मार्च 2017

ईमानदार को डर लगे और बेईमान निडर हो

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

कश्मीर का रफीक 12 वर्ष जेल में रहकर घर आया है, माँ रो रही है। वो कह रहा है, मैंने क्या गुनाह किया था ? मेरी जिंदगी के 12 वर्ष लौटकर कैसे आएंगे। टी.वी. वालों ने दिखाया तो मालूम पड़ा। अन्यथा हजारों है जिन्हें मुलजिम बनाया जाता है। जमानत नहीं मिली तो अकारण ही ताउम्र जेल में रह गए। बहुत सो के पास धन साधन नहीं थे। अच्छा वकील नहीं मिला, तो सजा हो गई। खून के मुजरिम की आसानी से जमानत होने लगी। हमारे देश में यह कहावत बन गई न्याय वहीं पावे जिसके पावं में चांदी की बेड़ीयाँ और हाथ में सोने के कडें हो।

कश्मीर का रफीक 12 वर्ष जेल में रहकर घर आया है, माँ रो रही है। वो कह रहा है, मैंने क्या गुनाह किया था ? मेरी जिंदगी के 12 वर्ष लौटकर कैसे आएंगे। टी.वी. वालों ने दिखाया तो मालूम पड़ा। अन्यथा हजारों है जिन्हें मुलजिम बनाया जाता है। जमानत नहीं मिली तो अकारण ही ताउम्र जेल में रह गए। बहुत सो के पास धन साधन नहीं थे। अच्छा वकील नहीं मिला, तो सजा हो गई। खून के मुजरिम की आसानी से जमानत होने लगी। हमारे देश में यह कहावत बन गई न्याय वहीं पावे जिसके पावं में चांदी की बेड़ीयाँ और हाथ में सोने के कडें हो। इसके दुष्परिणाम यह हुए कि प्रत्युत्तर में नए तरह के अतिरेक आ गए। विश्वविद्यालय को सुधारने के लिए परीक्षा में नकल पकड़ाने पर पाँच वर्ष की सजा या पाँच हजार रुपए दंड या दोनों का कानून बनाया गया। मैं इसके पूर्व वि.वि. की कार्यपरिषद् का एवं नकल प्रकरण निराकरण समिति का अध्यक्ष था। मैंने साढे पांच सौ प्रकरणों के फैसले एक वर्ष में किए थे। मेरा अनुभव यह था कि ताकतवर नकल करता है। लेकिन पकड़ाता नहीं है। उसे देख कर कोई छात्रा रबर, रुमाल, चुन्नी पर लिखकर ले आती है और पकड़ा जाती है। उसे एक-दो, तीन वर्ष तक परीक्षा देने से अयोग्य करने का कानून है। इसे बढाकर पाँच वर्ष कर दीजिए। लेकिन पुलिस को देने पर प्रकरण न्यायलय में कम से कम 10-20 साल चलेगा। उस छात्रा को अपने ससुराल और उसके बाद अपने बच्चे के बच्चों के बीच भी चीटर के रूप में जाना जाएगा। मैं अखबार में पढ़ता आया हूँ कि दूध में मिलावट पर अर्थ दंड या कोर्ट उठने से लेकर पंद्रह दिन की सजा या ट्रांजेस्टर चौर को 6 माह का कारावास। इससे अधिक सजा पढ़ने सुनने में नहीं आती। कार्यपरिषद एवं नकल समिति में पक्षपात के आधार पर कई बार खुद निर्णय करने वाले गलत काम करते है। जब देश में न्यायपूर्ण व्यवस्था हो जाए, तब इन्हें पुलिस को सौंप देना। मैंने अखबारों में लेख भी लिखे। कालांतर में यह कानून खत्म हो गया। वक्त बदला देश ने ताकतवरों को निपटते देखना शुरु किया। यूपीए सरकार में केबिनेट मंत्री ए. राजा से लेकर कनीमोझी, सुरेश कलमाड़ी बंद हुए। एक वर्ष से अधिक जेल में रहे। पूरे देश ने ताली बजाई। इसके बाद ओमप्रकाश चौटाला, सुब्रत राय, आशाराम आदि के अलग अलग तरह के प्रकरण है। देश ताली बजा रहा है। सलमान खान बरी हो गए, देश गाली बक रहा है। न्यायाधीश पर पैसे एवं प्रभाव में आने की बात कर रहा है। जो पकडा गया वो चोर है भले ही वो निर्दोष हो, यह कहावत हमारे देश में धीरे-धीरे मूर्त रूप ले रही है। पुलिस, आयकर या अन्य किसी भी विभाग की कार्रवाही हो प्राथमिकतौर पर ही सजा शुरु हो जाती है। इस अतिरेक की बानगी तमाम शासकीय महकमों की एक-दूसरे पर की जाने वाली छापामार कार्यवाही में भी आए दिन देख रहे है। पुलिस, आयकर, आर्थिक अपराध, लोकायुक्त सीबीआई मंत्री और न्यायाधीश छोटे बड़े का कोई भेद नहीं है। सब एक दूसरे पर कार्रवाही कर रहे है। पूर्व सेनाध्याक्षों तक पर कार्रवाई हो रही है। किसी ने अपनी जिंदगी में सब काम नियमपूर्वक किया हो, लेकिन उसकी पत्नी, भाई, रिश्तेदार, परिवार की सम्पत्ति उसके नाम चस्पा कर अखबार और टीवी पर खबर दे दी जाती है। वह देश में विलेन बन जाता है। इसी की दुष्परिणिति है कि आज देश भर में अदालते विचित्र किन्तु असत्य काम कर रही है, जिन प्रकरणों में एक-दो या पाँच वर्ष की सजा का प्रावधान है उन्हें गंभीर प्रकरण बनाकर उनमें साल साल भर तक जमानत नहीं दी जा रही है। तर्क है कि साक्ष्य नष्ट हो जाएंगे। न्यायलय यह नहीं पूछ रहा है कि सरकार उसका प्रशासन और पुलिस क्या इतनी जर्जर हो चुकी है ? यदि मुलजिम इसके बाद भी बरी हो गया तो बेगुनाही में मिली सजा और साक्ष्यर नाष्ट करने का गुनाहगार कौन होगा? सच तो यह है कि हम कुछ-कुछ उसी ओर जा रहे है जैसा कि कुछ मुस्लिम मुल्कों में होता है। बगैर किसी वकील, अपील दलील के हाथ काटना, फांसी पर लटकाना, पत्थरों से मार डालना। इसके बावजूद देश में लोकतंत्र के चारो स्तंभ काम कर रहे है। इनके द्वारा किए जान वाले काम सही-गलत भी होते है। यह तय करना मुश्किल होता है कौन सही है या गलत है। ऐसे में न्यायपालिका ही एक अंतिम विकल्प होती है। लेकिन जब ईमानदार को डर लगे और बेईमान निडर हो जाए और न्यायपालिका ही इनके साथ संगमंग होकर लकवाग्रस्थ होने लगे तब क्या होगा ? न्यायाधीश करनन ने 20 से अधिक न्यायधीशों की नियुक्ति एवं कार्य में पक्षपात एवं भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर पत्र लिखा है। सर्वोच्च न्यायालय ने करनन को अवमानना का नोटिस दिया है। न्यायाधीश काटजू भी कह चुके कि न्याय व्यवस्था में आधे लोग भ्रष्ट है। लेकिन करनन वाला मामला भिन्न हो गया है। वे कह रहे है मैं दलित हूँ इसलिए यह हो रहा है। वे दलित हैं, उन्होंने जिन्दगी भर अन्याय सहा है, यह सही है लेकिन अवमानना की कार्यवाही उनके दलित होने पर नहीं वरन् उनके द्वारा लगाया गए आरोपों के संदर्भ में हो रही है। करनन को निजी आरोपों के प्रमाण देना चाहिए। लेकिन उनके द्वारा उठाए गए मुद्दो पर न्यायपालिका में व्याप्त जातिवाद, पक्षपात, भ्रष्टाचार और कार्यप्रणाली पर बहस क्यों नहीं होना चाहिए? अवमानना के नाम पर बोलने से रोकने की सजा देश को मिल रही है। अनुचित लाभ – अनुचित हानि आजकल आलू, टमाटर और फूल बाजार में दो रुपये किलो बिक रहे है। लागत तो ठीक, मजदूरी भी नहीं निकल रही है, केवल हानि है, ऐसा अकसर होता रहता है जबकि सीमेंट 280 रुपए बोरी बिक रही है, यह 80 रुपए से भी कम में पढ़ती है। केवल लाभ है। इसके मूल में सीमेंट मालिकों का कारटेल है। इसमें भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष श्रीनिवासन, बिड़ला, बांगड़ आदि हैं। ये सब मिलकर ऊंचे से ऊंचे भाव तय करते है कोई सीमेंट मालिक कारटेल के भाव से कम पर सीमेंट नहीं बेचता है। इस तरह ये अनुचित लाभ ग्रहण करते हैं। इसके ठीक विपरीत आलू-टमाटर, फूल किसान की उपज है। इनका कारटेल नहीं है। कीमत किसान नहीं बाजार तय करता है। बाजार सरकार की नियत और नीति से चलता है। सरकार की नियत और नीति सीमेंट वालों के साथ रहती है। इस बहुत ज्यादा घटने और बहुत ज्यादा बढ़ने के मूल में सरकार की भूमिका ही होती हैं, आलू टमाटर का मतलब किसान है और सीमेंट का मतलब अम्बानी, अडानी, श्रीनिवासन आदि उद्योगपति है। इंडिया सीमेंट के मालिक श्रीनिवासन हैं। उनकी अध्यक्षता में चलने वाले क्रिकेट बोर्ड में नरेन्द्र मोदी, लालू यादव, अनुराग ठाकुर, शरद पंवार, ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजीव शुक्ला आदि थे। यह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड कहलाता था, लेकिन यह एक निजी बोर्ड था। जिसने जनता की भावनाओं को खरीद कर आईपीएल 20-20 जैसे टूर्नामेंट कराकर उसमें भी नग्नता परोसकर और सट्टा कराकर अनुचित लाभ कमाया, इससे अन्य भारतीय खेलों का अनुचित नुकसान हुआ। भारत की तीरंदाजी की स्वर्ण पदक विजेता सड़क पर बैठकर फल बेचकर अपनी जीविका चला रही है। हम इसकी दुष्परिणति ओलंपिक खेलों में देख भी सकते हैं। जहां हम पूरी दुनियां के सामने शर्मसार होते है। सर्वोच्च न्यायालय ने बोर्ड से राजनेताओं को हटाकर उनके कारटेल को तोड़कर नये नियम बना कर देश हित का काम किया है। यह उत्तरदायित्व सरकार का था लेकिन इसे निभा न्यायलय रहा है। न्यायलय न्याय करने के लिए होते है और सरकार काम करने के लिए होती है। सरकार को इस तरह के हजारों काम करना होते है लेकिन सरकार खुद ही लूट में शामिल होकर अन्य नेताओं के साथ कारटेल बनाकर काम करने लगे तब न्यायपालिका इस तरह के निर्णय से अच्छे संकेत दे सकती है लेकिन देश नहीं बदल सकती। परिवर्तन न्यायलय से नहीं जनता की चुनी हुई सरकार की ईमानदारी और संकल्प से आता है। हमारे देश में कभी उद्योगों एवं ऑटोमोबाइल आदि में लाइसेंस कोटा प्रणाली थी। व्यापार के लिए, मकानों के लिए बैंक लोन, हाउसिंग लोन नहीं मिलता था। राजीव गांधी के समय से लाइसेंस कोटा प्रणाली समाप्त हुई। मकानों के लिए ही नहीं अन्य कामों के लिए ऋण मिलना शुरु हुए, इससे उद्योग व्यापार, चिकित्सा, शिक्षा, मीडिया टेक्नोलॉजी आदि का विस्तार हुआ। इसके सद्प्रभाव और दुष्प्रभाव दोनों ही आना शुरु हो गए। सद्प्रभाव यह थे कि एकाधिकारवाद टुट रहा था। सभी क्षेत्रों में बढ़ती प्रतियोगिता ने अनुचित मुनाफे पर रोक लगाना शुरु कर दिया था। लेकिन इसके दुष्प्रभाव यह थे कि लोगों ने बैंकों को, वित्त संस्थानों को चूना लगाना शुरु कर दिया। सैकड़ो हजारों करोड़ के ऋण लेना शुरु कर दिए। जनता को मुर्ख बनाकर पब्लिक इश्यू लाना शुरु कर दिए। यह सबकुछ अनुचित लाभ की इंतहा थी। इसका भांडा 1992 में हर्षद मेहता कांड के रूप फूटकर देश के सामने आया। इस तरह की घटना से सबक लेकर सरकार ने आधी-अधूरी कार्यवाही की, लुटने वालों ने नए-नए रास्ते निकाल लिए। यूपीए सरकार के समय 2जी स्पेक्ट्रम, कोयला-खदान आदि घोटाले सामने आए। न्यायपालिका ने अपने तेवर दिखाए, पुन: कार्यवाहीयां हुई कुछ लोग जेल भी गए। बैंक डिफाल्टर और एनपीए उद्योगों को ऋण एवं पब्लिक इश्यू निकालने पर रोक लगाकर, देश को लूट कर अनुचित लाभ कमाने के मुख्य उत्पाद बन्द कर दिए। विजय माल्या, ललित मोदी आदि इसी तरह की भूल की उपज थे। आज अर्थव्यर्वस्था वैश्वीक हो चुकी है। हमें डॉलर और पौंड से लड़ना है। हम अमेरिका, यूरोप तो ठीक चीन, जापान का मुकाबला भी नहीं कर पा रहे है। हम स्टील, सोया आदि कई उद्योगों में इनसे पीट चुके है। जिस दिन सीमेंट बाहर से आना शुरु हो गई, उस दिन सीमेंट के कारटेल भी टूटकर बिखर जाएंगे। बैंकों के पहले ही लाखों करोड़ डूबे हुए है। जिनकी वापसी पर सराकर मौन है, शायद इस पर भी न्याय पालिका ही भविष्यी में कोई निर्णय करेगी। केन्द्र की सरकार के रहमोकरम पर कुछ उद्योगपति कब तक चल पाएंगे कहा नहीं जा सकता। वैश्वीक अर्थव्यवस्था से लड़ने की न तो हमारी दृष्टि है और ना ही इस दिशा में कोई विचार और कार्यक्रम है। म.प्र. में व्यापम घोटाला हुआ था। 1800 से अधिक छात्र और उनके पालक बंद हुए। एक मंत्री, कुछ अधिकारी और एक-दो बड़े डॉक्टर भी बंद हुए थे, उस घोटाले की एक बहुत बडी किताब है कुछ पन्ने फाड़ दिए या बदल दिए गए। उस किताब के एक पन्ने को सर्वोच्च न्यायालय ने खोल कर 650 छात्रों को जिन के प्रवेश 2008 से 2012 तक हुए थे। वे डॉक्टर बनकर प्रेक्टिस कर रहे थे, बहुत से तो पोस्ट ग्रेजुएट भी हो गए थे। उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया है। ये सब अनुचित लाभ के दोषी थे। लेकिन मुखिया और कई बड़ी मछलियां आज भी बची हुई हैं। यही नहीं वे छात्र जिनका स्थान इन गलत प्रवेश वालों ने ले लिया था, वे डॉक्टर बनने से रह गए हैं। उससे उनकी खुद की, समाज एवं देश की जो अनुचित हानि हुई है, उसकी भरपाई कौन करेगा? सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडू की शशिकला को मुख्यमंत्री की कुर्सी की जगह जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है। अनुचित लाभ को अनुचित हानि में नहीं वरन् उचित न्याय में बदल दिया है। हमारे देश में आज लोकतंत्र के सभी अंग काम कर रहे हैं। बहुत से छूट रहे है तो कुछ निपट भी रहे है। कौन कब कहां निपट जाएगा यह तो खुद निपटने वालो को भी नहीं पता है। क्योंकि वो भी कभी भी, कहीं भी निपट सकता है। जनता के वोट से या न्यायपालिका के दंडे से। अनुचित लाभ, अनुचित हानि को रोकने का एक उदाहरण यूपीए सरकार द्वारा लाया गया भूमि अधिग्रहण अध्यादेश था। मोदी सरकार ने सत्ता संभालते ही इसे उलटने की कोशिश की, लेकिन देश का किसान संगठित होकर खड़ा हो गया। सरकार पीछे हट गई। आज देश में विकास के नाम पर किसान की भूमि ओने-पौने दामों में नहीं ली जा सकती है। आजादी के बाद बरसों तक सरकार द्वारा विकास के नाम पर आवास, व्यवसाय, सड़क, पुल आदि के लिए जो भूमि अधिग्रहीत की जाती थी, वो भू-मालिक को अनुचित हानि पहुंचाती थी। जिनकी भूमि सरकारी योजनाओं में तिकड़मों से छोड़ दी जाती थी या छुड़ा ली जाती थी। वे अनुचित लाभ कमाते थे, सब कुछ भ्रष्टाचार और सरकार के रहमो-करम पर था। आज इस पर रोक लग चुकी है। इस रोके के बाद भी सरकार और उसके अधिकारियों की विकास के मूल में छुपी लालची वृत्ति और निरंकुशता का दौर जारी है। देश के सौ शहरों में स्मार्ट सिटी तैय्यार हो रही है। 25 से 30 लाख जनसंख्या के शहर में स्मार्ट सिटी में तकरीबन 1.50 से 2 लाख लोग आते है। एक स्मार्ट सिटी पर हजारों करोड़ खर्च हो रहे है। सड़कें चौड़ी हो रही है आधुनिक सुविधाएं आ रही है। किसी भी देश की जिंदगी के लिए जरूरी है लेकिन यह असंतुलित और अधूरी योजना है, 130 करोड़ के देश में 1.50 से 2 करोड़ के लिए है, इसे पूरे देश के लिए एक समग्र रूप से लाना चाहिए था। यह एक बहुत अच्छा काम है। जिसका क्रियान्वयन बहुत ही गलत तरीके से किया जा रहा है। कुछ लोगों की बर्बादी की कीमत पर बहुत से लोगों की खुशहाली का इंतजाम है। इनमें सबसे बड़ी अनुचित हानि उजड़ने वालों की हो रही है। उन्हें भूमि अधिग्रहण के नये कानून को पुराने कानून में मिलाकर उलझा दिया गया है। हम हजारों बरस राजा महाराजा, बादशाहों, नवाबों, जागीरदारों आदि की गुलामी के शिकार रहे। उसका चेतन-अचेतन आज भी हम सबमें विद्यमान है। हम 70 बरस में इस बर्बरता से बाहर आए हैं, लेकिन बहुत कुछ सुधरना बाकी है। एक लोकतंत्र में आजाद मुल्क में विकास की दौड़ में चाहे वो अच्छा ही क्यों न लग रहा हो, किसी की बर्बादी पर हो रहे विकास को देखकर हमारी मानवीयता के प्रति बेरुखी ही उजागर होती है। रंग, नस्ल, जात, मजहब, लिंग, धन, बल, आजादी, गुलामी में ना मालूम किस-किस तरह से, कितनी-कितनी तरह की अनुचित लाभ-हानि मिली हुई है। यह एक अनवरत सिलसिला है जो सदियों से चला आ रहा है, कभी कहीं बढता तो कभी कहीं कम होता दिखता है।