जुलाई 2016

ब्रिटेन : सुखांत या दुखांत

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

ब्रिटेन यूरोपियन संघ से अलग हो गया। इस अलग होने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का खूबसूरत नजारा पूरी दुनिया ने देखा। यह 52 प्रतिशत बनाम 48 प्रतिशत का द्वंद्व था। यह गाँव बनाम शहर का लोकतांत्रिक संघर्ष था। इस संघर्ष में गाँव जीता और शहर हारा। यह बुजुर्ग बनाम युवा का वैचारिक अन्तरद्वंद्व था। इस द्वंद्व में बुजुर्ग जीते और युवा हारे। इसे भारत में इस तरह प्रस्तुत किया गया, मानो ब्रिटेन की सभ्यता और संस्कृति नष्ट हो गई हो। अर्थव्यवस्था चरमरा गई हो। ब्रिटेन टूट कर बिखर गया हो। किसी भी देश का सोच-विचार अपने आज के हालात और बीते हुए कल से बनता है। जिन मुल्कों को आगे बढ़ना होता है, अपने आने वाले कल को बदलना होता है वे बीते हुए कल से वह चाहे अच्छा हो या बुरा प्रेरणा लेते हैं और आने वाले कल की सुन्दर रचना करते हैं। दुर्भाग्य कि हम सुधरने को तैयार नहीं हैं और सुधारने के ठेकेदार बने घूमते हैं। एक गाना था- ‘दिल अपना और प्रीत पराई किसने है ये रीत बनाई’ वही रीत आज भी चल रही है। भारत में कभी भारत-पाक विभाजन हुआ था। पाकिस्तान से कभी बाँग्लादेश अलग हुआ था। ये सब इतिहास के काले अध्या-य हैं। जो हमारे दिलो-दिमाग पर काबिज हैं। भारत में आजादी के बाद महाराष्ट्र से सौराष्ट्र अलग हुआ और गुजरात बन गया। बिहार से झारखंड, मप्र से छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड और आन्ध्र से तेलंगाना अलग हो गया। इन सबके मूल में यह विचार था कि राज्यों में समृद्ध और ताकतवर लोग आदिवासी क्षेत्रों का शोषण कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी 70 हजार करोड़ की जो मुम्बई - अहमदाबाद बुलेट ट्रेन चलाने वाले हैं, पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्य आज भी रेलमार्ग से कटे हुए हैं, इतने खर्च में वे देश से जुड़ सकते हैं। हमारा नारा है - अनेकता में एकता, लेकिन दिल बहलाने को यह ख्याल अच्छा है। वरना यह बटी हुई एकता है, इसमें घोर असमानता है। जिस तरह से हमारा देश भी बांग्लादेश, असम आदि में आस-पास के देशों से आने वाले शरणार्थियों को लेकर परेशान रहता है। इन देशों से हमारी यूरोपियन संघ जैसी कोई संधि भी नही हैं। ये कभी हमारे ही देश के हिस्से रहे हैं। इसके ठीक विपरीत ब्रिटेन की यूरोप के फ्रांस, जर्मनी, इटली आदि देशों के साथ व्यापारिक एवं अन्य कामों की संधि थी, जिनमें एक-दूसरे के हित निहित थे। दूसरी ओर ब्रिटेन आसपास के देशों से आने वाले मजदूरों आदि को ले कर भी परेशान रहता था। ब्रिटेन अपने आप को यूरोपियन सभ्यता का, संस्कृति का पंडित मानता है। लंदन की सड़कों पर 31 दिसंबर को 50 लाख लोग इकट्ठा होते हैं। ड्रिंक भी किए होते हैं, लेकिन मजाल है कि किसी की किसी से टक्कर हो जाए। हमारे देश में जो स्थिति ब्राह्मण की है वहीं स्थिति यूरोपियन संघ में ब्रिटेन की है। अंग्रेज सड़क तो दूर, अपने घर के बाहर पोर्च में भी कुछ खाना गलत मानता है। क्षमा (सॉरी) और मुस्कराना (स्माइल) उनके आभूषण हैं। वहाँ के बुजुर्गों सहित 52 प्रतिशत लोगों को लगा कि साथ में रहने से हमारा सभी तरह से नुकसान हो रहा है। वे अलग हो गए। आज से ढाई वर्ष पूर्व पूरी दुनिया ने ब्रिटेन और स्कॉटलैंड के अलग होने को लेकर हुए मतदान का खूबसूरत नजारा भी देखा था। उसी वक्त ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जॉन केमरून के बँगले पर भी एक घटना घटी थी। एक कैबिनेट मंत्री उनसे सुबह मिलने आए। वे साइकिल पर थे। वहाँ साइकिल और कार से आदमी छोटा बडा नहीं होता है। गार्ड ने साइकिल ले जाने से रोक दिया। मंत्री अड़ गए। उन्होंने गार्ड से झगड़ा कर लिया। खबर पूरे इंग्लैण्ड में फैल गई। मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। जाँच बैठ गई, रिपोर्ट तुरंत आ गई। उसमें मंत्री को मारपीट का नही वरन दुर्व्यवहार का दोषी पाया गया। मंत्री वापस मंत्री मंडल में नहीं आ सके। हमारा शेअर बाजार यूरोप की घटना से गिर गया। हमारे शेअर बाजार की आत्मा सट्टा है। हमारे कॉरपोरेट इस आत्मा की परिक्रमा का छलकपट करते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था की जीडीपी दर तय करने में भी ये सब मुख्य भूमिका निभाते हैं। हमारे शेअर बाजार की स्थिति तो ऐसी है जैसे कभी रूस में बारिश होने पर भारत के कम्युनिस्ट छाता तान लेते थे। हमारा शेअर बाजार तो कब कहाँ की बारिश के लिए छाता खोलेगा या बंद करेगा, यह वह खुद भी नहीं जानता है। देश, काल और परिस्थितियाँ हमारी और यूरोपियन संघ की अलग-अलग हैं। इसीलिए हम उनके सुखांत को अपने दुखांत के नजरिए से न देखें, वरन उस खूबसूरत लोकतंत्र से कुछ सीखें। उड़ता पंजाब फिल्म उड़ता पंजाब उजड़ते पंजाब से रूबरू करा गई है। जिस पंजाब के किनारे को सिंकदर छू न सका। गुरुओं ने कुर्बानी देकर जिस पंजाब को महफूज़ रखा, जो पंजाब आजादी के बंटवारे में इंसानियत की बर्बादी की विभीषिका को झेल कर भी उठ खड़ा हुआ और भाखड़ा नंगल बांध बनाकर उससे पानी लाकर जो पंजाब कभी पूरे देश का गेहूं का कटोरा बन गया था। आज पंजाब के उन लहलहाते खेतों में दवा के नाम पर जहरीले रसायन की मात्रा पूरे देश में सर्वाधिक पायी जाती है। पंजाब आज नशे से हार गया है, दुश्मनों से नहीं अपनों से हारा है, पंजाब का आज यही फलसफा है कि दिल के फफोले जल उठे सीने की आग से, घर को आग लगगई घर के चिराग से। कहते हैं कि आदमी कोई-सी भी बुरी आदत एक बार छोड़ सकता है, लेकिन नशा किसी भी शक्ल में उससे जुड़ गया तो वो उसकी मौत के साथ ही जाता है। एक कहावत है कि किसी से दुश्म नी हो तो उसे जान से मत मारो, इससे बदला पूरा नहीं होगा, उसे नशे की लत लगा दो, वो हर दिन मरेगा। जब तक जीएगा, उसके साथ उसका घर-परिवार भी तिलतिल कर मरेगा। आज यह नशा व्यक्ति, घर, समाज में घुस चुका है। उड़ता पंजाब की उड़ान पूरे देश में कुलांचे मार रही है। सेंसर बोर्ड ने फिल्म को रोककर देशहित का काम किया। क्योंकि फिल्म को इतनी प्रसिध्दि और किसी भी तरह से नहीं मिल सकती थी, पंजाब में चुनाव होने जा रहे हैं। इसने भी उड़ते पंजाब की असलियत को सामने लाने में बड़ी भूमिका निभाई है। उजड़ता पंजाब खून के आंसू रो रहा है। नशे की दुनिया कायम है, कायम ही रहेगी, क्योंकि यह नशेड़ियों के खून में घुस चुकी है। अवैध कारोबारियों को इस खून की कमाई का चस्का लग गया है। इनका सत्ता और उसके दलालों से गठबंधन है। सिख धर्म ने कभी तंबाखू का और मुस्लिम धर्म ने शराब का निषेध किया था। सिख तंबाखू की जगह शराब अन्य नशे और मुसलमानों ने शराब की जगह पान सिगरेट, तंबाखू को पूरी रफ्तार से ग्रहण कर लिया। सिख समाज पर तंबाखू-सिगरेट आज भी अपना दुष्प्रभाव नहीं डाल सकी है, सैकड़ों वर्ष बाद आज भी सिगरेट-तंबाखू इस समाज से दूर है। अब तो जमाना बदल गया है । अन्यथा कुछ वर्ष पूर्व तब कोई सरदार पान की दुकान पर अपने दोस्तों के साथ खड़े होने में भी डरता था कि कहीं उसे घर-समाज वाले देख न लें। आज सिगरेट की जगह हुक्का पंजाबी युवाओं की अभिजात्य संस्कृति बन रहा है। पान की दुकान से डरने वाला पीने की दुकान खोल कर बैठ गया है। धर्म इसके आगे घुटने टेक गया है। सभी धर्मों में इसी तरह की मिलती-जुलती कहानी है। राजनेता धर्मगुरु के कदमों में सिर रखते हैं, ऐसा लगता है कि धर्मगुरु ही राजनेता को बना और चला रहे हैं, लेकिन अंदर की कहानी कुछ और ही होती है, जिस धर्मगुरु के पास जितना बड़ा राजनेता है, वो उतना ही बड़ा धर्मगुरु है। मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री के यहां आने-जाने से धर्मगुरु की हैसियत तय होती है, इसलिए धर्म आज राजनीति की पायदान है। आज पंजाब से पंजाबीयत खत्म हो रही है। उसके गीत, संगीत, भाषा, संस्कृति सबकुछ टूटे-फूटे है बदल रहे हैं। बदलाव अच्छी चीज है, बशर्ते वह अच्छा लेकर आए, लेकिन पंजाब में आधुनिकता का तड़का नशे और फूहड़ता में डूबा हुआ है। यही कहानी राजस्थान और महाराष्ट्रर से लेकर कश्मीर, केरल तक पूरे देश की भी है। राजनीति खामोश है, वह स्थापित हितों की बंदिनी बन चुकी है। मीडिया जानकर भी अनजान है। नीतीश कुमार द्वारा बिहार में की गई शराबबन्दी पर जयललिता को छोड़कर केन्द्र और राज्य सरकारों, विभिन्न राजनीति दलों और नेताओं का जो रुख है, उससे इस नशे के असर को समझा जा सकता है। राजनीति और नशे की साझेदारी है। नशे से राजनीति और राजनीति से नशा चल रहा है। सत्ता सुन्दरी और दौलत इनके पनाहगाह हैं। पंजाब में इस नशे के धंधे का कारोबार 75 सौ करोड़ का है। इसमें शराब शामिल नहीं है। एक प्रसिद्ध कव्वाली है ‘झूम बराबर झूम शराबी’ उसकी एक पंक्ति है, आज अंगूर की बेटी ने सिर पर उठा रखी है दुनिया, ये तो अच्छा है अंगूर को बेटा न हुआ। अंगूर की बेटी शराब जितने भी नशे है, उनकी बड़ी अम्मा है। उसने काम तमाम कर दिया है ये जितने भी नशे हैं, गांजा, चरस, अफीम, मेंड्रेक्स, हेरोइन ये उस अंगूर की बेटी के ही बच्चे हैं। यह नशे का कारोबार और इसकी दुनिया ऐसी ही उड़ती रही तो पूरा देश नशे की गिरफ्त में आ जाएगा। आज यह स्टेटस सिंबाल बन चुका है। स्टेटस वालों के हाथों में शराब (ताकत) का जाम है। सरकार केन्द्र में हो या फिर प्रदेश में, दल कोई सा भी हो शराब और नशे में डूबा हुआ है एक राज्य के बारे में, जनसामान्य में कहावत है सूरज अस्त और मुख्यमंत्री मस्त शाम के बाद सरकारें कहीं ज्यादा, कहीं कम मस्ती में डूब जाती हैं। कहीं-कहीं दिन में भी डूबने की शुरुआत हो जाती है। जब रोम जल रहा था, तब नीरो बंसी बजा रहा था, लेकिन इसके आगे की कहानी आज की हकीकत है। नीरो की पार्टी चल रही थी, उस जमाने में बिजली तो थी नहीं इसलिए गरीब-मजदूरों को उसमें जलाकर रोशनी तेज की जा रही थी। उस पार्टी में रोम के उद्योगपति, व्यापारी, पत्रकार, बुद्धीजीवि, अधिकारी और मंत्री शिरकत कर रहे थे। प्रश्न उठता है कि नीरो तो था ही ऐसा, लेकिन बाकी लोग खामोश क्यों थे ? राहुल गाँधी ने कुछ वर्ष पूर्व कहा था कि पंजाब में 10 में से 7 युवा नशे के शिकार हैं। नशेडियों को तो गुस्सा नहीं आया, लेकिन नशेड़ियों के हिमायतियों ने कोहराम मचा दिया था। ये वो लोग थे, जो जानकर भी अनजान बनते हैं, पाखंड जिनका सबसे बड़ा अस्त्र है, ये राहुल गाँधी का पप्पू कहकर उपहास उड़ाते हैं, लेकिन नशे में डूबते देश को देखकर खामोश रहते हैं, इनके तकिया कलाम तरह-तरह के होते हैं। जैसे नशा खत्म नहीं हो सकता है। गुजरात में क्या शराब नहीं बिक रही है। अवैध शराब बिकेगी तो लोग मर जाएंगे। यह व्यक्तिगत आजादी का मामला है। ये लोग ऐसे कूतर्क देकर जनता के हितों की पैरवी करने का दावा करते है। जबसे संपादकीय ‘अलविदा शराब’ लिखा है, तब से ऐसा लग रहा है बहुत से शराबियों को बुरा लग रहा है। पहली बात तो यह है कि मैंने स्पष्ट। लिखा है कि विदेश में शराब है शराबी नहीं और भारत में शराबी हैं शराब नहीं। भारत में जो शराब को शराब समझते है, वे इसका बुरा नहीं मानेंगे। वे विचार को समझेंगे, लेकिन जो शराबी हैं, वे बुरा मानते हैं तो माने, क्योंकि जिन्होंने अपने अंधे स्वार्थ के लिए खुद की पत्नी, बच्चों की, परिवार की बर्बादी की चिंता नहीं की, वो अन्य की चिंता और इससे समाज और देश को क्या नुकसान हो रहा है, इसकी चिंता क्या करेंगे ? एक बात और, शराबी और नशा करने वालों को शराबी, नशेड़ी पढ़ने, सुनने में बुरा लगना शुभ संकेत है, अन्यथा यह स्टेटस सिंबल है, इसका बुरा लगना इस बात का प्रमाण है कि अच्छे-बुरे की समझ आज भी जिंदा है। नशेड़ियों में भी जिंदा है, वे अभी भी नशे की गिरफ्त से बाहर आ सकते हैं।