मई 2016

दलित, अम्बेडकर, यथार्थ

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

आज का विषय है दलित आंबेडकर यथार्थ। जिस देश में गाय, हाथी, सर्प, चूहे को, नदी, पहाड़, पेड़ और मिट्टी को पूजा जाता है। वहां एक अदृश्य भारत सदियों से रह रहा है। ये वो दलित हैं, जिन्हें कभी इंसान और जानवर और पदार्थ भी नहीं समझा गया, यही कटु यथार्थ है। इस यथार्थ की पीड़ा को डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भोगा था। वे लिखते हैं- जब लडक़पन हैं, तो मां नहीं है, पिता, सरकारी नौकरी में हैं, घर सम्पन्न है, भाई-बहन हैं और इतना सोना भी है कि कोई उन्हें आसानी से सवर्ण समझ सकता है। आंबेडकर उन्हीं दिनों का जिक्र करते हुए लिखते हैं- ‘‘भाई-बहन के साथ वो रेल में सफर कर पिता के पास जा रहे हैं, जब स्टेशन पहुंचे, तो टीसी का आना हुआ। उसने शुरुआती सम्मान दिया, पर जब उसे जात का पता चला, तो दूर हो गया। अब उसकी आंखों में नफरत थी, जिस स्टेशन पर हमारा उतरना हुआ, वहां कोई गाड़ी वाला बैठाने को तैयार नहीं था, क्योंकि सबको समझ आ गया था कि हम अछूत हैं। पीने को पानी नहीं था, खाना साथ में था, लेकिन बगैर पानी के भूख से आंतें खिंचने लगी थीं। ऐसे में एक गाड़ी वाले ने बैठा लिया, उसी गाड़ी वाले ने सलाह दी कि सामने जाओ और वहां से पानी ले लो, पर खुद को मुसलमान बताना। हमने यही किया, पर देने वाला पहचान गया और जोर से झिडक़ते हुए अछूत कहीं के कहकर भगा दिया। आंबेडकर ने सिर्फ इसी अपमान का जिक्र नहीं किया है। जब वो ब्रिटेन से लौटते हैं, पढ़-लिख चुके होते हैं। अब उन्हें मकान की तलाश है, पर मकान मिलता नहीं है, क्योंकि तब भी दलित को मकान नहीं मिलता था और आज भी नहीं मिलता है। यहां जवाहर चौधरी सामने बैठे हुए हैं। मैं यहां चौधरी जी की कहानी का जिक्र कर रहा हूं कि एक बुजुर्ग पति-पत्नी हैं, उन्हें अपने मकान में कमरे किराए पर देना है, उसी से उनका जीवन-यापन होता है। दो लडक़े आते हैं, पति-पत्नी कुछ पूछताछ कर उनसे रुपये लेकर दूसरे दिन बुलाते हैं, दूसरे दिन वो लडक़े पहुंचते हैं, पति-पत्नी अंदर बड़ा विमर्श करते हैं कि कहीं ये आतंकवादी तो नहीं हैं आदि-आदि तत्पश्चात उन लडक़ों के रुपये उन्हें वापस कर देते हैं। कहानी रहस्य के साथ खत्म हो जाती है। मैंने पूछा कि वो लडक़े आतंकवादी थे, उत्तर था नहीं वे दलित थे। संपादक ने दलित हटाकर कहानी में रहस्य छोड़ कहानी को सांप्रदायिकता की ओर घुमा दिया। ध्यान रखना हमारे देश के मीडिया पर वाणिक और कलम पर ब्राह्मण का अधिकार है। यह गठबंधन मुख्य मुद्दों से दूर करता है। बनिए तो गांधी भी थे, लोहिया भी थे, लेकिन जन्म से थे, कर्म से वो महान इंसान थे। आज दलित के लिए आरक्षण है। यह गाँधी की देन है क्योंकि वो आजादी की लड़ाई का और देश के लिए मरने का दौर था, आज दलित की लोकसभा, विधानसभा में सीट भी है और वोट भी है। इसी वजह से नेता दलित बस्तियों में जाते हैं। यदि ये सीट और वोट नहीं होते तो इन बस्तियों में जाना तो दूर इनकी तरफ मुंह उठाकर भी कोई नहीं देखता। वहां पर गंदगी और बदबू ही दिखाई देती। जबकि हकीकत में वो कचरा, बदबू इस देश के दिमाग फंसी हुई है। अंबेडकर का मूल्यांकन भी यह देश ठीक से नहीं कर पा रहा है। कुछ लोग ये कहने से नहीं चूकते कि आंबेडकर तो अंग्रेजों के एजेंट थे, ये ही लोग ना मालूम क्या-क्या जुल्म करते हैं। अंबेडकर के बारे में उनके समर्थक कहते हैं कि वे संविधान के निर्माता थे, लेकिन निर्माता तो और भी बहुत से थे। वे केन्द्रीय मंत्री थे, मंत्री तो ओर भी बहुत थे। असल में वे सच्चे देशभक्त थे। अगर वे चाहते, तो आराम की जिन्दगी कुबूल कर सकते थे, विदेश में जाकर अच्छी जिन्दगी गुजार सकते थे। पर उन्हें दलित और देश की मिट्टी से प्यार था। असल में एजेंट तो वो हैं, जो देश की दूध-मलाई खाते हैं और दूसरे देशों के हो जाते हैं हम ये सोचकर खुश रहते हैं कि वहां से जो पैसा आएगा, वो हमारे देश में समृद्धि लाएगा। दलितों को लेकर कई तरह की भ्रांतियां फैलाई जाती हैं और ये बताने का मौका नहीं गंवाया जाता कि सरकारी नौकरी हो या डिग्री कॉलेज, सब तरफ काबिल की जगह ये बैठ गए हैं और बड़ी आसानी से कोई भी कह देता है कि मेरी सीट पर इन्होंने कब्जा कर लिया है। मुझे याद है 1980 में नईदुनिया के ‘पत्र सम्पादक’ में छपा था कि इंजीनियरिंग कॉलेज में जो रैगिंग हुई, उसकी वजह दलित हैं। जब मैंने आंकड़े बुलवाए तो पता चला कि भ्रांति किस तरह से फैलाई जाती है। आरक्षण की सीटें पच्चीस फीसदी भी भर नहीं पाती हैं और एक साल बाद तो उसमें और कमी आ जाती है। लाखों छात्र पीएमटी, पीईटी में प्रवेश के लिए बैठते थे, सीट कुछ सैकड़ा भी नहीं होती थी। यदि आरक्षण नहीं भी होता तो लाखों के डॉक्टर इंजीनियर बनने की कोई गुंजाइश नहीं थी, लेकिन हमेशा यह कुप्रचार हुआ कि दलित हमारी सीट खा गए। सही बात तो यह है कि आज भी दलित किसी की सीट नहीं खा रहे हैं, यही हाल नौकरियों में भी है। रविवार में ही हमने लेख छापा था, उसमें लेखिका यही तो लिख रही हैं कि अगर आप दलित हैं और काबिल हैं, पहले नम्बर से पास होते हैं, तो भी आपको आरक्षण कोटे का ही समझा जाता है। शिक्षकों का सरकारी नौकरी के साक्षात्कार में दलितों का चयन नहीं होता था। सन् 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश दिया कि आरक्षित सीट खाली नही रखी जावे। 12 फरवरी 2016 की टेलिग्राफ की रिर्पोट है कि अनुसूचित जाति जनताति की सीटे 7.28, 12.58 कुल 9' ही भर पा रही है, जबकि आरक्षण 22' है। मेरा मानना है कि दूसरी किसी दौड़ में तो दलित दिख नहीं रहे हैं, अगर यहां से भी उन्हें खिसका दिया गया, तो वो कहीं नहीं बचेंगे। व्यापार-उद्योग में वो नहीं हैं। शिक्षा-चिकित्सा में नहीं हैं। कहीं के भी बाजार देख लीजिए, वो कहीं दिखेंगे नहीं और पॉश कॉलोनियों को भी ले लीजिए। इंदौर की ही बात कर लेते हैं, 500 से 1000 कॉलोनियां होंगी, पर दलितों की स्थिति क्या है? वो दूर-दूर तक नहीं है। कहा जाता है कि हिन्दू-मुसलमान की साम्प्रदायिकता मैं कहता हूं असल साम्प्रदायिकता तो दलित के साथ हुई है और हो रही है। मुसलमान तो अभी भी साथ रह रहे हैं। हिन्दुस्तान के किसी भी गॉँव शहर में चले जाइए, हिन्दू-मुसलमान सदियों से साथ रह रहे है, लेकिन दलितों को सबसे दूर कोने में जगह दी गई है और यही वो अदृश्य भारत है, जो दिखता तो है, पर देखा नहीं जाता। उसकी रीड़ की हड्डी में कई बल पड़ गए हैं। उसे जिस तहर प्रताडि़त किया गया है, इतना कमजोर कर दिया है कि उसमें ना मेघा है ना ही चेतना, ना ही जुबान, ना ही हौंसला है। मैं अगर बोल और लिख रहा हूं, मेरे हौंसले का एक बड़ा कारण मेरी अच्छी जाति भी है, जो मेरे जिंस में है, पर दलित तो बोलने में भी लडख़ड़ाता है, क्योंकि कभी उसे खड़ा होने ही नहीं दिया गया। सच्चिदानंद-हीरानंद अज्ञेय की किताब ‘शेखर एक जीवनी’ मुझे कॉलेज के जमाने में मिल गई थी। उसमें अज्ञेय पानी की तलाश में भटकते हैं और उन्हें दूर एक झोपड़ी दिखाई देती है, जहां हरिजन रहता है, वो उससे पानी मांगते हैं, वो पानी देने के बजाय एकदम पीछे हट जाता है, वो समझ जाता है सामने ब्राह्मण है, वो उससे कहते हैं कि मुझे पानी पिला, वरना मैं मर जाऊंगा, वो कहता है आप एक जन्म मरेंगे, मैं सात जन्म मर जाऊंगा। मैं हरिजन हूं, पानी नहीं पिला सकता, उसके दिमाग में भर दिया गया है कि तेरे पाप ने तुझे इस जाति में जन्म दिया है। इस जन्म में सेवा कर, कर्म कर, अगला जन्म सुधर जाएगा। आंबेडकर ने सिर्फ दलितों की लड़ाई नहीं लड़ी। महिलाओं के लिए हिन्दू संपत्ति अधिनियम जिसमें बेटी, नारी को संपत्ति में अधिकार दिया गया था लाये, उसका देशभर में तीव्र विरोध हुआ। वो उस समय पास ना हो सका लेकिन बाद में लागू हुआ। गांधी, लोहिया, अंबेडकर की ही विचारधारा का प्रभाव था जो राजीव गांधी पंचायती राज विधेयक लाए, जिसमें पंच-सरपंच, महापौर महिलाएं एवं दलित महिलाओं के रूप में आरक्षित हुई। ग्वालियर-उज्जैन की मेयर दलित महिला इसी आरक्षण की वजह से ही बन सकीं। अन्यथा बगैर आरक्षण के तो अगले सौ-दो सौ साल संभव नहीं था। मुझे शन्नो रानी याद आ रही हैं, जिन्हें लोहिया ने ग्वालियर में लोकसभा चुनाव में विजयाराजे सिंधिया के सामने खड़ा किया था और नारा दिया था, ‘‘महारानी बनाम मेहतरानी’’। क्योंकि शन्नोरानी मेहतरानी थी। लोग बार-बार कहते हैं कि हमारा हक दलित ले रहे हैं, उन्हें आरक्षण देकर ज्यादती की गई, पर जो उनके साथ ज्यादती हुई है, उससे वे अदृश्य भारत बन गए। आखिर ये प्रथा किसने चलाई, जिसमें एक से दिखने वाले दो इंसान बड़े-छोटे हो गए। एक के हिस्से जुल्म आए और दूसरे के लिए सारी सुविधाएं। क्या आज भी हम इससे आजाद हो पाए हैं, यहॉँ बैठे हुए लोगों में से कितनों केकिचन में दलित जा सकते है। असल में हमारे यहां जात नाम के आगे तो बाद में लिखी जाती है, माथे पर पहले चस्पा कर दी जाती है और दिमाग जात देखने के बाद ही काम करता है। अगर हम इतिहास के पन्ने पलटते हैं, तो पता चलता है, हमारे देश में जितने भी हमलावर आये वे विजयी हुए। शक, हुण, अरब, गजनी, मंगोल, खिलजी, तुर्क, तेमूर मुगल, पुर्तगाली, अंग्रेज। क्योंकि देश में जातिप्रथा थी करोड़ों का देश, लेकिन बटा हुआ था। अंग्रेजों और पुर्तगाली को छोडक़र सभी इसी देश में रच बस गए। हमारा देश उन्हीं का मिला जुला संगम है। गाँधी ने आजादी की लड़ाई में इसे पहचाना जब वे जेल में थे उन्होंंने देखा कि सब आये तो देश के लिए लेकिन खाना तो दूर पानी भी एक दूसरे के हाथ लगा नही पी सकते। मुझे यहां भाषासिंह की किताब ‘अदृश्य भारत’ याद आ रही है। भाषासिंह ने देश की दलित बस्तियों का विस्तृत अध्ययन किया और ‘अदृश्य भारत’ पुस्तक लिखी है। इसमें वो हरिजन महिला से मिलती हैं, जिसके सिर पर मैले (टट्टी) का डिब्बा है, जब वो उससे बात करती है, तो वो हरिजन महिला उन्हें झिडक़ देती है और कहती है, दूर हट, मेरे सिर पर ही नहीं, जो बच्चा मेरे साथ है, वो भी टट्टी है और जो पेट में है, वो भी टट्टी है। मेरे नथुनों, हाथों, नाखुनों में टट्टी है। मेरा जो बच्चा पैदा होता है वो भी तुम्हारी टट्टी होकर पैदा होता है। हमें सीखाया गया है मां पूजनीय है, क्योंकि वो बच्चे के सारे काम करती है, जो कोई और नहीं करता। तो फिर हरिजन महिला भी मां ही हुई, क्योंकि वो तो बाद तक यही काम करती है। हमारे यहां अजीब विडम्बना है, जो दलित आरक्षण से ताकत पाते हैं, वही उनकी लड़ाई में पिछड़ जाते हैं। कई मौके ऐसे आए, जब आरक्षण के विरोध में रैलियां निकली हैं, पर जो आरक्षण से नेता बने हैं, विधायक मंत्री, सांसद बने हैं, वे खामोश रहते हैं। आवाज नहीं उठाते हैं, और वे भी नववाणिक ब्राह्मण बनने लगते है। यही बड़ा खतरा है। अगर आंबेडकर के सपने को पूरा करना है, एक मजबूत देश बनाना है, तो मैंने भाषण दे दिया, दया, प्रेम दिखा दिया, इससे कुछ नहीं होगा। अब दलित को ही आगे आना होगा। उसे टट्टी की हकीकत को सामने लाना होगा। सबसे पहले दलित साम्प्रदायिकता को खत्म करना होगा। जात-पात की दीवारें तोडऩा होगी और उन्हीं दीवारों से हवा के साथ रोशनी भी आएगी।