मई 2017

लालबत्ती : गागर से सागर

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

कांग्रेस अपने नेताओं की अच्छाइयाँ तो ग्रहण कर न सकी और बुराइयाँ आत्मसात करके बैठ गई। आज देश में आजादी के बाद का सबसे विचार शून्य निकम्मा विपक्ष बैठा है।

नरेन्द्र मोदी ने जब देश भर में लाल बत्ती बन्द करने की घोषणा की, ठीक उसी समय सर्वोच्च न्यायालय ने लालकृष्ण आडवाणी आदि पर बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आपराधिक प्रकरण चलाने का निर्णय सुनाया। सबको लगा कि एक नहीं, दो बत्ती बन्द की गई हैं, एक सीधे-सीधे और दूसरी उलटे-उलटे। लेकिन, ऐसा कहना एक राजनैतिक कयास था। लालबत्ती दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और पंजाब में अमरिन्दर सिंह मोदी से पहले हटवा चुके थे। उसके बाद भी केजरीवाल की दिल्ली के एमसीडी चुनाव में हार हो गई। सन 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी की लहर के बाद दिल्ली में केजरीवाल को 70 में से 67 सीटें मिली थीं। यदि केजरीवाल नहीं होते तो मोदी कांग्रेस को हराकर उसी दिन दिल्ली में अपना परचम फहरा देते। केजरीवाल खुदा बन रहे थे, इसलिए दिल्ली के एमसीडी चुनाव मोदी के लिए भी एक संदेशा हैं कि चुनाव जीतने पर खुदा मत बनो। यह देश इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को मोदी से ज्यादा वोट और सीट लाने के बाद हरा चुका है। इंदिरा गांधी ने सन 1971 में देश के 550 राजाओं के प्रीविपर्स समाप्त किए थे। निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। कांग्रेस अपने नेताओं की अच्छाइयाँ तो ग्रहण कर न सकी और बुराइयाँ आत्मसात करके बैठ गई। आज देश मंथ आजादी के बाद का सबसे विचार शून्य निकम्मा विपक्ष बैठा है। सुप्रीम कोर्ट लाल बत्ती बन्द करने के 2013, दिसम्बर में दिशा निर्देश दे चुका था। नरेन्द्र मोदी ने एक बार में देश के 15 हजार से अधिक नेता, न्यायाधीश, अधिकारी एवं अन्य महत्वपूर्ण जो सरकार की कृपा से लाल बत्ती ग्रहण कर राजाओं के अंदाज में रौब गालिब कर जनता को गुलाम और खुद को हुक्ममरान मानते थे, उनकी लालबत्ती बंद कर जनता के नजदीक लाने की कोशिश की है, यह कोशिश अधूरी है। लाल बत्ती हटाना एक क्रांतिकारी विचार है, उस दिशा में एक कदम है, लेकिन उसका क्रियान्वय आमूलचूल परिवर्तन है, जो बहुत कठिन है। इसमें पूरी की पूरी राजनैतिक संस्कृति को ही नहीं, वरन देश को बदलना पड़ता है। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराजिंह चौहान अपने प्रशासकीय अमले और कुछ कारपोरेट को लेकर कई बार सरकारी खर्चे पर यूरोप-अमेरिका की पांच सितारा सैर कर आए हैं। ये अपने प्रदेश के विकास की खोज में जाते हैं। और इनका प्रदेश उस खोज पर शोध कर रहा है कि कहीं तो इनकी विकास यात्रा के पदचिह्न दिखाई दें। मप्र में जनता, उसमें भी महिलाएँ सड़कों पर उतर कर जगह-जगह, सत्याग्रह कर शराब की दुकानें बन्द करवा रही हैं। कहते हैं कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह सब देख रहे हैं। कांग्रेस भी यह सब आराम से देख रही है, वो शराब बन्दी में बिहार में सरकार के साथ है। वहन अपने अन्य राज्यों में शराब बन्दी की घोषणा कर मोदी को रास्ता दिखा सकती है। सन् 1977 में जनता सरकार बनी थी, उसमें आज की भाजपा और जनता दल, समाजवादी दल, राजग आदि की हिस्सेदारी थी। तब इस सरकार ने पद्मश्री आदि उपाधियाँ देना बंद कर दी थीं। ये उपाधियाँ भी सरकार की कृपा दर्शाती थी। बाद में कांग्रेस ने पुन: उपाधियाँ देना शुरू कर दिया। नरेन्द्र मोदी चाहें तो इसे लाल बत्ती बन्द करने जैसी मिसाल बना सकते हैं। मोदी की पार्टी के पास हजारों करोड़ का चंदा है, आयकर एवं अन्य विभागों के अधिकारी देश के उद्योगपति, व्यापारियों के ठिकानों पर छापे मार रहे हैं। उनके घर, ऑफिस के अंदर तक घुसकर चीरफाड़ कर हिसाब ले रहे हैं। लेकिन उनकी पार्टी ‘न खाता न बही जो हम बताएं वो ही सही’, वाले अंदाज में, घुमा-फिरा कर हिसाब दे रही है। आज सभी राजनीतिक दलों का चुनाव में धन पर दखल लगातार बढ़ता जा रहा है। इसमें उनकी पार्टी का दखल शायद सबसे ज्यादा है। वे इसे कम कर चुनावी चंदे का स्पष्ट़ ब्योरा देकर देश के लोकतंत्र को उसके वोट की ताकत को मजबूत कर सकते हैं। उत्तराखंड और गोवा जैसे अवसरवाद और अपने दल में अपराधियों और परिवारवाद को बत्ती देकर लालबत्ती हटाने की कार्यवाही को गति दे सकते हैं। बीफ से मीट की सियासत से ऊपर उठकर बेरोजगारी, महंगाई, चिकित्सा, शिक्षा, पानी, बिजली सड़क उद्योग, व्यापार, मजदूर, किसान और कानून जैसे अहम मुद्दों को अपनी पहली प्राथमिकता बनाकर सुशासन की दिशा में ठोस कदम उठा सकते हैं। लालकृष्ण से लालबत्ती की यात्रा में एक लाल का ख्याल आ रहा है, जिनके लिए नीरज ने कहा था आये थे गागर बनकर सागर बनकर चले गए। लाल बहादुर चले गए। आडवानी की गागर राम मंदिर से सत्ता की यात्रा थी, वो बाबरी विध्वंस में टूट गई। मोदी का लालबत्ती हटाना गागर से सागर... …………………… कश्मीर का दिल मैं सात वर्ष पूर्व कश्मीर गया था। प्रकृति की इस अनुपम धरोहर वरदान, जिसे धरती का स्वर्ग कहा गया है, उसे उसके जनजीवन को, उसकी संस्कृति, इतिहास और भूगोल को, उसके उद्योग-व्यापार और रोजगार को और वहां की राजनीति को एक‍ परिपूर्ण परिपेक्ष्य में नजदीक से देखने-समझने का प्रयास किया था। तब समझ में आया था कि हम कश्मीर को अपना मस्तक मानते हैं और कश्मीर भारत को अपना दिल मानता है, उनकी रोजी-रोटी, जिंदगी पर्यटन पर निर्भर है, कालीन से लेकर शॉल, किशमिश, केसर सब कुछ भारत पर निर्भर करते हैं। पर्यटक नहीं जाएगा तो वे बर्बाद हो जाएंगे। यही कश्मीर का मर्म है इसीलिए पर्यटक ही कश्मीर का दिल हैं। उनके पेट की आग दंगों से बुझती नहीं, वरन बढ़ती है। शांति ही इसका एक मात्र हल है। दंगे कुछ आतंकवादियों की फितरत है। जनता गुस्सा कर सकती है, लेकिन हिंसा उसकी फितरत नहीं हो सकती । यही कारण है कि कश्मीर अनेक थपेड़ों के बाद भी पटरी पर पुन: लौट आता है। आज मेरा सात वर्ष पुराना नजरिया टूट रहा है, कश्मीर समस्याओं में घिर गया है। उसकी समस्या क्या है, हम उसे न तो जानते हैं और न ही समझना चाहते हैं। एक तंग बंद नजरिया है, उसी से सबकुछ देखते-समझते हैं और उससे निकली अधूरी सोच को कश्मीर पर थोपते हैं। आज कश्मीर भारत से दूर हो चुका है। सेना ने इसे पकड़ रखा है। जो कश्मीर एक चिंगारी थी, आज वो आग का दरिया है। झेलम के पानी में जहर घुल गया है। इसका गुनहगार कौन है पाकिस्तान ? कश्मीर ? भारत ? जी नहीं, इसकी गुनहगार है हमारी वही तंग सोच, जो जिंदगी के हर हिस्से में काबिज है और उसने कश्मीर को भी अपने आगोश में ले लिया है। प्यार करने के लिए नहीं, वरन गला घोंटने के लिए। आज कश्मीजर में रूदन है, क्रंदन है, कोलाहल है, कश्मीगर की आंख में आंसू हैं। हमने उन्हें पोंछा नहीं, देखा नहीं उलटे उनकी आंखों में पेलेट गन की गोलियां बरसा कर उन्हें अंधा करने का काम किया है। राष्ट्र में महाराष्ट्रर है, वो राष्ट्र पर भारी है, वो कभी भी गैर मराठी, गैर मुम्बईकर को मुम्बई से निकाल सकता है। उसे गाली बक सकता है। मार सकता है, लेकिन वो देश भक्त है। पंजाब में गैर सिक्ख मुख्यमंत्री नहीं बन सकता है। लेकिन कश्मीर में गैर मुस्लिम मुख्यमंत्री नहीं बने तो मामला देश भक्ति से जुड़ जाता है। हम अफजल गुरु को फांसी देते हैं। इसकी मांग करते हैं, लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंतसिंह के हत्यारों को, इंदिरा और राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी देने की मांग नहीं करते, यही फर्क कश्मीर को भारत से दूर करता है। अफजल गुरु यदि अशोक गुरु होता तो क्या फांसी के लिए आग्रह इतना ही प्रबल होता ! उसे फांसी की सजा सर्वोच्च न्यायालय ने दी थी । उसमें आपका यकीन है, तो फिर बार-बार चिल्लाने की जरूरत क्या थी। आपकी चिल्लाहट ने कश्मीर को यह बतलाया कि आपका सलूक उसके लोगों के साथ और देश के अन्य लोगों के साथ अलग-अलग है, जबकि हकीकत में हमारे देश में यही सोच और सलूक जिंदगी के हर हिस्स में मौजूद है। सन 1984 में दिल्ली में हजारों सिक्खों का कत्लेआम इसी सोच ने किया था। सन् 2002 में गुजरात के साम्प्रदायिक दंगे और 1989 में मंडल के नाम पर आरक्षण के विरोध में जातीय दंगे इसी सोच का हिस्सा थे। सन 2014 में कश्मीर ने पाकिस्तान और आतंकवादियों की चिंता किए बगैर जिंदगी से जोखिम लेकर भारत के संविधान में यकीन करते हुए 65 प्रतिशत से अधिक मतदान करते हुए लोकतंत्र में यकीन किया था। जिसके फलस्वरूप भाजपा ने पीडीपी के साथ सरकार बनाई थी। आज कश्मीर में उपचुनाव में 6.5 प्रतिशत मतदान हो रहा है। कश्मीर के इस यकीन के टूटने के जो दोषी हैं। वो सेना के नाम पर, देशभक्ति के नाम पर उलटे सवाल कर रहे हैं। सेना का किसी भी मुल्क की जिंदगी में उपयोग वो भी अपने ही देशवासियों पर उस मुल्क के रहनुमाओं की नाकामी को दर्शाता है और पतन की गाथा तैयार करता है। आज सेना पर पत्थर फेंके जा रहे हैं। टीवी पर सैनिक की पिटाई दिखाई जा रही है। देशभर में इससे आक्रोश है, लेकिन इसे रोकने की जवाबदारी जिनकी थी, वे आतंकवादियों और उनके ठिकाने को नष्टश नहीं कर पाए। उलटे नाकामी को छुपाने के लिए कश्मीर की जनता को मारने लग गए। मारते-मारते थक गए तो अब शांति की बात कर रहे है। वहां के करोड़ों लोगों का दिल टूट गया है। वे गुस्से में है उसका इजहार करते हैं तो उसका भी दुष्प्रचार किया जा रहा है। मीडिया बहुत ही ज्यादा गैरजिम्मेदारी की भूमिका निभा रहा है। आज कश्मी र में लड़कियाँ सेना के सामने आकर खड़ी हो रही हैं। यह पेलेट गन से हजारों आंखें अंधी करने का नतीजा है। ऐसा कहने वाले को देश द्रोही कहना और कश्मीर की जनता के दु:ख-दर्द की बात करने पर प्रश्न खड़े करना और कश्मीर के छात्रों को देश के कॉलेजों में मारना कश्मीर को और देश को नुकसान पहुँचा रहे हैं। यह देश 130 करोड़ का है। इसमें सभी देश भक्त हैं। जो देशद्रोही का प्रमाण पत्र दे रहे हैं, वे भी देश भक्त हैं। वे देश द्रोह का जो प्रमाण पत्र जारी कर रहे हैं, वो उनकी देश के प्रति चाहत का इजहार है। लेकिन उन्हें समझना होगा कि बाकी के लोग जो कश्मी्र के हक की बात कर रहे हैं, वे और कश्मीरी भी देश भक्त हैं। सबके अपने देश को चाहने के तरीके और विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन आज तक ऐसा कोई बेरोमीटर नहीं बना, जो किसकी कितनी चाहत है, उसे नाप सके। आजादी के बाद से ही कश्मीसर के हिस्से में नाइंसाफी रही। सन् 1951 के पहले शेख अब्दुल्ला ने बेईमानी से अपने चुनाव अधिकारी को नियुक्त कर उनकी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले का पर्चा न किसी तरह से निरस्त करा दिया। नतीजा यह रहा कि 75 में से 2 सीटों पर चुनाव हुआ और बाकी पर शेख अब्दुल्ला निर्विरोध आ गए। उन्हीं शेख अब्दुला को नेहरू गिरफ्तार कर लेते हैं। और बख्शी गुलाम मोहम्मद कश्मीर के नए मुख्यमंत्री बनते हैं। 1957 में बख्शी साहब के सामने 70 में से 35 सीटों पर कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं होता है और उनकी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस 70 में से 68 सीट जीतती है। 1967 में बख्शी दिल्ली की नजरों से उतर जाते हैं। भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाते हैं। उनके विरोधी गुलाम मोहम्मदी सादिक कांग्रेस में आते हैं और 70 में से 61 सीटें उन्हें मिलती हैं। आज संवेदनशील माने जाने वाले अनन्तनाग, पुलवामा, कंगन जैसे अनेक इलाकों में 1977 से पहले किसी को वोट डालने नहीं दिया गया। कश्मीर के इतिहास के यह सबसे स्वच्छ चुनाव थे। मतदान 67.2 प्रतिशत था, 1983 में यह मतदान 73.2 प्रतिशत रहा। कश्मीर में इसके बाद 1980, 1984, 1987 के चुनाव में 75 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया। लेकिन चुनाव में धांधली थी। इसके बाद चुनावों में निष्पक्षता कम होती गई और धांधली बढ़ती गई। साथ में हिंसा का और उग्रवादियों का प्रवेश भी शुरू हो गया। 1989, 1991, 1993, 1998 से लेकर 2008 तक चुनावों में उग्रवादियों के साथ आतंकवादियों की धमक भी दिखने लगी। सब बातों का लब्बोलुआब यह है कि कश्मीर की जनता ने हमेशा भारत के लोकतंत्र में आस्था जताई। और बदले में कश्मीर और भारत के नेताओं ने कश्मीर की सत्ता पाने में अपनी ताकत लगाई। कश्मीर की जनता फुटबॉल बन गई। उसकी स्थिति उस भारतीय नारी की तरह हो गई, जिसे कभी खराब पति और ससुराल मिलने पर उसको पीहर वापस ससुराल भेज देता था और ससुराल के नर्क से मुक्त नहीं कराता था। तभी कहावत बनी थी कि ‘पीहर पापी और सासरा हत्यारा’। सात वर्ष पहले कश्मीर यात्रा के दौरान मैं एक रात झेलम नदी में शिकारे पर रुका था। शिकारे को चलाने वाले, खाना खिलाने वाले खानसामे से जब कश्मीर पर चर्चा हुई तो अगले दिन वो अपने मालिक को बुलाकर लाया। उनसे बहुत सी बातें हुईं। उन्होंने बताया कि ये जो हमारा खानसामा है, इससे पूछिए कि कश्मीर की अशांति को लेकर यह क्या कहता है। खानसामे ने कहा कि यहां का जो सबसे बड़ा उग्रवादी नेता है, जिसके सामने कोई बोल दे तो गोली मार देता है। उसको मैंने कहा कि इस बार यदि तुमने लाल चौक में तकरीर की और पत्थर चल गए तो मैं तुम्हें गोली मार दूंगा। वो नेता मुझे बोला तेरे बोलने का मतलब तू जानता है। मैंने कहा हाँ जानता हूँ, तू गोली मारेगा, मार दे भूखे मरने से गोली खाकर मरना अच्छा है। तू यहाँ तकरीर करता है, तो पत्थर चलते हैं। खबर भारत के टीवी पर आती है, भारत से सैलानी आना बन्द हो जाते हैं। और हम भूखे मरते हैं। वो हमसे बोला बाबूजी आप हमारी रोटी हो, ये सब कब समझेंगे...