सके। वह छाया ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर आज भी किसी के पास नहीं है। स्मार्ट सिटी के बाद हमारे देश ने आजादी के बाद अधूरी प्रगति की है, उस अधूरे विकास की सूरत से मुँह चुरा कर मोदी सरकार शॉर्टकट पकड़ रही है। इंदौर शहर का एक पुराना हिस्सा प्रधानमंत्री मोदी की स्मार्ट सिटी बन रहा है। शहर की तंग-बंद सड़कें, जो बीते हुए कल में हर दिन सिकुड़ती थीं, अब स्मार्ट सिटी में आने पर चौड़ी की जा रही हैं। जिन सड़कों पर घर-दुकान तो ठीक, ओटले भी हटाना नामुमकिन था, वे अब सीरिया के युद्ध के बाद के विध्वंस का नजारा दिखा रही हैं। उड़ती धूल के गुबार में अपने टूटे आशियाने के साथ टूटने वाला लुटा-पिटा खड़ा है। वह अपने ही शहर में बेगाना हो गया है। इंदौर आवारा पशुओं के अतिक्रमण से मुक्त हो रहा है। इंदौर स्वच्छता की रेटिंग में देश भर में नम्बर वन आया है। शहर बरसों से गंदगी के ढेर पर मच्छरों के बीच जिन्दगी जीते हुए साँसें ले रहा था। अब उसकी साँसें फौरी तौर पर चलने लग गयी हैं। यह सतही है, लेकिन इसकी भी किसी ने कल्पना नहीं की थी। इसलिए यह अँधियारे में उजाले की किरण है, जिसे सब सूरज समझ रहे हैं। पूरा शहर अभिभूत है, बधाइयाँ दे रहा है, लेकिन एक तिरानवे वर्ष के नौजवान हैं, जिनका नाम आनन्द मोहन माथुर है। वे वकील है, वे भी बधाई देने के लिए फोन उठाते हैं और वापस रख देते हैं। उन्हें बधाई में मानवीय पक्ष की नजरअंदाजी तकलीफ दे रही है। वे लोकतंत्र, मानवीय गरिमा और नागरिक के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं। इस सब में विकास और मानवीयता की जो टकराहट है, वह आसानी से दूर हो सकती थी। यह एक बहुत अच्छी मंजिल थी,जिसे बहुत ही गलत तरीके से अंजाम तक पहुँचाया जा रहा है। जब तोड़ने की तैयारी पूर्व से थी, ठेकेदारों के लिए टेंडर निकालने की भी जल्दी थी, लेकिन जो टूटने वाले हैं, उनके नुकसान के आकलन का, टूटते ही वह कहाँ रहेगा, कहाँ दुकान खोलेगा, इसका विकास के पुरोधाओं को खयाल तक नहीं था। क्या सर्वे करा कर उसके नुकसान का आकलन कर मुआवजा नहीं दिया जा सकता था? यदि कोई कानून नहीं था, तो क्या बनाया नहीं जा सकता था? अब मुआवजे के नाम पर टीडीआर की बात की जा रही है। गली के नेता को पार्षद, पार्षद को विधायक, विधायक को मंत्री, मंत्री को मुख्यमंत्री और सांसद, जो लोकसभा अध्यक्ष हैं, को राष्ट्रपति बनने की चिंता है। प्रतिपक्ष में कांग्रेस है, जो सो रही है, वह सत्ता के खुमार से बाहर नहीं आ पा रही है। स्मार्ट सिटी पर दो हजार करोड़ से अधिक का खर्चा है। यह शहर की एक से डेढ़ लाख जनता को कवर करेगी। देश भर में सौ स्मार्ट सिटी बनना है। मतलब 125 करोड़ के देश में एक से डेढ़ करोड़ लोग स्मार्ट और बाकी के गवांर। स्मार्ट सिटी में ड्रेनेज लाइन, वाटर लाइन और अंडर ग्राउण्ड बिजली डलना है। यह सब पूरा होने में कम से कम 5 वर्ष लगेंगे। बाकी के शहर को ये सौगात नहीं मिलेगी। क्या यह संभव नहीं था कि पूरे शहर को स्मार्ट बनाया जाता। चरणबद्ध तरीके से सड़क उसके बाद ड्रेनेज और फिर बिजली लाकर अगले 5-10-15 वर्षों में एक सुनियोजित शहर बनाया जाता। स्मार्ट सिटी से मेट्रो ट्रेन शहर में चलायी जाने वाली है। इंदौर से 25 किमी दूर हातोद के पास के गाँव से बरसात में चार माह आवागमन बंद रहता है, क्योंकि तालाब पर पुल नहीं है। यही स्थिति आसपास धार-झाबुआ आदि कितनी ही जगहों पर मौजूद है। हम कितनी ही मेट्रो ट्रेन चला लें, वे दिखती बहुत खूबसूरत हैं, लेकिन विदेशों में जहाँ-जहाँ भी वे चल रही हैं, वहाँ सब से पहले दूरस्थ गाँव तक आवागमन के सभी साधन पहुँचाए गये हैं। लंदन में पाँच मंजिल अंडरग्राउंड ट्रेन चले 100 वर्ष से ऊपर हो गये,लेकिन पूरे इंग्लैंड में कहीं भी हमारे देश जैसी असमान स्थिति नहीं है। हम मुम्बई से अहमदाबाद बुलेट ट्रेन चला रहे हैं, जो 80,000 करोड़ की है। बनते-बनते लाखों करोड़ में तब्दील हो जायेगी। जबकि झारखंड, झाबुआ, बस्तर सहित पूर्वोत्तर भारत के कई राज्य आज भी ट्रेन से दूर हैं। गाँव उजड़ रहे हैं, किसान मर रहे हैं,गाँव में कोई शहरी अपनी बेटी नहीं देता है। शहर पर आबादी का, यातायात का दबाव बढ़ रहा है। सभी बनने वाले पुल और चौड़ी सड़कें कल फिर टूटने वाली हैं। हम विदेशों से सेवन स्टार विकास के मॉडल ला रहे है, क्योंकि उसमें हमारे स्वार्थ छुपे हुए हैं। हमें पब्लिक ट्रांसपोर्ट और मार्ग को पहली प्राथमिकता बनाना होगा। किसी भी देश की जिंदगी में मार्ग का वही स्थान है, जो मानव शरीर में दिल का है; यदि दिल में रक्त धमनियाँ चोक होंगी, तो ब्लड प्रेशर, पेरालिसिस, किडनी से लेकर हार्ट अटैक के साथ कई बीमारियाँ आयेंगी या जिंदगी जायेगी। किसी भी देश के विकास में मार्ग वहीं रोल अदा करते हैं, जो शरीर में ह्रदय करता है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कभी कहा था : अमेरिका के मार्ग दुनिया में सब से अच्छे हैं। वे इसलिए अच्छे नहीं हैं कि अमेरिका धनवान है,वरन अमेरिका इसलिए धनवान है, क्योंकि वहाँ के मार्ग सब से अच्छे हैं। इंदौर शहर में बीआरटीएस के नाम पर पिछले 12 वर्ष से आठ लेन वाली सड़क बन रही है। वह आज भी अधूरी है। मुख्यमंत्री वही शिवराजसिंह चौहान हैं। सड़क में तीन बाधाएँ मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा आज भी मौजूद हैं। जबकि स्मार्ट सिटी क्षेत्र में सैकड़ों धर्मस्थलों को अन्यत्र स्थानांतरित करने की तैयारी पूरी है। बीआरटीएस सड़क पर बँगलों की बाउण्ड्री वॉल है, उन्हें तोड़ कर सड़क चौड़ी नहीं कर सकते। इसके विपरीत स्मार्ट सिटी क्षेत्र में सौ-सौ साल पुराने मकान जमींदो़ज कर दिये गये। यह सिर्फ इसलिए संभव हो सका, क्योंकि स्मार्ट सिटी नरेन्द्र मोदी की है। मुख्यमंत्री ने यहाँ सड़क का मुहूर्त किया। उन्हें मोदी को खुश करना था। नाखुशी का मतलब कुर्सी जाना होता है। यह सब निगमायुक्त मनीष सिंह के संकल्प का नतीजा है, जिनका नेतृत्व महापौर मालिनी गौड़ कर रही हैं। निगमायुक्त एक स्कूल में बच्चों के बीच अतिथि के बतौर गये, तो प्रश्नोत्तर के बीच एक बच्चे ने पूछ लिया कि क्या वे अपने बच्चों से मिल पाते हैं। तो वे भावुक हो गये, कारण वे आधी रात तक कर्म के साथ संघर्ष करते हैं। उनके इस हौसले से लोकतंत्र और न्याय की कई बार अवहेलना भी होती है। लेकिन बच्चों के लिए यह भावुकता बताती है कि मानवीय पक्ष हर कहीं जिंदा है। हजारों साल की गुलामी ने देश के तन-मन को बीमार बना दिया है। वह हमसे बार-बार गलतियाँ करवाती रहती है। हमारे संविधान की आत्मा है कि निन्यानवे गुनाहगार बच जाएँ, लेकिन एक बेगुनाह को सजा न मिले। हो इसका उलटा रहा है। इसे इस तरह समझ लें कि 'चला बेदिल हवा का झोंका तो घर उजड़ा किसी का, मैं समझा ठंडी हवा आयी, जब आया वो झोंका मुझ पर, तब समझ में आया किसने कैसे जान गँवायी।' राजस्थानस्थित सालासर बालाजी के मंदिर प्रांगण में भक्तों द्वारा लगायी गयी सैकड़ों तस्वीरें हैं। धीरे-धीरे इन तस्वीरों की चाँदी की फ्रेम सोने में बदल रही है। बाहर झाड़ू लगाती महिला मुझसे पैसे माँगती है, मुझे बुरा लगता है। वह फिर गुजारिश करती है। मैं पूछता हूँ : क्या तुम्हें यहाँ से तनख्वाह नहीं मिलती है? इसका उत्तर महिला से आता है : बाबूजी, उससे क्या होये। पूछा, कितने मिलते हैं, उत्तर, यही 600 से 800 रुपये, प्रति माह, सुबह-दोपहर, शाम-रात चार बार कचरा निकाल देती हूँ। मुझे समझ नहीं पड़ता है। इतना बड़ा धार्मिक स्थल और एक महिला की यह स्थिति। मैं पूछता हूँ : तुम्हारा नाम क्या है? वह अपना नाम मेहतरानी बताती है। मैं कहता हूँ, नाम..., वह कहती है, मेहतरानी। मैं पुन: पूछता हूँ : तुम्हारे माता-पिता किस नाम से बुलाते थे : वह कहती है, मैंने उन्हें देखा नहीं। मैं कहता हूँ : भाई-बहन, परिवार? उत्तर : कोई नहीं, सब मुझे मेहतरानी ही कहते हैं। मैं फिर पूछता हूँ, उत्तर फिर वही : मेहतरानी। बाबूजी, मैंने बचपन से ही मेहतरानी ही सुना है, सारे गाँव म्हारे मेहतरानी ही केवे है। उसकी उम्र 55 से 60 के बीच रही होगी, वह बुढ़िया है। मेरी उम्र 60 से ऊपर है, पत्नी 55 की है, हम बढ़िया हैं, स्मार्ट हैं। वह झुक गयी है,हम सीधे खड़े हैं। उसके दाँत टूट रहे है, झुर्रियाँ हैं, हमारे मजबूत हैं। गरीब को बचपन से सीधे बुढ़ापा आता है, अमीर सदैव जवान रहता है। यही हकीकत है। धार्मिक स्थानों में असंख्य दौलत आ रही है। लोहे की फ्रेम चाँदी-सोने में बदल रही है। बाहर की तस्वीर, उसमें भी एक मेहनतकश की, वह भी गंदगी उठाने वाली की दशा देश की दिशा बयान करती है। स्मार्ट सिटी और अन्य में यही अंतर है।