जून 2016

अलविदा शराब

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

रूस में जब जारशाही के खिलाफ 1917 में क्रांति हो रही थी, उस दौर में क्रांति के पूर्व जो हालात थे, हमारे देश के हालात आज कमोबेश वैसे ही हैं। रूस में गरीब बस्तियों में शाम के बाद जब कामगार घर लौट रहे होते थे, तब वे रास्ते में गालियां बकते चलते हुए ताड़ीखाने में घुसे जाते थे, वहां बहुत भीड़ होती थी। घर पहुंचकर पत्नी, बच्चों से मारपीट करते थे। चारों ओर कोलाहल, रुदन क्रंदन होता था। महिलाएं शाम के बाद घर से निकल नहीं सकती थी। घर के बाहर हैं तो बस्ती से गुजरकर घर नहीं पहुंच सकती थीं। आज भारत की गरीब बस्तियों का भी यही हाल है।

शराब के आगोश में पूरी दुनिया है। ठंडे मुल्कों जैसे यूरोप, अमेरिका आदि में यह जिन्दगी का हिस्सा है। वहीं भारत और इसके आस-पास के देशों में यह 10 प्रतिशत भी नहीं है, लेकिन जिंदगी को खत्म करने वाला किस्सा है। भारत में शराब पिछले 10-20 वर्षों में तीव्रगति से बढ़ी है। यदि इसकी रफ्तार जिस अंदाज में जैसी चल रही है, वैसी ही चलती रही तो जो शराब आज नदी बन गई है, कल समुद्र बनेगी। हमारे देश को तैरना नहीं आता, उसका डूबना तय है, क्योंकि हमारे यहाँ शराब नहीं शराबी हैं। बाकी दुनिया के लिए ऐसा नहीं कह सकते। वहां कायदे-कानून हैं, उन्हें तैरना आता है, क्योंकि वहाँ शराब है शराबी नहीं हैं। शराब की बुराइयों से, बीमारियों से वे भी अछूते नहीं हैं, फिर भी उनके लिए शराब मजा है, हमारे लिए सजा है। रूस में जब जारशाही के खिलाफ 1917 में क्रांति हो रही थी, उस दौर में क्रांति के पूर्व जो हालात थे, हमारे देश के हालात आज कमोबेश वैसे ही हैं। रूस में गरीब बस्तियों में शाम के बाद जब कामगार घर लौट रहे होते थे, तब वे रास्ते में गालियां बकते हुए ताड़ीखाने में घुस जाते थे, वहां बहुत भीड़ होती थी। घर पहुंचकर पत्नी, बच्चों से मारपीट करते थे। चारों ओर कोलाहल, रुदन, क्रंदन होता था। महिलाएं शाम के बाद घर से निकल नहीं सकती थीं। बाहर हैं तो बस्ती से गुजरकर घर नहीं पहुंच सकती थीं। आज भारत की गरीब बस्तियों का भी यही हाल है। एक-दो दारूकुट्टे पूरी बस्ती को हिलाकर रखते हैं। इनकी तादाद दिनोदिन बढ़ती जा रही है। ये दारूकुट्टे महिलाओं पर फब्तियां कसते हुए उन पर गंदे आरोप चस्पा करते हैं। उन्हेंं अपनी हवस का शिकार बनाते हैं। कामगार महिलाएं अपनी बच्चियों को घर छोड़कर काम पर जाने की स्थिति में नहीं होती हैं। वे अपने साथ बच्चियों को भी ले जाती हैं। इन बस्तियों की दास्तान, इनका दर्द बाहर वाले जानते ही नहीं हैं। कारण कि हमारी नई संस्कृति अपने से छोटों से रिश्ता बनाना तो ठीक, उनकी ओर देखने में भी तोहीन समझती है। सीने में जलन आँखों में तूफां, हैरान सा क्युं है... इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्युं है... गजल गाते हुए, शायर को परेशानी दिख रही है। लेकिन जिनकी जिम्मेदारी है, उस नेता और मीडिया की नजरें या तो कहीं और हैं या जानबूझ कर अनजान हैं या खुद ही नशे मेंं चूर हैं। शराब तबाही है। इसकी कीमत सबसे पहले माता-पिता को, उसके बाद ताउम्र पत्नी को बच्चों के साथ चुकाना पड़ती है। आदमी के शराबी बनते ही शराब उसकी पहली बीवी, अर्धांगिनी बन जाती है। उसकी पहली मोहब्बत बन जाती है, वह बीवी के बगैर काम चला लेता है, लेकिन शराब के बगैर अपने आपको अधूरा समझता है। शराबी की पत्नी डर, एक दर्द को लेकर सदैव जीती है कि पति का विरोध मतलब वह अन्य महिलाओं से दैहिक रिश्ते बना लेगा, जबकि उसका पति शर्म-हया पहले ही छोड़ चुका होता है। इसलिए वो अन्य रिश्ते भी पहले ही बना चुका होता है, लेकिन भारतीय नारी बेचारी आँखों में आँसू लिए पति को परमेश्वर मानती घुट-घुट कर जिंदगी गुजारती रहती है। गरीब की पत्नी पर चौतरफा मार होती है। उसके घर में दूध तो दूर, दाल-रोटी का भी संकट होता है। पति पत्नी की खून-पसीने की कमाई को छीनकर बच्चों की चिकित्सा, शिक्षा की कीमत पर दारू पी जाता है। प्रतिकार करने पर उस पर गैर पुरुष संसर्ग का सबसे घिनौना आरोप लगाते हुए उसकी बेरहमी से पिटाई करता है। उसकी बेबस देह पिटाई झेलने की अभ्यस्थ तो होती ही है, लेकिन उसकी आत्मा को भी छलनी करता है। शराब के समर्थक कुतर्ककरते हैं कि यह व्यक्तिगत आजादी में खलल है। उनसे पूछा जाए कि क्या किसी को आत्महत्या करने की छूट दी जा सकती है। क्या किसी को चौराहे पर नंगे होकर मनमानी करने की छूट दी जा सकती है। वे कुतर्क करते हैं कि यह दो नम्बर में ब्लैक में बिकेगी। उनसे पूछा जाना चाहिए कि खूनी, बलात्कारी न्यायालय से बरी हो जाता है तो क्या उन्हें पकडऩा बंद कर देें। गुजरात में आज भी शराब मिलती है। ऐसे कुतर्क शराब के समर्थक देते है, लेकिन हकीकत अभी ताजा-ताजा सामने है, शराब के एडिक्टो को बिहार में शराब नहीं मिल रही है इसलिए तो वे अस्पताल में भर्ती हैं। वहां की सत्तारूढ़ पार्टी की एमएलसी के बेटे ने खून किया तो घर में शराब मिली। एमएलसी शराब रखने के जुर्म में जेल में बंद है। शराब बंदी सरकार की नीति से ज्यादा नियत पर निर्भर करती है। जिन-जिन जगहों पर शराब बंद हुई, वहाँ की महिलाएँ सुखी हैं। घर खुशहाल है, जहाँ-जहाँ बढ़ी है, वहाँ-वहाँ दुखी हैं। दोनों ही अर्थों में हरियाणा का उदाहरण देश के सामने है। आज शराब-बंदी के पक्ष में सबसे अधिक महिलाएँ आंदोलन कर रही हैं। जिस देश में गरीबी, भुखमरी, सूखा, बेरोजगारी पर कोई आंदोलन नहीं है, वहाँ पर शराब को बंद करने के लिए आंदोलन होना, वो भी नेता, पत्रकार, बुद्धिजीवी के बगैर चौंकाने वाला है। साथ ही शराबी द्वारा दिए जाने वाले दर्र्द की व्यथा-कथा को बयाँ करता है। भारत में धर्म ने साधु-संत, महात्मा, मुल्ला, मौलवी, काजी ने शराब का निषेध किया है। इसलिए पीने वालों ने अपने रास्ते तलाशे हैं। हिन्दू है तो मंगलवार, शनिवार या नवरात्रि में दारू नहीं पीता है, जैन है तो पर्युषण में दारू नहीं पीता है और मुसलमान है तो रोजे में दारू नहीं पीता है। शराब शुगर, लीवर, हार्ट, रक्तचाप आदि बीमारियां तो देती ही है। धर्म के प्रभाव से पीने वाले में एक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अपराध बोध की बीमार मानसिकता भी बना देती है। वह घर-परिवार, समाज से कट जाता है, उसका देखने समझने का नजरिया बदल जाता है, एक शराबी भी शराबी को अच्छा नहीं समझता है। आज भी आदमी अपनी बेटी के लिए शराबी लड़का पसंद नहीं करता। आदमी में सौ गुण हों, वह अच्छा इंसान हो, लेकिन यदि शराब पीता है तो एक मिनट में उसकी किसी भी बात पर चाहे वह कितनी ही सही क्यों ना हो, लोग विश्वास नहीं करेंगे। कह देंगे रहने दे... वो शराबी है, बेवड़ा है। किसी की तारीफ करना हो तो कहेंगे अरे, ये शराब तो दूर, पान-सुपारी भी नहीं खाता है। जबकि खाने-पीने से इंसान अच्छा-बुरा नहीं होता है। शराब नहीं पीने वाला भी पांच रुपए, दस रुपए, सैकड़े के ब्याज वाला सूदखोर, मिलावटखोर भी हो सकता है। किसी शायर ने भी कहा है कि जो शराब नहीं पीते है वे पीते है इन्सा का खून। शायर, कवि, लेखक, पत्रकार, फिल्मकार, शराब पीकर इंसा के हक की बात इसी तरह करते रहे। वहीं, धर्मगुरु अनुचित धन वालों से धर्म चलवाते रहे। धर्मगुरु को शायर में शराबी और शायर को धर्म में खराबी दिखती रही। दोनों ही अधूरे रह गए। भारी शराब हो गई। भारी अनुचित धन हो गया। नुकसान में देश रह गया। नेहरू ने आजादी की लड़ाई में 12 वर्ष जेल में रहकर अपनी जवानी कुर्बान कर पूरी दुनिया के इतिहास को अपनी पुस्तक में इस तरह समेटा जैसे सबकुछ उनके सामने से गुजरा हो, यह किसी अच्छे इतिहासकार के बस में नहीं था। लेकिन वे अपने देश के इतिहास को समझ न सके और उन्होंने आजादी के बाद गाँधी की शराबबंदी की बात नहीं मानी। शराब धीरे-धीरे देश को दीमक की तरह खाने लगीं। इसने संविधान के चारों स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया के एक बड़े वर्ग को अपनी चपेट में लेकर कॉरपोरेट के साथ एक कॉकटेल बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इसकी गिरफ्त बढ़ती गई। आज शाम के बाद देश के सभी स्तंभों के कई कर्णधार कॉरपोरेट के साथ आधुनिक नीरो बन देश के पतन की पटकथा तैयार करते हैं। इसकी प्रस्तावना में शराब, मध्य में शबाब और अन्त में भ्रष्टाचार के साथ देश पर चिंतन होता है। इस वर्ग में से कुछ लोग 50-60 वर्ष के करीब पहुंच रहे है, उनमें से बहुतों ने बीते 25-30 वर्ष पहले शराब पीना शुरू की थी, जो अब उनकी लत बन गई है। इनकी पत्नियां शराब नहीं पीतीं। पार्टियों में सजी-सजाई सूरत में पहले जेवरात और आजकल ब्रांडेड में बगैर पीए इनका साथ निभाती हैं। लेकिन आज की पीढ़ी अपनी पत्नी के साथ ही दोस्तों की महफिल सजाकर शराबखोरी कर रही है। प्रगति की रफ्तार इतनी तेज है कि 30 वर्ष 25 वर्ष, 20 वर्ष वाले के एक-दूसरे से विचार और सूरत नहीं मिलती है। इन्होंने शराब के साथ अन्य नशे भी ग्रहण कर लिए हैं। इनकी रात को शुरू हुई पार्टी सुबह ही खत्म होती है। आज की पीढ़ी की दशा और दिशा यही है कि वो शराब और हाईफाई लाइफ को ही अपनी जिंदगी और पूरा देश समझ रही है। उनकी पुरानी पीढ़ी ने उन्हें जो विरासत दी है, उससे यही निकलना था, नई पीढ़ी के बड़े इस कड़वी हकीकत को जानते हैं, समझते हैं, लेकिन खुद नशे के आगे बेबस हैं। जब उन्होंने अपने मां-बाप, पत्नी के आंसुओं को नहीें देखा तो अपनी गलत लिखी इबारत को क्या देखेंगे। नीतीश कुमार ने बर्रे के छत्ते में हाथ डाला है, लेकिन जो लोग नया समाज, नया देश बनाने का सपना देखते हैं, वे इसकी चिंता कहां करते हैं। चीन तो अफीम के नशे में डूब कर खत्म ही हो गया था। माओत्से तुंग ने सख्ती से नशेडिय़ों को जेल में डाल कर, कुचल कर अपने देश को बचाया था। नीतीश कुमार ने शराबबंदी के बाद पान-गुटखा पर भी रोक लगा दी है। यह जनता के प्रति उनका कर्तव्य है। तमिलनाडु में जयललिता भी इस कर्तव्य पथ पर चल पड़ी है। यह कर्तव्य गांधी की वारिस कांग्रेस का भी है और दीनदयाल उपाध्याय की वारिस भाजपा का भी है। लेकिन ये खामोश क्यों हैं? नशे के बचाव में आर्थिक नुकसान की चिंता का तर्क कोई भी सरकार झूठमूठ करती है। कारण कि धन तो खुद सरकार अपने पर लुटाती रहती है और हजारों करोड़ के नए कर्ज एवं करों की व्यवस्था भी करती रहती है। असल में इन्हें डर तो दारूकुट्टों की एक बहुत बड़ी उस तादाद से है, जो सत्ता में है और जिंदगी के हर हिस्से में ताकतवर है। लेकिन जिन्हें देश की 125 करोड़ जनता की चिंता है, वे इन ताकतवरों से डरते नहीं, वरन् उन्हें ठीक करते हैं। बुराई को खत्म करना नीतीश कुमार की मंजिल है, अंजाम चाहे जो हो।