फरवरी 2017

जल्लीकट्टू के बहाने...

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के हजारों वर्ष पुराने परम्परागत खेल जल्लीपकट्टू पर रोक लगा दी । तमिलनाडु की जनता इसके विरोध में सड़कों पर आकर आंदोलन करने लगी। वह इसे अपनी परंपरा, संस्कृति और इतिहास बता रही थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के हजारों वर्ष पुराने परम्परागत खेल जल्लीपकट्टू पर रोक लगा दी । तमिलनाडु की जनता इसके विरोध में सड़कों पर आकर आंदोलन करने लगी। वह इसे अपनी परंपरा, संस्कृति और इतिहास बता रही थी। यह सच भी है, कभी राजा-महाराजा का युग था। तब इंसान की जिन्दगी जानवर से बदतर थी। राजा खतरनाक जानवर और आदमी की कुश्ती करवाता था। सांड, बैल, हाथी से आदमी को लड़वाता था। इसमें जो जीतता था, वही बचता था। राजा के साथ प्रजा भी इस खेल का मजा लेती थी। तमिलनाडु की उक्त प्रथा उस पुरातन कुरूपता की पुनरावृत्ति ही है। हमारे देश का दिमाग, इंसान हो या जानवर, उस पर होने वाले जुल्मों पर जड़ से चेतन्यता की ओर लौट रहा है। इस चेतना ने ही मानवीय मूल्य स्थापित किए हैं। कभी आदमी और जानवर दोनों ही का क्रय-विक्रय होता था। आज इंसान को बंधुआ या गुलाम नहीं बनाया जा सकता। इंसान द्वारा जानवर को खरीद जा सकता है, लेकिन उस पर किसी भी किस्म का जुल्म नहीं किया जा सकता है। नागपंचमी पर नाग को दूध पिलाने की प्रथा पर न्यायालय से रोक लग चुकी है। सांप कभी दूध पीता नहीं था और उसे दूध पिलाने के नाम पर उसकी पूजा कर उसे अधमरा करने या मारने को हम नागपंचमी कहते आए हैं। मेनका गांधी कह रही हैं कि गाय का दूध पीना उसका खून पीना है, यह हिंसा है। हम गाय का दूध पीते हैं, गायवाला उसका दूध बेचता है और उसे भूखा रखता है, पर्याप्त खुराक भी नहीं देता है। वह खुराक भी जूठन या गंदगी भरी जगहों पर गाय को मिलती है। यह सब कुछ हम अपने आजू-बाजू आए दिन देखते हैं। हमने इन पुरातन परम्पराओं में तरह-तरह के छोटे-छोटे सही-गलत रास्ते भी निकाले हैं। एक गरीब आदमी यदि हजारों लोगों को भोजन कराकर पुण्य अर्जित नहीं कर सकता तो वो चींटियों के झुंड को आटा डालकर, हजारों प्राणि़यों को भोजन कराने का पुण्य अर्जित कर सकता है। हम चींटी को मारने को पाप मानते हैं और चींटी को मारने के लिए पावडर भी डालते हैं। कुत्ता मंत्री-अफसर का हो, तो वो इंसान से अच्छी जिन्दगी जीता है, लेकिन सड़क का हो तो वो भूखा रहकर हड़क्या, पागल हो जाता है। राहगीर को काटता है। कुत्ते द्वारा लोगों को काटने की तादाद इतनी ज्यादा होती है कि हर वक्त इसके इंजेक्शन की कमी बनी रहती है। पहले कुत्ते को पकड़कर पिंजरा पोल ले जाकर बंद कर देते थे। अब पिंजरा पोल खत्म हो चुके हैं। कानून बन गया है कि कुत्ते को मार नहीं सकते हैं। कुत्ता आदमी को काट रहा है और तमाशा सब देख रहे हैं। बंदर और रीछ को मदारी नचाता है और अपना पेट पालता है। तोते और मैना को आदमी पिंजरे में बंद करता है। कबूतर से कभी चिट्ठी पहुंचाई जाती थी, आज भी कबूतरबाजी की जाती है। मुर्गे से मुर्गे को, तीतर से बटेर को, सांप से नेवले को, सांड से सांड को लड़ाया जाता है। मछली पानी में है तो उसे दाना खिलाकर पुण्य कमाया जाता है। उसी मछली को पानी से बाहर निकालकर बगैर पानी के तड़पा-तड़पा कर मार दिया जाता है। बकरा ईद का है तो उसे सबसे बढ़िया खुराक, सेवा मिलती है, लेकिन बाद में उसे ही सेवा करवाने वाले के हाथों मौत मिलती है। कभी जानकर और कभी अंजाने में इंसान-इंसान पर और इंसान जानवर पर जुल्म करता आया है। बहुत कुछ हटा है और बहुत कुछ हटना बाकी है। कभी-कभी लगता है कि इंसान और जानवर के बीच बहुत बड़ा अंतर है और कभी लगता है कि दोनों के बीच महज एक महीन रेखा है और कभी इंसान जानवर और जानवर इंसान बन जाता है। सर्वोच्च न्यायालय की कोशिश जानवर और इंसान को लेकर इंसानियत जगाने की थी। वो हार गया। केन्द्र सरकार ने इसे लागू करने पर संशोधन कर रोक लगा दी है। सरकारें न्यायालय का सम्मान करें और जनता से डरें यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है। लेकिन जनता की गलत बात से डरकर और न्यायालय की सही बात को ठुकराकर उसका अपमान करें, यह गलत संकेत है। पुलिस बनाम पुलिस का कुत्ता सन् सत्तर के दशक में समाजवादी नेता रामानंद तिवारी ने पुलिस के जवानों की दुर्दशा पर देश का ध्यान खींचा था। उन्होंने उनकी व्यथा-कथा इस तरह बयां कि ‘‘पुलिस का जवान अपने अफसर के खेत में बैल की जगह खुद जुतकर हल जोतता है। घर पर कपड़े धोता है। बर्तन मांजता है। अफसर के कुत्ते को खुद भूखे रहकर बढ़िया खाना खिलाता है और दूध पिलाता है।’’ इसका शीर्षक था ‘‘पुलिस बनाम पुलिस का कुत्ता’’। तब समाजवादियों ने इंसाफ के लिए देश में पुलिस यूनियन भी बनाई थी। वह यूनियन बाद में अपने साथियों पर हो रहे जुल्म, अन्याय के लिए संघर्ष करने के बजाय अपने हितों के लिए अफसरों की सेवा में बदल गई। उसी दौर में पुलिस में होते आ रहे अन्याय के विरुद्ध उत्तरप्रदेश में पुलिस ने बगावत की थी। जिसे तत्कालीन शासन ने कुचल दिया था। उसी दौर में आज के जदयू नेता शरद यादव ने पुलिस जवानों की लड़ाई लड़ते हुए ग्यारह महीने की जेल यात्रा की थी। यह पुलिस ही भारतीय पुलिस अर्धसैनिक बल, सीमा सुरक्षा बल आदि रूपों में देश की सेवा करती है। गुंडों से, नक्सलियों से और सीमा पर दुश्मंनों से लड़ती है। गोली खाती है, लेकिन शहीद नहीं कहलाती है। हद तो यह हो गई है कि एक मिलिट्री जवान वीडियो वायरल कर अपनी दर्दभरी जिन्दगी बयां कर रहा है। जिसमें देश की सेवा करने के बदले में अधूरी रोटी, वो भी रूखी है। दाल है, जिसमें मिर्च-मसाला, बघार नहीं है। वह बर्फ में है, नक्स लियों में है, सीमा पर है। वह भूखा है, प्यासा है और खड़े-खड़े ड्यूटी कर रहा है। उसकी ड्यूटी है, लेकिन देश की उसके प्रति कोई ड्यूटी नहीं है। हजारों साल की गुलामी ने हमारे देश के तन-मन को बीमार बनाया है, साथ ही एक गैर-बराबरी पर आधारित जुल्म-अन्याय करने का संस्कार भी दे दिया है। उसी की दुष्परिणति है कि हर बड़ा और ताकतवर जिन्दगी के किसी भी हिस्से में चाहे वो मर्द-औरत का हो या अमीर-गरीब का हो, चाहे वो नेता-जनता का हो या अफसर-मातहत का हो या रंग, नस्ल, जाति, मजहब का हो, भेदभाव करता है। बड़े को चाटना और छोटे को काटना भारतीय समाज की सबसे कड़वी हकीकत है। इंसानियत जो सबसे बड़ा धर्म है, वह देश की अंतिम प्राथमिकता है। कुपोषण से बच्चे मर जाएं, भूख से इंसान मर जाएं, कर्ज से किसान आत्महत्या कर लें या बैंक की लाइन में लगकर मर जाएं। इन सब पर देश में कोई गुस्सा, कोई बेचैनी नहीं होती है, लेकिन अतिक्रमित मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे की एक र्इंट हटाकर देखिए, पूरा समाज हजारों की तादाद में इकट्टा होकर हिंसा पर उतर जाएगा। इस घटनाक्रम पर सेनाध्यक्ष श्री रावत ने कहा है कि सैनिक किसी भी तरह से वीडियो वायरल नहीं करें। उन्होंने ठीक ही कहा है, उनका उत्तरदायित्व सेना में अनुशासन बनाकर रखना है। इसलिए हमारे संविधान निर्माताओं ने हथियार बंद सेवाओं में आंतरिक न्याय व्यवस्था भी बनाई है, लेकिन इस आंतरिक न्याय व्यवस्था की अपनी सीमाएं हैं। अभी-अभी सेना में आसमान में ऊंचाइयों पर छोड़े जाने वाले मारक वायुयान के बदले कम ऊंचाई के विमानों का सौदा कर भ्रष्टाचार करने के मामले में पूर्व वायु सेनाध्यक्ष को सीबीआई ने हिरासत में लेकर 8 दिनों तक पूछताछ की है। सेनाध्यक्ष ने कहा है कि अनुशासन तोड़ने वालों पर कठोर कार्रवाई होगी। सेनाध्यक्ष ने जो कहा है, क्या हमारे संविधान में सिर्फ इतनी ही व्यवस्था है। यह व्यवस्था तो हर सरकारी सेवा में है। सरकारी सेवा तो ठीक प्राइवेट नौकरी में भी यही व्यवस्था है। कौन सा संगठन चाहताहै कि उसके विरुद्ध कोई बात की जाए? फिर भी बात तो होती है और आवाज भी होती है। आन्दोलन होते हैं। इन पर निजी और सरकारी कार्रवाई भी होती है और दमन भी होते हैं। इसके प्रत्युत्तर में लड़ने वालों के लिए तत्कालिक तौर पर एक जगह जेल होती है, दूसरी जगह न्यायालय होता है और तीसरी जगह होता है चुनाव। केन्द्रीय राज्य मंत्री पूर्व व थल सेनाध्यक्ष वी.के. सिंह खुद अपनी नौकरी के लिए अनुशासन तोड़ कर न्यायालय गए थे। अधूरी रोटी उन्हें तब ही नहीं दिखती थी तो अब क्या दिखेगी। अटलबिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार के समय हुए ताबूत घोटाले ने सरकार और सेना को कटघरे में खड़ा कर दिया था। वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घोटाला भी उछला है। इनमें सेना और उसके बड़े अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। यह सब मामले कैसे उठ गए ? सेना की गोपनीयता कैसे भंग हो गई? इन सब मामलों में अनुशासन कहा गुम हो गया ? इसलिए सेना के मामलों में कहां बोलने की छूट है, कहां नहीं है। उस पर आरोप लगाना, कहां उचित है, कहां नहीं, यह अनिश्चित है। सत्ता की भाषा अलग होती है, चाहे वो राजनीति में हो, सेना में हो या जिन्दगी के किसी भी हिस्से में और मातहत की भाषा अलग होती है, सत्ता को मातहत का झुका सिर चाहिए होता है। इसीलिए सत्तारूढ़ को लोकतांत्रित होना चाहिए। किसी की बात सुनने का, उसका समाधान करने का साहस होना चाहिए। उसे समझना चाहिए कि भ्रष्टाचार देश को ही नहीं, सेना को भी दीमक की तरह चाट रहा है, एक सैनिक जो बर्फ में ड्यूटी कर रहा है, वो अपने साथियों के पेट की भूख के लिए आवाज उठा रहा है, उसे अंजाम भी मालूम है, फिर भी उठा रहा है। उस पर भरे पेट प्रतिप्रश्न कर कार्रवाई की बातें कर रहे हैं। भरे पेट वालों को डर है कि इससे उनकी अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार सामने आ जाएगा। यथास्थितिवादियों का तर्क है कि इससे देश बिखर जाएगा। उन्हें यह समझना होगा कि चाह तन-मन को गुनाहगार बना देती है, बाग के बाग को बीमार बना देती है, भूखे पेट देशभक्ति सिखाने वालों को भूख गद्दार बना देती है। हमारे जवान इसे झुठलाते हुए भूखे पेट रह कर देश की सेवा कर रहे हैं, वे अब लड़ना सीख रहे हैं। कानूनन यह लड़ाई वे नहीं लड़ सकते हैं। उनकी लड़ाई जब-जब भी जिसने लड़ी है, उसे कुचला गया है, जेल में डाला गया है। यह आवाज सैनिक द्वारा मीडिया को किए गए वीडियो वायरल की आवाज है, जबकि जिम्मेदारी मीडिया को इस समस्या की तह तक जाने की थी, उसे खोजकर लाने की थी। हमारी राजनीति और मीडिया की पहली प्राथमिकता मुलायम, अखिलेश, प्रहसन है, सलमान प्रकरण है। दूरदर्शन तो फिर भी इन्हें दिखा रहा है, लेकिन प्रिंट मीडिया की स्थिति तो बहुत ही खराब है, वह चेतन भगत जैसे आठ-दस लोगों की विचार शून्य यात्रा में गोते लगा रहा है।