अप्रैल 2017

दिल के फफोले जल उठे सीने के दाग से... घर को आग लग गई घर के चिराग से

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

नरेन्द्र मोदी, अमित शाह ने पिछले तीन वर्षों में इन लोगों से परे हटकर राजनीति की कोई नई संस्कृति नहीं बनाई है। वे भी इन्हीं की राह के मुसाफिर ही नही कहीं-कहीं तो इनसे भी बढ़कर हैं। फर्क इतना ही है कि नरेन्द्र मोदी यह मानकर लड़ रहे थे कि उन्हें चुनाव जीतना है,वे 2014 के बाद हुए 6 उपचुनाव की हकीकत भी जानते थे जिनमें उन्हें हारना पड़ा था। मोदी बनारस में ही तीन दिन रुके रहे और अमित शाह उप्र में दो माह पूरे प्रदेश में परिश्रम करते रहे। जबकि अखिलेश पहले ही चुनाव जीत चुके है इस मानसिकता से चुनाव लड़ रहे थे।

एक राजकुमार का राजपाट कभी का छिन चुका है, दूसरे का 11 मार्च को छिन गया। पहले राजकुमार राहुल गाँधी और उनकी पार्टी के क्षत्रपों कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित अधिकांश की स्थिति वैसी ही है, जैसे किसी पुराने राजा का किसी पहाड़ी पर टूटा-फूटा पुराना किला। उसमें राजा साहब टूटी कुर्सी पर बैठे हुए हैं। दिमाग नहीं बदला है, अकड़ पुरानी कायम है। दूसरे राजकुमार अखिलेश यादव हैं, इनके कार्यकाल में जो पारिवारिक सीरियल चला, उसमें झगड़ा क्या था, सभी तो सत्ता में भागीदार थे? सभी के मुख्यमंत्री अखिलेश थे। हमारे संविधान में मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री ये दो पद ऐसे हैं, जिनमें प्रदेश और देश को चलाने की समस्त शक्तियां निहित होती हैं। यह शक्ति सत्तासीन को मदमस्त कर देती है। अखिलेश को पिता का डांटना भी नहीं सुहाता था, वे भूल गए कि पिता ने उन्हें यह कुर्सी विरासत में सौंपी थी। उनके पिता की बुनियाद में संघर्ष, आन्दोलन और जेल का तत्व था। जबकि वे कभी 10 दिन भी धरने पर नहीं बैठे थे। उनके पिता को यह कुर्सी समाजवादी आंदोलन के उन हजारों कार्यकर्ता ने और नेतृत्वकर्ताओं ने सौंपी थी, जिन्होंने आजादी के बाद डॉ. लोहिया के नेतृत्व में संघर्ष कर कुर्बानी देकर जमीन तैयार की थी। यह जमीन वंचित, शोषित, दलित और पिछड़ों के लिए थी। मुलायम सिंह यादव ने समस्त पिछड़ों को यादववाद में और मायावती ने समस्त शूद्र-अतिशूद्र को चमार में केन्द्रित कर इनके उत्थान को स्वहित में केन्द्रित कर दिया। मुस्लिमों को भाजपा ने एक टिकट भी नहीं दिया, लेकिन इन्होंने मुस्लिम को कभी खिलौना तो कभी अपना हथियार बना दिया। सैफई को मस्ती का तीर्थ स्थल बना दिया। नरेन्द्र मोदी, अमित शाह ने पिछले तीन वर्षों में इन लोगों से परे हटकर राजनीति की कोई नई संस्कृति नहीं बनाई है। वे भी इन्हीं की राह के मुसाफिर ही नही कहीं-कहीं तो इनसे भी बढ़कर हैं। फर्क इतना ही है कि नरेन्द्र मोदी यह मानकर लड़ रहे थे कि उन्हें चुनाव जीतना है,वे 2014 के बाद हुए 6 उपचुनाव की हकीकत भी जानते थे जिनमें उन्हें हारना पड़ा था। मोदी बनारस में ही तीन दिन रुके रहे और अमित शाह उप्र में दो माह पूरे प्रदेश में परिश्रम करते रहे। जबकि अखिलेश पहले ही चुनाव जीत चुके है इस मानसिकता से चुनाव लड़ रहे थे। नरेन्द्र मोदी ने कब्रिस्तान-शमशान दिखाया। योगी आदित्यनाथ को हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण में लगाया। दलित को मायावती का जाटववाद और पिछड़ों को अखिलेश का सिर्फ यादववाद जिसमें थानेदार, कलेक्टर, मलाईदार सत्ता सिर्फ यादवों की ही है यह समझाया। जब चुनाव शुरू हुआ था और दोनों राजकुमार एक साथ निकले थे तब नरेन्द्र मोदी इनके प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे मोदी के प्रश्न बढ़ते गये, अखिलेश का एक ही उत्तर था विकास के नाम पर एक्सप्रेस हाईवे। मोदी के चेहरे पर प्रधानमंत्री नहीं प्रतिपक्ष के नेता का संघर्ष दिख रहा था। दोनों राजकुमारों, उसमें भी खासतौर पर अखिलेश की सूरत पर मस्ती डिम्पल के साथ दिख रही थी। मुलायम, शिवपाल, मुख्ता र अंसारी को बार-बार पार्टी में ला रहे थे और अखिलेश भगा रहे थे। मुलायम जानते थे कि मुख्तार जैसे लोग बहुत से मुस्लिमों के दिलों पर राज करते हैं, लेकिन बहुत से हिन्दु उनसे नफरत करते है। उसी तरह आदित्यनाथ आदि बहुत से हिन्दुओं के नायक रहते हैं, लेकिन वे मुसलमानों को खलनायक दिखते हैं। सोशल मीडिया मुलायमसिंह को मुल्ला-मौलाना घोषित कर चुका था, लेकिन मुलायम ने इसकी कभी परवाह नहीं की थी और यही उनकी जीत का राज था। अखिलेश उसके दबाव में आ गए। वे इस जमीनी हकीकत से अंजान थे। पिछले पच्चीस-तीस वर्षों में मुलायम-मायावती के इर्द-गिर्द ही सत्ता केन्द्रित रही थी। उनके पिछड़े, दलित मुस्लिम वोट गुण-दोष के आधार पर आपस में ही बंट जाते थे। भाजपा परेशान थी उसे चुनाव जीतने की कोई सूरत नहीं दिख रही थी। मोदी ने उत्तरप्रदेश में अपना दल के साथ गठबंधन बनाया। राहुल अखिलेश ने सभी वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष दलों को दूर,भगाया। इनके किसी भी राष्ट्री य या प्रादेशिक नेता को बुलाना तो दूर, उनसे बात करना भी जरूरी नहीं समझा। सच भी है, जो पिता को ही पिता नही कह रहा है, वो पड़ोसी को काका कैसे कहेगा। बिहार में जिस तरह नीतिश-लालू ने महागठबंधन बनाया था। यदि इन्होंने अजीत सिंह को साथ में लेकर शरद यादव, नीतिश कुमार जो पिछले एक वर्ष से बनारस, इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ आदि के दौरे कर रहे थे उन्हें साथ में लिया होता। यदि लालू यादव से चुनाव जीतने के लिए बिहार की तरह बड़े होते हुए भी त्याग करने की रणनीति सीखी होती और महागठबंधन बनाया होता। तब महागठबंधन के नेता संघ नेता वैद्य का आरक्षण विरोधी बयान बताते, जिससे यादवों से पिछड़ी जातियाँ पहली बार जिस तरह टूटी हैं, वे नहीं टूटतीं। मुस्लिमों में एक विश्वास कायम होता। अजीत सिंह और मायावती के मुस्लिम प्रत्याशियों के कारण एक-एक सीट पर जिस तरह से 6 से 7 मुस्लिम प्रत्याशी खड़े हो गए थे, उनके वोट नहीं बिखरते। लेकिन जो हुआ वह अच्छा हुआ। इन दोनों राजकुमारों का घमंड टूटना जरूरी था। बगैर पिटे अक्ल नहीं आती है, शायद ये और इनके साथी अब सुधरें। अपनी जमीनी हकीकत को समझें। मीडिया लगातार छह माह से मुलायम शिवपाल, अखिलेश साहित पूरे परिवार की आपसी लड़ाई दिखा रहा था । सत्ता की फूहड़ता के इस प्रहसन को देखकर जनता परेशान थी, वो समझ ही नहीं पा रही थी, कि एक ही परिवार के लोग मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद , विधायक बनने के बाद भी इस कदर पागल हो सकते हैं। इस पागलपन की अति यह थी कि सभी ओर मुलायम-शिवपाल खलनायक और अखिलेश हीरो दिख रहे थे। मीडिया इसे बखूबी दिखा रहा था। मुलायम आज तक किसी से नहीं निपटे थे। सबको निपटाकर उन्होंने बेटे को बैठाया था। प्रकृति का खेल बड़ा निराला होता है। अब वे बेटे के माध्यम से खुद ही निपट रहे थे। सभी उनसे अपना पुराना हिसाब चुका रहे थे। हिसाब पूरा हो गया, ये लोग चुनाव हार गए। अच्छा हुआ इन लोगों का जीतना हमारे लोकतंत्र पर, जनता की समझ पर प्रश्नचिह्न ही लगाता। जातिवादी होना बुरा भी होता है और अच्छा भी होता है। एक होता है, अन्य वंचित-शोषितों को आगे लाने के लिए और दूसरा होता है खुद और परिवार को आगे लाने के लिए। मुलायम का जातिवाद एक से शुरू होकर दूसरी तरह का बन गया था, लेकिन पिछड़ों के नाम पर ढंका हुआ था। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि बहुत से दलित, पिछड़े ऊपर उठते ही सबसे पहले अगड़े बन जाते है, इन सब के चक्कर में अखिलेश आ गए, वे ऊॅंचे हो गए, अखिलेश अपने पिता की राजनीति से ना तो कुछ सीख सके, नहीं उसे समझ सके। प्रतिफल में इतना ऊॅंचे उठ गए कि उनके हाथ से अपने पिछड़े मुसलमान भी निकल गए और अगड़ों के तो वे कभी थे ही नहीं। उन्होंने उन्हें मुलायम के प्रति चिढ़ के कारण उंचा बना रखा था। इस तरह वे दोनों ही से दूर होकर पुन: असली यादव बन गए। लौट के बुद्धु घर को आ गए। अब पुन: मोदी-मोदी का शोर हो रहा है। देश ने कभी कांग्रेस नेता देवकांत बरुआ को इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा बताते हुए भी देखा है। देश ने कभी इंदिरा गांधी को पूरे उत्तर भारत से राहुल की कांग्रेस और अखिलेश की सपा से कई गुना ताकत के साथ हारते हुए और राजीव गांधी को आज के मोदी की 2014 और अभी की जीत से ज्यादा जीतते हुए भी देखा है। तब भी इसी तरह के शोर करने वाले लोगों ने इस तरह की हार-जीत को अंतिम सत्य मान लिया था। लोगों की ऐसी ही मानसिकता की वजह से हम अंग्रेजों के दो सौ वर्ष गुलाम रहे हैं। इस तरह की बात ये लोग तब भी कर रहे, जब गोवा और मणिपुर में सत्ता सुंदरी का अपहरण होते हुए देख रहे थे। कांग्रेस के मुख्यमंत्री और मंत्री को भाजपा का मुख्यमंत्री मंत्री बनते देख रहे है। सत्ता की प्राप्ति एक नया देश बनाने के लिए होती है। लेकिन यह स्वार्थ की पराकाष्ठा है। उसमें स्तुति का यह गान नेता को बिगाड़ कर पतन की ओर अग्रसर करता है। इन्हें जीत में सिर्फ रोशनी नजर आ रही है, उसके नीचे, आसपास का अंधकार नहीं दिख रहा है। यह जनता द्वारा दिया गया वो संदेश है, जिसमें जीतने वाला जीत की खुशी मना सकता है, लेकिन हारने वाले से खुद की सूरत उजली नहीं बता सकता है। ये लोग मोदी की सर्जिकल स्ट्राइक का गुणगान भी कर रहे हैं, इन्हें यह नहीं दिख रहा है कि सबसे अधिक सैनिक पंजाब में होते हैं। वहां पर सर्जिकल स्ट्राइक कहां गुम हो गई। ये लोग नोटबंदी का गुणगान भी कर रहे हैं। मणिपुर तो अन्य राज्यों से ज्यादा गरीब राज्य हैं। यहां नोट बंदी कहां खो गई। उ.प्र. और उत्तराखंड में मोदी थे, तो वे पंजाब, मणिपुर, गोआ में क्या थे ? क्या ये भारत वर्ष के बाहर के राज्य हैं। सच तो यह है कि पांच राज्यों के चुनाव थे, जनता ने पांचों राज्यों में सत्ता को उखाड़ फेंका है। हकीकत तो यह है कि हमारे देश की जनता नेताओं से ज्यादा होशियार हो गई है। मोदी के कालाधन 30 दिसम्बर तक जमा कराने की घोषणा के पहले ही और ज्यादा धन जमा करवा दिया। मोदी आज तक नहीं बता सके कि कितना धन जमा हुआ है? यह प्रश्न तो राहुल अखिलेश को करना थे, लेकिन वे सत्ता के कटघरे से बाहर आने को तैयार नहीं थे और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद भूलकर जमीन पर खड़े होकर प्रतिप्रश्नब कर रहे थे। जनता ने 2014 के लोकसभा में चुनाव में दिल्ली में 7 ही सीटों पर मोदी को जितवाया था, और केजरीवाल को हराया था। क्योंकि चुनाव केन्द्र के थे और विकल्प में मोदी की सरकार ही बन सकती थी । लेकिन, उसी जनता ने चार माह बाद हुए विधानसभा चुनावों में केजरीवाल को 70 में से 67 सीटों पर जितवाया था। जनता जानती थी कि यह राज्य के चुनाव है और बेहतर केजरीवाल हैं। जीतने वालों को समझना होगा कि चुनाव जीतना या हारना किसी को बड़ा नहीं बनाता है, बड़ा बनाता है, जीतने या हारने के बाद किया गया काम। हजारों वर्ष के इतिहास में न मालूम कितने राजा बादशाह हुए, लेकिन अशोक-अकबर के साथ हम 10-20 नाम भी याद नहीं कर सकते है। आजादी के बाद हमारे देश में कितने ही प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री हो गए, उनमें से इतिहास कितनों को याद रखेगा? लेकिन गांधी, लोहिया, जयप्रकाश को अवश्य याद रखेगा। पांच में से दो राज्यों में विजयी होने पर वो भी सामने लड़ने वालों की मुर्खता के कारण जीते गए चुनाव पर आज ताली बजा सकते हो। लेकिन कल से वो प्रश्न खड़े होने वाले है। जिनके उत्तर ही आने वाले कल का इतिहास तय करेंगे। आजादी के बाद नेताओं की समझ पर प्रश्न चिह्न लगते रहे हैं और जनता के उत्तर सही आते रहे हैं। अभी भाजपा का हनीमून पीरियड है, इसके बाद उसे प्रश्नों के उत्तर देना है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना दिया है। इसके पहले उमा भारती बन चुकी है। भारत के कथा पुराणों में और हजारों वर्ष के इतिहास में कोई योगी साधु, राजा नहीं बना है न ही व्यापारी बना है। रामायण काल में गुरु वशिष्ठ और महाभारत काल में गुरु द्रोण ने राजा का मार्ग-दर्शन किया, खुद राजा नहीं बने। चन्द्रगुप्त के समय चाणक्य ने उन्हें राजा बनाया, खुद नहीं बने। आधुनिक काल में देश भर में उद्योगपति, व्यापारी सिकुड़ रहे हैं और बाबा रामदेव फल-फूल रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी है और उनके पीछे गुरु द्रोण और वशिष्ठ के रूप में संघ प्रमुख मोहन भागवत हैं, खबर है कि मोदी ने तो केन्द्रीय मंत्री सिन्हा को उ.प्र. का मुख्यमंत्री बना दिया था। लेकिन एन वक्त पर मोहन भागवत ने योगी आदित्यनाथ को आगे कर दिया। उन्हें आडवाणी की जगह मोदी चाहिए थे और अब मोदी की जगह आदित्यनाथ की जरूरत पड़ सकती है। योगी के शपथ ग्रहण समारोह में मोदी भी मौजूद थे, और उनकी उपस्थिति में देश पहली बार मोदी-मोदी की जगह योगी-योगी के नारे सुन रहा था। यह एक नए दौर की शुरुआत है, भविष्य के लिए यही कहा जा सकता है कि लोकतंत्र बना रहे कोई खुदा ना बन सके। जनता के निर्णय को शिरोधार्य कर उस पर भरोसा करें।